आपका यह वोट बाजार के राष्ट्रपति के लिए अमेरिकी पूंजी और आर्थिक सुधारों के हक में है, कामरेड!
पलाश विश्वास
जेएनयू पलट माकपा के शीर्षस्थ नीति निर्धारक देस की जनता को मूर्ख समझकर अपने मौकापरस्त फैसलों को जायज ठहराने के लिए सांप्रदायिकता विरोध के फौरी तकाजा के बहाने व्यक्ति प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति पद पर समर्थन देने को बेशर्मी की हद तक जायज ठहरा रहे हैं, जबकि दरअसल राष्ट्रपति चुनाव के जरिए विचारधाराओं और राजनीतिक दलों के आर पार जो ध्रूवीकरण हुआ है, वह अमेरिकी पूंजी के हक में हैं, आर्थिक सुधारों को तेज करने के मकसद से हैं। विचारधारा और राजनीति के बहाने वोट बैंक के समीकरण साधते हुए दरअसल सांप्रदायिकता का संरक्षण ही करता रहा है सत्तावर्ग, जिसमें माकपाई भी सक्रिय तौर पर शामिल हैं। इतिहास गवाह है कि वक्त आने पर वामपंथियों ने कोई न कोई सिद्धांत गढ़कर हिंदुत्ववादियों के साथ खड़े होने में कोई परहेज नहीं किया। फिर संघ परिवार अकेले हिंदू राष्ट्रवाद का धारक वाहक नहीं है, बल्कि हिंदुत्व को सत्ता में अनूदित करने की कला कांग्रेस से बेहतर किसी को नहीं मालूम।संघ परिवार तो महज हिंदुत्व के नारे और कार्यक्रम उछालता है, मगर उन कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाने का निर्णायक काम हमेशा कांग्रेस ने किया है।कांग्रेस और संघ परिवार दोनों ही वर्चस्ववादी अर्थ व्यवस्था और सामाजिक अन्याय, असमता, मानवाधिकार के हनन की राजनीति करते रहे हैं ताकि एक फीसद लोगों के हितों के मद्देनजर बहिष्कृत निनानब्वे फीसद बहुजनसमाज को वंचित करके तमाम संसाधनों और अवसरों पर वर्चस्व की व्यवस्था जारी रहे। हमने बार बार लिखा है कि बंगाल में कोई वाम मोर्चा की सरकार नहीं थी, वह तो बंगाली ब्राह्मणमोर्चा की ही सरकार थी और जो बंगाली राष्ट्रवाद है , वह दरअसल ब्राह्मणवाद है। प्रणव को समर्थन के जरिये इस बंगाली ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद की चरम अभिव्यक्ति हुई है, जहां बंगाल के तमाम राजनीतिक दल एक ही अवस्थान पर खड़े हैं वर्चस्व कायम रखने के लिए।
हिंदू राष्ट्रवाद का मूल लक्ष्य है विषमता और अन्याय पर आधारित मनुस्मृति व्यवस्था को बनाये रखना। गैरहिंदुओं और खासकर मुसलमानों के खिलाफ सांप्रदायिकता और घृणा अभियान का मतलब है कि इस विषमता और अन्याय के शिकार बहुजनों को बिना कोई हक हकूक दिये हिंदुत्व राष्ट्रवाद में निष्मात करके सामाजिक बदलाव और बहुसंख्यकों के आर्थिक सशक्तीकरण को रोकना।धर्मनिरफेक्ष ताकतों का पहला एजंडा तो यही होना चाहिए कि वह इस विषमता और अन्याय के खिलाफ अपना कार्यक्रम बनाये और अमल करें। विषमता और अन्याय के शिकार लोग अगर गोलबंद हो गये तो सांप्रदायिकता और हिंदू राष्ट्रवाद के लिए स्पेस कहां बचता है, कामरेड? इस सिलसिले में वामपंथियों ने अब तक क्या किया है?
