Monday, October 14, 2019

छोटा नागपुर के आदिवासी संसोधित संविधान में उनकी सही हैसियत (1936 में लिखित) दिवंगत शरत चंद्र राय मूल अंग्रेजी से अनुवादः पलाश विश्वास



छोटा नागपुर के आदिवासी
संसोधित संविधान में उनकी सही हैसियत
(1936 में लिखित)
दिवंगत शरत चंद्र राय
मूल अंग्रेजी से अनुवादः पलाश विश्वास

1

प्रस्तावना

बिहार और ओड़ीशा प्रांत के चार इलाके गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट, 1919 के प्रावधानों के तहत पिछड़े इलाके (Backward tract) की श्रेणी में रखे गये। ये इलाके अनुगुल, संथाल परगना, संबलपुर और छोटा नागपुर हैं।
चूंकि इन चारों इलाकों के सामाजिक राजनीतिक इतिहास और संस्कृति भिन्न भिन्न हैं, इसलिए उनमें से हरेक के लिए प्रशासनिक बंदोबस्त अब तक सापेक्षिक तौर पर भिन्न भिन्न रहा है।
अनुगुल पहले ट्रिब्यूटरी स्टेट बउद का हिस्सा था,जिसे वहां रहने वाली जंगली खोंड आदिवासियों में प्रचलित निर्मम आदिम मेरिहा नरबलि प्रथा को रोकने के बहाने अंग्रेजों ने 1847 में बउद से जब्त कर लिया। तब से अब तक इस इलाके का प्रशासन बेहद सामान्य पितृसत्तात्मक तौर तरीके के साथ रेगुलेशन चतुर्थ,1904 के मुताबिक चल रहा है जो प्रांत के सामान्य प्रशासन से एकदम अलहदा है।
खेती बाड़ी से गुजर बसर करने वाले  संथालों और उनसे भी प्राचीन आदिम जनजाति सौरिया पहाड़िया के इलाके संथाल परगना में 1855 से अब तक  स्पेशल रेगुलेशन के अंतर्गत प्रशासन चलाया जाता रहा है। बहरहाल अनुगुल की तुलना में कम पिछड़ा माने जाने की वजह से इस जिले को 1920 से विधायिका में नुमाइंदगी की इजाजत मिली हुई है।
संबलपुर में देशी शासकों के शासनकाल में अनेक उलटफेर के बाद ब्रिटिश सरकार ने उसका अधिग्रहण कर लिया और उसे 1849 में साउथ वेस्टर्न फ्रंटियर एजंसी के हिस्सा बतौर छोटा नागपुर में शामिल कर लिया। फिर उसे 1860 में ओड़ीशा के हवाले करने के बाद फिर 1862 में सेंट्रल प्रोविंस और 1905 में बंगाल में शामिल किया गया और आखिरकार 1912 में ओड़ीशा को लौटा दिया गया। लेकिन अब तक वहां व्यवहारिक तौर पर  छोटा नागपुर की प्रशासनिक व्यवस्था की तर्ज पर प्रशासन चलाया जाता रहा है।
छोटा नागपुर, बेहतर कहें तो मौजूदा रांची, हजारीबाग और पलामू जिलों पर अंग्रेजों ने अठारवीं सदी के आखिरी पच्चीस सालों के दौरान कब्जा जमा लिया,जहां 1831 तक प्रशासन आर्डिनरी डिस्ट्रिक्ट रेगुलेशन के तहत चलाया जाता रहा। जो रामगढ़ के  जज-मजिस्ट्रेट-कलेक्टर के आधीन था। जिनका मुख्यालय बारी बारी से हजारीबाग जिले के चतरा और मौजूदा गया जिले के शेर घाटी हुआ करता था। मुख्यालयों से बहुत दूरी की वजह से इस दुर्गम जिले के आदिवासियों के लिए छोटा नागपुर में उनकी विरासती जमीन के हकहकूक पर होने वाले हमलों के खिलाफ सुनवाई का कोई खास साधन नहीं था और ऐसे हमले का सिलसिला उन दिनों का दस्तूर था। बहरहाल हमें बताया गया है कि कभी कभार रामगढ़ अदालत के नजीर को प्रशासन के कामकाज का निरीक्षण करके रपट देने के लिए विशेषाधिकार के साथ मौके पर पड़ताल के लिए भेज दिया जाता था। जिससे आदिवासियों की हिफाजत बहुत कम हो पाती थी और उन्हें शायद ही कोई राहत मिल पाती थी। जैसा कि सर विलियम्स हंटर ने लिखा है,` वे नये हुक्मरान की उपेक्षा के शिकार थे। बाहरी लोग उनका शोषण करते थे। फिर उन्हें उन सभी मौकों से वंचित कर दिया गया, जिसके तहत उन्हें अपने सरदार से अपनी तकलीफें कहकर उनसे राहत मिला करती थी। ‘1831 के कोल विद्रोह (Kol Insurrection) से फिर वह आग भड़क गयी जो लंबे समय तक सुलगती रही। (Stastical Account of Bengal,Vol.XVI.p.450).
जाहिर है कि इस विद्रोह के बाद छोटा नागपुर के आदिवासियों के वैध हितों की खास तौर पर रक्षा करने की जरुरत हुक्मरान को समझ में आ गयी। नतीजतन समूचा छोटानागपुर को एक अलहदा प्रशासनिक इकाई बना दिया गया,जिसमें सिंहभूम और मानभूम जिलों को भी शामिल कर लिया गया। इस नई प्रशासनिक इकाई के मुखिया बतौर एक नये पद का सृजन कर दिया गया। स्पेशल अफसर जो गवर्नर जनरल का एजंट था। गवर्नर जनरल के इस एजंट को रांची में तैनात कर दिया गया और उसके मुख्य सहयोगियों के जिला मुख्यालयों में। अदालतों के दिशानिर्देश के तहत पुराने जटिल कानूनी विधान (कोड) के बजाय नये सरलीकृत कानून लागू कर दिये गये।इससे कुछ हद तक आदिवासी जमीन के मालिकों की बेदखली पर अंकुश लगा जो अबतक निरंकुश तौर पर होती  रही थी।
दुर्भाग्य से दो दशकों के अंदर ही इस  नई प्रणाली के तहत आदिवासियों के हितों के संरक्षण के प्रावधान वक्त पूरा होने से पहले खत्म कर दिये गये। अपने हक हकूक की हिफाजत के लिए आदिवासियों के पर्याप्त शिक्षा हासिल करने  और बेहतर तौर पर सभ्य बनने से पहले ही छोटा नागपुर को फिर उसी पुरानी प्रशासनिक और विधायी प्रणाली के अंधेरे में फेंक दिया गया। हालांकि छोटा नागपुर को जिलों  को अब  `नान रेगुलेशन जिले’ का दर्जा दे दिया गया और इसके बाद उन्हें `अनुसूचित जिले ’ का दर्जा भी मिल गया। फिर केंद्र और प्रांतीय विधानमंडल के बनाये सारे आम कानून एक के बाद एक इन जिलों में भी लागू कर दिये गये। जिसका विस्तार डिवीजन तक हो गया। अब तक इसी तरह इरादों और उद्देश्यों के साथ छोटा नागपुर के तमाम जिले भी आम रेगुलेशन जिले बने रहे, जो प्रांत के सबसे विकसित जिलों की तरह वही  कानून, वही हाईकोर्ट, निचली अदालतों और राजस्व अधिकारियों के उसी वर्ग के अधीन बने रहे। आदिवासियों के खास हक हकूक की हिफाजत के लिए एक नाकाफी टिनेंसी एक्ट (Bengal Act I of 1879) और एक स्पेशल टेनुअर्स एक्ट (Bengal Act II of 1869) के सिवाय काई कारगर कदम उठाये नहीं गये, ऐसा लगता है। नतीजतन ऐसे कानूनी संरक्षण की अनुपस्थिति, स्थानीय अफसरान की लापरवाही और उदासीनता की वजह से आदिवासी भूमिधारी और गैरभूमिधारी खेत जोतनेवाले  किसानों को इस पूरी अवधि में जो नुकसान हुआ ,उसका कोई हिसाब जो़ड़ा नहीं जा सकता।छोटानागपुर के ये तमाम आदिवासी मजबूत लुटेरों के हमलों,फर्जीवाड़ों और ताकत के शिकार होते चले गये।1899 के बिरसा अनुयायियों के मुंडा विद्रोह तक आदिवासियों के पास जो भी कुछ मामूली तौर पर बचा खुचा था, उसकी हिफाजत के लिए सरकार ने कुछ भी नहीं किया, कोई कारगर कदम नहीं उठाये और इस विद्रोह ने उन्हें झकझोर कर जगा दिया।

