| Saturday, 16 February 2013 11:59 |
कुमार प्रशांत भ्रष्टाचार और पिछड़ी जातियों के संदर्भ में आशीष नंदी ने जो कहा वह एकदम तथ्यहीन है। उन्हें मैंने जितनी बार, अपनी वह बात कहते टीवी पर देखा, हर बार मुझे लगा कि वे अपनी बौद्धिकता को एक अंगुली ऊपर स्थापित करने के तेवर में बोल रहे थे और उस रौ में ऐसे बहे कि बेलगाम बोल गए। क्या इस बात से कोई इनकार कर सकता है कि इस देश में अनगिनत स्तरों पर, अनगिनत किस्म के भ्रष्टाचार की बजबजाती नालियां बह रही हैं और हम उसमें लोटपोट हो रहे हैं! इसमें सारी तथाकथित उच्च जातियां बगैर किसी अपवाद के लिप्त हैं, ठीक वैसे ही जैसे बगैर किसी अपवाद के इन सारी जातियों में ऐसे लोग हैं जो इस बुराई से लड़ भी रहे हैं। जब हमारी पिछड़ी जातियों को मौका मिला कि वे भी सत्ता-संपत्ति के इस पापकुंड में उतरें तो वे भी इसी में लोटपोट होने लगीं और इसमें भी अपवाद कोई नहीं बचा। तो इसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण यही हो सकता है कि अलग-अलग स्तरों पर जीने वाली जातियां चाहे कितनी भी भिन्न हों, मानवीय कमजोरियों के क्षण में उनमें कोई फर्क नहीं रहता है। और यह भी इसी सांस में कहने की जरूरत है कि पिछड़ी जातियों में भी ऐसे लोग हैं जो इस बुराई से लड़ रहे हैं। फिर समाजशास्त्री कहेगा कि जहां तक बुराइयों से लड़ने का सवाल है, जातियों की घेरेबंदी वहां भी कमजोर पड़ जाती है। इसलिए भ्रष्टाचार कई कारणों से चलता और फैलता है और उस पर काबू पाने के लिए कई स्तरों पर, कई तरह की पहल करनी होगी। लेकिन इसे समझना बहुत जरूरी है कि अंतत:यह मानवीय चरित्र की समस्या है जिससे नैतिक स्तर पर ही लड़ा जा सकता है। अगर आशीष नंदी इस विश्लेषण से सहमत हों तो उन्हें इस तरह से ही यह बात कहनी चाहिए थी और बार-बार दी गई अपनी उलझी हुई सफाई में भी इसे पेश करना चाहिए था। लेकिन एक सवाल फिर भी बचा रहता है कि क्या हम ऐसा कहना चाहते हैं कि हमारे देश में किसी को भी यह अधिकार नहीं होगा कि वह ऐसी बातें कह सके जो आमतौर पर कही नहीं जाती हैं? आशीष नंदी को जो जानते-पढ़ते रहे हैं, जानते हैं कि वे पिछड़ी-वंचित जातियों के लिए सामाजिक न्याय और समता की बात करते रहे हैं। इसलिए आशीष नंदी की बहक को अपनी राजनीतिक गोटी लाल करने का मौका बना कर दलित राजनीतिक जिस तरह मैदान मारने में लग गए, वह हमारे समय का सबसे शर्मनाक मंजर है। इससे दलितों का कोई भला नहीं होगा। अदालत ने ठीक ही किया कि इस बहस को एक अच्छा मोड़ देकर छोड़ दिया। सलमान रुश्दी, ऐसा लगता है कि उन लोगों में हैं जो विवादों से ऊर्जा पाते हैं। पिछले साल की, जयपुर की बौद्धिक फैशन परेड में भी उनका ही नाम छाया रहा। इस बार जयपुर नहीं, तो उन्हें मिला कोलकाता! वे कोलकाता आ रहे थे लेकिन आए नहीं। क्यों? इसलिए कि ममता बनर्जी की तरफ से उन्हें धमकी मिली। लेकिन भाई रुश्दी, कलम उठाने में हिम्मत नाम की एक चीज भी तो लगती है। हम रचनाकारों के पास वह है, इसका भी तो प्रमाण मिलना चाहिए! ममता बनर्जी ने क्या धमकी दी थी आपको? बकौल आप ही, ऐसा कहवाया गया था कि अगर आप कोलकाता आते हैं तो हवाई अड््डे से ही गिरफ्तार कर, वापसी के जहाज में बिठा दिया जाएगा। यह तो मजे की बात थी! मुफ्त की यात्रा भी हो जाती आपकी और रंग भी चोखा आता! अपने विश्वास के लिए क्या हमें इतनी हिम्मत भी नहीं दिखानी चाहिए? कोलकाता हवाई अड््डे से आपको पकड़ कर वापस कर देती ममता बनर्जी सरकार तो आसमान फट पड़ता कि धरती डोल जाती? इसकी फिक्र तो ममता बनर्जी को होनी चाहिए थी कि उनकी सरकार ऐसा करेगी तो किसे क्या मुंह दिखाएगी! अपनी आस्था की जमीन पर जो पांव धरते भी डरे, वह दूसरा कुछ भी हो, कलम की आबरू रखने वाला रचनाकार नहीं हो सकता। बहुत धूल उड़ चुकी है। वक्त है कि हम अपना चेहरा साफ करें। |
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