Saturday, June 2, 2012

I have some clarifications on this story which I would write later. but I am posting Prayag`s story which uses the Term Bangladeshi for the partition victim refugeesउत्‍तराखंड में शरणार्थियों की जमीनों पर दबंगों का कब्‍जा long before the creation of

I have some clarifications on this story which I would write later. but I am posting Prayag`s story which uses the Term Bangladeshi for the partition victim refugees long before the creation of Bangladesh in 522-54.Otherwise the story is good. i would write om it very soon.


[LARGE][LINK=/index.php/yeduniya/1498-2012-06-02-12-08-35]उत्‍तराखंड में शरणार्थियों की जमीनों पर दबंगों का कब्‍जा   [/LINK] [/LARGE]
Written by प्रयाग पाण्डे Category: [LINK=/index.php/yeduniya]सियासत-ताकत-राजकाज-देश-प्रदेश-दुनिया-समाज-सरोकार[/LINK] Published on 02 June 2012 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=65cf964756b951696d5d9cfc0b4aaa7cef2ac214][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/yeduniya/1498-2012-06-02-12-08-35?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
कुमाऊँ की तराई में बसाये गये बंगाली शरणार्थियों को पट्टे पर दी गई कृषि जमीनों में मालिकाना हक दिये जाने के एवज में सितारगंज से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर एमएलए चुने गये किरन मंडल ने 23 मई को पार्टी और विधायकी से इस्तीफा देकर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। इसी रोज उत्‍तराखण्ड सरकार के मंत्रिमण्डल ने प्रदेश में गवर्नमेंट ग्रांट एक्ट-1895 के तहत खेती के निमित्‍त पट्टे पर दी गई जमीन पर पट्टाधारकों को मालिकाना हक देने का फैसला ले लिया। एक तरफ राज्य सरकार ने किरन मंडल की शर्त के मुताबिक कैबिनेट में प्रस्ताव पास किया, दूसरी तरफ मंडल ने पार्टी और विधायकी को अलविदा कहा। मंडल और उत्‍तराखण्ड सरकार के बीच का यह समझौता फौरी तौर पर मंडल और उनकी बिरादरी और कांग्रेस के लिए बेशक फायदे का नजर आ रहा हो। लेकिन इससे तराई के भीतर पिछले पचास सालों से लटके भूमि सुधार के मामले और जमीनों से जुडी़ दूसरी बुनियादी समस्याओं का समाधान होने वाला नहीं है। विधायकी की महज एक अदद सीट के लिए हुआ यह समझौता इस नये राज्य की भावी सियासी दशा और दिशा और खासकर कांग्रेस के लिए काफी मंहगा साबित हो सकता है। आनन-फानन में लिये गये इस फैसले से उत्‍तराखण्ड की जमीनी हकीकत को लेकर पहाड़ के नेताओं की तदर्थ सोच अवश्य जगजाहिर हो गई है।

सरकार ने कहा है कि इस फैसले से 1950 से 1980 के बीच समूचे राज्य में गवर्नमेंट ग्रांट एक्ट के तहत कृषि जमीन का पट्टा पाए करीब 60 हजार से ज्यादा पट्टा धारकों को फायदा मिलेगा। सरकार के इस फैसले के अगले ही रोज 24 मई को एक कैबिनेट मंत्री सुरेन्द्र राकेश ने आसामी पट्टाधारियों को भी मालिकाना हक देने की मॉग उठा दी है। उन्होंने मुख्यमंत्री से मिलकर कहा है कि तात्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गॉधी के आदेश पर 1973 से 1976 के बीच नैनीताल, उद्यमसिंहनगर, देहरादून और हरिद्वार जिलों में करीब 17 हजार दलितों को दिये गए आसामी पट्टाधारियों को भी सरकार मालिकाना हक दे। उत्‍तराखण्ड के मौजूदा सियासी गणित को अपने हक में करने की मजबूरी में लिए गए राज्य सरकार के ताजा फैसले से इन दिनों तराई समेत पूरे उत्‍तराखण्ड में भूमि सुधार का मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। इस बहाने भविष्य में कुमाऊँ और खासकर तराई में भूमि सुधार कानूनों को अमल में लाने के मुद्दे के जोर पकड़ने के आसार नजर आने लगे है।

दरअसल अपनी समृद्ध जमीन और वनसंपदा की वजह से तराई का इलाका मुगल काल से ही लडाइयों का केन्द्र रहा है। ऐतिहासिक नजरिये से तराई-भावर गुप्त काल से कुमाऊँ राज्य का हिस्सा रहा। उन दिनों कुमाऊँ में कत्यूरी वंश का राज था। कत्यूरी कुमाऊँ का सबसे पुराना राजवंश है। कत्यूरी शासन काल में तराई का यह इलाका खूब फूला-फला। ग्यारहवीं ईसवी में तराई को लेकर मुस्लिम शासकों और कत्यूरों के बीच अनेक बार झड़पें भी हुई। अकबर के शासन काल के दौरान कुमाऊँ में चंद वंश के राजा रूप चंद का शासन था। तब तराई को नौलखिया माल और कुमाऊँ के राजा को नौलखिया राजा कहा जाता था। उन दिनों यहॉ के राजा को तराई से सालाना नौ लाख रुपये की आमदनी होती थी। चंद राजा ने तब तराई को सहजगीर (अब जसपुर), कोटा- (अब काशीपुर), मुडियया -(अब बाजपुर), गदरपुर भुक्सर -(अब रूद्रपुर), बक्शी -(अब नानकमत्‍ता) और चिंकी- (सुबड़ना और बेहडी़) सात परगनों में बॉटा था। चंद वंश के चौथे राजा त्रिमूल चंद ने 1626 से 1638 तक कुमाऊँ में राज किया। त्रिमूल चंद के राज में तराई बहुत समृद्ध थी। तराई की समृद्धि के मद्देनजर अनेक राजाओं ने तराई पर नजर गडा़नी शुरू कर दी, तराई को हाथ से निकलते देख त्रिमूल चंद के उत्‍तराधिकारी राजा बाज बहादुर चंद ने दिल्ली के मुगल सम्राट शाहजहॉ से समझौता कर लिया। बदले में कुमाऊँ की सेना ने काबुल और कंधार की लडा़ईयों में मुगलों का साथ दिया।

औरंगजेब के शासन काल में 1678 ई. को कुमाऊँ के राजा बाज बहादुर चंद ने तराई में अपने प्रभुत्व का मुगल फरमान हासिल किया। 1744 से 1748 ई. के दौरान रूहेलखण्ड के रूहेलों ने कुमाऊँ पर दो बार आक्रमण किए। 1747 ई. में मुगल सम्राट ने फिर तराई पर कुमाऊँ के राजा का प्रभुत्व कबूल किया। 1814-1815 को सिंगौली की संधि के बाद 1815 में कुमाऊँ में ब्रिटिश कंपनी का आधिपत्य हो गया। 1864 में ब्रिटिश हुकूमत ने तराई और भावरी क्षेत्र के कुछ हिस्सों को मिलाकर यहॉ की करीब साढे़ चार लाख एकड़ जमीन को "तराई एण्ड भावर गवर्नमेंट इस्टेट" बना दिया। इसे "खाम इस्टेट" या "क्राउन लैण्ड" भी कहा जाता था। उस दौर में यहॉ करीब पौने पॉच सौ छोटे-बडे़ गॉव थे, इनमें से करीब पौने चार सौ गॉव इस्टेट के नियंत्रण में थे। ब्रिटिश सरकार अनेक स्थानों पर इस्टेट की जमीनों को खेती के लिए लीज पर भी देती थी। उस दौरान इस इलाके को बोलचाल में तराई-भावर इस्टेट कहा जाता था। 1891 में नैनीताल जिला बना। इस क्षेत्र को नैनीताल जिले के डिप्टी कमिश्नर के अधीन कर दिया गया।

तराई के ज्यादातर नगर कस्बे चंद राजाओं के शासन काल में बने। राजा रूद्र चंद ने रूद्रपुर नगर बसाया। रूद्र चंद के सामंत काशीनाथ अधिकारी ने काशीपुर और राजा बाजबहादुर चंद ने बाजपुर बसाया। ब्रिटिश हुकुमत के दिनों चंद वंश के उत्‍तराधिकारी को तराई -भावर जागीर में दे दी गई। उन्हें राजा साहब काशीपुर की पदवी से नवाजा गया। 1898 ई. में तराई में इंफल्युएंजा की बीमारी फैल गई। 1920 में यहॉ जबरदस्त हैजा फैला। इस दरम्यान यहॉ सुलताना डाकू का भी जबरदस्त खौफ था। इन सब वजहों से तराई में आबादी कम होती चली गई। अतीत में भी तराई कई बार बसी, और कई बार उजडी़। विश्व युद्ध के दौरान अनाज की कमी और पूर्वी पाकिस्तान से आये विस्थापितों को बसाने की मंशा से तराई-भावर के बहुत बडे़ भू-भाग के जंगलों को काटकर वहॉ बस्तियॉ बसाने को सिलसिला शुरू हुआ। दिसम्बर, 1948 को पंजाब के शरणार्थियों का पहला जत्था यहॉ पहुंचा। अगस्त 1949 में उन्हें भूमि आवंटन कि प्रक्रिया शुरू हुई।

तराई उत्‍तराखण्ड का सबसे ज्यादा मैदानी इलाका है। यह बेहद उपजाऊ क्षेत्र है। गन्ना, धान और गेहूं की उपज के मामले में तराई को देश के सबसे ज्यादा उपजाऊ वाले इलाकों में गिना जाता है। ब्रिटिश हुकुमत के दिनों से तराई के जंगलों में खेती करने का चलन तो था। पर तब तराई का ज्यादातर हिस्सा बेआबाद था। 1945 में यहॉ दूसरे विश्व युद्ध के सैनिकों को बसाने की योजना बनी। आजादी के बाद रक्षा मंत्रालय ने इस पर अमल करना था। 1946 में प्रदेश की पहली विधानसभा ने इस क्षेत्र में कुमाऊँ और गढ़वाल के लोगों को बसाने की योजना बनाई। पर यह कामयाब नहीं हो सकी। 1950 तक तराई की पूरी जमीन सरकार की थी। इसे खाम जमीन कहा जाता था।