II
रचनात्मक नीति का अभाव
बिरसा अनुयायियों के मुंडा विद्रोह के बाद ही आदिवासी किसानों की अकूत संपत्ति में से जितनी भी बाकी जमीन आदिवासियों के पास बची हुई थी, उसकी हिफाजत के नजरिये से  सर्वे और बंदोबस्त के लिए अभियान शुरु किये गये। बहरहाल इसका बेहद मामूली असर हो सका। फिरभी इसतरह के कदम से आदिवासियों को व्यापक पैमाने पर शांत कर दिया गया और उन्होंने अपनी  सारी ऊर्जा पूरे दिलोदिमाग के साथ  अपने सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास के लिए विकसित नस्लों के अनुकरण में लगा दिया गया।
इस तरह बंगाल बिहार और ओड़ीशा प्रशासन की पंचवर्षीय रपट (1903-1908) रपट में हमें पढ़ने को मिलता हैः `अदालतों की उपेक्षा और स्थानीय अफसरान की उदासीनता की वजह से हाल के वर्षों तक कानून और व्यवस्था की विभिन्न एजंसियों की तरफ से मुंडा आदिवासियों के साथ बहुत ज्यादा अन्याय होता रहा है।जिससे उनमें से ज्यादातर के दिमाग में सरकार के खिलाफ बेहद कड़वापन भर गया।क्योंकि उनके हक में सरकारी हस्तक्षेप न होने की वजहें वे समझ नहीं पा रहे थे।’
1902 में जब सर्वे और बंदोबस्त के अभियान के तहत उनके पास बाकी बची जमीन के हकहकूक  तय कर दिये गये और 1908 में पास एक बेहतर टिनेंसी एक्ट के (हांलाकि तब भी त्रुटिपूर्ण) लागू कर दिया गया,तब जाकर कहीं छोटानागपुर के आदिवासी शांत हुए और उनके तमाम नेताओं ने आदिवासियों के सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक बेहतरी पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। इस अवधि तक जो नतीजे मिले ,उसे काफी हद तक गौरतलब कहा जा सकता है।
हालांकि उन्होंने पहले ही बहुत कुछ खो दिया,बहुत तकलीफें उठायीं, इसके बावजूद जो कुछ उनके पास बचा था, उस पर उनका हक सुरक्षित हो जाने के बाद उन्होंने अपने हालात से समझौते कर लिये। बेशक उन्हें अपने विचारों और आकांक्षाओं के लिए नई दिशा मिल गयी। यह दिशा प्रांत की आम जनसंख्या के विचारों और आकांक्षाओं के मुताबिक थी।
इस सिलसिले में गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट,1919 के तहत गवर्नर जनरल और गवर्नर को जिन इलाकों को वे पिछड़े बैकवर्ड ट्रैक्ट बता रहे थे, वहां के लिए सेक्शन 52ए के तहत किसी  कानून को लागू होने से पूरी तरह या आंशिक तौर पर रोक लगाने के अधिकार दे दिये गये। यहीं नहीं, इन पिछड़े इलाकों के लिए जरुरत पड़ने पर नये नियम (रेगुलेशन) बनाने के लिए सेक्शन 71 के तहत उन्हें अधिकार भी दे दिये गये। लेकिन जहां तक छोटा नागपुर का संबंध है, सेक्शन 71 को इस हद तक लागू नहीं किया गया। इन पिछड़े इलाकों के लिए बिहार और ओड़ीशा सरकार के स्टेच्युरी कमीशन के लिए तैयार ज्ञापन में कहा गयाः `छोटा नागपुर के पांच जिलों की स्थिति (अन्य पिछड़े इलाकों,बैकवर्ड ट्रैक्ट से) भिन्न है। जिससे वहां रेगुलेशन के मार्फत कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं है।’
गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट,1919 के सेक्शन 52ए के तहत गवर्नर जनरल और गवर्नर को मिले मामूली संरक्षणात्मक अधिकार के अलावा छोटानागपुर के सभी जिले अपने इरादे और उद्देश्य के साथ प्रांत के दूसरे `विकसित’ जिलों की तरह एक समान संवैधानिक स्थिति में थे। पिछले पंद्रह सालों के दौरान सेक्शन 52ए के तहत गवर्नर जनरल और गवर्नर को मिले संरक्षणात्मक अधिकार का इस्तेमाल सिर्फ एक बार सिर्फ एक कानून के सिर्फ एक सेक्शन को लागू करने से रोकने के लिए हो सका। इस पर तुर्रा यह कि (जिला परिषद के चेयरमैन के चुनाव पर) यह रोक सिर्फ इन तमाम जिलों में से सिर्फ एक ही जिले में हटायी  गयी है जबकि  बाकी जिलों में वह रोक जल्दी हटाये जाने की उम्मीद की जा रही  है।
दरअसल जहां तक छोटा नागपुर का संबंध है, सेक्शन 52ए के तहत संरक्षण लागू करने में शायद इतनी देरी हो गयी है कि उसका कोई खास व्यवहारिक उपयोग बचा नहीं है। बल्कि सच यह है कि इसका इस्तेमाल छोटानागपुर के आदिवासियों के शोषण के इतिहास के त्रासद युग के अवसान के बाद जाकर कहीं हो सका। जाहिरा तौर पर इसका किसी तरह के व्यवहारिक इस्तेमाल की गुंजाइश बची नहीं है।बहरहाल विरोधी राजनीतिक दबाव के बावजूद गवर्नरों और कुछ स्थानीय अधिकारियों की सहानुभूति दरअसल देशी लोगों की तुलना में आम तौर पर कहीं ज्यादा थी और इसी वजह से आदिवासियों के हितों की पूरी तरह उपेक्षा भी नहीं हो रही थी। इसके बावजूद ऐसा कतई कहा नहीं जा सकता कि इस आंशिक संरक्षणात्मक नीति के अलावा छोटा नागपुर के आदिवासियों के सामाजिक ,आर्थिक राजनीतिक उत्थान के लिए सरकार व्यवस्थित तरीके से कोई काम कर रही थी या इस मकसद से उसकी कोई रचनात्मक नीति बना ली थी।
जाहिरा तौर पर जब नये संवैधानिक सुधार लागू किये गये,उस वक्त बहुत लोगों को उम्मीद थी कि पुराने कानून के तहत बैकवर्ड ट्रैक्ट इलाकों में छोटानागपुर के सबसे विकसित होने के आधार पर उसे प्रांत के दूसरे जिलों के बराबर कानूनी हक हकूक निश्चित तौर पर आदिवासियों के आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के साथ उनके खास हितों के संरक्षण के लिए जरुरी रक्षाकवच के साथ मिल जायेंगे।
गौरतलब है कि इन आदिवासियों को बदलते हुए हालात के मुताबिक जिस हद तक वे कर सकते थे, खुद को ढालने के लिए बेसहारा छोड़ दिया गया जबकि अतीत में उन्होंने बहुत कुछ खो दिया, बहुत तकलीफें झेलीं और अब वे अपने पांवों पर खड़े होने भी लगे हैं। हालांकि उनके संरक्षण के लिए अब भी कुछ कदम उठाये जाने चाहिए थे लेकिन हकीकत यह है कि अब उन्हें सिर्फ कानून के मुख्य सहारे की जरुरत नहीं है।
बहरहाल नये रिफार्म बिल में उनकी उम्मीदों का गहरा झटका लगा। क्योंकि छोटानागपुर की राजनैतिक हैसियत में कोई सुधार करने के बजाय इस बिल की छठी अनुसूची के तहत छोटानागपुर और संबलपुर को संथाल परगना और अनुगुल के साथ आंशिक तौर पर अलहदा इलाका,एक्सक्लुडेड एरिया बतौर  नत्थी कर दिया गया।इस तरह बड़ी निर्ममता के साथ इन भिन्न भिन्न  इलाकों के अपने अपने प्रशासनिक इतिहास, शैक्षणिक विकास और उनकी राजनैतिक हैसियत  को सिरे से नजरअंदाज कर दिया गया। यहां तक कि आदिवासी इलाकों के प्रशासन के बारे में विधान परिषद  में  बातचीत और सवाल जवाब करने के उनके नुमाइंदों के हक भी छीन लिये जाने का प्रस्ताव किया गया है।

III

आधिकारिक आपत्तियां

18 फरवरी,1935 को बिहार विधान परिषद ने बिना मत विभाजन के परिषद के एकमात्र आदिवासी निर्वाचित सदस्य की तरफ से पेश प्रस्ताव पास करके सरकार से सिफारिश कर दी कि छोटा नागपुर के किसी भी हिस्से को` अलहदा एक्सक्लुडेड या आंशिक रुप में अलहदा पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका न बनाया जाय’। इस प्रस्ताव से आदिवासियों के लिए उनके वैध हितों के संरक्षण के लिए बतौर अल्पसंख्यक अपने हक हकूक हासिल कर लेने का रास्ता खुल गया। लेकिन प्रस्ताव पर बहस के दौरान सरकार की ओर से माननीय श्री हुब्बैक ने न सिर्फ इस प्रस्ताव का विरोध कर दिया बल्कि उससे आगे बढ़कर सभी उम्मीदों के विपरीत ऐलान कर दिया कि जहां तक कि छोटा नागपुर के आदिवासियों का संबंध है, हालांकि वे छोटा नागपुर में जनसंख्या के 40 प्रतिशत हैं और पूरे बिहार प्रांत की कुल जनसंख्या के 13 प्रतिशत, उन्हें दूसरे मान्यताप्राप्त अल्पसंख्यकों की तरह अल्पसंख्यक माना नहीं जा सकता।बिहार सरकार के इस रवैये को जो कारण उन्होंने बताये वे इस प्रकार हैंः
  1. उन्होंने सभ्यता का वह स्तर हासिल नहीं किया है,जैसा दूसरे अल्पसंख्यकों ने हासिल कर लिया है। धनबल और हैसियत में भी वे उनके बराबर नहीं हैं।
  2. साक्षरता परीक्षण में भी देखा गया है कि वे सामान्य स्तर तक पहुंचने के लिए अभी उन्हें बहुत फासला तय करना बाकी है।
  3. वे राजनैतिक तौर पर भी उतने संगठित नहीं हैं ,जितने कि दूसरे समुदाय हैं।
  4. और देश में अमन चैन और अच्छा राजकाज बहाल रखना जरुरी है।


