Thursday, July 19, 2012

Fwd: [New post] कार्टून विवाद :तर्कशील दलित नेतृत्व के अभाव का सवाल



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Date: 2012/7/19
Subject: [New post] कार्टून विवाद :तर्कशील दलित नेतृत्व के अभाव का सवाल
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कार्टून विवाद :तर्कशील दलित नेतृत्व के अभाव का सवाल

by समयांतर डैस्क

मोहन आर्या

cartoon-from-first-postइतिहास के जिस महानतम दलित ने अपनी व्यक्ति पूजा पर सख्त ऐतराज जताया था और जनतांत्रिक मूल्यों में आस्था के कारण ही शताब्दी के सर्वाधिक प्रभावशील व्यक्तित्व की हत्या तक को लोगों की उस महामानव से मुक्ति के अवसर के रूप में देखा था। उस अंबेडकर ने शायद ही सोचा होगा कि उनके तथाकथित अनुयायी उनके विचारों का अनुगमन करना असुविधाजनक जानकर उन्हें केवल एक ऐसी मूर्ति के रूप में स्थापित कर देंगे जिसकी केवल पूजा की जा सकती है और ऐसा करते हुए अपने आपको दलितों का सबसे बड़ा हितैषी घोषित करने की होड़ लग जाएगी।

हालिया कार्टून विवाद इस किस्म के दलित नेताओं को सामने लाता है जो केवल अस्मिता मान-सम्मान, अंबेडकर का अपमान आदि मुद्दों पर भावनात्मक मुद्रा में आकर अति मुखर हो जाते हैं। परंतु दलितों के वास्तविक मुद्दों पर या तो बहुत ही रहस्यमय और चालाक चुप्पी ओढ़ लेते हैं या फिर नाम मात्र की रस्मी सक्रियता दिखाते हैं। इससे ऐसा लगता है कि अंबेडकर के बाद, तर्कशील, विवेकशील, ईमानदार और प्रगतिशील दलित नेतृत्व का निर्वात अभी भी भरा नहीं जा सका है।

इस कार्टून विवाद में एनसीईआरटी की ग्यारहवीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की पाठ्य पुस्तक में छपे अंबेडकर के कार्टून पर कुछ दलित नेताओं द्वारा आपति जताई गई है। यह कार्टून सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर ने संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान बनाया था। जिसमें अंबेडकर एक घोंघे के ऊपर सवार हैं उनके एक हाथ में घोंघे की लगाम है दूसरे हाथ में चाबुक। यह घोंघा भारत के संविधान का प्रतीक है। अंबेडकर हाथ में चाबुक लिए हुए घोंघे को गति देना चाह रहे हैं। और घोंघे के पीछे नेहरू भी चाबुक से वार करने की मुद्रा में हैं। यह कार्टून अद्भुत कल्पनाशीलता का उदाहरण है। यह दिखाता है कि नेहरू चाह रहे हैं कि संविधान निर्माण का कार्य जल्दी पूरा हो। अंबेडकर भी संविधान रूपी घोंघे को आगे बढ़ाना चाह रहे हैं, परंतु अंबेडकर स्वयं उसके ऊपर बैठे हुए हैं और लगाम नही खींच रहे हैं जिससे संविधान को आगे बढ़ाने में विलंब हो रहा है। यह अंबेडकर का अपरूपण नही है दरअसल यह दिखाता है कि नेहरू और अंबेडकर दोनों चाह रहे हैं कि संविधान जल्दी बनकर तैयार हो, परंतु अंबेडकर संविधान बनाने की जल्दी में दलितों के लिए संवैधानिक संरक्षण की शर्त को छोडऩा नहीं चाहते हैं। जिससे एक गतिरोध पैदा हो जाता है यह इतिहास है कि भारतीय संविधान में निम्न जातियों एवं जन जातियों के संरक्षण के प्रश्न पर अंबेडकर और नेहरू में मतभेद थे। परंतु अंबेडकर पीछे नहीं हटे और उन्होंने 'राज्य और अल्पसंख्यक' शीर्षक वाले अपने संविधान सभा को सौंपे गए ज्ञापन की सभी महत्त्वपूर्ण बातों को भारतीय संविधान में सम्मिलित करने का प्रयास किया।