1947 में भारत पाक विभाजन के वक्त आए शरणार्थियों को तराई में बसाने की योजना बनी। योजना के तहत पहले-पहल 1952 में पंजाब से आए हरेक शरणार्थी परिवार को 12 एकड़ जमीन दी गई। फिर बंगाल से आए शरणार्थीयों को जमीनें दी गई। बाद के सालों में इस योजना में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी शामिल किये गये। तराई में निजी व्यक्तियों और सहकारी समितियों को भी 99 साल की लीज पर जमीनें बॉटी गई। इस तरह दूसरे विश्व युद्ध के सैनिक, उत्‍तराखण्ड के वे लोग, जिनके पास जमीन नहीं थी। पंजाब एवं बंगाल से आये शरणार्थी, भूमिहीन स्वतंत्रा संग्राम सेनानी, युद्ध में अपंग या शहीद सैनिकों के परिवार और तराई के पुराने वाशिन्दे थारू-बुक्सा, अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों को तराई की जमीन का असल हकदार बनाया गया। पर हकीकत में ऐसा नहीं हो सका। जमीन के आवंटन में बरती गई धांधलियों के चलते राजनीतिज्ञ, उद्योगपति, फिल्मी हस्तियॉ, पुराने नवाब, अफसर और सरकारी मुलाजिम तराई की जमीन के असली मालिक बन बैठे। रक्षा मंत्रालय के जरिये सैनिकों को बॉटी जाने वाली जमीनों का ज्यादातर हिस्सा सेना के चंद अफसरों ने हथिया लिया। पंजाब से आये शरणार्थियों को जमीन बॉटने का फायदा भी राजनीतिक पहुंच वाले प्रकाश सिंह बादल और सुरजीत सिंह बरनाला सरीखे चंद नेताओं ने उठाया। पहाड़ के गरीब लोगों के नाम पर कुछ बड़े नेताओं, अफसरों और सरकारी मशीनरी ने जमीने घेरी। कुछ लोगों ने बंगाली शरणार्थियों को मिली जमीनें खरीदी, तो कुछ ने थारू-बुक्सा जनजातियों की जमीनें और सरकारी जमीनों पर कब्जा कर अपना रकवा बढा़या। इस तरह चंद लोगों ने तराई में बेहिसाब उपजाऊ और बेशकिमती जमीनें हथिया ली।

1964 में बंगलादेश के वजूद में आने के बाद यहॉ हजारों की तादाद में बंगालादेशी शरणार्थी आये। इसी साल बंगाली शरणार्थियों को पुनर्वासित करने के लिए ग्राम-लमरा और शिमला बहादुर के बीच करीब साढे़ तीन सौ एकड़ जमीन पुनर्वास विभाग को दी गई। यहॉ ट्रांजिट कैम्प बना। करीब दो सौ परिवारों को पक्के मकानों के अलावा दो से ढाई एकड़ कृषि जमीनें दी गई। करीब तीन सौ परिवारों को व्यवसाय के लिए एक मुश्त रकम और पक्के मकान दिये गये। बंगलादेशी शरणार्थियों को दिनेशपुर, शक्तिफार्म, रूद्रपुर, किच्छा, मुड़ियाफार्म, सितारगंज, महतोष मोड़, खानपुर और गदरपुर आदि क्षेत्रों में बसाया गया। उन्हें मुख्य रूप से दिनेशपुर और शक्तिफार्म में जमीनें आवंटित की गई। शक्तिफार्म में 2233 बंगाली शरणार्थियों को पट्टे दिये गये थे। आवंटन में लीज जैसी किसी शर्त का जिक्र नहीं किया गया था। 1971 के बंगलादेश युद्ध के समय भी चटगॉव, वारीसाल, खुलना, फरीदपुर और ढाका वगैरह जिलो से भी बंगलादेशी शरणार्थी तराई में आ बसे है। यह सिलसिला कमोवेश छुटपुट तौर पर आज भी जारी है। आज रविन्द्र नगर, संजय नगर, आदर्श कालोनी, जगतपुरा, भतईपुरा, रम्पुरा मुहल्ला और राजीव नगर में भी बंगाली शरणार्थियों की कालोनियॉ बसी है।

तराई में जिस रफ्तार से फार्म हाउसों का रकवा बढ़ता गया, ठीक उसी रफ्तार से भूमिहीन और खेत मजदूरों की तादाद भी बढ़ती गई। कुछ लोग जमीन बंटवारे के वक्त ही जमीन नहीं पा सके। जिन्हें मिली, उन्हें किसी न किसी तरह बेदखल कर दिया गया। जमीदारी फैलाव की चपेट में तराई के जंगलों के पुराने वाशिन्दे थारू-बुक्सा जनजाति के लोग आये। आजादी के बाद थारू-बुक्सा को जनजाति का दर्जा देकर उनकी जमीनों की खरीद-फरोख्त पर कानूनी पाबंदी लगा दी गई। पर यह कानून भी थारू-बुक्सा को भूमिहीन बनाने से नहीं रोक पाया। जमीन के असमान बंटवारे के चलते पंजाबी शरणार्थियों में राय, सिख, बंगाली शरणार्थी और पहाड़ के ज्यादातर लोगों को जमीनें नहीं मिल पाई। इनमें से सबसे ज्यादा बुरे हाल बंगाली शरणार्थियों के हुए। तराई में आज ज्यादातर बंगाली शरणार्थी खेत मजदूर बनकर रह गये हैं। बंगाली शरणार्थियों को आवंटित भूमि में से आधी से ज्यादा जमीनें दस से एक सौ रुपये कीमत के स्टॉप पेपरों में दाननामा और दूसरे तरीकों से बिक चुकी है। बंगाली शरणार्थियों के पट्टे वाली इन जमीनों में से कुछ जमीनें दूसरे बंगाली शरणार्थियों ने ही खरीद ली। बाकी दूसरे लोगों ने। कुछ बंगाली शरणार्थी शुरुआती दिनों में ही अपनी पट्टे वाली जमीनें बेचकर चले गए। अब उनका कोई अता-पता नहीं है। खरीददार और बेचनेवालों के बीच अदालतों में कई मुकदमें भी चल रहे हैं। जमीन किसी और को अलॉट हुई थी, मौके पर कब्जा किसी और का है। 1971 में आये बंगाली शरणार्थियों में से अभी कई परिवारों को पुनर्वासित नहीं किया जा सका है।

जमीदारी उन्मूलन एक्ट के तहत तराई के कुछ लोगों को उनके कब्जे वाली जमीन में मालिकाना हक पहले ही मिल गये। तराई में बडे़ नेताओं, उद्योगपतियों, चंद सेना के अधिकारियों और फिल्मी सितारों के हजारों एकड़ के फार्म हाउस बन गये। एस्कोर्ट फार्म, पेगा फार्म (काशीपुर), प्राग फार्म (किच्छा), अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल का फार्म, चीमा फार्म, राणा फार्म, शर्मा फार्म (बाजपुर) मंजीत फार्म, बिष्टी फार्म, टिंगरी फार्म, सिसैइया फार्म, नकहा फार्म (सितारगंज) जैसे फार्म हाऊसों की लंबी फेहरिस्त है। तराई में सैकड़ों एकड़ वाले फार्मों की तादाद सैकड़ों में है। प्रभावशाली लोगों के फार्म हाऊसों के रकवे की ठीक-ठीक जानकारी सरकारी अमले के पास भी नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार तराई में तीन फीसदी किसानों के कब्जे में चौबीस प्रतिशत जमीन है। जबकि बाकी पचपन फीसदी किसान सिर्फ पन्द्रह प्रतिशत जमीन पर काबिज हैं।

तराई में 1972 में सीलिंग कानून लागू होना शुरू हुआ। सीलिंग कानून की चपेट में मझौले किसान ही आ पाये। फार्म हाऊसों के मालिकों के कद के सामनें सीलिंग कानून भी बौना साबित हुआ। सिंचाई वाली जमीन को असिंचित दिखाकर सीलिंग की हद से ज्यादा जमीनों में फर्जी स्कूल, मकान, सड़क-रास्ते दर्शाकर या फिर रेवन्यू रिकार्ड़ में बेनामी जमीने दर्ज कराकर फार्म हाऊसों के मालिक सीलिंग कानून से बचते रहे। तराई में आज भी सीलिंग के अधिकांश मामले विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन है। सीलिंग के गिरफ्त में आये लोग एक बार अदालत से फैसला हो जाने के बाद उसी जमीन में किसी दूसरे के नाम से नये सिरे से मुकदमे बाजी शुरू कर देते है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख के बाद कुछ साल पहले प्रशासन ने एस्कोर्ट फार्म में सीलिंग की कार्रवाई की। यहॉ पहले ही गैरकानूनी रूप से जमीन खरीदकर मौके पर काबिज लोगों को जमीने बॉट दी गई। सीलिंग की खानापूर्ति के लिए निकाली गई जमीन भूमिहीनों को बॉटनें के बजाय आईएमए के हवाले कर दी गई।

पी.यू.डी.आर. की एक रिपोर्ट के मुताबिक तराई में सीलिंग कानून लागू करते वक्त सरकार ने केवल 1.4 फीसदी जमीन अतिरिक्त घोषित की थी। सरकार इस में से 64 फीसदी जमीन ही अपने कब्जे में ले पाई। कब्जे में ली गई जमीन में से 61 फीसदी जमीन लोगों को बॉटी गई। बाकी सीलिंग में निकली जमीन पर भी प्रभावशाली लोग हाथ मार गये। सीलिंग में निकली जमीन में से सिर्फ 0.4 फीसदी जमीन भूमि हीनों को मिल पाई। इनमें से एक चौथाई लोगों को बडी़ जोत वालों ने बेदखल कर दिया। छोटे किसानों के अधिकार वाली ज्यादातर जमीने भी बडी़ जोत वाले किसानों के फार्मों का हिस्सा बनकर रह गई। तराई में पिछले करीब पचास सालों से भूमि सुधार कानूनों को लागू करने की मॉग उठती रही है। लेकिन यहॉ प्रदेश सरकार ने राजनीतिक फायदे-नुकसान के मद्देनजर हरेक वर्ग के लिए अलग-अलग कानून बनाये और लागू किये। शुरू में सभी शरणार्थियों को गवर्नमेंट ग्रांट एक्ट के तहत जमीने आवंटित की गई थी। माली और सियासी तौर पर मजबूत लोगों को बहुत पहले मालिकाना हक दे दिया गया। हालत यह है कि राजनेताओं, नौकरशाहों और भू-पतियों के अंतरंग गठजोड़ के चलते जमींदारी उन्मूलन एक्ट भी बडे़ फार्म हाऊस मालिकों के हक में गया। नतीजन पिछले चार दशकों से यहॉ सीलिंग और चकबंदी कानून पर जमीनी अमल नहीं हो पाया है। तराई में आज तक जमीन की पैमाईश नहीं कराई गई।