नवउदारवाद और अमेरिकी पूंजी का हिंदू राष्ट्रवाद से चोली दामन का साथ है तो आप एक का समर्थन और दूसरे का विरोध एक साथ कैसे कर सकते हैं?भाजपा और संघ परिवार को रोकने के लिए कामरेड , आप तो अमेरिकी पूंजी के हक में खड़े हो गये।कोयला कंपनियों के खिलाफ राष्ट्रपति की डिक्री से जाहिर है कि प्रणव रायसिना में क्या करेंगे। जाहिर है कि प्रणव के पीछ कौन कौन से औद्योगिक घराने हैं। साफ जाहिर है कि बागी क्षत्रपों को नकेल कसने के लिए कैसे अमेरिकी पूंजी ने निर्णायक भूमिका अदा की। हिलेरिया की कोलकाता में सवारी से लेकर ओबामा प्रवचन, तरह तरह की रपट, रेटिंग का सारा जोर आर्थिक सुधारों पर। ऐसे नाजुक वक्त पर य़ूपीए के साथ खड़े होकर वामपंथियों ने न सिर्फ आर्थिक सुधारों में अवरोध बनी राजनीतिक बाध्यताओं को खत्म कर दिया है, बल्कि नवउदारवादी हिंदू राष्ट्रवाद को राजनैतिक चुनौती की गुंजाइश भी खत्म कर दी है।
कहने को तो ममता बनर्जी भी आर्थिक सुधारों के खिलाफ हैं और उन्हींके विरोध के कारण मल्टी ब्रांड एफडीआई, भूमि अधिग्रहण कानून, पेंशन बिल और तमाम सुदारों के लिए जरूरी बिल अटके हुए हैं। आप तो इतना भी नहीं कर पाये। तब भी नहीं, जब आपके पास ६१ सांसद थे। दरअसल, ममता बनर्जी और वामपंथियों की जड़ें एक ही जगह शुरू होती हैं और खत्म भी वहीं। राजनीति के लिए राजनीति। वोटबैंक के लिए राजनीति। न ममता बनर्जी को आर्थिक सुधारों से परहेज हैं और न आपको। न आप वामपंथी मजदूर कर्मचारी यूनियनों, किसान सभा और तमाम सामाजिक संगठनों और शक्तियों के बावजूद आजतक सत्ता वर्ग के वर्चस्ववाद या फिर नवउदारवाद या हिंदू राष्ट्रवाद या अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी जनांदोलन खड़ा करने की कोशिश की और ममता का ही नवउदारवाद के खिलाफ जिहाद छेड़ने से खोई आशय है।
अमेरिकी साम्राज्यवाद और हिंदू राष्ट्रवाद एक दूसरे से नत्थी है। नंदीग्राम और सिंगूर परिदृश्य में वामपंथी पूंजीवाद का जो नंगा सच सामने आया, राष्ट्रपति चुनाव में उसीकी नये सिरे से पुष्टि हुई है।
14वें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान जारी है। लोकसभा, राज्यभा और विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान कर रहे हैं। इस बीच गुजरात भाजपा में क्रॉस वोटिंग की खबर मिली है।आज के चुनाव में कुल 4896 सांसद और विधायक (776 सांसद और 4120 विधायक) संसद और राज्य विधानसभाओं में मतदान कर सकेंगे। मतों का कुल मूल्य 10.98 लाख है और यदि सभी लोग मतदान करेंगे तो जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को 5 लाख 49 हजार 442 मत मूल्य की जरूरत होगी ।पूर्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का इस चुनावी मुकाबले में विजयी होना तय माना जा रहा है क्योंकि तृणमूल से समर्थन मिलने के बाद संप्रग खेमे को उम्मीद है कि प्रणब को लगभग 7.5 लाख मत मूल्य हासिल होगा जबकि संगमा को 3.15 लाख मत मूल्य मिल सकता है ।
विडंबना देखिये, वाममोर्चा का नेतृत्व करनेवाली माकपा ने नीतियों से अलग हट कर व्यक्ति विशेष को तरजीह देकर राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी का समर्थन करने की घोषणा की। इसके पीछे राजनीतिक रूप से तृणमूल कांग्रेस को अलग-थलग करने की माकपा रणनीति काम कर रही थी। इसलिए पार्टी ने जल्दबाजी में पहले ही प्रणब का समर्थन करने की घोषणा कर दी। अंत में तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने जब प्रणब को वोट देने की घोषणा कर दी तो माकपा की यह रणनीति धरी की धरी रह गयी। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में फूट डालने की माकपा की कौशल नाकाम हो गयी। पोलित ब्यूरो के सदस्य बुद्धदेव भंट्टाचार्य और विमान बोस सहित कुछ कामरेड यह मान कर चल रहे थे कि माकपा जब प्रणब का समर्थन करेगी तो तृणमूल खुद पीछे हट जायेगी। शह- मात के इस खेल में प्रारंभ में ममता पिछड़ रही थी लेकिन अचानक प्रंणब को समर्थन करने की घोषणा कर उन्होंने केंद्र के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर लिया। वाममोर्चा में एक फिर माकपा की रणनीति पर सवाल खड़ा हुआ है। माकपा के कुछ नेता भी इस मुद्दे पर पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से संतुष्ट नहीं हैं। पूर्व भूमि सुधार मंत्री व माकपा के वरिष्ठ नेता अब्दुर्रज्जाक मोल्ला ने कहा है कि जो लोग सोच रहे थे कि प्रणब का समर्थन करने से कांग्रेस और तृणमूल के बीच फूट पैदा होगी उनकी राजनीतिक समझ पर हैरत हो रही है। पूर्व लोक निर्माण मंत्री क्षीति गोस्वामी ने कहा कि इस घटना के बाद उम्मीद है कि माकपा अपनी गलती सुधार लेगी और आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ वामपंथी आंदोलन को मजबूत करने पर ध्यान देगी। नीति से हट कर कोई कौशल कामयाब नहीं हो सकता।
जाहिर है कि राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर माकपा एक बार फिर कांग्रेस के करीब आयी है। माकपा की सर्वोच्च नीति निर्धारण कमेटी पोलित ब्यूरो ने भले ही यूपीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन करने का निर्णय किया है, लेकिन इस मुद्दे पर कामरेड एकमत नहीं है। माकपा अंतत: भाकपा सहित कुछ घटक दलों को प्रणब को समर्थन करने के लिए मना नहीं सकी। पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा एकजुट है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न मुद्दों पर उनमें मतभेद उजागर होता रहा है। राष्ट्रपति चुनाव में भी वाममोर्चा में मतभेद उभर आया है। भाकपा और आरएसपी ने राष्ट्रपति चुनाव में तटस्थ रहने का निर्णय किया है। राजनीतिक कारणों से माकपा और फारवर्ड ब्लाक यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री व माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य बुद्धदेव भंट्टाचार्य ने कहा है कि इस बार राष्ट्रपति चुनाव में नीति नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष का मुद्दा है। श्री भंट्टाचार्य के कहने का मतलब बंगाल से पहली बार एक व्यक्ति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर जा रहा है। इसमें माकपा बाधक बन कर बंगाल की जनता को नाराज नहीं कर सकती। हमेशा नीतियों पर चलने वाले करात का तर्क है कि भाजपा समर्थित राजग उम्मीदवार को सर्वोच्च संवैधानिक पद पर जाने से रोकने के लिए प्रणब का समर्थन करने का निर्णय किया गया है। कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन के पीछे तृणमूल व कांग्रेस में फूट डालने की माकपा की रणनीति भी काम कर रही है। राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए उम्मीदवार का समर्थन करने के बावजूद माकपा केंद्र की जनविरोधी आर्थिक नीतियों का पुरजोर विरोध कर रही है जिसका सूत्रधार कुछ हद तक प्रणव मुखर्जी हैं। वामपंथी दलों का कांग्रेस विरोध 2014 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहेगा। इसमें राष्ट्रपति चुनाव एक अपवाद है।