IV

आदिवासियों की संस्कृति का स्तर

मैं अपनी जानकारी की रोशनी के मुताबिक इन तमाम बिंदुओं पर सिलसिलेवार एक के बाद  संक्षेप में चर्चा करने की कोशिश कर रहा हूं। चूंकि यह सवाल छोटा नागपुर डिवीजन के आदिवासियों को लेकर उठाया गया है तो मैं अपनी चर्चा इसी डिवीजन के दायरे में ही कर रहा हूं।
जहां तक यह सवाल है कि छोटा नागपुर के आदिवासियों की साक्षरता का स्तर प्रांत के दूसरे अल्पसंख्यकों के बराबर नहीं है, किसी भी पैमाने पर इस बात के पक्ष में यह दलील नहीं दी जा सकती कि  साक्षरता के मामले में छोटानागपुर के आदिवासी मान्यताप्राप्त अल्पसंख्यकों दलित वर्ग और मजदूरों के मुकाबले कमतर हैं। जबकि हालांकि दूसरे मान्यताप्राप्त अल्पसंख्यकों की साक्षरता का स्तर आदिवासियों की तुलना में थोडा़ बहुत बेहतर हो सकता है लेकिन उनमें भी स्तर की भिन्नता है। दूसरी तरफ, छोटा नागपुर के मुख्य आदिवासी समूहों मुंडा, उरांव,खेड़िया, संथाल, हो और भूमिज की भी अपनी अपनी खास संस्कृति है जो कम महत्वपूर्ण या किसी भी तरह से निचले स्तर की नहीं है।
यह सभी लोग मानते हैं कि छोटा नागपुर में जमीन आबाद उन्हीं लोगों ने किया और गांव भी उन्हीं लोगों ने बसाये।बहुत पुराने समय से उनका परंपरागत कारगर ग्राम स्वराज गांव के सरदार और उनके सहयोगियों की अगुवाई में बहाल रहा है जिसके तहत गांव के बुजुर्गों की पंचायत न्यायिक और कार्यकारी कामकाज निबटाती रही है। जबकि अविवाहित युवा गांव की सुरक्षावाहिनी बतौर काम करते रहे हैं। उन्होंने आगे फिर अपने स्वराज का विकास कर लिया और गांवों के संघ बतौर परहा और पिरा के स्तर तक ग्राम स्वराज को विस्तृत और विकसित कर लिया। संघीय कार्यकारिणी और न्यायिक परिषद बतौर परहा पंचायतें भी उन्होंने बना लीं। वे इससे भी आगे के स्तर तक संघीय ढांचे में संगठित होते चले गये। उन्होंने व्यापक ग्राम स्वराज का संघीय ढांचा परहा पंचायतों के ताने बाने बुनने के जरिये तैयार कर लिया। इस संघीय ढांचे में राज्य के बीज अंकुरित होने लगे। लेकिन विपरीत परिस्थितियों की वजह से ग्राम स्वराज के विकास की यह प्रक्रिया रुक गयी। हालांकि पिछले सौ साल या उसके आसपास की अवधि में उनके ग्राम स्वराज के ढांचे के अंतर्गत उनके तमाम संगठन काफी कमजोर हो गये। क्योंकि अपरिहार्य कारणों से उनके परंपरागत पुराने  कामकाज में रुकावटें आयीं और इस संगठनों की ताकत घटती चली गयी। इसके बावजूद इनका बाहरी ढांचा अभी बहाल है और इन संगठनों के कुछ सामाजिक और न्यायिक कामकाज अभी बदस्तूर जारी हैं। छोटा नागपुर में किसी अजनबी को रांची जिले के कुछ आदिवासी गांवों में राजा, दीवान, पांडे, कोटवारे जैसी पदवियों का सामना करके अचरज भी हो सकता है। जो उनके गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है। छोटा नागपुर के मुंडा आदिवासी मूलतः मैदानी घाटी इलाकों और आखिरकार पहाड़ों और पठारों में अपनी हुकूमत की परंपराओं को अभी बचाये हुए हैं। जैसे कि भारतीय समाजशास्त्र और नृतत्व विज्ञान के सभी छात्रों को मालूम होगा कि बंगालियों, बिहारियों और उड़िया जनसमूहों की सिर्फ नस्ली बनावट में ही इन आदिवासियों की कमोबेश भूमिका नहीं रही है, बल्कि उनके सामाजिक,धार्मिक और सांस्कृतिक उपकरणों में भी उनका योगदान रहा है।
अतीत से वर्तमान में लौटें तो हम देखते हैं कि आदिवासियों की मौजूदा पीढ़ियां अपनी विरासत की पुराने ढांचों की  नींव पर नये सिरे से निर्माण में लगे हुए हैं। उनकी सभाओं, सहकारी समितियों और व्यापक पैमाने पर  दूसरे सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक सुनियोजित संगठनों में उनकी सांगठनिक शक्ति और अनुशासन की अभिव्यक्ति हुई है।
जहां तक साहित्य का सवाल है, हालांकि छोटा नागपुर के आदिवासियों का अपना कोई लिखित साहित्य नहीं है, लेकिन आज कम से कम  उनके अनेक गीतों में उच्च स्तर का कवित्व है। कविता के गुणों से भरपूर ये गीत बेहद सुंदर तो हैं ही, इनकी विंब संरचना की सादगी और सुंदरता पश्चिमी कवियों जैसे राबर्ट बर्न्स की कविताओं की याद दिलाती हैं।
आदिवासियों के बीच काम करने वालों को धन्यवाद,जिनमें खास तौर पर ईसाई मिशनरी उनके बीच करीब सौ साल से काम कर रहे हैं। ईसाई मिशनरियों और सरकार की शिक्षा के लिए दी जाने वाली मदद से उनमें से एक वर्ग को अंग्रेजी शिक्षा मिली है और उनमें से कुछ ने तो यूरोप और अमेरिका से भी शिक्षा हासिल की है। इनमें से अनेक ने भारतीय विश्वविद्यालयों से शिक्षा ली है। जिनमें से कुछ प्रांतीय सरकार और अधीनस्थ सरकारी सेवाओं में जिम्मेदार पदों पर काम कर रहे हैं। कुछ उदार पेशेवर हैं तो कुछ इस प्रांत और प्रांत के बाहर भी जिंदगी में विभिन्न जिम्मेदार पदों पर काम कर रहे हैं। उन्होंने सुधारों के लिए सोसाइटियों और सभाओं का गठन किया है और वे एक से अधिक सामयिक पत्र का प्रकाशन भी कर रहे हैं। खास तौर पर पिछले तीस सालों के दरम्यान उनमें सांस्कृतिक विकास की दिशा में चहुंमुखी उल्लेखनीय प्रगति हुई है, यह खासतौर पर गौरतलब है। उनकी पुरानी  नस्ली खर्चीलेपन की आदत की जगह बहुत सारे मामलों में किफायत के साथ आपस में एक दूसरे की, खुद की मदद और एक दूसरे से सहयोग करने की की भावना ने ले ली है। यही नहीं, बड़ी संख्या में शिक्षित लोगों ने नस्ली आत्म विकास पर ध्यान केंद्रित कर लिया है। उनकी सभाओं में अपने लोगों के कल्याण के  कार्यक्रमों को तेज करने के मकसद के साथ सामाजिक,आर्थिक और यहां तक कि राजनीतिक मुद्दों पर विचार विमर्श होता है और वे व्याख्यान और संवाद के जरिये अपनी राय और अपने विचारों को आगे बढ़ाने लगे हैं। ताकि वे अपने समुदाय में समाजिक सुधारों और आर्थिक और राजनीतिक बेहतरी के लिए जनमत बना सके। आदरणीय श्रीमाऩ हुब्बाक ने भी खुद हाल में उनके संगठनों की तरफ से पास प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए उन्हें महत्वपूर्ण भी माना है। आदिवासियों की तरफ से स्टेच्युरी कमीशन के सामने इस सिलसिले एक शिष्टमंडल ने मजबूती के साथ अपना पक्ष भी रखा है।
दरअसल काफी हद तक ईसाई मिशनरियों के असर में और कुछ हद तक सरकार प्रबंधित और सरकारी मदद से चलने वाले शैक्षणिक संस्थानों की वजह से छोटा नागपुर के आदिवासियों के बौद्धिक और सामाजिक विकास में पिछले पचास सालों में बहुत बड़ी प्रेरणा मिली है। यही नहीं, इससे भी पहले आदिवासियों ने छोटा नागपुर के विभिन्न जन समुदायों के बीच सिर्फ सामाजिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक तौर पर खास दर्जा हासिल कर लिया था। यहां तक कि आदिवासी गांवों के सरदारों और परहा के मुखियाओं का आज भी सिर्फ उनके अपने लोगों पर ही नहीं, बल्कि पड़ोसी हिंदुओं और मुसलमानों में भी असर बना हुआ है। उनमें से कुछ तो गांवों के मालिक ही बन गये हैं और करीब करीब उन सबके पास विरासत में मिली अपनी  संपत्तियां है और  कुछ मामलों में तो यह संपत्ति काफी है। उनमें से कुछ लोग कारोबार चला रहे हैं तो कुछ बैंकर भी हैं। संपत्ति और हैसियत के मामले में आदिवासियों में अनेक टेनुयर होल्डर हैं तो कुछ गांव या गांवों के समूह के मालिकान भी हैं और जाहिरा तौर पर उनकी हैसियत बहुत ऊंची है। इनमें से कुछ लोगों की चर्चा बड़े जमीदारों को कर्ज (कई मामलों में हजारों रुपये ) देने के लिए होती है। इन इलाकों में उनकी समाजिक हैसियत पेशक काफी ऊंची है। इस तरह साफ जाहिर है कि इस देश पर उनका दावा किसी मायने में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी कोई संस्कृति और सभ्यता नहीं है।
बौद्धिक क्षमता के पैमाने से छोटा नागपुर के आदिवासी इस प्रांत और किसी भी दूसरे प्रांत के ज्यादा विकसित समुदायों की तुलना में कतई पीछे नहीं हैं। यह सिर्फ आगे विकास के लिए  सही मौका न मिलने और दूसरी सभ्यताओं के साथ सही और पर्याप्त संपर्क स्थापित न होने का मामला है, जिस वजह से वे पिछड़े हैं, जबकि उनमें से एक बड़ा हिस्सा  सही मौकों के के लिए बिल्कुल तैयार हैं। अब तक जो भी सुविधाएं उन्हें दी गयी हैं, उन्होंने साबित कर दिया है कि वे उनका सही इस्तेमाल करते हैंऔर फायदा भी उठाते हैं।
जहां तक आदरणीय श्रीमान हुब्बाक महोदय उन्हें अलहदा रखने की दूसरी वजह साक्षरता, खासकर अंग्रेजी ज्ञान  में उनके पीछे होना बताते हैं ,उस सिलसिले में निवेदन है कि उपलब्ध सरकारी आंकड़े उनके  इन विचारों पर आधारित प्रस्ताव का पूरी तरह समर्थन नहीं करते नजर नहीं आते हैं। किसी भी पैमाने के लिहाज से छोटा नागपुर डिवीजन में साक्षरता दर सूबे के  सबसे ज्यादा विकसित किसी डिवीजन से कम नहीं प्रतीत होती है। किसी खास जनजाति की प्रांतीय आंकड़े को किसी दलील का आधार नहीं बनाया जा सकता, जिनका एक बड़ा हिस्सा जागीरदारी (सामंती) राज्य ओड़ीशा में बसे हुए हैं ,जहां साक्षरता दर सूबे में  सबसे कम है और आदिवासियों में तो साक्षरता नहीं के बराबर है। हम इस मामले में पूरी तरह छोटानागपुर के आंकड़ों के साथ हैं और छोटानागपुर के आंकड़ों की ही तुलना सूबे के दूसरे डिवीजनों के मुकाबले रखना चाहते हैं।
पिछले 16 जनवरी के विधान परिषद में संयुक्त संसदीय समिति की रपट के सिलसिले में पेश प्रस्ताव पर माननीय श्रीमान हुब्बाक ने जो वक्तव्य रखा,उसके मुताबिक किसी खास इलाके को आंशिक रुप से `अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाके’ में शामिल करने और उसे विकसित इलाकों के मुकम्मल हक हकूक से वंचित करने का एकमात्र औचित्य उस इलाके की साक्षरता में और खास तौर पर अंग्रेजी ज्ञान में पिछड़ापन है। बहरहाल किसी जिले या डिवीजन के इस `पिछड़ेपन’ या विकास  की माननीय श्रीमान हुब्बाक की `निरंकुश और निर्णायक कसौटी‘ के आधार पर भी, जिसके मुताबिक जल्द ही लागू किये जाने वाले संशोधित संविधान के तहत संबद्ध इलाके की राजनैतिक हैसियत और कानूनी स्थिति तय होनी है, छोटा नागपुर अब  उन पिछड़े इलाकों के व्यापक हिस्से में शामिल नहीं किया जा सकता, जहां साक्षरता का स्तर बाकी प्रांत के मुकाबले निचले दर्जा का है।
दरअसल हकीकत यह है कि प्रांत के दूसरे डिवीजनों से पिछड़ने की बात तो रही दूर, बल्कि कुछ ही समय के भीतर छोटा नागपुर ने काफी तरक्की कर ली है और आम साक्षरता के साथ साथ अंग्रेजी शिक्षा में भी छोटा नागपुर डिवीजन प्रांत के दूसरे डिवीजनों के मुकाबले अग्रिम स्थान पर है।
जनगणना के ताजा आंकड़ों ने इसे निर्णायक तरीके से साबित भी कर दिया है। इन आंकड़ों के मुताबिक आम साक्षरता के मामले में छोटा नागपुर करीब करीब दक्षिण बिहार के स्तर तक पहुंच गया है। जबकि अंग्रेजी शिक्षा के मामले में छोटा नागपुर डिवीजन ने दूसरों डिवीजनों को पीछे छोड़ दिया है।
प्रति दस हजार की जनसंख्या के हिसाब से मीडिल या उससे ऊंचले दर्जे की परीक्षाएं पास करने वालों में उत्तरी बिहार के 65 पुरुष और 3 स्त्रियां हैं, दक्षिण बिहार में 96 पुरुष और 6 स्त्रियां हैं जबकि इनके मुकाबले छोटा नागपुर डिवीजन में 90.8 पुरुष और 8.4 स्त्रियां। ऐसे स्त्री पुरुष मिलाकर कुल शिक्षित लोगों की संख्या उत्तर बिहार में 42, दक्षिण बिहार में 51 और छोटा नागपुर डिवीजन में 50.8 है। अंग्रेजी शिक्षा के मामले में 5 से 20 साल की उम्र के  उत्तर बिहार में 70 पुरुष और 4 स्त्रियां है, दक्षिण बिहार में 119 पुरुष और 11 महिलाएं हैं तो इनके मुकाबले छोटा नागपुर डिवीजन में यह संख्या काफी ज्यादा 120.6 पुरुष और 15.2 स्त्रियां हैं। जहां तक 20 साल या उससे ज्यादा उम्र वालों में अंग्रेजी शिक्षा वाले पुरुषों और स्त्रियों की संख्या है तो यह उत्तर बिहार में 85 पुरुष और 4 स्त्रियां हैं तो दक्षिण बिहार में 140 पुरुष और 11 स्त्रियां हैं जबकि छोटा नागपुर डिवीजन में यह संख्या भी काफी ज्यादा 152.6 पुरुष और 16.6 स्त्रियां हैं।
जैसा कि माननीय श्रीमान हुब्बाक ने सही तौर पर कहा है कि प्रांत की मुख्य देशी भाषा में शिक्षा और अंग्रेजी शिक्षा के पैमाने के तहत तरक्की की कसौटी पर ही किसी इलाके को पिछड़ेपन के दर्जे से अगला ऊंचला  विकसित दर्जे पर प्रोन्नत किया जाना चाहिए तो जाहिर है कि छोटा नागपुर इस प्रोन्नति का हकदार है। इस लिहाज से छोटा नागपुर के आदिवासियों को कानूनन अल्पसंख्यक का दर्जा मिल जाना चाहिए।
माननीय श्रीमान  हुब्बाक के ही फैसले के तहत  उन्हींकी तय `निरंकुश और निर्णायक कसौटी’ छोटानागपुर अथवा कम से कम रांची जिले के पिछड़ेपन की पड़ताल होनी चाहिए क्योंकि अतीत चाहे कुछ भी रहा हो, इन्हें प्रांत के पिछड़े इलाकों में  किसी भी कीमत पर शामिल नहीं किया जा सकता।
हाल के वर्षों में शिक्षा और सभ्यता के मामलों में छोटा नागपुर ने जो अभूतपूर्व प्रगति की है, उस नजरअंदाज करते हुए छोटा नागपुर को अनुगुल और यहां तक कि संथाल परगना के दर्जे में आंशिक अलहदा ,पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका के निचले दर्जे में रखना छोटानागपुर के आदिवासी नेताओं को स्वाभाविक रुप से  यह सोचने के लिए मजबूर कर देगा कि उनके साथ अन्याय हो रहा है और यह उनके लोगों के नस्ली आत्मसम्मान के खिलाफ है। गौरतलब है कि ये आदिवासी नेता अपने समुदाय के नेताओं में काफी आगे हैं।सदन में यह प्रस्ताव पेश करने वाले बिहार विधान परिषद के आदिवासी सदस्य ने इस बिंदु पर खास जोर दिया है।
इस मामले में आदिवासियों की शिकायत को शायद कमोबेश भावनात्मक समझा जा सकता है। यदि ऐसा भी है तो यह भी गौरतलब है कि इंसानियत  के मामलात में भावनाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। खासतौर पर थोड़े कम कुलीन आदिवासियों में तो इसका खास महत्व है। राजनीति के विशेषज्ञ और संविधान निर्माता ऐसी आपत्तियों को भावनात्मक बकवास समझकर सिरे से खारिज नहीं कर सकते। भावनाओं को वजूद से बाहर खींचकर निकाला नहीं जा सकता। अच्छाई के लिए या बुराई के लिए भी इन भावनाओं के संभावित असर को सुरक्षित तरीके से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पढ़े लिखे आदिवासियों में नस्ली चेतना, नस्ली गौरव, और यहां तक कि  राजनीतिक चेतना और स्वतंत्रता की भावना के तेज विकास बल्कि पुनरुत्थान के मद्देनजर  इस पर हैरत नहीं होनी चाहिए कि इन  आदिवासियों को  पिछड़ा और संरक्षित कमतर समुदाय का दर्जा  दिया जाना उनमें अपमान बोध और गुस्सा पैदा करेगा। ऐसा शायद सभी आदिवासी नेताओं में न हो ,लेकिन उनमें जो थोडे ज्यादा जोशीले हैं, उनपर ऐसा असर जरुर होगा।
जैसे कि  1928 में स्टेच्युरी कमीशन में आदिवासी जनता के नेता रेवरेंड ज्वेल लाकड़ा ने श्री हरि सिंह गौड़ के आदिवासियों को `पिछड़ा’ कहने पर ऐतराज जताया था, क्योंकि आदिवासियों को इस तरह पिछड़ा बताना उनमें आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की लहर रोकने के लिए सुनियोजित है जिसका विकास आगे और हो सकता है,ऐसा उन्होंने अपने उस जबाव में साफ कह दिया था।
फिर 21 अगस्त,1928 को एक और आदिवासी नेता देवेंद्र नाथ सामंत ने बिहार विधान परिषद में साइमन कमीशन के साथ सहयोग के लिए समिति के गठन के लिए पेश सरकारी प्रस्ताव पर बोलते हुए इस भावना को असाधारण तरीके से अभिव्यक्ति दी, जब उन्होंने आवेश में आकर कह दिया, `हम आदिवासियों को अच्छी तरह मालूम है कि जब सरकार बीच बीच में आदिवासी हितों या उनसे संबंधित जरुरी मामलात पर कार्रवाई करने का दिखावा करती है तो यह उनके अपने ही मकसद को पूरा करने के मकसद से किया जाता है।’ अगर श्री सामंत का यह बयान सिर्फ उनकी निराशा की ढीठ अभिव्यक्ति नहीं है तो यह समझना चाहिए कि श्री सामंत को अफसोसजनक तरीके से गलत समझा गया। मुझे तो उनके इस लापरवाह तरीके से कुछ ज्यादा ही बोल देने की व्याख्या करते हुए लगता है कि उनकी भाषा में गुस्से का लहजा था, जो उनके लोगों को पितृसत्तात्मक सरकार की ओर से ऐसी `पिछड़ी नस्ल’ का दर्जा दिये जाने के खिलाफ उनमें पैदा हो गयी हीनताबोध की वजह से है क्योंकि सरकार का रवैया उन्हें `पिछड़ी नस्ल’ का बताते हुए उनके मां बाप जैसा बर्ताव करने का  है।
यहां तक कि काफी संजीदा दिमाग के आदिवासियों के बुद्धिमान मित्र रांची के दिवंगत बिशप वान हुयेक ने आदिवासियों के आत्मसम्मान को जख्मी न करने पर खास जोर दिया है। साइमन कमीशन के समक्ष इस सवाल पर कि क्या वे इस इलाके के लिए `ज्यादा संरक्षणात्मक कदम उठाये जाने के पक्ष में हैं या इसके लिए अलग प्रशासनिक इंतजाम के’, उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि `मैं निश्चित तौर पर अलग प्रशासन के दूसरे विकल्प को चुनना चाहुंगा क्योंकि अगर आपको विशेष संरक्षण दिया जाता है तो इससे निश्चित तौर पर आपका आत्मसम्मान नहीं बढ़ता है और ऐसा कोई बंदोबस्त आपको लगातार इस बात का अहसास करायेगा कि आप दूसरों के मुकाबले हीन हैं। जाहिर है कि अगर आप आजाद हैं तो आपको आगे और किसी संरक्षण की जरुरत नहीं है।’ इससे भी आगे बढ़कर उन्होंने यह भी कह दिया, `किसी मशीनरी बनाने ( छोटा नागपुर के लिए अलग सही प्रशासनिक मशीनरी) के सिलसिले में आदिवासियों के आत्म सम्मान का  खास ख्याल रखा जाना चाहिए।उन्हें लगातार यह महसूस करने के लिए कतई मजबूर नहीं किया जाना चाहिए कि हम दूसरों के मुकाबले कमतर हैं तो हमें इसकी कोई परवाह नहीं करनी चाहिए।’
अब जबकि छोटा नागपुरी जनता देख रही है कि उन्हें सिर्फ `रेगुरलेशन गवर्न्ड’ संथाल परगना ही नहीं, बल्कि अबतक `अलहदा, एक्सक्लुडेड ‘अनुगुल के साथ एक ही दर्जे में डाला जा  रहा है तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि वे इसे गलत तरीके से राजनीतिक दर्जा घटाने की कार्रवाई मानें और इससे  अपना अपमान भी समझ लें। इसके साथ उनमें नाइंसाफी और अन्याय की भावना इस हकीकत के मद्देनजर और प्रबल हो सकती है क्योंकि जहां तक छोटा नागपुर का संबंध हैं, वहां दलित वर्ग के लोग दरअसल गांव के नौकर और मजदूर होते हैं और वे `लकड़ियां काटते और इकट्ठी करते हैं’ लेकिन उन्हें आदिवासी भी `पानी लेने की इजाजत’ नहीं देता और उन्हें भी कानूनी तौर पर अल्पसंख्यक का दर्जा मिल गया है ,जिसके तहत उन्हें सूबे की विधायिका में ज्यादा प्रतिनिधित्व मिला है और संघीय विधायिका में भी कुछ प्रतिनिधित्व मिल गया है,जबकि प्रांतीय परिषदों में ज्यादा और संघीय विधायिका में कुछ प्रतिनिधित्व की आदिवासियों की अपनी मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई।