तराई में जमीनों के गड़बड़झाले को लेकर पूर्ववर्ती उत्‍तरप्रदेश सरकार ने 27 जुलाई, 1968 को तब उत्‍तरप्रदेश बोर्ड ऑफ रेवन्यू के सदस्य वरिष्ठ आईसीएस अफसर बी.डी. सनवाल की अध्यक्षता में चार सदस्यीय "तराई लैण्ड जॉच कमेटी" बनाई थी। इस कमेटी ने 1969 को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौपीं। उत्‍तरप्रदेश के तात्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा अपने कार्यकाल के दौरान गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज रूद्रपुर का उद्घाटन करने को यहॉ आये। लोगों ने श्री बहुगुणा से तराई के भीतर जमीनों के असमान बंटवारे की शिकायत की और यहॉ सीलिंग और चकबंदी कानून को अमल में लाने की गुजारिश की। इस मामले को गम्भीरता से लेते हुए हेमवती नन्दन बहुगुणा ने 8 फरवरी, 1972 को उत्‍तरप्रदेश विधान सभा और विधान परिषद की "उत्‍तरप्रदेश भूमि व्यवस्था जॉच समिति" नाम से एक साझा जॉच समिति बनाई। मंगल देव विशारद को इस जॉच समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। इस समिति ने मार्च, 1974 को अपनी विस्तृत जॉच रपट राज्य सरकार को सौपीं। रिपोर्ट में कहा गया कि तराई में 185 खातों में 474 खातेदारों के नाम 25379 एकड़ जमीन दर्ज है। यानी हरेक खातेदार के नाम औसतन 137 एकड़ जमीन दर्ज है। कहा गया कि सैकडों खातों में 50 एकड़ से ज्यादा जमीनें दर्ज है। जिनका इन्द्राज कई लोगों के नाम पर है। लेकिन जमीन का वास्तविक मालिक एक ही व्यक्ति है। रिपोर्ट में कहा गया कि तराई में स्थित गॉव सभा, गोदान, भू-दान, बाधों तथा जलाशयों की अतिरिक्त भूमि, वन विभाग को पौधारोपण के लिए दी गई भूमि, वनभूमि, खामभूमि, वर्ग-चार और वर्ग-आठ की भूमि और वन पंचायतों की बेहिसाब भूमि भी कब्जा ली गई है। कहा गया है कि बाजपुर और रामनगर में 55 बुक्सारी गॉव थे। अब वहॉ के मूल वाशिन्दे थारू-बुक्साओं की जमीनें भी छिन रही है। मंगल देव विशारद जॉच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बडे़ फार्म हाऊसों के कब्जे की अतिरिक्त जमीनों का विस्तृत और प्रमाणिक ब्यौरा दिया था। इस समिति ने उत्‍तरप्रदेश अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम- 1960 के तहत तराई में सीलिंग में निकलने वाली जमीनों को बॉटने के लिए बकायदा तरीका भी सुझाया था। समिति ने सिफारिश की थी कि सीलिंग में अतिरिक्त निकली जमीनें क्रमशः युद्ध में वीरगति को प्राप्त सैनिक के भूमिहीन आश्रितों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भूमिहीन खेतिहर मजदूरों, अन्य भूमिहीन खेतहर मजदूरों, भूमिहीन भूतपूर्व सैनिक व भूमिहीन राजनीतिक पीड़ितों और छोटे कास्तकारों, जिनके पास 3 एकड़ से कम जमीन है, को बॉटी जाए। शुरुआत में समूचे उत्‍तरप्रदेश में मंगलदेव विशारद जॉच कमेटी की इसी रिपोर्ट के आधार पर ही सीलिंग की कार्रवाई होती थी। बाद में राजनेताओं, नौकरशाहों और भू-स्वामियों के नापाक गठजोड़ ने इस रिपोर्ट को पूरे प्रदेश से एक प्रकार से गायब ही करा दिया।

आज तराई में वनभूमि, वर्ग-चार, वर्ग-आठ की भूमि और सिंचाई विभाग की हजारो हेक्टयर भूमि में कब्जे है। बिन्दुखत्‍ता से नेपाल की सीमा तक वन भूमि पर कब्जा हो चुका है। पिछले पचास सालों से भूमि सुधार के मामले लटके है। उत्‍तराखण्ड को अलग राज्य बने साढे़ ग्यारह साल बीत गये है। लेकिन राज्य सरकार ने इस दिशा में सोचने-विचारने तक की जहमत नहीं उठाई। नतीजन यह समस्या वक्त के साथ बडी़ होती चली जा रही है। बेहतर होता कि राज्य सरकार सियासी नफा-नुकसान के मद्देनजर टुकड़ों में निर्णय लेने के बजाय, तराई में वर्षों से अधर में लटके भूमि सबंधी मामलों को निपटाने के लिए व्यापक और सार्वभौमिक नीति बनाती, जिससे यहॉ रह रहे सभी वर्ग के कमजोर और जरूरतमंद लोगों को फायदा मिलता। लेकिन उत्‍तराखण्ड के मौजूदा सियासी हालातों में इस बात की उम्मीद करना शायद बेमानी होगा।

[B]लेखक प्रयाग पाण्‍डे नैनीताल के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.[/B]

Fwd: [initiative-india] NAPM Condemns Builder-Police Repression at Koliwada



---------- Forwarded message ----------
From: NAPM India <napmindia@napm-india.org>
Date: Thu, May 31, 2012 at 7:26 PM
Subject: [initiative-india] NAPM Condemns Builder-Police Repression at Koliwada
To: Madhuri Shivkar <madhuri.shivkar@gmail.com>, Medha Patkar <medha.narmada@gmail.com>


NAPM Condemns Builder-Police Repression

and Demolitions at Koliwada

Demands Justice for the Fisherfolk and Original Dwellers of the Land

Mumbai May 31st, 2012:  Despite severe resistance by the traditional fisher folk in Sion Koliwada, the Mumbai police and Bombay Municipal Corporation (BMC) have been going ahead with its demolition drive.  The municipal officials, accompanied by the private builder, Mr. Sudhakar Shetty and a huge contingent of the RAF police today ruthlessly razed down the house of Kalpesh Shivkar of the Koliwada community. Despite the police and private security of the builder attempting to drive away the other community people who were protesting and resisting the demolition, the people were keen to stand by Kalpesh and afford support. About 50-100 women and men have been arrested while they were trying to give protection to Kalpesh's family and neighbours whose house was demolished and needed shelter, since monsoon is at doorstep. The women were physically assaulted by the male police, who also pulled them by their hair. All this brutality by the police is totally condemnable. Surprisingly, after the demolition, while the people were trying to re-erect the houses, the builder brought in 20 muslim women to occupy the same place, which the locals questioned.  

National Alliance of People's Movements and Ghar Bachao Ghar Banao (GBGB) Andolan wholly condemns this brutal move of the administration to evict the people from their decades old settlements, for no cogent public purpose, rather for the vested interests of a private real estate lobby. The demolition is not only unjustifiable, but is also fully illegal and in violation of the legal rights of the residents. GBGB also questions the entire project as a fraudulent one since false consent has been shown by the community, signatures of the locals have been manoeuvred and other serious irregularities have been committed by the developers. It is fact that more than 80% of the residents have not consented to the project, which makes the very project illegal.

It is shocking to note that the police has not yet registered cases filed by the people over the past few days as FIRs, ever since the eviction drive began. Moreover, despite the people pointing out specifically as to how certain police officials / personnel are siding with the builders and have demanded suspension of such officers, no action has been taken in this regard. The only 'assurance' that the police has given so far is to protect the municipal officials who may face any 'harm', during the demolition process. We express our deep disdain towards this approach of the State and seek to challenge the illegal arrests and detentions being made by the police for questioning the unlawful demolitions.

It may be noted that Koliwada, an indigenous fisherfolk Community has been living in the area even prior to independence. In 1939, the British constructed NSP sheds for their own security purposes and they were asked to move to this. These NSP Sheds then were taken over by the Municipal Corporation after Independence. Even though these fisher people have lived on the land for more than a century they have been denied their "right to land", due to the unfair policies of the Britishers as well as BMC. Now in the name of so-called 'development', the State is evicting them and giving away the prime property to the Builders. The people continue to face the might of the JCBs, police and State with their resolve in non-violent, democratic struggle.  

Please do condemn the atrocities against the original inhabitants of Mumbai.

Do Fax your letters of protest to the Chief Minister and Home Minister, demanding them to:

  • Break the growing unholy nexus between the politicians – police – builders in Mumbai.
  • Suspend the police officials, especially male police, who have used unjust force against the people and have abused the women and men in the name of 'protesting the BMC officials'.
  • Lodge FIRs on the basis of complaints filed at various levels by Medha Patkar and others and initiate action against the erring officials and the builder lobby.

Shri Prithviraj Chavan, Chief Minister

Fax: +91-22-22029214

E-mail: chiefminister@maharashtra.gov.in

Shri R.R. Patil, Home Minister

Fax: 91 22 22027174 / 22 22029742

E-mail: Min_Home@maharashtra.gov.in

For details and update call: Madhuri Shivkar 09892143242 / Madhuri Variyath 0982061917

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Fwd: Today's Exclusives - Global markets in a crash mode



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From: Moneylife <noreply@moneylife.in>
Date: Fri, Jun 1, 2012 at 7:27 PM
Subject: Today's Exclusives - Global markets in a crash mode
To: palashbiswaskl@gmail.com


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1 June 2012
 
Moneylife Exclusive
Moneylife Digital Team
 
 
ADVT
Other ML Exclusives
 
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At a Glance
 
- Visa updates CBI officials about cyber crime, card fraud trends
- Google new product search to be a paid service in US
- CBI starts verifying complaint of coal block scam
- RBI cannot arrest rupee fall if it is driven by weak fundamentals
- Air India staff integration process to start in 45 days
- Prime Minister sets up mechanism to fast track project implementation
- IPL to issue strict guidelines for franchise owners says Shukla
- Ranvir Sena chief Brahmeshwar Singh shot dead in Bihar
- New Army chief says leave behind past
- NSE revises liquidity enhancement scheme for FTSE 100 index
 
Corporate Wrap-up
 
- TVS Motor reports 5% dip in total sales for May 2012
- Ricoh India hikes product prices by 5% on rupee depreciation
- CRISIL buys UK-based analytics firm Coalition for Rs250 crore
 
 
FROM the ARCHIVES
 
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Fwd: CC News Letter, 01 June - The Ethiopian Land Giveaway



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From: Countercurrents <editor@countercurrents.org>
Date: Fri, Jun 1, 2012 at 10:30 PM
Subject: CC News Letter, 01 June - The Ethiopian Land Giveaway
To: palashbiswaskl@gmail.com



 Dear Friend,

 If you think the content of this news letter is critical for the dignified living and survival of humanity and other species on earth, please forward it to your friends and spread the word.It's time humanity should come together as one family! You can subscribe to our news letter here http://www.countercurrents.org/subscribe.htm. You can also follow us on twitter, http://twitter.com/countercurrents and on Facebook, http://www.facebook.com/countercurrents

 In Solidarity
 Binu Mathew, Editor,
 Countercurrents.org
 Educate! Organize! Agitate!