फिर भी पाखंड से बाज कहां आते हैं हमारे कामरेड ?मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के उस आग्रह की आलोचना की है, जिसमें उन्होंने भारत से कहा है कि वाल-मार्ट को खुदरा क्षेत्र में कारोबार करने की अनुमति दी जाए। माकपा ने सरकार से कहा है कि वह अमेरिका के दबाव में न झुके। माकपा ने कहा है कि उसे अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान पर आपत्ति है, जिसमें उन्होंने भारत से अपने खुदरा क्षेत्र के दरवाजे वाल-मार्ट और अन्य विदेशी निवेशकों के लिए खोलने की बात कही है।
माकपा ने अपने वक्तव्य में कहा है, "यह निर्लज्ज बयान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार पर दबाव बनाने के लिए दिया गया है, ताकि वह मल्टीब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए दरवाजा खोल दे।"
पार्टी ने मांग की है, "माकपा चाहती है कि सरकार खुदरा क्षेत्र को विदेशी सुपर मार्केट चेन के लिए न खोले। ऐसा करने पर लाखों छोटे दुकानदारों और व्यापारियों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।"
राष्ट्रपति चुनाव और वामपंथ
प्रकाश करात
सीपीआई (एम) हमेशा से राष्ट्रपति चुनाव को एक राजनीतिक मुद्दे की तरह देखती आई है और इस मुद्दे पर एक राजनीतिक रुख अपनाती आई है। पिछले ही दिनों संपन्न हुई पार्टी की 20वीं कांग्रेस द्वारा तय की गई राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन, कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार तथा उसकी आर्थिक नीतियों के खिलाफ संघर्ष का आह्वान किया गया है। इसके साथ ही हमारी पार्टी, भाजपा तथा उसके सांप्रदायिक एजेंडा के भी खिलाफ है। हमारी पार्टी नवउदारवादी नीतियों, सांप्रदायिकता और बढ़ते साम्राज्यवादी प्रभाव के खिलाफ संघर्ष करेगी। पार्टी, मुद्दों के आधार पर गैर-कांग्रेसी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के साथ सहयोग का प्रयास करेगी और जनता के मुद्दों पर संयुक्त आंदोलनों व संघर्षों के लिए पहल करेगी। पार्टी एक वामपंथी-जनतांत्रिक विकल्प के निर्माण के लिए काम करेगी। इस तरह के विकल्प का तकाजा है कि एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में सीपीआई (एम) तथा वामपंथ की ताकत बढ़ाई जाए। सीपीआई (एम) तथा वामपंथ को मजबूत करने की प्रक्रिया का यह भी तकाजा है कि प. बंगाल में पार्टी तथा वामपंथी आंदोलन की हिफाजत की जाए, जिन पर भीषण हमला हो रहा है।
पार्टी ने राष्ट्रपति चुनाव में अपना रुख, परिस्थितियों के इसी खाके के संदर्भ में तय किया है। सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो ने प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का समर्थन करने का फैसला लिया है। 1991 के लोकसभा चुनाव से लगाकर, हमारे भाजपा द्वारा प्रायोजित उम्मीदवार का समर्थन करने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। इसकी वजह यह है कि भाजपा के ताकतवर बन जाने के बाद से, यह एक महत्वपूर्ण काम हो गया है कि उसे देश के संवैधानिक प्रमुख के पद पर ऐसे व्यक्ति को बैठाने से रोका जाए, जो हिंदुत्ववादी ताकतों के प्रभाव में आ सकता हो क्योंकि अगर ऐसा होता तो यह हमारे संविधान के धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक सिद्धांत के ही खिलाफ जाता।