V

आदिवासियों के राजनीतिक संगठन

आदरणीय श्रीमाऩ हुब्बाक की आपत्ति की तीसरी दलील यह है कि आदिवासी मजबूती के साथ संगठित नहीं हैं। इस सिलसिले में गौरतलब हो सकता है कि भारत के दलित और मेहनतकश वर्ग के लोग बिना बाहरी मदद और दिशा निर्देश के बिना राजनीतिक संगठन बनाने के काबिल मुश्किल से बताये जा सकते हैं,जबकि छोटा नागपुर के आदिवासियों की सांगठनिक ताकत काफी है और अपने हक हकूक के लिए वे साझा कार्रवाई करते रहते हैं। साइमन कमीशन के समक्ष पेश किये जाने के लिए  पिछड़े इलाकों के बारे में बिहार और ओड़ीशा सरकारों के ज्ञापन के पेज नंबर 16 में इसीलिए हमें बताया गया है कि दक्षिण मानभूम, रांची और सिंहभूम के  चुनाव क्षेत्रों से आदिवासी `उनके हक हकूक की आवाज बुलंद करने वाले किसी उम्मीदवार को जिताने में सक्षम हैं।’ फिर हम यह  पाते हैं कि सिर्फ ये चुनाव क्षेत्र ही  ऐसे हैं,जहां आदिवासी मतदाताओं की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या के 50 प्रतिशत से ज्यादा हैं। मसलन दक्षिण मानभूम में 52 प्रतिशत, सिंहभूम में 63 प्रतिशत और रांची में 66 प्रतिशत। जिन चुनावक्षेत्रों में आदिवासी मतदाताओं की संख्या इतनी कम है जैसे हजारीबाग में 18 प्रतिशत,पलामू में 20 प्रतिशत और उत्तर मानभूम में 29.5 प्रतिशत,वहां चुनाव नतीजे इससे अलग नहीं हो सकते,जैसे होते रहे हैं। नये संवैधानिक सुधारों के नतीजतन मताधिकार का जो विस्तार हुआ है, उसके तहत यह उम्मीद करना बहुत हद तक तर्कसंगत है कि इन इलाकों के आदिवासियों को अपने उम्मीदवारों को जिताने में कामयाबी मिलनी चाहिए। 24 निर्वाचित प्रतिनिधियों में 12 आदिवासी सदस्यों को जिता लेने की रांची के आदिवासियों की कामयाबी का हवाला देते हुए इसी ज्ञापन के पेज नंबर 17 में कहा गया हैः `यह नतीजा बहुत हद तक अपने हालात सुधारने के मकसद से उरांव और मुंडा आदिवासियों के संगठन बन जाने की वजह से है।यह संगठन उन्नति समाज नामक एक सोसाइटी है ,जो कुछ पढ़े लिखे आदिवासियों की पहल पर बना।’ जाहिर है कि उनके बारे में अब कतई यह कहा नहीं जा सकता कि वे संगठित नहीं हो सकते।
गौरतलब है कि रांची और सिंहभूम जिलों में विधान परिषद और स्थानीय निकायों के चुनावों में मतदान केंद्रों तक पहुंचने वाले मतदाताओं का जो औसत रहता है, वह विकसित जिलों में सबसे विकसित विकसित समुदायों के मतदाताओं के औसत की तुलना में कम नहीं है। इसलिए यह कहा नहीं जा सकता कि आदिवासी सामाजिक या राजनैतिक रुप में काफी मजबूती के साथ संगठित नहीं हैं।
आपत्ति की चौथी और आखिरी वजह यह बतायी गयी है कि आदिवासी इलाकों में `अमन चैन और अच्छी सरकार’ बहाल रखने की जरुरत है। अब छोटा नागपुर के आदिवासी शांतिप्रिय और कानून का पालन करने वाले लोग हैं, इस हकीकत के खिलाफ कुछ कहने की गुंजाइश नहीं है। पिछली सदी में जिस तरह की अशांति कई दफा हुई, उसके पर्याप्त कारण रहे हैं।  इसकी वजह आदिवासियों के जन्मजात उपद्रवी होना या उनमें किसी तरह की आपराधिक प्रवृत्तियां नहीं हैं। बल्कि पिछली सदी की अशांति आदिवासियों के जमीन के विरासत के मुताबिक हक हकूक पर अन्यायपूर्ण हमले की प्रतिक्रिया रही है। जिससे अतीत में अदालतों और अफसरों से उन्हें बहुत ही कम राहत मिली है। बहरहाल जैसे ही सर्वे और बंदोबस्त अभियान के तहत उनकी बची हुई जमीन के अधिकार बहाल हो गये, छोटा नागपुर के आदिवासी नस्ल बतौर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक स्थिति सुधारने के काम में जुट गये।इस दिशा में अब तक हुई उनकी प्रगति उल्लेखनीय है।
स्वाभाविक तौर पर इसीलिए छोटा नागपुर के आदिवासियों में  बेहतर पढ़े लिखे तबके को उनके इस विचार के लिए दोषी ठहराया नहीं जा सकता कि उनसे अब भी `पिछड़ा’ समुदाय बतौर बर्ताव किया जा रहा है और उनके प्रति गवर्नर की घोषित जिम्मेदारी सिर्फ सेक्शन 52 Cl. (e) के तहत  `अमन चैन की बहाली और अच्छी सरकार’ की है।
इस फार्मूला का असल मतलब यह है कि जिन समुदायों के लिए इस तरह का इंतजाम किया गया है, उसमें ज्यादातर लोग अनियंत्रित जंगली हैं, जो कट्टर तरीके से अशांत हैं और वे जन्मजात समाजविरोधी और कानून तोड़ने की प्रवृत्तियों वाले लोग हैं। इसके मद्देनजर उनका लगातार दमन और उन पर काबू रखने के लिए ऐसे ही इंतजाम की जरुरत है। लगातार होने वाले अन्याय से निराश होकर पिछली सदी में छोटा नागपुर के आदिवासियों में से कुछ दिग्भ्रमित समूहों ने प्रतिक्रिया में बदले और हिंसा की जो भी वारदातें की हैं, वह प्रशासन की तरफ से उनकी शिकायतों और तकलीफों की सुनवाई बहुत कम होने की वजह से हुई हैं। इसके विपरीत इस सदी की शुरुआत से वे लगातार  अमन चैन का रास्ता अख्तियार करते हुए बतौर शांतिप्रिय प्रजा अपने आर्थिक,सामाजिक और बौद्धिक विकास के लिए कोशिशें जारी किये हुए हैं। ये लोग अमन चैन के साथ अपने पड़ोसियों के साथ सद्भाव बनाये रखते हुए कर्तव्यपरायण भाव से प्रशासन से सहयोग कर रहे हैं। हालांकि इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इनमें से अपढ़ अशिक्षित आम लोग कभी कभार जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं, लेकिन सरकार के प्रति उनकी वफादारी के खिलाफ कोई सवाल उठाया नहीं जा सकता। इसके साथ ही गौरतलब है कि शिक्षा और सभ्यता के क्षेत्र में उन्होंने तब से लेकर अब तक उल्लेखनीय प्रगति कर ली है।
छोटा नागपुर के आदिवासी अब भी जंगली हैं, इस भ्रम के लिए शायद उनके बारे में अक्सर ढीले ढाले मायने में इस्तेमाल किये जाने वाले आदिम जैसे अनुचित शब्द के सम्मोहक इस्तेमाल बहुत हद तक जिम्मेदार है और इसी विभ्रम की वजह से उन्हें `अमन चैन और सरकार’ के लिए विध्वंसक तत्व मान लिया जाता है।बेशक अमन चैन और सरकार छोटा नागपुर के लिए उतना ही जरुरी है ,जितना कि किसी भी देश के लिए होता है। फिरभी इन दिनों इनकी बहाली के  लिए छोटा नागपुर में किसी खास ऐहतियाती इंतजाम करने की जरुरत नहीं पड़ती है। नस्ली अल्पसंख्यक होने की वजह से ` आदिवासियों के वैध हक हकूक की रक्षा’ के लिए गवर्नर और गवर्नर जनरल के अपनी  जिम्मेदारी निभाने से ही इस मकसद को पूरा किया जा सकता है।
बहरहाल मानीय श्रीमान हुब्बाक ने इस अमन चैन और सरकार के फार्मूले की एक और व्याख्या पेश की है और उनकी दलील है कि अल्पसंख्यक समुदाय के बजाय `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाके’ के वाशिंदे की हैसियत से आदिवासियों को कहीं ज्यादा फायदा होने वाला है। उन्होंने विधान परिषद में हमें बताया कि अमन चैन और सरकार की बहाली से `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाके’ की आबादी की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठाये जा सकेंगे जबकि `वैध  हकहकूक की रक्षा‘ के तहत अल्पसंख्यकों के ऐसे हितों के उल्लंघन के मामलों को रोकने के लिए नकारात्मक कार्रवाई के बारे में ही सोचा जा सकता है। उनके मुताबिक सिर्फ `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाके’ में ही आदिवासियों के खास मसलों को सुलझाने पर ध्यान दिया जा सकता है।