नेहरू द्वारा प्रस्तुत जिस उद्देश्य प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा द्वारा स्वीकृत किया गया था उसमें अल्पसंख्यकों (उस समय पाकिस्तान निर्माण को अंग्रेजों से आधिकारिक स्वीकृति नही मिली थी। ) जनजातियों, दलितों, व अन्य पिछड़े वर्गों के संरक्षण की बात तो कही गई थी परंतु इन संरक्षणों के रूप प्रकृति मात्रा विस्तार और अवधि को लेकर निश्चित रूप से अंबेडकर और शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व में मत भिन्नता थी। इसके अतिरिक्त परिसंघीय ढांचे भाषाई राज्य आदि प्रश्नों पर भी एक राय नहीं थी। परंतु अंबेडकर के सम्मुख मुख्य चुनौती निम्न जातियों के संरक्षण की थी जिसे उन्होंने स्वीकार किया और तमाम दबावों के बावजूद अपना दायित्व निभाया जिसके चलते संविधान निर्माण में कुछ विलंब अवश्य हुआ। अत: यह कार्टून अंबेडकर और शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व के उन मतभेदों को समझने के लिए संकेत देता है जिन पर अन्यथा बात ही नहीं होती। यह अपरूपण नहीं बल्कि तात्कालिक वास्तविक परिस्थितियों का चित्रण है जोकि एक कार्टूनिस्ट का दायित्व है। कार्टून विधा के साथ परिहास का पुट रहता ही है इसके बिना वह कार्टून नहीं रह जाएगा। कहा जाता है कि अंबेडकर ने स्वयं इस कार्टून को पसंद किया था। कुल मिलाकर यह कार्टून आपत्तिजनक नहीं है। दूसरा प्रश्न जो दलित नेताओं ने उठाया था कि 11वीं में पढऩे वाले छात्र क्या इस कार्टून को उसके ऐतिहासिक व राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समझ पाएंगे और क्या शिक्षक उसे इस रूप में समझा पाएंगे। यह प्रश्न वास्तव में विचारणीय है। यह एक सच्चाई है कि आम तौर पर समाज में अंबेडकर को वह स्थान नहीं दिया जाता जिसके वह अधिकारी हैं। सामान्यतया सवर्ण शिक्षक जिसकी सामाजिक ट्रेनिंग ही दलितों को तिरस्कार से देखने की रहती है वह इस कार्टून को अंबेडकर को नीचा दिखाने के प्रयास में प्रयोग कर ही सकता है। परंतु आप इस दलित तिरस्कार की सामाजिक ट्रेनिंग पाए हुए सवर्ण शिक्षक से अंबेडकर को किसी भी रूप में नहीं बचा सकते हैं। इस वर्ग ने हमेशा ही अंबेडकर की महानता को कम करके दिखाया है। वास्तव में ब्राह्मणवादी ढांचे पर पनपने वाला हर व्यक्ति आम तौर पर अंबेडकर का नाम सुनकर ही तिलमिला उठता है। वह छुपकर अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ता है और उन पर कालिख पोतता है। तो क्या इससे अंबेडकर की महानता और प्रासंगिकता कम हो जाती है? जब तक मानवता है तब तक अंबेडकर की महानता बनी रहेगी और जब तक जाति व्यवस्था और वर्गभेद है तब तक उनकी प्रासंगिकता भी बनी रहेगी। इस या उस कार्टून पर आपत्ति जता कर और तालिबानी रवैया अपना कर हम अंबेडकर के विचार स्वातंत्र्य की अवधारणा पर ही कुठाराघात करेंगे। इसके बावजूद भी यदि कुछ दलित नेता इस कार्टून को हटाने की मांग करते हैं और कपिल सिब्बल से माफी तक मंगवाने पर सफल हो जाते हैं तो भी हमें आपत्ति नहीं है। परंतु इस प्रकरण से एक बात साफ हो जाती है कि मुख्यधारा का दलित नेतृत्व चाहे वह किसी भी राजनीतिक पार्टी से ताल्लुक रखता हो दलितों को भावनात्मक रूप से उद्वेलित करने वाले मुद्दों पर तो अति मुखर हो जाता है और संसद तक ठप कर देता है परंतु दलितों के जीवन को वास्तविक और भौतिक रूप से प्रभावित करने वाले मुद्दों पर रहस्यमयी चुप्पी साध लेता है। इससे यह प्रतीत होता है कि समकालीन मुख्यधारा का दलित राजनीतिक नेतृत्व एक छद्म दलित नेतृत्व है। पिछले दिनों ही बेहद महत्त्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं जो दलितों के लिए इस कार्टून प्रकरण से अधिक प्रासंगिक हैं और जिन्होंने दलितों को एक अजीब से असमंजस की स्थिति में डाला हुआ है।