इसी ख्याल से पार्टी ने 1992 के राष्ट्रपति चुनाव में, कांग्रेस के उम्मीदवार शंकरदयाल शर्मा का समर्थन किया था। और यही वजह थी कि 1992 के बाद से, नवउदारतावाद की उन नीतियों के अपने दृढ़ विरोध के बावजूद, जिनकी शुरूआत नरसिंह राव की सरकार ने की थी और जिन्हें उसके बाद से एक के बाद एक आई सरकारों ने जारी रखा है, हमारे देश के संविधान तथा राजनीतिक व्यवस्था के धर्मनिरपेक्ष आधार की हिफाजत करने को प्राथमिकता दी जाती रही है। इसी समझ के आधार पर पार्टी ने शंकरदयाल शर्मा, केआर नारायणन तथा प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था। राष्ट्रपति चुनाव के मामले में एक 2002 का चुनाव ही अपवाद रहा, जब एनडीए की सरकार सत्ता में थी। इस चुनाव में भाजपा ने एपीजे कलाम की उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया था और कांग्रेस ने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया था। चूंकि गैर-भाजपा खेमे का कोई दूसरा कारगर उम्मीदवार ही नहीं था, इस चुनाव में वामपंथी पार्टियों ने अपना ही उम्मीदवार खड़ा किया था।
वर्तमान राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी के उम्मीदवार बनाए जाने से, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने डॉ. कलाम को उम्मीदवार बनवाने की कोशिश की थी। यह ऐसा कदम था जिसे भाजपा का पूरा अनुमोदन हासिल था। इस कोशिश में विफल हो जाने के बाद, अब तृणमूल कांग्रेस के पास यही विकल्प रह गया है कि या तो चुनाव में हिस्सा ही न ले या फिर अपने रुख से पलटे और प्रणब मुखर्जी को समर्थन दे। सीपीआई (एम) ने अपना रुख तय करते हुए, सत्ताधारी गठजोड़ के भीतर की दरार को ध्यान में रखा है।
सीपीआई (एम) ने यह निर्णय लेते हुए इस तथ्य को भी ध्यान में रखा है कि अनेक गैर-यूपीए पार्टियों ने भी प्रणब मुखर्जी के लिए अपने समर्थन का एलान किया है। इनमें समाजवादी पार्टी, बसपा, जद (सेक्यूलर) तथा जनता दल (यूनाइटेड) शामिल हैं। अगर धर्मनिरपेक्ष विपक्षी पार्टियां इसके लिए तैयार होतीं तब तो सीपीआई (एम) अलग से उम्मीदवार खड़ा करने की बात भी सोच सकती थी। लेकिन, अन्नाद्रमुक तथा बीजद के अपवाद को छोड़कर, जिन्होंने संगमा के नाम का प्रस्ताव किया था, जिसका अब भाजपा समर्थन कर रही है, ज्यादातर धर्मनिरपेक्ष विपक्षी पार्टियां यूपीए के उम्मीदवार को समर्थन देने की ओर झुक रही थीं। इस तरह प्रणब मुखर्जी ऐेसे उम्मीदवार के रूप में सामने आये हैं, जिसके नाम पर व्यापकतम सहमति है। भाजपा तथा ममता बैनर्जी ने डॉ. कलाम को चुनाव में लड़वाने के लिए जैसी ताबड़तोड़ कोशिशें की थीं, खासतौर पर उनके संदर्भ में, व्यापकतम सहमति के इस पहलू को भी ध्यान रखना जरूरी है। इस तथ्य को देखते हुए कि 2002 के चुनाव में समाजवादी पार्टी कलाम के साथ थी, मुलायम सिंह व समाजवादी पार्टी का इन कोशिशों का साथ देना खासतौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है।
दूसरी अनेक पार्टियों के यूपीए के उम्मीदवार को समर्थन देने से कोई यूपीए की ताकत बढ़ नहीं जाती है। उल्टे यह तो चुनाव में अपने उम्मीदवार की नैया पार लगाने के लिए, बाहर की ताकतों पर कांग्रेस की निर्भरता को ही रेखांकित करता है। इसमें यह इशारा भी छुपा हुआ है कि ये ताकतें कांग्रेस से बराबरी की हैसियत से बात करने जा रही हैं और कांग्रेस उन पर अपनी मनमर्जी नहीं थोप सकती है।
कांग्रेस और भाजपा से लड़ने की राजनीतिक लाइन को, सभी मामलों में दोनों पार्टियों के साथ समान दूरी रखने की नीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मिसाल के तौर पर जहां तक राष्ट्रपति चुनाव का सवाल है, मौजूदा हालात में राष्ट्रपति तो प्रमुख पूंजीवादी पार्टियों द्वारा चुना गया व्यक्ति ही होगा। फिर भी, चूंकि इस चुनाव में असली मुद्दा यह है कि देश का संवैधानिक प्रमुख दृढ़तापूर्वक धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए न कि किसी भी तरह से भाजपा के असर में आ सकने वाला व्यक्ति, सीपीआई (एम) का जोर भाजपा-प्रायोजित उम्मीदवार के खिलाफ होगा।