 The Ethiopian Land Giveaway
 By Graham Peebles

http://www.countercurrents.org/peebles010612.htm

The Ethiopian government, through the Agricultural Investment Support Directorate is at the forefront of this African Land Sale. The Oakland Institute research shows that at least 3,619,509ha of land (an area just smaller than Belgium) have been transferred to investors, although the actual number may be higher


Save Dafur's Mi$$ing Million$: The Israeli Connection
 By Thomas C. Mountain

http://www.countercurrents.org/mountain010612.htm

The so called "Save Dafur Coalition" raised tens of millions of dollars, some say a hundred million or more to help the people of Dafur yet an investigation by this writer can find no evidence of any of this money reaching Dafur refugees on the ground in Sudan.


Imagining The Post-Occupy Social Movement
 By Shamus Cooke

http://www.countercurrents.org/cooke010612.htm

The movement that Occupy gives birth to will be born at a higher level, with unity of purpose and collective action. It will not simply protest corporate power but directly challenge this power and the political system tied to it by the combined power of working people


How The Democrats Exploit Occupy
 By Ann Robertson & Bill Leumer

http://www.countercurrents.org/leumer010612.htm

Some dogs can be vicious. But if kept on a short leash, they can be prevented from harming others. When they are off leash and cause harm, the owners are legally responsible, not the dog. Until Occupy starts focusing on the deeper causes of our problems and not just the symptoms, the problems will persist


Criminal Injustice System (part 2)
 By Mickey Z.

http://www.countercurrents.org/mickeyz010612.htm

Unity and trust among Occupiers can help serve as a bulwark against inevitable and extralegal law enforcement devices. Once we have reached that point, another world is truly possible


Living Without Your Name
 By Neve Gordon

http://www.countercurrents.org/gordon010612.htm

In Israel, if you are a Palestinian and want to rent a flat, at times, to misquote Arthur Miller, you have to live without your name


Without Growth, There's Only One Ending For Euro Debt Crisis
 By Jeff Rubin

http://www.countercurrents.org/rubin010612.htm

How much more fiscal punishment can the eurozone endure before countries start throwing in the towel? Without economic growth, there can be only one ending to Europe's debt crisis. Default. Judging by the newly elected socialist politicians in Greece and France that eventuality is a lot closer than financial markets might think


'Model Citizens' In An Age Of Passive Consumerism
 By Colin Todhunter

http://www.countercurrents.org/todhunter010612.htm

As the debate rumbles on about India opening its doors further to powerful transnational companies, the question to be asked is just what is in fact there to discuss?


Neocon- And Zionist-Pressured UK New Statesman Censors Anti-Racist Jewish Opinion
 By Dr Gideon Polya

http://www.countercurrents.org/polya010612.htm

Neocon American and Zionist (NAZI)-derived Mainstream media censorship enables the continuation of the Palestinian Genocide (2 million invasion-related deaths since 1936, 7 million refugees) and the Muslim Holocaust and Muslim Genocide (12 million war-related deaths since 1990; 20 million refugees ). It is possible to get through the Mainstream media's Wall of Silence - please tell everyone you can

 Countercurrents And You !

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Fwd: Rick Rozoff: Pentagon Consolidates Control Over Balkans - US Military Presence in the former Yugoslavia



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From: Global Research E-Newsletter <crgeditor@yahoo.com>
Date: Sat, Jun 2, 2012 at 4:33 PM
Subject: Rick Rozoff: Pentagon Consolidates Control Over Balkans - US Military Presence in the former Yugoslavia
To: palashbiswaskl@gmail.com


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Pentagon Consolidates Control Over Balkans: US Military Presence in the former Yugoslavia

By Rick Rozoff

Global Research, May 30, 2012
Stop NATO

URL of this article: www.globalresearch.ca/index.php?context=va&aid=31128

Ahead of, during and after the North Atlantic Treaty Organization's 25th summit in Chicago on May 20-21, the Pentagon has continued expanding its permanent military presence in the former Yugoslavia and the rest of the Balkan region.

The military bloc's two-day conclave in Chicago formalized, among several other initiatives including the initial activation of its U.S.-dominated interceptor missile system and Global Hawk-equipped Alliance Ground Surveillance operations, a new category of what NATO calls aspirant countries next in line for full Alliance membership. Three of them are former Yugoslav federal republics - Bosnia, Macedonia and Montenegro - and the fourth is Georgia, conflicts involving which could be the most immediate cause of a confrontation between the world's two major nuclear powers.

This year new NATO partnership formats have sprung up like poisonous toadstools after a summer rain: Aspirants countries, the Partnership Cooperation Menu, the Individual Partnership and Cooperation Programme, the Connected Forces Initiative and partners across the globe among them.

The military bloc's inauguration as an active, aggressive military force in Bosnia and the Federal Republic of Yugoslavia in the 1990s laid the groundwork for the U.S.'s already unmatched military to move troops, hardware and bases into Southeast Europe for actions there and to points east and south: The Middle East, the Caucasus, North Africa and Central and South Asia.

Since 2004 several nations in the east and west Balkans - Bulgaria, Romania, Slovenia, Croatia and Albania - have been incorporated into the alliance as full members and the remainder - Bosnia, Macedonia, Montenegro, Serbia and the generally unrecognized Republic of Kosovo - have in the first four instances joined NATO's Partnership for Peace program and in the last had its nascent armed forces, the Kosovo Security Force, built from scratch by the leading alliance powers.

Macedonia, which would have become a full member in 2009 except for the lingering name dispute with Greece, and Montenegro have been granted the Membership Action Plan, the final stage before full accession, and Bosnia will be accorded the same once the quasi-autonomous Republika Srpska is deemed properly stripped of the last vestige of self-governance.

NATO and the wars waged under its command, not only in the Balkans but in Afghanistan and all but officially in Iraq, have provided the Pentagon the mammoth Camp Bondsteel in Kosovo and three major air bases in Bulgaria and Romania as well as headquarters for new military task forces and jumping-off points for "downrange" operations outside Europe. The U.S. Department of Defense has also acquired subservient legionaries for wars in Asia and Africa and training grounds for American and multinational expeditionary units employed in 21st century neo-colonial wars far beyond the Euro-Atlantic area. Romania will host 24 U.S. Standard Missile-3 interceptors starting in three years.

NATO's Cooperative Longbow and Cooperative Lancer 2012 command and field exercises started in Macedonia on the second day of the Chicago NATO summit, May 21, and ended on May 29. The largest of four such exercises held within the framework of the Partnership for Peace program - "to train, exercise, and promote the interoperability of Partnership for Peace forces using NATO standards" - to date, this year's Longbow/Lancer drills included 2,200 troops from several NATO and a dozen Partnership for Peace nations, a total of 25 countries including the U.S.

On May 26 U.S. Army Europe and U.S. Air Forces in Europe launched the Immediate Response 2012 exercise in Croatia with military personnel from the host country, Albania, Bosnia, Montenegro and Slovenia. Macedonia and Serbia sent observers.

A report on the opening of the exercise posted on the website of U.S. European Command appended this paragraph:

"U.S. Army Europe is uniquely positioned to advance American strategic interests across Eurasia, building teams, assuring allies and deterring enemies. The relationships we build during more than 1,000 theater security cooperation events in more than 40 countries each year lead directly to support for U.S. actions such as in Kosovo, Iraq, Afghanistan, and Libya."

Balkan states Albania, Bosnia, Bulgaria, Croatia, Macedonia, Romania and Slovenia deployed troops to Iraq after 2003 and all those nations as well as Montenegro (which became independent in 2006) have troops under NATO command in Afghanistan currently.

NATO's Allied Joint Force Command Naples has military missions in Bosnia, Macedonia and Serbia.

On May 28 the U.S. Joint Chiefs of Staff began a two-week disaster management and crisis response exercise, Shared Resilience 2012, in Bosnia. In addition to the U.S. and Bosnia, participating nations include Albania, Bulgaria, Croatia, Montenegro, Norway, Serbia and Slovenia.

Immediately before the NATO summit, the U.S. Marines Corps' Black Sea Rotational Force 2012 held multinational exercises near Constanta, Romania from May 7-18. The Black Sea Rotational Force was established in 2010 and last year doubled the duration of its training exercises in the Balkans, the Black Sea region and the South Caucasus from three to six months annually.

Now spending half the year in the geopolitically vital area, the Black Sea Rotational Force recently announced its mission of building "enduring partnerships with 19 nations throughout Eastern Europe." The U.S. Marines are being hosted by Romania from April 2 to September 1. Prior to that Black Sea Rotational Force 2012 participated in the Agile Spirit 2012 exercise in Georgia in March.

U.S. Army Europe's Task Force East, employing Stryker combat vehicles, also operates out of Romania as well as Bulgaria: The Mihal Kog?lniceanu Airfield and the Babadag Training Area in the first country and the Novo Selo Training Area in the second. In 2009 Task Force East spent three months training in Romania and Bulgaria, primarily preparing troops from the U.S. and the two host nations for operations in Afghanistan.

This year NATO officially identified Afghanistan and Iraq as military partners, in the category of partners across the globe. Since the end of NATO operations against Libya last October, the bloc's secretary general and its American ambassador, Anders Fogh Rasmussen and Ivo Daalder, have mentioned Libya joining NATO's Mediterranean Dialogue military partnership with the other nations of North Africa.