VI

तुरंत जो कदम उठाने जरुरी हैं

आदिवासियों की जिन खास  समस्याओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए और उनके जिन वैध हितों की रक्षा की जानी हैं, वे कृषि से संबंधित हक हकूक और स्पेशल टीनेंसी के हक हकूक हैं,जिनकी हिफाजत समुचित सोच विचार के साथ तैयार टीनेंसी कानून के जरिये ही की जा सकती है। दूसरा जो मुद्दा है, वह यह है कि उनके आर्थिक कल्याण के लिए दूसरी तमाम बातों के अलावा सूदखोरी के खिलाफ न्यायसंगत कानून बनाये जाने की जरुरत है और इसके अलावा उनके लोगों को सरकारी सेवाओं में व्यापक रोजगार दिलाने की जरुरत है। तीसरी जरूरी बात यह है कि उनकी शिक्षा और संस्कृति के विकास के लिए सही संस्थाओं की देखभाल और जहां भी जरुरत है, उसके मुताबिक उनके लिए विशेष आर्थिक अनुदान देने की आवश्यकता है। चौथी जरूरी बात यह है कि आदिवासियों में संयम को प्रोत्साहित करने के लिए  सही कदम उठाये जाने चाहिए। जिसके लिए आम तौर पर उनके इलाके में समुचित प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए सोच समझकर सावधानी से उनकी भाषा और रीति रिवाजों के जानकार विशेषतौर पर योग्य और संवेदनशील अधिकारियों को आदिवासी इलाकों में नियुक्त किया जाना चाहिए। जैसा कि मैं सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि आदिवासियों के इन सारे हितों की रक्षा और प्रोत्साहन गवर्नर नये बिल के क्लाज 12 (I) (c), 52 और 83 (3) के अंतर्गत अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति उनकी विशेष जिम्मेदारियों के तहत उतनी ही सक्षमता के साथ कर सकते हैं जैसे कि `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाके’ के अंतर्गत विशेष जिम्मेदारियों के तहत। इन हितों की रक्षा के लिए सिर्फ नकारातमक कदम उठाने के बजाय सकारात्मक कदम भी उठाये जा सकते हैं। उनके उत्थान के लिए, उनकी विशेष संस्कृति को  प्रोत्साहन देने के लिए और सार्वजनिक सेवाओं में उनको देय प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए ऐसे सकारात्मक कदम उठाये जा सकते हैं। जिनके बारे में इंस्ट्रुमेंट आफ इंस्ट्रक्शन (और संयुक्त संसदीय कमिटी की रपट के पैरा 321 में खास तौर पर उल्लेख किया गया है।
माननीय श्रीमान हुब्बाक की दलील है कि नये बिल के क्लाज 80 (1) के अंतर्गत गवर्नर को किसी भी ऐसे खाते से खर्च को प्रमाणित करने करने का अधिकार रहेगा, जिस पर विधान परिषद का वोट गवर्नर की विशेष जिम्मेदारियों में से किसी के निस्तारण पर उनके मुताबिक असर पड़ता हो। उनके मुताबिक अगर यह डिवीजन `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका’ हो तो इस वजह से इसका लाभ छोटा नागपुर को मिलेगा, ऐसा बिल्कुल साफ है। लेकिन मेरे हिसाब से चूंकि गवर्नर के इस अधिकार का प्रयोग का मौका उनकी खास जिम्मेदारियों के निर्वाह के सिलसिले में मिलेगा, तो जाहिर सी बात है कि वे इस अधिकार का प्रयोग आदिवासियों के हित में उनकी अल्पसंख्यक समुदाय की हैसियत के मुताबिक भी उसी तरह कर सकेंगे,जैसे कि छोटानागपुर डिवीजन के `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाके’ होने की स्थिति में वे कर सकते हैं।
इन तथ्यों के मद्देनजर `अल्पसंख्यक स्कीम’ के मुकाबले `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाके’ की स्कीम से कुछ ज्यादा फायदा होने की दलील हमें  समझ में नहीं आ रही है और न ऐसा कहीं प्रकट हो रहा है। बहरहाल किसी भी स्थिति में नये गवर्नमेंट आफ इंडिया बिल के अल्पसंख्यक धारा के तहत आदिवासियों को अल्पसंख्यक हैसियत ,जिसके वे हकदार हैं, के तहत उन्हें मिलने वाले लाभ से वंचित करने के पक्ष में कोई वैध तर्क है ही नहीं। जाहिर है कि अगर छोटा नागपुर के आदिवासियों को अल्पसंख्यक समुदाय की हैसियत दे दी जाती है और `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड ’ जैसे अपमानजनक नाम से रिहा कर दिया जाता है तो  आगे चलकर ऐसे किसी प्रवाधान का विरोध भी नहीं होगा,जिसके नतीजतन आदिवासियों का आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान हो।
गौरतलब है कि माननीय श्रीमान हुब्बाक ने भी अपने भाषण में माना है कि `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका’ आदिवासियों की `भावनाओं पर हल्का सा असर डालता है।’ इसलिए इन्हीं तथ्यों के मद्देनजर यही न्यायसंगत और सही होगा कि छोटानागपुर को `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका’ कतई नहीं माना जाये। बल्कि `आदिवासी इलाका’ या `एवोरिजिन ट्रैक्ट’ जैसी कोई हैसियत छोटा नागपुर के लिए ज्यादा सही होगा ,जिस पर किसी ऐतराज की गुंजाइश नहीं है। क्योंकि आदिवासी ही अल्पसंख्यक होने के बावजूद इन इलाकों के लिए नीति निर्धारण के सिलसिले में सबसे प्रभावी कारक हैं।
`आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका’ का प्रावधान अनुगुल की हैसियत सुधारने में निश्चित तौर पर मदद करेगा। संथाल परगना के मामले में नये बिल (शिड्युल VI) के असर में  कमोबेश यथास्थिति बनी रहेगी, हालांकि इस स्थिति में भी विधान परिषद में पूछताछ और चर्चा के अबाध अधिकार  खोना होगा।लेकिन जहां तक छोटा नागपुर का सवाल है,`आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका’ के प्रावधान में हम प्रगति का कोई तत्व खोज नहीं पा रहे हैं। इसके विपरीत अनेक आदिवासी नेता यह महसूस करते हैं कि इससे प्रगति के बदले प्रतिगमन या पतन की स्थिति पैदा हो जायेगी और उनकी राजनैतिक हैसियत घटेगी। जैसा कि `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका’ की श्रेणी से छोटानागपुर को हटाने के लिए मुंडा नेता के प्रस्ताव से जाहिर है और वे भी ऐसा महसूस करते हैं। उनकी शिकायत है कि इस प्रावधान में सबसे खास विशेषताएं बहिस्कार (एक्सक्लुजन) और प्रतिबंध हैं, न कि उनके हक हकूक में कोई बढ़ोतरी। दूसरी तरफ, अल्पसंख्यक प्रावधान की मुख्य विशेषताएं उनके हकहकूक की रक्षा और संरक्षण हैं और इसके साथ ही उनके कल्याण को प्राथमिकता है। आदिवासी नेता भी अपने समुदाय के लिए ऐसा ही चाहते हैं और यही उनकी जरुरतें भी हैं। वे महसूस करते हैं कि `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड ’ हैसियत से उनके बढ़ते हुए नस्ली आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है, जबकि बिल के अल्पसंख्यक प्रावधान के तहत नये बिल के अंतर्गत `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका’ से मिलने वाले सारे संरक्षण बराबर  हासिल हो जाते हैं। इसलिए वे मानते हैं कि अल्पसंख्यक प्रावधान के तहत ही उनके तमाम खास हितों की रक्षा काफी हद तक संभव है। इसके अलावा अल्पसंख्यक प्रावधान से उन्हें उस हीनताबोध से निजात मिल सकेगी जो बहिस्कार (एक्सक्लुजन) के नतीजतन पैदा हो जाना लाजिमी है, हालांकि नये सुधार के मुताबिक यह बहिस्कार आंशिक ही होना है लेकिन इससे पैदा होने वाला हीनताबोध और गहराने वाला है। माइनारिटी स्कीम के तहत उन्हें कुछ सकारात्मक लाभ मिलने की उम्मीदें भी हैं जैसे सार्वजनिक सेवाओं और विधायिका में सही प्रतिनिधित्व, अपनी संस्कृति का विकास और अपने इलाकों के प्रशासन के बारे में संवाद और पूछताछ की स्वतंत्रता के अधिकार। इन सबसे कहीं ज्यादा, जिसकी सबसे ज्यादा जरुरत है, इन इलाकों के प्रशासन लिए विशेष तौर पर सहानुभूतिशील अधिकारियों की नियुक्ति।
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट,1919 के सेक्शन 52 ए के तहत सिर्फ एक संरक्षणात्मक प्रावधान अब तक ऐसा माना जाता रहा है है, जिससे प्रांत के  दूसरे विकसित डिवीजनों के समकक्ष छोटानागपुर आ जाता है और वह प्रावधान गवर्नर जनरल को छोटानागपुर में किसी विधायी कानून या कानून के किसी हिस्से के अमल पर रोक लगाने का हक मिला हुआ है। जबकि इस मामूली संरक्षणात्मक  प्रावधान  का भी कहीं इस्तेमाल नहीं होता है। सिर्फ बारह साल पहले एक मामूली वाकये में इसका एक दफा इस्तेमाल किया गया। गौरतलब है कि तबसे लेकर अब तक शिक्षा और सभ्यता के विकास में छोटा नागपुर ने बहुत तेज तरक्की कर ली है।
इस प्रकार देखा जा सकता है कि प्रांत में आदिवासियों को अल्पसंख्यक समुदाय की मान्यता दिये जाने के  खिलाफ माननीय श्रीमान हुब्बाक ने अपने ऐतराज की जो वजहें बतायी हैं, वे अब किसी भी रुप में जायज नहीं मानी जा सकतीं।
`आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड इलाका’ के लिए नये बिल के तहत दो मुख्य संरक्षणात्मक उपायों के प्रावधान हैं।जो अपने इलाके में नये कानून को लागू करने के मामले में गवर्नर के  वीटो करने या सुधार करने के अधिकार हैं और इसके साथ ही उनके रेगुलेशन के मुताबिक राजकाज हैं। जबकि माइनारिटी स्कीम के तहत इन प्रावधानों के मुकाबले सेक्शन 90 के तहत गवर्नर को किसी बिल को अपनी सम्मति  देने से इंकार करने या रिमांड पर भेजने के अधिकार दिये गये हैं, जिसके तहत गवर्नर को अपनी विशेष जिम्मेदारियों के निर्वाह के सिलसिले में अल्पसंख्यकों के वैध हितों की रक्षा के  लिए `गवर्नर का कानून’ लागू करने का भी अधिकार दे दिया गया है। सेक्शन 44 के तहत गवर्नर जनरल को भी यही अधिकार दे दिया गया है।
इन परिस्थितियों में यह साफ हो जाना चाहिए कि छोटा नागपुर के आदिवासियों के लिए `अल्पसंख्यकों के लिए योजना’(माइनारिटी स्कीम) में संतुलन के हिसाब से ज्यादा लाभ की स्थिति है। यह लाभजनक स्थिति आगे फिर विधायिकाओं में ज्यादा और सही प्रतिनिधित्व दिये जाने और आदिवासियों के सांस्कृतिक और आर्थिक हितों को प्रोत्साहित करने पर और मजबूत हो सकती है। ऐसे कदम सही और जरूरी समझे जाने चाहिए।
आदिवासियों का प्रतिनिधित्व  प्रांतीय विधायिकाओं में सही तरीके से बढ़ाने और संघीय असेंबली में कुछ प्रतिनिधित्व दिये जाने पर दिये जाने पर इसे अतिरिक्त संरक्षणात्मक उपाय माना जा सकता है,जिससे आदिवासियों के वैध हितों पर  आवश्यक विवेचना हो सकती है और उनकी रक्षा भी की जा सकती है। आदिवासियों के साथ हमारी तमाम पेशागत सहानुभूति के बावजूद बेहद शर्मिंदगी के साथ हमें इसे मानना होगा कि  जब कभी हितों के टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है, तब आदिवासियों को देशवासियों की सहानुभूति बहुत कम मिल पाती है। उन्हें अपनी ही ताकत और सरकारी सक्रिय सहानुभूति और मदद पर जीना होता है।