जहां आर्थिक नीतियों के खिलाफ संघर्ष का सवाल होगा, जोर कांग्रेस तथा यूपीए की सरकार के खिलाफफ होगा। बेशक, कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी के पैरोकार, सीपीआई (एम) पर राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार का साथ देने का आरोप लगा सकते हैं। लेकिन, जब महंगाई तथा कांग्रेसी सरकार के अन्य जनविरोधी कदमों के खिलाफफ संघर्ष करने तथा जनांदोलनों का विकास करने का सवाल आता है, वही लोग सीपीआई (एम) पर भाजपा के साथ हो जाने का आरोप भी लगा सकते हैं। सीपीआई (एम) की लाइन की इस तरह व्याख्या नहीं की जा सकती है।
प्रणब मुखर्जी के कैबिनेट से तथा वित्त मंत्रालय से हटने से, कोई आर्थिक नीतियों की दिशा नहीं बदल जाएगी। इस पद पर चाहे पी चिदंबरम रहे हों या प्रणब मुखर्जी रहे हों या अब आगे जो भी कोई उनके हाथों वित्त मंत्रालय संभालेगा, नवउदारवादी नीतियां तो जारी ही रहने वाली हैं। इसकी वजह यह है कि ये सत्ताधारी वर्ग की नीतियां हैं, जिन पर कांग्रेस पार्टी चलती है। वास्तव में आने वाले दिनों में नवउदारवादी सुधारों के लिए नये सिरे से जोर लगाए जाने की ही संभावना है, जिसके लिए बड़े कारोबारी हलके तथा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के पैरोकार शोर मचाते रहे हैं।
बहुब्रांड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देना, इसी नये बलाघात का हिस्सा है। यह एक बड़ा मुद्दा है जिसका संबंध चार करोड़ लोगों की आजीविका का हिस्सा है। इसका प्रतिरोध करना होगा तथा इसे रोकना होगा। यह काम यूपीए के बाहर की सभी राजनीतिक पार्टियों को गोलबंद करने के जरिए ही किया जा सकता है। इस तरह की गोलबंदी में यूपीए का समर्थन कर रही कई पार्टियों को भी और एनडीए से जुड़ी पार्टियों को भी शामिल करना होगा। सीपीआई (एम), वालमॉर्ट तथा ऐसी ही अन्य कंपनियों को भारत में अपनी दूकानें खोलने से रोकने के लिए, एक शक्तिशाली आंदोलन के पक्ष में है। सीपीआई (एम) चाहेगी कि सभी विपक्षी पार्टियां इस मामले में एकजुट रुख अपनाएं। इसलिए, राष्ट्र्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार के चयन को, नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ लड़ने की कार्यनीति के साथ गड्डमड्ड करना सही नहीं होगा।
एक सवाल यह भी किया जा रहा है कि सीपीआई (एम) ने, राष्ट्रपति चुनाव से खुद को अलग क्यों नहीं रखा? यूपीए तथा भाजपा-समर्थित उम्मीदवारों के खिलाफ, पार्टी किसी को भी वोट न देने का रास्ता भी तो अपना सकती थी।
लेकिन, इस मामले में मतदान से दूर रहने का मतलब होता, प. बंगाल में ममता बैनर्जी तथा तृणमूल कांग्रेस के साथ खड़े होना। ऐसा करना राजनीतिक रूप से नुकसानदेह होता और हमें मंजूर नहीं था। तृणमूल कांग्रेस, बंगाल में सीपीआई (एम) के खिलाफ हिंसक आतंक की मुहिम चला रही है। विधानसभा चुनाव के बाद से, हमारी पार्टी तथा वाम मोर्चा के 68 सदस्यों व हमदर्दों की हत्या की जा चुकी है। जनतंत्र पर इस हमले ने जनता के सभी तबकों को अपने दायरे में ले लिया है। कांग्रेस तक को नहीं बख्शा गया है। इन परिस्थितियों में तृणमूल कांग्रेस जैसा ही रुख अपनाना, वामपंथ के हितों तथा प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ संघर्ष को ही चोट पहुंचाता। सीपीआई (एम) चूंकि सबसे बड़ी वामपंथी पार्टी है, उस पर ही प. बंगाल में मेहनतकशों की, उन पर हो रहे भारी हमले से रक्षा करने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी आती है। यह पार्टी का एक महत्वपूर्ण काम है कि वामपंथ के सबसे मजबूत आधार की रक्षा करे, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी तथा वामपंथ को आगे ले जाने में मदद मिलेगी।