Each NATO military operation over the past 17 years, in Bosnia, Yugoslavia, Afghanistan and Libya, has provided the alliance with bases, centers, troops and logistics for later and for future wars. Air bases in Bulgaria and Romania were employed for the wars in Iraq, Afghanistan and Libya and, as noted above, every Balkan nation but Serbia has supplied troops for the wars in Iraq and Afghanistan. Pentagon and NATO military personnel, aircraft, ships and radar in Southeast Europe can be used in attacks on Syria and Iran and in any new armed conflict in the South Caucasus, such as the five-day war between Georgia and Russia four years ago.

The U.S. and its NATO allies are expanding their military presence and infrastructure ever closer to new theaters of war.


Stop NATO e-mail list home page with archives and search engine:
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Stop NATO website and articles:
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Friday, June 1, 2012

आत्मघाती जंगखोर परिस्थिति में भारत और पाकिस्तान की जनता समान रुप से जीवन और आजीविका के संकट में फंसीं!

आत्मघाती जंगखोर परिस्थिति में भारत और पाकिस्तान की जनता समान रुप से जीवन और आजीविका के संकट में फंसीं!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

दक्षिण एशिया कारपोरेट साम्राज्यवाद और विश्व हथियार बाजार का नया युद्ध क्षेय्र है जिसे उबरते हुए बाजार बतौर पेश किया जा रहा है। दक्षिण एशिया में आर्थिक संकट गहराता जा रहा है, हर कहीं लोकतंत्र खतरे में है। खुला बाजार है और कट्टरपंथी ताकतें अंध राष्ट्रवाद का परचम लहराये कारपोरेट साम्राज्यवाद, वैश्विक पूंजी और हथियारों के सौदेगरों के लिए नरसंहार संस्कृति के जरिये पूरे क्षेत्र को खुला आखेटगाह बना रहे हैं। भारत में सैनिक तैयारियों में खामी और सैनिक सौदों में घोटाले को लेकर भारी हंगामे के बावजूद रक्षा बजट में लगातार वृद्ध हो रही है। चीन के साथ छायायुद्ध चल रहा है। वहीं पाकिस्तान का सत्ता वर्ग शुरू से  भारत  के विरुद्ध घृणा को पूंजी बनाकर हधियारों की अंधी दौड़ तेज कर रहे हैं। जबकि अर्थव्यवस्था के मामले में दोनों भारत और पाकिस्तान चीन से मीलों पीछे हैं। गनीमत है कि अभी  दौड़ से बाहर है नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार, वरना यहां हालात मध्यपूर्व से भी यकीनन खराब होते। अब  भारत को कड़ी चुनौती देते हुए  पाकिस्तान ने एक हफ्ते के भीतर दूसरी बार अपनी परमाणु क्षमता वाली हत्फ-8 क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। देखना है राजस्व घाटे और राजनीतिक बाध्यताओं से पंगु भारत की यूपीए सरकार पेट्रोल कीमतों में वृद्धि के खिलाफ अभी अभी हुए भारत बंद और निरंतर हावी हो रहे अंध हिंदू राष्ट्रवाद के मुकाबले कैसे सैन्यीकरण की अग्निपरीक्षा से निपटती है।बहरहाल इस आत्मघाती जंगखोर परिस्थिति में भारत और पाकिस्तान की जनता समान रुप से जीवन और आजीविका के संकट में फंस गये हैं।राहत की खबर है कि पेट्रोल के दाम में 1.60 रुपये प्रति लीटर की कटौती की घोषणा की गई है। तेल विपणन कंपनियों ने गुरुवार को बैठक के बाद दाम घटाने का निर्णय लिया है। तेल कंपनियों के अधिकारियों की मुंबई में बैठक हुई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी के बाद कथित तौर पर दाम घटाने का फैसला किया गया है। घटी हुई कीमतों की लागू करने की घोषणा कुछ दिनों के अंदर कर दी जाएगी।पर सैनिक तैयारियों का दबाव और समूचे दक्षिक्ण एशिया में वैश्विक हथियार बाजार की रणनीतिक मैर्केटिंग, युद्ध गृहयुद्ध के आयात निर्यात उसपर मंदी की मार, ईंधन संकट, आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेंगी। भारत में नये सेनाध्यक्ष की ताजपोशी के​ ​ साथ ही सैनिक तैयारियों को जारी रखने और सैन्य होड़ में अपनी दौड़ जारी रखने का दोहरा दबाव बढ़ा है। लागू होने वाली इन नई कीमत के बाद पेट्रोल की पुरानी बढ़ोत्तरी 5.90 रुपये प्रति लीटर ही रह जाएगी।  हालांकि आम आदमी पेट्रोल कीमतों की इस कमी से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं।तेल कंपनियों ने अब हर पखवाड़े में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों और विदेशी मुद्रा के आधार पर हर महीने की पहली और 16वीं तारीख को पेट्रोल की कीमतों में संशोधन करने का फैसला भी लिया है। ये सुविधा पहले भी मौजूद थी, हालांकि इस पर सुचारू तरीके से अमल नहीं हो पा रहा था। भारतीय अर्थव्यवस्था देश-विदेश के तंग हालात में फंसकर पिछले वित्तवर्ष 2011-12 की आखिरी तिमाही (जनवरी-मार्च 2012) में मात्र 5.3 प्रतिशत बढ सकी और इसके चलते वार्षिक आर्थिक वृद्धि 6.5 प्रतिशत तक ही सीमित रही। इससे पिछले वित्तवर्ष के दौरान भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8.4 प्रतिशत वृद्धि हुई थी और आखिरी तिमाही की वृद्धि 9.2 प्रतिशत थी। पिछले करीब नौ वर्ष में चौथी तिमाही की यह न्यूनतम वृद्धि है।


चितरा देवघर में सुमेरू पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि भारत को अमेरिका का पिछलग्गू नहीं बनना चाहिए। चितरा में आयोजित 9 दिवसीय शिवशक्ति यज्ञ में प्रवचन देने पहुंचे शंकराचार्य ने पत्रकारों से कहा कि जब-जब भारत ने पड़ोसी देश के साथ बेहतर संबंध बनाने की कोशिश की, तब-तब आतंकवादी हमले झेलने पड़े। अमेरिका ने एक आतंकवादी हमले का जवाब तुरंत दिया। जबकि वह भारत को संयम बरतने की नसीहत देता रहता है। अमेरिका भारत का आका नहीं है। भारत सरकार को अमेरिका की कठपुतली नहीं बनना चाहिए और उसकी परवाह किए बिना 20 फीसदी रक्षा बजट में इजाफा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना को त्वरित कार्रवाई करने का अधिकार मिलना चाहिए।यज्ञ स्थल पर भक्ति की गंगा बह रही है। एक ओर जहां हवन, भजन-कीर्तन प्रवचन का दौर जारी है। दूसरी ओर इलाहाबाद से आए गणेश श्रीवास्तव व राधा रानी ने भजन गाकर लोगों को भावविभोर कर दिया। इस अवसर पर अन्य वक्ताओं ने भी भक्ति पर आधारित कार्यक्रम पेश कर लोगों का मनोरंजन किया।

इन्हीं परिस्थितियों के बीच भारत और चीन के बीच दक्षिम चीन सागर विवाद गरमाया हुआ है और चीन अपनी दावेदारी मजबूत करने का कोई मौका चोड़ने के मूड में नहीं है।अमेरिकी रक्षामंत्री लिओन पेनेटा की यात्रा के बीच चीन ने गुरुवार को अमेरिका से अनुरोध किया कि वह एशिया प्रशांत क्षेत्र में उसके हितों का सम्मान करे। पेनेटा की यात्रा के पहले ही पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एशिया की ओर रणनीति बदलने की घोषणा की थी। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय दावों को लेकर तनाव बढ़ गया है।एशिया प्रशांत क्षेत्र में शांति व स्थिरता के सवाल को लेकर आसियान मंच, शानगरिला वार्ता जैसी अनेक द्विपक्षीय व बहुपक्षीय वार्ता व्यवस्थाएं चल रही हैं। वास्तव में शानगरिला वार्ता 11 सितम्बर घटना के बाद एशिया प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा से जुड़ी एक नयी वार्ता व्यवस्था है। यह व्यवस्था लंदन इंटरनेशनल इंस्टीट्युट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडी के प्रर्वतन में सिन्गापुर रक्षा मंत्रालय के साथ संयुक्त रूप से कायम हुई है जिस में विभिन्न देशों के सुरक्षा मामले के अधिकारी भाग लेते हैं। वर्ष 2002 में सिन्गापुर के शानगरिला होटल में इस का प्रथम एशिया सुरक्षा सम्मेलन हुआ, इसलिए इसे शानगरिला वार्ता के नाम से माना जाने लगा।पहली जून से तीसरी जून तक चलने वाली 11 वीं शानगरिला वार्ता में अमेरिका, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन, ओस्ट्रेलिया, जापान, कनाडा, भारत और इंडोनिशिया समेत 27 देशों के रक्षा मंत्री व वरिष्ठ अधिकारी हिस्सा ले रहे हैं। वार्ता में विभिन्न देशों के प्रस्तावित एजेंडों को देखते हुए यह लगता है कि दक्षिण चीन सागर सवाल एक बहुचर्चित मुद्दा बनेगा, हो सकता है कि वह एक जबरदस्त बहस का विषय भी होगा। क्योंकि फिलिपीन्स के रक्षा मंत्री होंगय्येन द्वीप सवाल को लेकर विवाद खड़ा करने को तैयार हो गए हैं ताकि उस की ओर विभिन्न देशों का ध्यान खींचा जाए और होंगय्येन द्वीप पर कब्जा करने की अपनी कुचेष्टा साकार हो। इसके अलावा अमेरिकी रक्षा मंत्री लेएन पैनेटा पहली बार शानगरिला वार्ता में आए हैं, वे चाहते हैं कि दक्षिण चीन सागर सवाल को लेकर चीन पर दबाव डाले और एशिया प्रशांत क्षेत्र के संबंधित देशों के प्रति अमेरिका की अपनी जिम्मेदारी और फर्ज जताए, ताकि अमेरिका की विश्वव्यापी रणनीति का जोर पूर्व की दिशा पर ले जाने की योजना आसानी से पूरी हो सके। और तो और, पश्चिमी देश भी अन्तरराष्ट्रीय जल मार्ग की सुरक्षा व स्वतंत्र यात्रा की गारंटी के बहाने दक्षिण चीन सागर के मामले में टांग अड़ाने का मौका देख रहे हैं। यह सब कुछ शीतयुद्ध के बाद अन्तरराष्ट्रीय मामलों में दखलंदाजी करने के लिए पश्चिमी देशों के प्रचलित हथकंडे हैं।विश्व के बहुत कम हिस्सों में इतनी आर्थिक विविधता है जितनी दक्षिण एशिया में। मानव और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद यह क्षेत्र संपर्क, शासन और सकारात्मक राजनीतिक नेतृत्व की भारी कमी से जूझ रहा है। यह क्षेत्र आर्थिक वैश्वीकरण का लाभ उठाने में भी पिछड़ गया है। दक्षिण एशियाई देशों का आपस में व्यापार उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा है, जिस गति से शेष विश्व के साथ व्यापार बढ़ा है। इस क्षेत्र के सभी देशों के कुल व्यापार के अनुपात में अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की दर कम है। इससे पता चलता है कि दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र जैसे क्षेत्रीय व्यापार संगठन अंतर क्षेत्रीय व्यापार बढ़ाने में विफल रहे हैं। साफ्टा क्षेत्र में जारी व्यापार दरों को नीचे लाने में उतना प्रभावी सिद्ध नहीं हुआ जितनी उससे आशा की जा रही थी। अपनी जीडीपी की तुलना में क्षेत्र का विदेश व्यापार विश्व के अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी कम है। यद्यपि यह अनुपात पिछले दो दशकों में कुछ सुधरा है। इस सुधार के पीछे एक प्रमुख कारण है गैर-क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार में बढ़ोतरी। खासतौर पर दक्षिण एशिया का चीन के साथ व्यापार तेजी से बढ़ा है। पिछले दशक में चीन के साथ क्षेत्र का व्यापार 5.7 अरब डॉलर से बढ़कर 80.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। इस वृद्धि के बावजूद दक्षिण एशिया अब भी चीन के लिए छोटा व्यापार साझेदार है। दक्षिण एशिया के लिए चीन एक प्रमुख व्यापार इकाई के रूप में उभरा है, किंतु चीन के लिए यह क्षेत्र प्रमुख बाजार नहीं बन पाया है। दक्षिण एशिया में चीन का व्यापार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इसके व्यापार का महज पांच फीसदी ही है। वास्तव में, चीन के लिए दक्षिण एशिया से बड़े व्यापारिक साझेदार तो पश्चिम एशिया और अफ्रीका हैं। फिर भी जिस तेजी के साथ दक्षिण एशिया में चीन का व्यापार बढ़ रहा है उससे यह संभावना बलवती हो रही है कि यह इस क्षेत्र के व्यापार ढांचे में अपनी औपचारिक उपस्थिति को संस्थागत रूप देना चाहेगा। खासतौर पर यह विचार इस संभावना से पैदा हुआ है कि निकट भविष्य में चीन साफ्टा का सदस्य बनने जा रहा है।