पहला है सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला जिसमें उत्तर प्रदेश में पदोन्नति में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान करने वाली पूर्ववर्ती मायावती सरकार के फैसले को असंवैधानिक ठहराया गया है। जबकि यह बात महत्त्वपूर्ण है कि इंद्र साहनी बनाम भारत संघ वाद में 13 जजों की संवैधानिक पीठ ने अनुसूचित जाति व जनजाति के भीतर क्रीमी लेयर की अवधारणा को खारिज किया था एवं इनके लिए पदोन्नति में आरक्षण को निश्चित अवधि के लिए संवैधानिक ठहराया था। तथा 77वें संविधान संशोधन 1995 द्वारा एससी व एसटी के लिए पदोन्नति में आरक्षण पर लगाई गई समयावधि की शर्त हटा दी गई है। अत: सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान फैसला पूर्ववर्ती संवैधानिक पीठ के फैसले से साम्य नहीं रखता है। एससी व एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण एक संवेदनशील व प्रासंगिक मसला है।

एस सी व एस टी को प्रोन्नति में आरक्षण एक संवेदनशील और प्रासंगिक मसला है। वर्तमान में नियुक्ति में ही आरक्षण को नियमानुसार पूरा नहीं किया जा रहा है। यदि किसी तरह आरक्षित वर्ग के लोग राजकीय सेवा में आ भी जाएं तो वहां उनकी उन्नति के रास्ते सवर्ण वर्चस्व के द्वारा बंद करने की पूरी कोशिश की जाती है। आम तौर पर दलित अधिकारियों और कर्मचारियों की पोस्टिंग दूर-दराज के इलाकों में की जाती है। विभाग के भीतर विभिन्न तरीकों से परेशान करने की कोशिश की जाती है। दलित व आदिवासी समुदाय के लोगों को काले सांपों की तरह देखा जाता है जो कि सवर्णों के अनुसार उनका अधिकार छीनने ही आए हैं। सवर्ण यह नहीं देख पाते कि भला वह कौन से पुश्तैनी अधिकार हैं जो दलित उनसे छीन लेगा। सरकारी विभागों में दलित अधिकारी और कर्मचारियों की दयनीय स्थिति का ब्यौरा देने की यहां आवश्यकता नहीं है, परंतु उदहारण के तौर पर हाल में देहरादून में ओएनजीसी के एक रिटायर्ड दलित अधिकारी द्वारा अपने उच्चाधिकारियों पर जातिगत अत्याचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पिछले वर्ष केरल में महानियंत्रक के पद से सेवानिवृत्त दलित अधिकारी के वाहन तक को गौमूत्र से शुद्ध किया गया था। इन घटनाओं से पता चलता है कि विशेष संरक्षणात्मक उपायों के बिना दलितों और आदिवासियों का उच्च पदों तक पहुंचना अभी मुश्किल है। तथा उच्च पदों पर इनकी नाम मात्र की भागीदारी पदोन्नति में आरक्षण को जरूरी बना देती है। परंतु अंबेडकर के कार्टून पर हंगामा करने वालों को पदोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान संशोधन लाने की मांग पर संसद को ठप करने की बात क्यों नहीं सूझती है?