VII

जो पिछड़े थे, वे अब पिछड़े कतई नहीं रहे

जैसा कि हमने देख लिया है कि छोटा नागपुर के आदिवासियों ने  पिछले तीस साल और उससे कुछ ज्यादा अवधि में शिक्षा में अपना पिछड़ापन काफी हद तक दूर कर लिया है। साधनों और मौकों की इजाजत मिलने के हिसाब से वे तेज तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। अब वास्तव में उन्हें और ज्यादा मौका दिये जाने की आपातकालीन जरुरत है।
छोटा नागपुर को अनुगुल की श्रेणी में रखने का मतलब यह है कि आप छोटा नागपुर के लिए घड़ी की सुई को पीछे की तरफ धकेल रहे हैं और उसे लगभग एक सदी पीछे के जमाने में साउथ वेस्टर्न फ्रंटियर एजंसी के कार्यकाल की तरफ ले जा रहे हैं,जो 1854 में समाप्त हो गया था। हकीकत यह जरूर  है कि वक्त से पहले 1854 में संरक्षणात्मक इंतजामात खत्म कर दिये जाने की वजह से आदिवासियों को अपनी  विरासत के मुताबिक मिले जमीनी हक हकूक आहिस्ते आहिस्ते खत्म होते चले गये और इसके नतीजतन बार बार पूरी सदी के ज्यादातर हिस्से के दरम्यान आदिवासी विद्रोह की घटनाएं होती रहीं। एक विद्रोह थमा तो दूसरा विद्रोह शुरु हो गया। आफ एंड आन। यह सिलसिला तभी थमा, जब बहुत देरी से 1902 में सर्वे और बंदोबस्त के आपरेशन अादिवासियों के प्रति अपनी सहानुभूति के लिए मशहूर अधिकारियों जैसे श्री (अब हिज एक्सीलेंसी  सर जेम्स) सिफ्टन, सर्वश्री लिस्टर, रीड, ब्रिज और गोखले और श्री (अब सर स्टुआर्ट) मैकफर्सन के दिशानिर्देशों के मुताबिक शुरु हो गये। इससे विरासत के मुताबिक हक हकूक की हिफाजत तय हो जाने के नतीजतन,जो अब तक बहाल हैं, आदिवासियों को शांत किया जा सका। तभी से आदिवासी अपने बदले हुए आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक हालात के मुताबिक खुद को तैयार करने में लगे हैं। तभी से उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा पूरे दिल के साथ अपने बौद्धिक, सामाजिक और आर्थिक उत्थान में लगा दी है। तब से लेकर अब तक जो तरक्की उन्होंने कर ली है,वह बेशक अभूतपूर्व है। अब ऐसे में दिन के अंत में आखिरकार उनकी उपलब्धियों के भुगतान बतौर `संरक्षण के पुराने एरिअर (प्रोटेक्शनंस ओल्ड एरिअर)’ चुकाने के मकसद से एक सदी पीछे लौटकर नार्थ वेस्टर्न फ्रंटिअर एजंसी के जमाने के बेकार और गलत संरक्षण के प्रावधान करना जहां तक छोटा नागपुर का ताल्लुक है, कुछ ज्यादा संरक्षण (ओवर प्रोटेक्शन) जैसा लगेगा,जो कि साफ तौर पर संवैधानिक कालभ्रम (एलक्रोनिज्म) होगा।
मौजूदा संविधान के मुताबिक विधायिका के सारे आम कानून वास्तव अर्थों में छोटा नागपुर में भी लागू होते हैं बशर्ते कि गवर्नर अपने विवेक के मुताबिक किसी पूरे कानून या उसके किसी हिस्से के छोटा नागपुर में अमल पर वीटो का प्रयोग न करें या उसे सुधार के साथ लागू करने का फैसला न करें। दूसरी तरफ, नये प्रस्तावों (सेक्शन 92 (I)) के तहत विधायिका का कोई कानून तब तक लागू नहीं होगा जब तक गवर्नर इसे लागू करने के लिए सार्वजनिक अधिसूचना जारी करके निर्देश न दें।आगे इस तथ्य पर भी गौर करें कि सेक्शन 92 (2) के तहत गवर्नर को अधिकार है कि अगर वे इसका फैसला कर लें तो वे विधायिका के किसी कानून को वापस ले सकते हैं और छोटा नागपुर के लिए अपनी तरफ से कोई रेगुलेशन बनाकर उसे लागू कर सकते हैं। इसके अलावा सेक्शन 84 (d) (i) के तहत वे ऐसा कदम उठाये जाने के औचित्य पर विधान परिषद में सवाल उठाने और बहस की इजाजत देने से भी इंकार कर सकते हैं। इन तथ्यों के मद्देनजर कुछ लोगों को डरावना ख्वाब आने लगा है कि इन प्रावधानों से, जैसा कि उनका आशय है, प्रशासन रेगुलेशन के तहत चलाये जाने के खतरे को खारिज नहीं किया जा सकता। अगर कोई उन्हें यह समझाने की कोशिश करता है कि उनकी यह  बेतरतीब आशंका निराधार है और ऐसा कोई गतिरोध असंभव है तो इस पर उनका कहना है कि हालांकि हिज एक्सीलेंसी सर जेम्स सिफ्टन जैसे बुद्धिमान और सहानुभूतिशील गवर्नर या माननीय श्रीमान हुब्बाक या माननीय श्रीमान हैलेट जैसे गवर्नर जो आदिवासियों को अच्छी तरह जानते हैं और उनके प्रति सहानुभूतिशील हैं, वे ऐसे किसी प्रशासनिक कालभ्रम ( एनक्रोनिज्म) के बारे में कभी सोच नहीं सकते और आम तौर पर किसी गवर्नर के ऐसे अधिकार के प्रयोग करने की कोई संभावना नहीं है, फिरभी कानून की किताब में ऐसे प्रावधान होने से मौजूदा तथ्य बदल नहीं जाते, न ही उनके दिमाग में गहरे पैठा यह डर खत्म हो जाता है। इसका सीधा मतलब हर कीमत पर छोटा नागपुर की संवैधानिक हैसियत का घट जाना है। इसका नतीजा कुल मिलाकर एक दुधारी तलवार पर चलने जैसे हालात का निर्माण हो जाना है।
जब इस सिलसिले में श्वेत पत्र प्रकाशित हुआ, तभी आदिवासियों और उनके मित्रों का ध्यान खास तौर पर उसके क्लाज 100 में निहित दुःखद अन्याय की तरफ गया, जिसके तहत `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड एरिया’ अथवा `पूरी तरह अलहदा,होली एक्सक्लुडेड एरिया’ के प्रशासन के मामले में गवर्नर को  विधान परिषद के किसी प्रस्ताव या सवाल को खारिज करने का अधिकार दे दिया गया है। यह ऐसे वक्त हुआ जबकि वे और मैं भी सोच रहे थे कि क्लाज 108 के तहत जो संरक्षणात्मक प्रावधान किये गये हैं, वे व्यवहार में मौजूदा संरक्षणात्मक प्रावधानों की तरह ही हैं,जो बेहतर बंदोबस्त के लिहाज से शायद  कुछ और वक्त के लिए मददगार साबित हों।बशर्ते कि श्वेत पत्र की सिफारिशों की तुलना में विधायिकाओं में आदिवासियों को बेहतर प्रतिनिधित्व दिया जाये।
ज्वाइंट सिलेक्ट कमिटी की रपट प्रकाशित होने के बाद प्रावधानों की ज्यादा सावधानी के साथ पड़ताल की गयी तो पता चला कि `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड एरिया’ के तहत तमाम प्रतिबंध मौजूदा प्रतिबंधों से भी ज्यादा सख्त और ज्यादा अपमानजनक हैं। अनेक आदिवासी नेता इस तथ्य से खुद को और अपमानित और हताश महसूस करने लगे कि `दलित वर्ग’  और मजदूरों के अधिकार भी बढ़ा दिये गये जबकि इसके उलट उनके अधिकारों  पर प्रतिबंध लगा दिये गये। यही नहीं, प्रांतीय विधायिका में ज्यादा प्रतिनिधित्व और संघीय विधायिका में कुछ प्रतिनिधित्व की आदिवासियों की मांग भी ठुकरा दी गयी। गौरतलब है कि हमने प्रांतीय परिषद में इसके लिए जोरदार तरीके से मांग उठायी थी और इसे लेकर प्रतिनिधिमंडल ने माननीय गवर्नर, माननीय गवर्नर जनरल ,राज्य सचिव और प्रधानमंत्री से मुलाकात भी की थी। मौजूदा बिल `आंशिक अलहदा, पार्शियली एक्सक्लुडेड एरिया’ के मामले में ज्वाइंट सिलेक्ट कमिटी की रपट से भी खराब है।जो पीछे की ओर ले जाता है।