अंध राष्ट्रवाद का भूत हमें अमेरिका और इजराइल का पिछलग्गू बनाने से बाज नहीं आ रहा।महाशक्ति भूत हमें अपने पड़ोसियों के साथ हमेशा छायायुद्ध निष्णात कर रहा है।वैश्विक स्तर पर नाभिकीय हथियारों की होड़ एक अशांत और भययुक्त विश्व का निर्माण करती जा रही है। शक्तिशाली और संपन्न देशों के पास पर्याप्त हथियार हैं। जो देश तेजी से विकास करते जा रहे हैं, उनके लिए हथियारों की खरीद और घातक मिसाइलों का परीक्षण एक प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए जरूरी लगता जा रहा है। ये देश अपनी संप्रभुता की रक्षा और दिखावे के नाम पर आवश्यकता से अधिक हथियार खरीदने और हथियार विकसित करने में व्यय करते हैं। भारत का नाम भी इस सूची में दर्ज है। स्वीडन की संस्था स्टॉक होम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सर्वाधिक हथियार आयातक देश बन चुका है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत, चीन और पाकिस्तान ने विश्व के कुल हथियार आयात का लगभग पांच प्रतिशत आयात किया है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने सरकार को आगाह किया कि वह रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार और सेना संबंधी अन्य विवादों के कारण देश की रक्षा तैयारियों में कोई कोताही नहीं बरते।रक्षा मंत्रालय के कामकाज पर सदन में हुई चर्चा का समापन करते हुए जेटली ने कहा कि पारदर्शिता अच्छी बात है लेकिन यह अनिर्णय और लेटलतीफी में नहीं बदलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भ्रष्टाचार संबंधी विभिन्न विवादों के कारण सैनिक तंत्र पर इतना दबाव है कि कोई भी अधिकारी रक्षा खरीद के संबंध में जल्द फैसला करने से कतरा रहा है।विपक्ष के नेता ने पूर्व में बोफोर्स, पनडुब्बी, तहलका और टाट्रा ट्रक विवादों की चर्चा करते हुए कहा कि रक्षामंत्री ए के एंटनी को सैनिक तंत्र में इतना आत्मविश्वास पैदा करना चाहिए कि राष्ट्रीय हित में अविलम्ब फैसले किए जा सकें तथा देश की रक्षा तैयारियों में कोई कमी नहीं रहे।सन् 2007 से सन् 2011 तक की अवधि के लिए हथियार आयातकों की सूची में भारत दुनिया में सबसे आगे रहा है। ये आंकड़े स्टॉकहोम स्थित अंतर्राष्ट्रीय शांति शोध संस्थान ने जारी किए।हथियारों के आयात में भारत का हिस्सा दस प्रतिशत बनता है। उसने रूस से  सू-30MK और मिग-29का किस्म के 120 और ब्रिटेन से 20 जगुआर लड़ाकू विमान ख़रीदे हैं।हथियारों की दुनिया के सबसे बड़े आयातकों की सूची में दूसरा स्थान दक्षिणी कोरिया को हासिल है जिसका हिस्सा दुनिया में हथियारों के कुल आयात का 6 प्रतिशत है। उसके बाद चीन तथा पाकिस्तान (5-5 प्रतिशत) और सिंगापुर (4 प्रतिशत) का स्थान है।  दुनिया में हथियारों के कुल आयात का 30 प्रतिशत इन पाँच देशों के ख़ाते में पड़ता है।  यही नहीं, दुनिया के सर्वाधिक पांच हथियार आयातक देश एशिया के ही हैं। हालांकि विश्व युद्ध जैसी अब कोई स्थिति नहीं है, लेकिन विश्व शांति के लिए यह शुभ संकेत नहीं है। आज कई देश हथियारों की खरीद पर इतना अधिक धन व्यय कर रहे हैं कि उनके विकास के कार्यो के लिए धन की कमी पड़ती जा रही है। विडंबना यह भी है कि हथियारों की होड़ में शामिल देश अपने परमाणु हथियारों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम भी नहीं कर रहे हैं। यह भी वजह है कि दुनिया में संदेह का माहौल है। पाकिस्तान का उदाहरण हमारे सामने है, जिसने भारत से परमाणु शक्ति संपन्न बनने की प्रतिस्पर्धा तो कर ली है, लेकिन उसके खुद के परमाणु हथियार सुरक्षित नहीं हैं। आज पूरी दुनिया की चिंता पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर है।


350 किलोमीटर से अधिक की मारक क्षमता वाली यह मिसाइल उन मिसाइल परीक्षणों की सीरीज की ताजा कड़ी है जो भारत के भीतर तक लक्ष्यों को भेद सकती हैं। सेना ने हत्फ-8 मिसाइल के टेस्ट को सफल करार दिया है। सेना ने एक बयान में बताया है कि 350 किलोमीटर से अधिक की रेंज वाली मिसाइल पाकिस्तान को सतह और समुद्र में सामरिक क्षमता बढ़ाने में मदद करेगी। बयान के अनुसार, 'यह मिसाइल लड़ाकू क्षमता की है और कम ऊंचाई पर अधिक कुशलता से मार करने में सक्षम है।' इस टेस्ट से कुछ ही दिन पहले पाकिस्तान ने परमाणु क्षमता संपन्न और तेजी से प्रतिक्रिया करने वाली हत्फ-9 मिसाइल का परीक्षण 29 मई को किया था, जिसकी मारक क्षमता 60 किलोमीटर थी। हत्फ नौ मिसाइल पूरी तरह युद्ध के मैदान के हिसाब से डिजाइन की गई मिसाइल है जो हथियारों के बड़े जखीरे को निशाना बनाने के लिए है। बयान में कहा गया है कि हत्फ-8, 'पूरी सटीकता के साथ परमाणु और पारंपरिक हथियारों को ले जाने में सक्षम है।' सेना ने बताया कि आज के परीक्षण में एक नई ऑटोमेटिड कमांड और कंट्रोल सिस्टम का भी टेस्ट किया गया।

इस बीच सेना प्रमुख का पद संभालने के बाद पहले ही दिन जनरल बिक्रम सिंह ने शुक्रवार को सेना के सामने खड़ी कई चुनौतियों के संकेत दे दिए।इनमें संयुक्त राष्ट्र कांगो मिशन में तैनाती के दौरान यौन दुराचार संबंधी कई अन्य आरोप भी शामिल है। जनरल सिंह ने कहा कि ऐसे किसी भी विवाद को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।

ब्रिकम सिंह ने गार्ड ऑफ ऑनर का सम्मान प्राप्त करने के बाद कहा कि उनकी प्राथमिकता सेना को धर्मनिरपेक्ष, गैर राजनीतिक बल बनाए रखने का होगी।गौरतलब है कि बिक्रम सिंह दुनिया की इस दूसरी सबसे बड़ी सेना का प्रतिष्ठित पद संभालने वाले 27 वें सेना प्रमुख है तथा 25 वें भारतीय है।जनरल बिक्रम सिंह ने गुरुवार को देश के नए सेनाध्यक्ष के तौर पर फौज की कमान संभाल ली। 1972 के कमीशन इंफैंट्री अधिकारी सिंह ने बीते 26 माह में कई तूफान खड़े करने वाले जनरल वीके सिंह से बैटन हासिल किया। सेना के 27वें मुखिया बने बिक्रम सिंह का कार्यकाल भी 27 महीनों का होगा। सेना मुख्यालय में हुए बदलाव के साथ ही रक्षामंत्री एके एंटनी ने भी मंत्रालय के अफसरों के साथ बैठक कर उन्हें अतीत के कड़वे अनुभवों को भुल आगे की सुध लेने की नसीहत दी। पिछले सेनाध्यक्ष के 26 माह के कार्यकाल में मंत्रालय और सेना प्रमुख के बीच उम्र विवाद पर मतभेद सुप्रीमकोर्ट तक भी पहुंच गए थे।