दूसरी घटना है पटना हाईकोर्ट का वह फैसला जिसमें बथानी टोला में दलितों का नर संहार करने वालों को पुख्ता साक्ष्यों के अभाव में छोड़ दिया गया है। 1996 में कुल मिलाकर लगभग 300 दलित रणवीर सेना द्वारा मार दिए गए थे। बिहार में दलितों की नुमाइंदगी का दावा करने वाले राम विलास पासवान ने इस मुद्दे पर जुबान तक नहीं खोली और वे अंबेडकर के कार्टून को छापने वालों पर आपराधिक केस दर्ज करने की बात करते हैं। मायावती और बसपा ने भी कोर्ट के इस फैसले पर चुप्पी साधी है। अनुसूचित जाति आयोग यहां कुछ क्यों नहीं कर रहा है। नि:संदेह मसला न्यायिक है परंतु तकनीकी औपचारिकता के चलते या फिर अदालत की अवमानना के डर से दलित नेतृत्व यदि खामोशी ओढ़ लेता है तो वह सच्चा दलित नेतृत्व नहीं है। यदि दलितों के हत्यारे निर्दोष हैं तो उनकी हत्या किसने की। क्या दलित हमेशा इसी तरह मारा जाता रहेगा।

तीसरी घटना है यूपी में बसपा का राजनैतिक पतन, माया सरकार का चला जाना और उसके तुरंत बाद ही दलितों पर उत्तरप्रदेश में अत्याचार का बढऩा उनके घर जलाया जाना आदि। यह घटना इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि अब सामान्य राजनीतिक और सामजिक चेतना रखने वाले दलित के सामने प्रश्न है कि आगे क्या? उच्च जातियों के समर्थन से मिली राजनीतिक सत्ता दलितों के हाथ से फिसल चुकी है। इसमें नेतृत्व की अदूरदर्शिता और मनमानापन उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि दलितों का अकेले अपने दम पर निर्णायक भूमिका में न रह पाना है और वर्तमान में उत्तरप्रदेश सरकार ने बहुत ही जल्दबाजी में अध्यादेश द्वारा सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को लागू करने की कोशिश की है जिसमें प्रोन्नति में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण को समाप्त कर दिया गया है। ऐसा करके उसने ओबीसी और मुसलिमों के साथ साथ उच्च जातियों को भी अपने पाले में कर लिया है।

दलित और जनजाति समुदाय फिर से अल्पसंख्यक वाली दयनीय स्थिति में आ गया है। तमाम सदिच्छाओं और प्रयासों के बावजूद दलित और ओबीसी सत्ता संघर्ष में सहयोगी नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धी के रूप में उभर कर आए हैं। और कई जगह तो ओबीसी ने दलितों के उत्पीडऩ में सवर्णों को भी पीछे छोड़ दिया है।