VIII

आदिवासियों की राजनैतिक हैसियत

बिहार और ओड़ीशा विधान परिषद की पिछले पंद्रह साल की कार्यवाही में देखा जा सकता है कि मैं हमेशा आदिवासियों की राजनैतिक प्रगति के मामलों में बेहद सतर्क और अनुदार रहा हूं। मैंने हमेशा इस सिलिसिले में सतही जल्दबाजी का विरोध किया है और उनकी राजनैतिक प्रगति के लिए वक्त के सही चुनाव और कदमों के बारे में सलाह दी है। मैं आगे भी यह सिलसिला जारी रखनेवाला हूं क्योंकि पिछले तीस सालों से या उससे भी ज्यादा वक्त से मेरी सोच और मेरे दिल में आदिवासियों के कल्याण के सरोकार सर्वोच्च प्राथमिकता के रहे हैं। लेकिन पूरी जिम्मेदारी और गहरी चिंता के साथ `बैकवर्ड ट्रैक्ट’ सिस्टम और इसे संवैधानिक तौर पर आंशिक अलहदा, पार्शियल एक्सक्लुजन के साथ नत्थी करने के प्रस्ताव के फायदे  और नुकसान को उनकी प्रस्तावित राजनैतिक हैसियत के मद्देनजर नस्ली दिमाग पर होने वाले असर को ध्यान में रखते हुए विचार करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचने के लिए मजबूर हो गया हूं कि नये संविधान के तहत  छोटानागपुर के आदिवासियों के प्रति आचरण के तीनों तरह के इंतजाम, (1) उन्हें कि विशेष योग्यता के बिना आम संविधान के राज में डालना,(2) सुधारों के तहत उन्हें संथाल परगना और अनुगुल की तरह `आंशिक अलहदा,पार्शियली एक्सक्लुडेड  इलाका’ के अंतर्गत रखना (3) उन्हें महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक की मान्यता  पर विचार के बाद यही सही लगता है और इसीकी अपेक्षा की जाती है कि मौजूदा चरण में उन्हें महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय मान लिया जाये। अतिरिक्त जो भी संरक्षणात्मक प्रावधान जरुरी हों, और असाधारण व आकस्मिक परिस्थितियों के मद्देनजर वे अनिवार्य भी हों, तो भी मेरे विनम्र विचार के मुताबिक उनकी सामान्य राजनीतिक हैसियत एक ऐसे महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय की होनी चाहिए, जिसके संरक्षण और उत्थान के लिए सरकार की विशेष जिम्मेदारी हो। बहरहाल जब तक उनकी सरकार के मुखिया बतौर सहानुभूतिशील और उनके बारे में घनिष्ठ जानकारी रखने वाले अधिकारी हिज एक्सीलेंसी सर जेम्स सिफ्टन, या माननीय श्रीमान हुब्बाक या श्रीमान हैलेट जैसे लोग हों, उनके वैध हितों के खतरे में पड़ने या नजरअंदाज हो जाने को कोई आशंका नहीं है। लेकिन प्रशासन का वह तानाबाना जो शायद अनुगुल के खोंड या राजमहल के पहाड़ों में बसने वाले सौरिया  पहाड़िया (मलेर) या दामिन ई कोह के लिए सही है, वह छोटा नागपुर के मुंडा,उरांव और खड़िया, भूमिज, हो और संताल आदिवासियों की मौजूदा शैक्षणिक प्रगति के मद्देनजर सही नहीं होगा। हालिया तरक्की के मद्देनजर उनके बढ़ते कद के मुताबिक उनके लिए संविधान का दायरा बढ़ाने के बजाये उन्हें नये गवर्नमेंट आफ इंडिया बिल के सेक्शन 91,91 और 94 के तहत आंशिक `अलहदगी, पार्शियल एक्सक्लुजन’ में कैद कर देने से उनकी हैसियत कहीं ज्यादा पालतू, जख्मी और संकुचित हो जायेगी।
क्योंकि छोटा नागपुर अब `झूठी नींद’ में नहीं है और `वह रोशनी के बिना जी रहा सुस्त ठहराव का भूगोल नहीं है या आंदोलन की शक्ति भी नहीं है।’



अब मास्साब के मिशन को पूरा करने की जिम्मेदारी।यह पुलिनबाबू का मिशन भी है।हमारे पुरखों का मिशन


अपनी बात
अब मास्साब के मिशन को पूरा करने की जिम्मेदारी।यह पुलिनबाबू का मिशन भी है।हमारे पुरखों का मिशन।
पलाश विश्वास
प्रेरणा-अंशु के मास्साब की स्मृति पर केन्द्रित मई अंक आपके हाथों में पहुंच गया होगा।इस पर आपकी प्रतिक्रिया का इन्तजार है।मास्साब के आदर्शों के मुताबिक हम गांव,किसान और कृषि पर राष्ट्रव्यापी संवाद चलाना चाहते हैं।

यही प्रेरणा -अंशु का मिशन है।समाजोत्थान की दिशा भी यही है।यह मेरे दिवंगत पिता पुलिनबाबू का मिशन भी है।हमारे पुरखों का मिशन,जो अभी अधूरा है।

 हम इस राष्ट्रव्यापी संवाद  में छात्रों युवाओं की व्यापक पैमाने पर भागेदारी की उम्मीद करते हैं और आपसे सहयोग की अपेक्षा।

मास्साब को श्रद्धांजलि की रस्म अदायगी का कोई मतलब नहीं है अगर हम उनका मिशन आगे बढ़ाने में नाकाम हो जाते हैं।

मास्साब ने 18 मार्च,2018 के कैंसर से लड़ते हुए दम तोड़ने से पहले तक किसानों,कामगारों और वंचितों के हकहकूक के लिए जनान्दोलनों का नेतृत्व करते रहे।

संजोग की बात यह है 12 जून 2001 में ही उत्तराखंड के शरणार्थी  किसान नेता पुलिन बाबू ने भी रीढ़ के कैंसर से लड़ते हुए आखिरी सांस लेने तक मेहनतकश जनता के लिए देशभर में दौड़ते रहे, जनांदोलनों का नेतृ्त्व करते रहे। 

यह तराई में बसे लघु भारत की साझा विरासत है,जिसमें मास्साब,पुलिनबाबू और हमारे पुरखों की गौरवशाली भूमिका है।

तराई के इन दोनों समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं की आजीवन सक्रियता से तराई में आम लोगों के हकहकूक की निरन्तरता बनी रही है और इस परम्परा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी है।

मास्टर प्रताप  सिंह, समाज और आम जनता के मास्साब   बुनियादी तौर पर एक बेहतरीन लेखक सम्पादक थे और और प्रखर वैज्ञानिक दृष्टि के साथ अपने आदर्शों और संघर्षों का ब्यौरा वे लिपिबद्ध करके गये हैं।

यहीं नहीं,भारतीय कृषि,किसानों और कामगारों के हक में वैकल्पिक प्रकृति बांधव विकास के विकल्प की रुपरेखा भी मास्साब तैयार करके गये हैं।गांव,कृषि और किसान कामगार के हित सुनिश्चित करने के अपने इस मिशन को पूरा करने का उनका एक समयबद्ध कार्यक्रम भी रहा है।

मास्साब के साथियों, समर्थकों के अलावा सभी जनप्रतिबद्ध लोगों के सामने इस कार्यक्रम को लागू करने की चुनौती है।

इसके विपरीत पुलिनबाबू कोई लेखक नहीं थेे।वे औपचारिक शिक्षा के मुताबिक शायद अपढ़ थे।जबकि वे कई भाषाओं में नियमित पढ़ते लिखते थे।सामाजिक कामकाज के अलावा बाकी समय उनके लिे पढ़ने लिखने का होता था।मुझे भी पढ़ने लिखने का नशा बचपन में हर कहीं उनके साथ आते जाते और रहने के कारण लग गया। वे रोजाना तराई और बाकी देश की मेहनतकश जनता के हक में लिखा पढ़ी करते रहे हैं और रोजाना रोजनामचा भी मास्साब की तरह लिखते रहे हैं।

यह मेरा अपराध है कि उनका लिखा हम मास्साब के परिवार की तरह सहेज नहीं सके।तराई और देश भर में हमारे अपने लोगों की आबादी में मेरी पहचान उनकी वजह से है।फिरभी हम वह नहीं कर सके जो मास्साब के चार बेटों,बहुओं और उनकी पत्नी ने कर दिखाया है।ऐसा मेरी जानकारी में किसी ने शायद ही किया होगा।
अब यह परिवार मेरा परिवार है।पुलिनबाबू का अपना परिवार है।

यह भी मेरा अपराध है कि मैं जनसंघर्षोे में मास्साब,पुलिनबाबू और तराई समेत उत्तराखंड की जनता के मोर्चे पर खड़ा होने की अपनी जिम्मेदारी निभा नहीं सका।इस मामले में तराई और पहाड़ के सारे युवा साथी हमसे बेहतर हैं। हर गांव के लोगों को मुझसे शिकायत है कि मैं भाग क्यों गया।यह मेरे अपने लोगों का प्यार है और मेरा अक्षम्य अपराध।आप मुझे सजा दें।माफी नहीं चाहिए।

बेहतर सजा यही है कि गांव,कृषि और किसानों के इस मिशन को पूरा करने में मैं अपना सबकुछ समर्पित कर दूं।इस सजा को अंजाम  देने के लिए दिनेशपुर को एक खुला जेल बनाकर आप पहरेदार बन सकते हैं।

मास्साब ने समाजोत्थान और प्रेरणा अंशु के रुप में जो सामाजिक संस्थाओं का निर्माण किया है,उसकी भूमिका भी उनकी विरासत को बचाने में निर्णायक रही है।

मास्साब से पहले तराई में ऐसी रचनात्मक संस्थागत सामाजिक सक्रियता हुई नहीं है।

इसलिए हम सिर्फ पुलिनबाबू ही नहीं,तराई  के नवनिर्माण में जिनकी भी भूमिका रही हैं,चाहे वह जगन्नाथ मिश्र हों,सरदार भगत सिंह हों,चौधरी नेपाल सिंह हों, बाबा गणेशा सिंह हों  या फिर तराई को बसाने में और तराई और पहाड़ के जनमानस की एकात्मता,बहुलता और विविधता के लोकतंत्र में गांव गांव के अनेक महत्वपूर्ण पुरखों की कोई स्मृति हम सहेज नहीं सके हैं।

हमें इसका कोई अंदाजा नहीं है कि हमारे पुरखों ने घने जंगल में महामारियों से लड़ते हुए बिना संसाधन,बिना बुनियादी ढांचा, बिना बुनिादी सेवाओं के कितनी मुश्किलों के साथ और कैसे तराई को बसाया है और हमें इसकी कोई परवाह भी नहीं है। 

जिन हालात में हमारी परवरिश हुई,अब हालात बदलने के बाद हम भूल गये हैं।पक्के मकानों के वाशिंदों को माटी कीचड़ में लथपथ अपने पुरखों की घास फूस की झोपड़ियों और साझे चूल्हों की कोई याद नहीं है।

जाहिर है,तराई में धर्मस्थल तो गांव गांव में भव्य बन गये हैं लेकिन अपनी विरासत,अपना इतिहास सहेजने और पुरखों का सपना पूरा करने के लिए सामाजिक संस्थाएं नहीं बन सकी हैं।

यह विडंबना ही है कि चित्तरंजन राहा के नाम एक इन्टर कालेज है और पुलिनबाबू के नाम एक अस्पताल।हमने पुलिन बाबू की एक मूर्ति भी लगा दी है।लेकिन उनके बारे में हम कुछ भी नहीं जानते और न जानने की कोशिश करते हैं।जानते नहीं तो यह विरासत हम नई पीढ़ी के साथ साझा भी नहीं कर सकते।

विडम्बना है कि पुलिनबाबू  की मूर्ति पर फूल चढ़ाने वाला कोई नहीं होता।न उनके नाम से जुड़े अस्पताल में चिकित्सा की कोई व्यवस्था है।हम रंगरोगन से सिर्फ अपना अपना चेहरा चमका रहे हैं और जहां तहां अपने नाम का बोर्ड लगा रहे हैं।भइये,इस तरह चेहरा चमकता नहीं है।

दूसरे लोगों के लिए तो हमने  एक रास्ते तक का नामकरण नहीं किया है।लाखों का खर्च करके लोग अपनी छवि निखारने की कोशिश कर रहे हैं इन दिनों और उन्हें परवाह नहीं है कि छवि विज्ञापनों से नहीं,संस्थाओं के जरिये रचनात्मक सामाजिक सक्रियता से बनती है।

रचनात्मक सक्रियता का मास्साब इसके सच्चे उदाहरण हैं।

पुलिनबाबू,राधाकांत बाबू, हरिपद मास्टर, सुरेन बाबू,षड़ानन बाबू,अधर बाबू जैसे शरणार्थियों के नेताओं के बारे में अगर नई पीढ़ी को कुछ भी नहीं मालूम है और अपने गांवों को बसाने वाले पुरखों को वे याद नहीं करते तो यह हमारा समाजिक अपराध है।

अब भी जो लोग तराई बसाने वालों की उस पुरानी पीढ़ी के बचे हुए हैं,उनकी मदद से उस विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी हमारी है।हम ऐसा नहीं करते तो हमारा कोई इतिहास भूगोल बचेगा नहीं। यह अहसास होना मिशन के लिए अनिवार्य है।

पुलिनबाबू के लिखे सारे दस्तावेज,उनकी डायरियां घुन लगने से नष्ट हो गये क्योंकि मैं पिछले चालीस साल से तराई से बाहर रहा हूं और पिताजी तजिंदगी घास फूस की झोपड़ियों में रहे हैं। अब हमने पक्के मकान बना लिये हैं लेकिन उन मकानों में हमारी स्मृतियों का कोई धरोहर नहीं है।पिता के चरण चिन्ह नहीं हैं।

तराई में गांव गांव में पक्के मकान खूब बने हैं और लोगों के पास पैसा भी खूब है।फिर भी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का कोई प्रयास नहीं है।

हमें उम्मीद है कि प्रेरणा अंशु और समाजोत्थान मिशन से जुड़े लोग यह सूरत बदलने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा और रचनात्मकता लगा देंगे। उनकी क्षमता ही हमारी पूंजी है।