जनरल वी.के.सिंह से कार्यभार ग्रहण करने वाले बिक्रम सिंह ने कहा कि 11.30 लाख सैनिकों वाली इस सेना की सभी इकाइयां और इसके कमांडर इस संगठन की आंतरिक सेहत सुधारने के लिए काम करते है और यह प्रयास लगातार जारी रहेगा।

बिक्रम सिंह, सेना प्रमुख का पद संभालने वाले सिख समुदाय के दूसरे व्यक्ति है। उन्हे कई कठिनाइयों से उबरना है। इसमें एक कानूनी जंग भी शामिल है,जिसके कारण उन्हे सेना प्रमुख का पद संभालने से रोकने की कोशिश भी हुई थी।

जनरल बिक्रम सिंह पहले ऐसे सेनाध्यक्ष हैं जिन्होंने किसी युद्ध में हिस्सा नहीं लिया। भारत ने पाक के खिलाफ सीधा युद्ध 1971 में लड़ा था और बिक्रम सिंह 1972 के कमीशन प्राप्त अधिकारी हैं। हालांकि कारगिल संघर्ष के समय सिंह सैन्य अभियान निदेशालय में थे और घुसपैठियों को खदेड़ने की सैन्य कार्रवाई पर मीडिया को नियमित ब्रीफ किया करते थे। साथियों के बीच 'बिक्की' नाम से लोकप्रिय सिंह सिख लाइट इंफैंट्री के अधिकारी हैं और इससे पहले पूर्वी कमान के कमांडर थे। अमेरिका के वॉर कॉलेज से प्रशिक्षित सिंह बेलगाम स्थित इंफैट्री स्कूल में कमांडो प्रशिक्षक रह चुके हैं। गुरुवार दोपहर रक्षा मंत्रालय में सेनाध्यक्ष कार्यालय में हुए सत्ता परिवर्तन के मौके पर जनरल बिक्रम सिंह के साथ उनकी पत्नी सुरजीत कौर भी मौजूद थीं।

सेना प्रमुख के तौर पर बिक्रम सिंह के नई जिम्मेदारी संभालने से पहले इस पद पर उनकी नियुक्ति के खिलाफ अदालत में सवाल उठाए गए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट से गत माह उनकी नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज हो चुकी है, लेकिन अब नई पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई है।

इससे पहले सेवानिवृत्त हुए सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। सलामी लेने के बाद सिंह ने मीडिया से बातचीत में कहा,उन्होंने अपने वादे के मुताबिक सेना की अंदरूनी सेहत को सुधारा है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सिंह सुहाग की अगुवाई वाली 3 कोर में एक फर्जी मुठभेड़ को लेकर एक मेजर रैंक अधिकारी की ओर से मिली शिकायत पर चिंता जताते हुए कहा,इस बारे में जांच के लिए कहने के बावजूद पड़ताल शुरू नहीं हो पाई है। इस बारे में अब अगले नेतृत्व को कार्रवाई करनी है।

देश के नए सेनाध्यक्ष बिक्रम सिंह जब निवर्तमान सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह से 'बैटन' ग्रहण कर रहे थे, उसी समय उनके पैतृक गांव कलेर घुमान के प्राइमरी स्कूल के 'नोटिस बोर्ड' पर एक अध्यापिका 'गांव के गौरव बिक्रम सिंह देश के नए सेना अध्यक्ष का पद ग्रहण कर रहे हैं' के बारे में चॉक से लिख रही थीं। गांव के सरकारी ऐलीमेंट्री स्कूल के हेड मास्टर दिलबाग सिंह ने विद्यार्थियों को जब गांव के बेटे की उपलब्धि के बारे में बताया तो तालियों की गड़गड़ाहट से स्कूल गूंज उठा।

अमृतसर-जालंधर रोड पर स्थित कस्बा रइया के नहर के पुल के बाएं तरफ मुड़ती एक तंग सड़क पर तीन किलोमीटर दूर बसे इस गांव में गुरुवार को उल्लास का माहौल था। उनके पैतृक घर में रहने वाले पूर्व सरपंच बलविंदर सिंह लोगों को बार-बार मकान के उस हिस्से की ओर इशारा कर रहे थे, जहां जनरल बिक्रम सिंह के पिता प्यारा सिंह, मां जीत कौर और परिवार के अन्य सदस्य रहा करते थे। बलविंदर सिंह के पूर्वजों ने जनरल के पिता प्यारा सिंह से यह घर मात्र 3600 रुपये में खरीदा था। मकान की सेल डीड को पिछले 42 वर्ष से एक संदूक में बंद थी, लेकिन आज उस डीड को निकालकर वह देख रहे थे। उस पर बिक्रम सिंह के पिता प्यारा सिंह के अंग्रेजी में दस्तखत हैं। बलविंदर सिंह कहते हैं कि जनरल के परिवार के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे। यह मकान उनको उस समय रहने को दिया गया था। जब पूरा परिवार जम्मू स्थानांतरित हो गया था। बाद में यह मकान उन्हें बेच दिया गया।

बिक्रम सिंह, संयुक्त राष्ट्र कांगो मिशन के उप कमान अधिकारी थे, जब संयुक्त राष्ट्र के निगरानी दल ने भारतीय बलों पर स्थानीय महिलाओं के यौन शोषण में लिप्त होने का संकेत दिया था।

एक साल पहले 45 रुपये की तुलना में डॉलर के 25 फीसदी मजबूत होकर 56 रुपये (बुधवार को) के स्तर पर पहुंचने से आयात पर निर्भर रक्षा उद्योग को तगड़ा झटका लगने जा रहा है। ताजा रक्षा बजट को 13.5 फीसदी बढ़ाकर 1,70,937 करोड़ रुपये से 1,93,407 करोड़ रुपये किया गया था। यह बढ़ोतरी और इससे कुछ ज्यादा ही डॉलर की आंधी में साफ हो गई है। अगर इसके साथ मुद्रास्फीति को भी जोड़ दें तो तस्वीर और भी बेरंग दिखती है, जो रक्षा उपकरणों के लिए सालाना लगभग 15 फीसदी के स्तर पर चल रही है।
भारतीय रक्षा उद्योग का नुकसान काफी बढ़ गया है, जो भले ही 'स्वदेशी' शस्त्र बनाता है लेकिन उनमें 30 से 70 फीसदी हिस्सेदारी विदेशी उपकरणों और प्रणालियों की है। बीते साल तक विदेशी मुद्रा दर रूपांतर (एफईआरवी) के माध्यम से रक्षा मंत्रालय सार्वजनिक रक्षा क्षेत्र को संरक्षण दिया करता था, जिसमें 8 रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों (डीपीएसयू) और 39 आयुध डिपो (ओएफ) शामिल हैं। एफईआरवी के माध्यम से विदेशी मुद्रा में होने वाले उतार-चढ़ावों को उनकी आय के साथ समायोजित किया जाता है। इसके विपरीत निजी क्षेत्र को विदेशी विनिमय (मुद्रा) जोखिम से जूझना पड़ता है।ऐसा बिजनेस स्टैंडर्ड की रपट में बताया गया है।

इसी क्रम में कई निजी कंपनियों को अभूतपूर्व घाटे की आशंका है। लार्सन ऐंड टुब्रो को ही लीजिए, जिसने मार्च 2010 में भारतीय तटरक्षक सेना के लिए 36 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट बनाने का 1,000 करोड़ रुपये का ठेका हासिल किया था। ये 110 टन के गश्ती और बचाव पोत हैं जो वाटर जेट के दम पर 44 नॉट (81 किलोमीटर प्रति घंटा) की रफ्तार से दौड़ सकता है। एलऐंडटी कहती है कि इंजन और वाटर जेट सहित लगभग 40 फीसदी जहाज आयातित है। 10 फीसदी मुनाफा मार्जिन के साथ एलऐंडटी ने 360 करोड़ रुपये विदेशी मुुद्रा घटक का उल्लेख किया था। रुपये में कमजोरी को देखते हुए विदेशी मुद्रा घटकर बढ़कर आज 445 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। एलऐंडटी कहती है कि उसके लिए इस ठेके में मुनाफा कमाना मुश्किल हो रहा है।या फिर बेंगलूर की अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजिज लि. को लेते हैं, जिसने बीते साल सितंबर में वायुसेना के लिए लक्ष्य की पहचान करने वाले उपकरण (टारगेट डेजिग्नेटर) , लेजर बीम बनाने के लिए 48 करोड़ रुपये का ठेका हासिल किया था। जब नवंबर 2010 अल्फा ने बोली लगाई थी तब डॉलर 44.37 रुपये पर था, आज यह 25 फीसदी ऊंचा है। टारगेट डेजिग्नेटर के 70 फीसदी आयातित होने के लिहाज से अल्फा को भारी नुकसान होने जा रहा है।

अल्फा के सीएमडी कर्नल एच एस शंकर कहते हैं, 'हमें भारत इलेक्ट्रॉनिक लि. जैसे डीपीएसयू से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है, जिन्हें एफईआरवी जोखिमों के प्रति रक्षा मंत्रालय से संरक्षण मिल रहा है। रक्षा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में 5 फीसदी मुनाफा मार्जिन को देखते हुए हम कैसे विदेशी मुद्रा हेजिंग को सहन कर सकते हैं?'