भारत में समकालीन दलित आंदोलन के सामने कई ऐसे प्रश्न हैं जिन पर निर्णायक फैसले लिए जाने हैं और मुख्यधारा का दलित नेतृत्व इस समय भी अंबेडकर के कार्टून को मुद्दा बना रहा है। यह दलित नेतृत्व निहायत ही लम्पट अवसरवादी और सुविधाभोगी है। साथ ही यह जिन पार्टियों में भी है वह मूल रूप से दलित और अंबेडकर विरोधी ही है। बसपा भी भले ही अंबेडकर की विरासत को आगे ले जाने का दावा करे परंतु वह भी समाज के जातिगत ढांचे और शक्ति समीकरणों को यथावत रखते हुए अपने हितों की राजनीति को जिलाए रखना चाहती है। अन्य पार्टियां तो विशुद्ध रूप से दलित व अंबेडकर विरोधी हैं इनके सर्वसमावेशी सिद्धांत के पीछे इनका सवर्ण वर्चस्ववादी चेहरा छिपा हुआ है। पिछली यूपीए सरकार में सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मीरा कुमार ने अनुसूचित जाति की बढ़ी हुई जनसंख्या का हवाला देकर जब उनके लिए आरक्षण अनुपात को बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था तो तत्कालीन यूपीए ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। मीरा कुमार ने भी मंत्रालय से छपने वाले संपूर्ण अंबेडकर वांग्मय पर रोक लगा दी थी वह भी बिना कोई कारण बताए। कांग्रेस के भीतर दलित नेतृत्व की स्थिति कभी भी निर्णायक बनी ही रही। अन्य पार्टियों में भी दलित नेतृत्व सहमा और दुबका सा दिखाई देता है। कांशीराम ने इस दलित नेतृत्व को ही चमचा नेतृत्व कहा था जो कि सवर्ण नेताओं की चमचागिरी पर ही अपना अस्तित्व बनाए रखता है।

उत्तर अंबेडकर युग में राजनीतिक उत्थान और सत्ता में भागीदारी बढऩे के बावजूद भी एक तर्कशील, विवेकशील और दूरदर्शी दलित नेतृत्व का अभाव सा हो गया है।

वर्तमान में दलितों और आदिवासियों के सम्मुख कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण चुनौतियां हैं जिनको लेकर विशुद्ध दलित आधार वाली पार्टियों के पास भी कोई ठोस रणनीति नहीं है। यह चुनौतियां मुख्य रूप से निम्न हैं-

  • -बढ़ता हुआ निजीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र का संकुचन।
  • -शिक्षा के निजीकरण से उच्च शिक्षा में इन वर्गों की भागीदारी और भी कम हो जाना।
  • -तमाम औद्योगीकरण और पूंजीवादीकरण के बावजूद जाति संरचना का लगभग यथावत बने रहना और सर्वहाराकरण की सबसे ज्यादा शिकार होने वाली निम्न जातियों पर जातिगत अत्याचार में कोई कमी न होना।
  • -मध्यवर्ती जातियों, शूद्र जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों का अपनी राजनीतिक हैसियत के कारण दलितों के नए शोषक के रूप में उभरना।
  • -आरक्षण प्राप्त निम्न-मध्यम दलित वर्ग का एक वर्ग के रूप में अलगाव व असमंजस की स्थिति में होना जोकि अपने पूर्ववर्ती निम्न आर्थिक वर्ग से कट चुका है। और जिसे उसके आर्थिक संवर्गीय उच्च जाति के लोग स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इस वर्ग का अपने अस्तित्व और पहचान के संकट से जूझना।
  • -समानांतर साझी दलित संस्कृति का विकास न हो पाना जिसके अभाव में निम्न जातियों द्वारा उच्च जातियों की नकल करते हुए संस्कृतिकरण को अपनाना।
  • -धर्मांतरित ईसाई और मुस्लिम दलितों का आरक्षण के लाभ से वंचित हो जाना और जाति की जकडऩ से धर्मांतरण के बाद भी मुक्त न हो पाना।
  • -दलितों और आदिवासियों के बीच उपजातियों का संघर्ष दिखाई देना।
  • -आरक्षण के प्रावधानों के बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र में अपर्याप्त भागीदारी और निजीक्षेत्र में लगभग अनुपस्थिति।
  • -मीडिया जनसंचार माध्यमों के द्वारा दलित व आदिवासी मुद्दों की भयंकर अनदेखी करना एवं समानांतर दलित व आदिवासी मीडिया का न पनप पाना। कला, संगीत, फिल्म, ड्रामा में अनुपस्थिति।
  • -अस्पृश्यता का भयंकर रूपों में जिंदा रहना।
  • -अनुसूचित जनजातियों का नए विकास के मॉडल के द्वारा विनाश किया जाना। उन्हें उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल कर दिया जाना।