पुन: यह प. बंगाल का ही मामला नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति चुनाव से दूर रहने का मतलब होता, मैदान से हटना। यह विकसित होते राजनीतिक परिदृश्य में पार्टी के हस्तक्षेप को भोथरा कर देता। शासक वर्ग सुनियोजित तरीके से वामपंथ पर हमला कर रहे हैं, ताकि उसे अलग-थलग कर सकें। 2009 से सीपीआई (एम) तथा वामपंथ की ताकत घटी है। इसका कोई भ्रम न रखते हुए भी कि शासक वर्ग अपना शत्रुतापूर्ण रुख छोड़ देंगे तथा नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ वामपंथ के समझौताहीन रुख को देखते हुए, यह जरूरी है कि सत्ताधारी गठजोड़ में विभिन्न पार्टियों के बीच के टकरावों तथा उनके बीच के विभाजनों का उपयोग किया जाए। इस मुकाम पर चुनाव से दूर रहना, इस संबंध में मददगार नहीं होगा।
राष्ट्रपति चुनाव में वामपंथी पार्टियां एक समान रुख नहीं अपना पाई हैं। इससे पहले भी ऐसा हुआ है। लेकिन, इस मुद्दे पर अलग-अलग रुख अपनाने से, वामपंथी एकता पर कोई खरोंच तक नहीं लगने वाली है। जहां तक प्रमुख राजनीतिक व आर्थिक मुद्दों का सवाल है, वामपंथी पार्टियों की साझा समझ बनी हुई है। इसी आधार पर वामपंथी पार्टियों ने खाद्य सुरक्षा तथा सार्वभौम सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मांग को लेकर, एकजुट अभियान तथा आंदोलन छेड़ने का आह्वान किया है।
http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/3057/10/0
विभिन्न क्षेत्रों में नव उदारवादी सुधार लागू करने का आरोप
First Published:01-11-09 12:51 PM
संप्रग सरकार पर विभिन्न क्षेत्रों में नव उदारवादी सुधार लागू करने का आरोप लगाते हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा है कि केन्द्र एनटीपीसी जैसी नवरत्न कंपनियों सहित मुनाफा देने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों के विनिवेश की तैयारी कर रहा है।
माकपा ने दावा किया कि सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों को नई पूंजी देने के लिए विश्व बैंक से दो अरब डॉलर का ऋण लिया है और विश्व बैंक की शर्तों के चलते यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों के विनिवेश की शुरूआत है।
पार्टी के मुखपत्र लोकलहर के ताजा अंक में कहा गया कि केन्द्र सरकार एनटीपीसी जैसी नवरत्न कंपनियों सहित मुनाफा देने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का विनिवेश करने की तैयारी कर रही है।
सरकार द्वारा प्रस्तावित प्रत्यक्ष कर कोड विधेयक की आलोचना करते हुए कहा गया कि इसमें अनेक प्रतिकूल प्रावधान हैं, जिससे राजस्व में भारी नुकसान होगा। विधेयक में निगमित कर दर को 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत करने और संपत्ति कर तथा पूंजी लाभ कर की दर में कटौती जैसे दूसरे कदम उठाने तथा करदाताओं के ऊपरी वर्ग को और ज्यादा राहत देने का प्रस्ताव है।
पार्टी ने कहा कि संप्रग सरकार चाहती है कि करों में कटौती के जरिए अमीर और अमीर बने हैं। इससे सामाजिक कल्याणकारी कदमों के फंड के लिए संसाधन जुटाने में उसकी प्रतिबद्धता की कमी खुलकर सामने आ जाती है।
लोकलहर में कहा गया कि संप्रग सरकार अनेक क्षेत्रों में नव उदारवादी सुधार लागू करने की प्रक्रिया में भी लगी है। बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा में संशोधन करने और उच्च शिक्षा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की इजाजत देने के लिए कानून बनाने का प्रस्ताव इन्हीं में से एक है।
साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर उसे साम्राज्यवाद से समझौता करने तथा भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर सरकार को रियायत देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
रविवार, 7 अक्टूबर 2007( 19:37 IST )
मध्यावधि चुनाव की आशंका के बीच माकपा ने साफ संकेत दिया है कि साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर उसे साम्राज्यवाद से समझौता करने तथा भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर सरकार को रियायत देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
समझौते पर कांग्रेस नीत संप्रग सरकार से तनातनी के मौजूदा माहौल में माकपा ने कहा है कि भाजपा नीत पूर्ववर्ती राजग सरकार ने छह साल के अपने शासन में किस तरह अमेरिकी पूँजी की घुसपैठ सुगम बना दी थी और कैसे तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंत सिंह गुपचुप तरीके से अमेरिकी विदेश उपमंत्री स्ट्रोब टालबोट से वार्ताएँ कर रहे थे तथा अमेरिकी हित साधने के लिए हर मोर्चे पर झुकने को तैयार थे।
माकपा के मुखपत्र लोकलहर के ताजा अंक के संपादकीय में कहा गया है कि माकपा तथा तीन अन्य वामपंथी दलों ने केवल सांप्रदायिक ताकतों का सत्तारोहण रोकने के लिए नहीं बल्कि राजग की साम्राज्यवाद परस्त विदेश नीति की विदाई के लिए भी संप्रग को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया था।
संपादकीय में याद दिलाया गया है कि इसीलिए माकपा ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम सीएमपी के शुरुआती मसौदे में अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते कायम करने के प्रयास की मंशा पर आपत्ति जताई थी और विश्व संबंधो में बहुध्रुवीयता की खातिर स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करने की स्पष्ट घोषणा के बाद ही सीएमपी को मंजूरी दी थी।
लोकलहर के संपादकीय में कहा गया है कि भाजपा नीत राजग के छह साल का शासनकाल विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व व्यापार संगठन की त्रिमूर्ति और सांप्रदायिकता के त्रिशूल के बीच अवैध गठजोड़ की तो गवाही देता है। अमेरिकी विदेश उपमंत्री स्ट्रोब टालबोट की पुस्तक से यह भी स्पष्ट है कि उनसे आठ दौर की गुपचुप वार्ताओं में तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंतसिंह ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के रणनीतिक हितों के साथ देश को बाँधने का वचन दे दिया था।
माकपा ने आतंकवाद विरोधी मुहिम में अफगानिस्तान, इराक, फिलस्तीन तथा ईरान में अमेरिका की बढ़ती सैन्य दखलंदाजी के मद्देनजर बहुध्रुवीयता तथा विकासशील देशों की एकजुटता को और जरूरी बताया है और आरोप लगाया है कि इस जरूरत तथा सीएमपी की वचनबद्धता की अनदेखी करते हुए संप्रग सरकार पूर्ववर्ती राजग की ही तरह अमेरिका परस्त विदेश नीति अपनाती रही है और भारत-अमेरिका परमाणु करार इसी की चरम अभिव्यक्ति है।
ज्ञातव्य है कि वामपंथी पार्टियों की राय में यह करार भारत की विदेश नीति को अमेरिकी हितों का अनुचर और देश को साम्राज्यवादी विस्तारवाद के मंसूबों से अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों में कनिष्ठ सहयोगी बना देगा।
पार्टी मुखपत्र ने कहा है कि साम्राज्यवाद एवं सांप्रदायिकता में दरअसल कोई विरोध नहीं है और इन दोनों से ही संघर्ष देश की संप्रभुता तथा स्वतंत्र देश के रूप में भारत की ताकतवर उपस्थिति के लिए आवश्यक है।
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