एलऐंडटी के अध्यक्ष (हैवी इंजीनियरिंग) एम वी कोतवाल कहते हैं, 'रुपये की कमजोरी को देखते हुए स्थिर मूल्य वाले ठेके हेजिंग की लागत बढऩे के कारण बेहद जोखिम भरे हो गए हैं। कल्पना कीजिए कि जब भारतीय कंपनियों को भारतीय सेना के ठेकों के लिए विदेशी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़े जो स्वत: ही संरक्षित हैं।'


दूसरी ओर सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह की चिट्ठी के सामने आ जाने से पाकिस्तान बेहद खुश है।  वीके सिंह की चिट्ठी में कई बातों के अलावा बताया गया है कि भारतीय सेना के पास हथियार और साज-ओ-सामान की कमी है। इस खबर को पाकिस्तान मीडिया ने प्रमुखता से जगह दी है।  पाकिस्तान के ज़्यादातर अखबारों ने जनरल सिंह की चिट्ठी को अहमियत देते हुए 'दो दुश्मन पड़ोसियों' (चीन और पाकिस्तान) को देखते हुए 'भारतीय सेना की तैयारियों में खामी' का विश्लेषण किया है।   

'इंडियाज मिलियन स्ट्रॉन्ग आर्मी एक्सपोज़्ड एज होलो' शीर्षक से एक्सप्रेस ट्रिब्यून की खबर में भारतीय सेना के पास गोला बारूद की कमी, भारतीय वायुसेना की 97 फीसदी रक्षा प्रणाली का बेकार होना और भारत के शीर्ष सुरक्षा बलों के पास जरूरी हथियारों की कमी की बात को अहमियत दी गई है। रिपोर्ट में भारत पर यह कहते हुए तंज भी कसा गया है कि यह देश दुनिया में सैन्य साज-ओ-सामान को सबसे ज़्यादा आयात करने वाला देश है।

पाकिस्तान के सबसे ज़्यादा बिकने वाले अंग्रेजी दैनिक 'द न्यूज' ने 'लीक्ड लेटर रिवील्स इंडियाज मिलिट्री वीकनेस' शीर्षक से छपी खबर में कहा है कि लीक हुई चिट्ठीमें शर्मिंदा करने वाले ब्योरे हैं, जो एशिया के सबसे ताकतवर मुल्कों में से एक की सरकारऔर सेना की छवि के लिए बड़ा झटका है।  खबर के मुताबिक चिट्ठी सरकार और जनरल सिंह के बीच 'जंग को सार्वजनिक' कर दिया है।  

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हथियारों और अन्य सैन्य सामानों की खरीद की प्रक्रिया 'भ्रष्टाचार के लिए बदनाम' है।  जबकि 'द डॉन' ने बैक पेज पर इंडियन आर्मी इन बैड शेप, जनरल सिंह टेल्स पीएम शीर्षक से छपी खबर में कहा है कि चिट्ठी से सामने आया ब्योरा पाकिस्तान को खुश कर सकता है लेकिन यह किसी बड़ी परेशानी की तरफ इशारा नहीं करता है। रिपोर्ट में भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष शंकर रॉयचौधरी के बयान का हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था, 'पाकिस्तान इन सब बातों को लेकर हंस रहा होगा।'  
उर्दू के अख़बार 'रोज़नामा जंग', जिसने इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह दी और अपनी ख़बर में लिखा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सेना भीतर से काफी कमज़ोर है और उसके सेनाध्यक्ष ने यह बात मानी है।

पाकिस्तान से दशकों पुराने तनाव, चीन के आक्रामक रवैये और नक्सली समस्या को ध्यान में रखते हुए भारत अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। चीन और उसके सहयोगी पाकिस्तान की तरफ से बढ़ती खतरे की आशंकाओं के मद्देनज़र भारत ने तेजी से अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी है। जानकारों का मानना है कि भारत अपने पड़ोसियों (खासकर चीन) के साथ हथियारों की होड़ में न सिर्फ चुनौती दे रहा है बल्कि कई रणनीतिक मामलों में वह उन पर भारी भी पड़ रहा है। समुद्र के सामरिक महत्व और चीन के दक्षिण पूर्व एशिया के समुद्री इलाकों में बढ़ते असर को देखते हुए भारत ने समंदर में अपनी ताकत बढ़ाने का फैसला किया है। इसी साल अगस्त में चीन के जहाज ने भारत के जहाज को वियतनाम के पास दक्षिण चीन सागर में मौजूदगी की वजह पूछी थी। जानकारों के मुताबिक यह घटना दक्षिण एशिया में भारत और चीन जैसे देशों के बीच होड़ को समझने के लिए काफी है। दुनिया में असरदार देश बनने की ओर बढ़ रहे दक्षिण पूर्व एशिया के देश पहले क्षेत्रीय स्तर पर बड़ी ताकत बनना चाहते हैं। भारत इस समय हथियार आयात करने के मामले में दुनिया का अव्वल देश है।

हथियारों की खरीदफरोख्त पर नज़र रखने वाले संगठन सिपरी की 2011 की रिपोर्ट के मुताबिक 2006 और 2010 के बीच दुनिया में हुई हथियारों की खरीद का 9 फीसदी हिस्सा अकेले भारत के हिस्से में है। सिपरी के मुताबिक भारत ने अपने ज़्यादातर हथियार रूस से खरीदे हैं। वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के आकलन के मुताबिक भारत ने अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण पर 2015 तक 80 अरब डॉलर (करीब 40 खरब रुपये) खर्च करने की योजना बनाई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत अपनी समुद्री ताकत को बढ़ाने पर खासा जोर दे रहा है। मैरीटाइम एनालिसिस फर्म एएमआई इंटरनेशनल के एक आकलन के मुताबिक अगले 20 सालों में भारत 103 नए जंगी जहाजों (इसमें परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां भी शामिल) पर 45 अरब डॉलर का खर्च करेगा। वहीं, इस दौरान चीन 135 जंगी जहाजों पर महज 25 अरब डॉलर (करीब 12 खरब रुपये) खर्च करेगा। जानकार यह भी मानते हैं कि भारत के लिए राहत की बात यह है कि अमेरिका भारत की बढ़ती सामरिक ताकत से ज़्यादा चिंतित नहीं है।

अमेरिका के लिए ज़्यादा चिंता की बात चीन की सामरिक शक्ति है। इस तथ्य के बावजूद कि भारत सबसे ज़्यादा हथियार रूस से खरीदता है, अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन की 2010 डिफेंस रिव्यू में हिंद महासागर के अलावा अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत की बढ़ती भूमिका का स्वागत किया था। सिर्फ समंदर ही नहीं, आसमान और जमीन पर भी नज़र भारत सिर्फ अपनी नौसेना को ही आधुनिक नहीं बना रहा है। बल्कि उसकी नज़र आसमान पर भी है। यही वजह है कि भारत ने अपनी वायुसेना को भी आधुनिक बनाने की महत्वाकांक्षी योजना पर अमल करना शुरू कर दिया है। 126 आधुनिक जंगी विमान भारत करीब 126 आधुनिक जंगी विमान खरीदने की योजना बना रहा है। भारतीय वायुसेना ने इस खरीदारी के लिए दो विमानों को विचार के लिए चुना है। इनमें रफाल और टायफून विमान शामिल हैं। दोनों विमान अमेरिका के एफ-16 विमानों को टक्कर दे सकते हैं। अमेरिका ने एफ-16 विमान पाकिस्तान को भी दिए हैं।

जानकारों का मानना है कि भारतीय वायुसेना इनमें से किसी का भी चुना करे, दोनों भारतीय सैन्य क्षमताओं को नई ऊंचाई देंगे और भारत दुनिया के उन देशों की कतार में खड़ा हो जाएगा जो आधुनिक जंगी विमानों से लैस हैं। द रफाल को फ्रांस की दसाल्ट एविएशन ने बनाया है। जबकि यूरो फाइटर टायफून को यूरोप के चार देशों (ब्रिटेन, इटली, जर्मनी और स्पेन) की एक संयुक्त कंपनी यूरो फाइट ने तैयार किया है। लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (एलसीएच) दुनिया के आधुनिकतम लड़ाकू हेलीकॉप्टरों में से एक है। इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने विकसित किया है। 2013 तक यह हेलीकॉप्टर भारतीय वायुसेना के जंगी बेडे़ में शामिल हो जाएगा। एलसीएच के पास दुश्मन का मुकाबला करने के लिए जबर्दस्त क्षमताएं हैं। इसमें स्टेल्थ विमानों के भी गुण हैं, जिसका मतलब है कि इसकी उड़ान को रडार के जरिए भांपा नहीं जा सकता है। इस हेलीकॉप्टर का वजन 5800 किलो है। यह हेलीकॉप्टर 268 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा में उड़ सकता है। इसमें 20 मिमी की टरेट गन है, जो दुश्मन के ठिकाने को भेद सकता है। यह हेलीकॉप्टर दायें, बायें, नीचे और सबसे अहम पीछे की तरफ उड़ सकता है।

जानकार मानते हैं कि इस हेलीकॉप्टर की खूबियां दुनिया में सबसे आधुनिक और उन्नत माने जा रहे अमेरिका के ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर को टक्कर दे सकती हैं। कुछ मायनों में जानकार इसे ब्लैक हॉक से भी बेहतर बता रहे हैं। गौरतलब है कि अमेरिका ने ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल इसी साल मई में ओसामा बिन लादेन को मारने में किया था। मिग 29 के मिग 29 के लड़ाकू विमान नौसेना के पास होगा। एडमिरल गोर्शकोव को आधुनिक आईएनएस विक्रमादित्य के तौर विकसित किया जा रहा है। 2012 के अंत या 2013 की शुरुआत तक विक्रमादित्य के नौसेना में शामिल होने पर मिग 29 के को आईएनएस विक्रमादित्य पर तैनात कर दिया जाएगा। मिग-29 के, पुराने मिग-29 से 30 फीसदी ज़्यादा भारी है। मिग-29 के एंटी एयरक्राफ्ट बीयॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल, स्मार्ट गाइडेड बम और रॉकेट से लैस है। इस लड़ाकू विमान के पंखों को फोल्ड किया जा सकता है। नेवी के आईएनएस विक्रमादित्य जहाज पर इसकी तैनाती के लिहाज से यह अहम खासियत साबित हो सकती है। मिग-29 के सिंगल सीट वाला लडा़कू विमान है। यह विमान फरवरी, 2010 में नौसेना के बेड़े में शामिल हो चुका है। आधुनिक जंगी टैंक अर्जुन मार्क 2 अगली पीढ़ी का आधुनिक जंगी टैंक। भारत में डीआरडीओ ने इसे विकसित किया है। इसका ट्रायल चल रहा है। सेना उम्मीद जता रही है कि जून, 2012 तक यह टैंक उनके बेडे़ में शामिल होगा। इसे बनाने के लिए अर्जुन के पहले संस्करण में कई बदलाव किए गए हैं। पुराने अर्जुन टैंक में पहले नाइट विज़न नहीं था। डिजीटल कंट्रोल है। टैंक के कमांडर को बड़े 90 बदलाव किेए गए हैं। रूस के टी-90 को कड़ी टक्कर दे सकता है। अर्जुन मार्क 2 को रूस के टी-90 टैंक से बेहतर माना जा रहा है।
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