इन तमाम समस्याओं और चुनौतियों को लेकर जिस बौद्धिक सांगठनिक और दूरदर्शी नेतृत्व की दरकार है वह मुख्यधारा का दलित नेतृत्व कभी नहीं दे सकता। वह केवल अपने लिए सुविधाजनक प्रश्नों पर ही बोलता है। तो क्या अंबेडकर के बाद वास्तव में दलित नेतृत्व रहा ही नहीं? दरअसल ऐसा लगता है परंतु यह पूरा सच भी नहीं है साठ के दशक में उभरा दलित पैंथर आंदोलन वह पहला प्रयास था जिसमें ऊपर उठाई गई कई समस्याओं से जूझने का माद्दा था परंतु वह आंदोलन बिखर गया वर्तमान में देश के अलग-अलग हिस्सों में छोटे-छोटे दलित व आदिवासी संगठन उभरे हैं। जिनके नजरिए में तर्क और विवेक स्पस्ट दिखाई देता है। साहित्य में तो एक तरह से दलित क्रांति ही हुई है। समानांतर दलित साहित्य आज एक सच्चाई है। राजनीति में भी छोटे-छोटे समूह दलित प्रश्नों पर मुखर हो रहे हैं। बथानी टोला से संबंधित फैसले के बाद बिहार में सीपीआई एमएल का आंदोलन प्रशंसनीय है। यह कम्युनिस्ट पार्टी यदि जाति व्यवस्था से संबंधित अपनी अवधारणा को अपने ही अनुभवों से समृद्ध करे तो बिहार में यह दलित उभार की एक नई शुरुआत हो सकती है।

यह बात जरूर है कि इस प्रकार के आंदोलनकारी नेतृत्व को मीडिया में कवरेज नहीं मिलता है साथ ही एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि बसपा से जुड़ा संगठन बामसेफ निजीकरण के खिलाफ निरंतर तार्किक संघर्ष की ओर बढ़ रहा है। विडंबना यह है कि मीडिया और न्यूज चैनलों में उन दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों को ही बुलाया जाता है जिनकी समझ अपनी आका पार्टियों की यथास्थितिवादी समझ से कतई आगे नहीं होती। यदि कभी समझदार दलित बुद्धिजीवी इस तरह के कार्यक्रमों में आ भी जाए तो उसे अपनी बात ही पूरी कहने नहीं दी जाती है। जैसे कि हालिया कार्टून मुद्दे पर एनडीटीवी में जारी बहस पर प्रकाश अंबेडकर बहुत ही संतुलित तरीके से तार्किक पक्ष रख रहे थे उन्हें बोलने ही नहीं दिया जा रहा था और पीएल पुनिया जो कि भावावेश में अंध अंबेडकर भक्त हुए जा रहे थे उनकी अतार्किक बातों को बार-बार सुनाया जाता रहा। दलित प्रतिनिधित्व के संकट और सवर्ण वर्चस्व के चलते मीडिया की यही भूमिका हो सकती है।

फिलहाल हम छोटे-छोटे स्तरों पर उभर रहे उन गुमनाम दलित व आदिवासी आंदोलनों से ही अपेक्षा कर सकते हैं जो कि वास्तविक दलित प्रश्नों की बुनियाद पर खड़े हो रहे हैं निसंदेह ये दलित और आदिवासी आंदोलन ही अंबेडकर की विरासत के सच्चे वाहक होंगे और जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के अंबेडकर के महान स्वप्न को साकार करेंगे।

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