हमें छात्रों और युवाओं के ज्ञान विज्ञान की सभी विधाओं और सभी विषयों में शिक्षित करने के प्रयास करने होंगे।उनकी रचनात्मकता के सारे माध्यम मजबूत करने होंगे और उनके भविष्य के निर्माण और उनके सम्मानजनक सामाजिक उत्थान और रोजगार के रास्ते भी बनाने होंगे।

यही मास्साब और पुलिनबाबू के मिशन का मतलब है।

टीन के ट्रंक और खुले में आंधी पानी में चूंते हुए सीलनभरे घर में हम उनका लिखा कुछ भी सहेज नहीं सकें और न ही कोई संस्था ऐसी रही है,जहां तराई के गौरवशाली सामुदायिक जीवन के दस्तावेज रखे जाते।जितनी जल्दी हो, इस कमी को दूर करने की पहल की जानी चाहिेए।

मास्साब की बनायी संस्था ही अब मेरी शरणस्थली है।जीते जी मरे हुओं के लिए संजीवनी है।

जाहिर है कि मास्साब की बनायी संस्थाओं को और मजबूत करके इन्हीं के जरिये हम इस  अधूरे काम को अंजाम दे सकते हैं और इसके लिए छात्रों और युवाओं से लगातार संवाद करने की जरुरत होगी,जैसा प्रयास प्रेरणा अंशु की तरफ से लगातार किया जा रहा है।

अगर हम प्रतिबद्ध है तो सामाजिक नेटवर्किंग और जन सहयोग से जिस तरह मास्साब ने समाजोत्थान और प्रेरणा अंशु को आगे बढ़ाया है,उसी तरह तराई और पहाड़ में भी,हम विविधता और बहुलता की इस साझा विरासत की निरंतरता बनाने के लिए सामाजिक सहयोग और नेटवर्किंग के मास्साब के दिखाये रास्ते पर ही जरुरी संसाधन जुटा सकते हैं और हमें पूरी उम्मीद है कि देश के बाकी हिस्सों से भी जो हमारे मित्र और साथी हैं,उनका भी सहयोग हमें मिलेगा।उन्हें भी इस मिशन से जोड़ना है।

1952 तक तब नैनीताल जिले की तराई का पूरा इलाका घनघोर जंगल था और अंग्रेजी हुकूमत के भूमि बन्दोबस्त के तहत यह पूरा इलाका खाम सुपरिंटेंडेंट के आधीन था,जिन्होंने इस इलाके की ज्यादातर  बेशकीमती जमीन देश के प्रभावशाली तबकों पूंजीपति घरानों, सिने कलाकारों, आईपीएस आईएएस अफसरों, राजनेताओं को कौड़ियों के मोल अलाट कर दी।

हजारों एकड़ के नामी बेनामी रकबों वाले उनके बड़े फार्मों के लिए मजदूरों की जरुरत थी और तराई के घने जंगल को साफ करने के लिए मजदूरों की जरुरत थी।

ब्रिटिश भारत में  संयुक्त प्रान्त के प्रधानमन्त्री और आजाद भारत में बाहैसियत यूपी के मुख्यमन्त्री और भारत के गृहमन्त्री पंडित गोविन्द बल्लभ पंत ने पहाड़ के लोगों को तराई में बसाने की पहल की,लेकिन इस बीहड़ जंगल में पहाड़ से आकर बसने के लिए लोग तैयार नहीं थे।

इस पर नेहरु और पंत ने भारत विभाजन के शिकार पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली और पश्चिम पाकिस्तान के पंजाबी और सिख शरणार्थियों को तराई में बसाने की योजना लागू की। 

1950 तक खाम सुपरिंटेंडेंट के जमाने से तराई में विभाजनपीड़ित बंगाली और पंजाबी शरणार्थियों के गांव बसने लगे।

इन्हीं शरणार्थियों ने तराई को आबाद किया,जहां घने जंगल के बीच झूम खेती करने वाले थारु और बुक्सा आदिवासियों के गांव भी थे,जिन्हें पहले बड़े फार्मों के लिए,फिर पुनर्वास योजना लागू करने के लिए बड़ी निर्ममता से उजाड़ दिया गया।

तभी से तराई में किसानों और कामगारों की बेदखली का सिलिसला जारी है तो किसानों और कामगारों के हकहकूक के लिए आंदोलन और प्रतिरोध का सिलसिला जारी है।

1956 में तराई में बंगाली शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए पहला बड़ा आन्दोलन हुआ।दिनेशपुर से बंगाली शरणार्थी बाल बच्चों, महिलाओं और बूढ़ों के साथ जुलूस निकालकर रुद्रपुर पहुंचे और वहां धरना प्रदर्शन किया। जैसा कि इन शरणार्थियों ने उत्तराखंड की पहली भाजपा सरकार बनने के बाद उन्हें भारतीय नागरिक न मानने के खिलाफ 2001 में किया था।यह समझना होगा कि 2001 की तराई और 1956 की तराई में बहुत बड़ा फर्क था।

1956 का यह आंदोलन तराई बंगाली उद्वास्तु समिति की ओर से किया गया।इस समिति के अध्यक्ष गांव सुंदरपुर के राधाकांत मंडल थे और महासचिव पुलिनबाबू थे,जिनका गांव बसंतीपुर तब तक बसा नहीं था।

1956 के आंदोलन के बाद ही गांव बसंतीपुर,पंचाननपुर और उदयनगर बसाये गये।

 दिनेशपुर इलाके के बाकी गांव 1950 से ही बसने लगे थे।

इस आंदोलन में लक्ष्मीकान्त पुर के हरिपद विश्वास,राधाकांतपुर के अधर वैद्य, मकरन्दपुर के हरेन सरकार, चंदायन के सुरेनबाबू, दिनेशपुर के वीरेन राय और सुखलाल मंडल,पंचानन पुर के कुमुद सरकार, मोहनपुर के विनोद सिकदार,खानपुर के षड़ानन सिकदार,दिनेशपुर की फूलझड़ी मंडल,चंदननगर के दयालबाबू और हरेन राय,अमृतनगर के रेबा विश्वास के पिता,प्रफुल्लनगर के काली जोआरदार,हरिदासपुर के प्रफुल्ल मिस्त्री,बसंतीपुर के मांदार मंडल,अतुल शील और शिशुवर मंडल,उदयनगर के प्रफुल्ल साहा, कालीनगर के कालीपद मंडल,पिपुलिया के भोलानाथ और वासुदेव,चित्तरंजनपुर के वृहस्पति बैरागी और निरंजन मंडल, विजय नगर के गोवर्धन राय,जगदीशपुर के हाजरापद मंडल,आनंदखेड़ा के हरिमोहन हालदार और निरोद विश्वास (रेड रोज स्कूल के हरिपद विश्वास के पिता),शिवपुर के मेघनाथ राय, दुर्गापुर के बिरंची बाबू जैसे असंख्य लोगों की बड़ी भूमिका रही है। इस सूची में दूसरे अनेक नाम छूट गये होंगे,जिन्हें मैं भी भूल गया हूं।उन सभी लोगों के बिना तराई का बसना असम्भव था।

उस आंदोलन के गवाह अब बिरंचीबाबू,रोहिताश्व मल्लिक, सुधारंजन राहा, कार्तिक साना, विधू अधिकारी जैसे गिने चुने लोग हैं और तराई की नई पीढ़ी के लोग पुलिनबाबू के अलावा बाकी किसी का नाम भी नहीं जानते बल्कि पुलिनबाबू को भी नहीं जानते।

रुद्रपुर में आंदोलन कर रहे शरणार्थियों को महिलाओं,बच्चों,बूढ़ों समेत किलाखेड़ा के घने जंगल में पलिस और पीएसी वालों ने फेंक दिया।जहां से जंगल में भटकते हुे खूखार जानवरों से बचते हुए वे पैदल साथ साथ अपने गांव लौटे थे। फिरभी पुलिनबाबू और उनके साथी मोर्चे पर डटे हुए थे। हारकर यूपी सरकार को शरणार्थियों की सारी मांगें माननी पड़ी।

1956 के उस आन्तीदोलन की वजह से, न कि किसी की अनुकम्नपा या कृपा से ये गांव बसंतीपुर,पंचाननपुर और उदयनगर बसाये गये।सड़के बनीं।स्कूल खुले।अस्पताल बना।आईटीआई खुला।पूरी जनता के प्राण एक साथ बन्धे होने का नतीजा दिनेशपुर है।दिनेशपुर का कायाकल्प हो चुका है।वह बन्धन भी टूट गया है।लेकिन दिनेशपुर का कोई प्राण नहीं है।दिनेशपुर में प्राण फूकने के लिए फिर वहीं प्रेमबन्धन चाहिए।

बहरहाल,आज के विकसित दिनेशपुर का बुनियादी ढांचा 1956 के उसी आन्दोलन की वजह से तैयार हुआ।उन आन्दोलनकारी पुरखों की स्मृतियां सहेजने की जिम्मेदारी अब हमारी है।

1956 के बाद पूरे देश में तेलंगना किसान विद्रोह के बाद किसानों और कामगारों के हकहकूक का आंदोलन लालकुआं और गूलरभोज के मध्य ढिमरी ब्लाक में 1958 में किसान सभा के नेेतृत्व में हुआ।इस आंदोलन के नेता थे नैनीताल के कामरेड हरीश ढौंडियाल,एडवोकेट,कामरेड सत्येन्द्र.चौधरी नेपाल सिंह,बाबा गणेशासिंह और पुलिनबाबू थे।

बागी किसानों ने तराई के भूमिहीन किसानों के चालीस गांव बसा लिये थे।हर गांव में चालीस परिवार को दस-दस एकड़ जमीन बांटी गयी थी।खेती बाड़ी शुरु हो चुकी थी।

तब यूपी के गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह थे।उन्होंने थर्ड जाट रेजीमेंट और बरेली, रामपुर,नैनीताल,पीलीभीत और मुरादाबाद पुलिस और पीएसी के जरिये इन गांवों को रातोंरात जला दिया और हजारों किसानों की गिरफ्तारी की।भारी लूटपाट हुई।
हाथ पांव तोड़ दिये गये।

पुलिनबाबू का हाथ रूद्रपुर थाने में तोड़ दिया गया।

विडंबना यह है कि कामरेड पीसी जोशी तब कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे और पार्टी ने तेलगंना किसान विद्रोह की तरह ढिमरी ब्लाक किसान आंदोलन से पल्ला झाड़ लिया।

अर्जुनपुर के बाब गणेशा सिंह की जेल में सड़ते हुए मृत्यु हो गयी।पुलिनबाबू और उनके साथियों पर 1967 तक संविद सरकार द्वारा मुकदमा वापस लेने तक मुकदमा चलता रहा।

हमारे घर दो दो बार कुर्की जब्ती हो गयी।उसी दौर में तराई के आन्दोलनों के सारे दस्तावेज नष्ट कर दिये गये।

इसी मुकदमे की सुनवाई के दौरान मैं पिता के साथ 1963 में नैनीताल कचहरी में मौजूद था और तभी नैनीताल पहलीबार गया।उस सुनवाई में आन्दोलनकारियों को जेल हो गयी थी लेकिन तुरन्त उनके साथियों ने उनकी जमानत करवा ली थी।

हम लोग इस आन्दोलन का इतिहास अब तक नहीं लिख पाये, जिससे वाम नेतृत्व के विश्वासघात की वजह से यूपी, पंजाब, बिहार और राजस्थान में पलाशी के युद्ध के बाद से लगातार जारी किसान आंदोलनों का भूगोल पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सिमट गया और तभी से हिन्दी जनपदों में कम्युनिस्टों का जनाधार खिसकने लगा और पूरी हिंदी पट्टी का भगवाकरण होने लगा।

बदलाव का समपना देखने वाले लोगों के लिए इतिहास और भूगोल का यह सबक जरुरी है।

ढिमरी ब्लाक आंदोलन के बाद पार्टी से मोहभंग के कारण पुलिनबाबू और उनके साथी पार्टी से अलग हो गये।लेकिन तराई में किसानों और कामगारों का आंदोलन सिलसिलेवार जारी रहा।

साठ के दशक में तराईभर में सूदखोरों और महाजनों के खिलाफ आन्दोलन चला और तब भी हजारों किसानों की गिरफ्तारी हुई।

विडंबना यह है कि तब कुछ कम्युनिस्ट नेताओं ने किसानों की जमीन बिकवाने में बिचौलिये की भूमिका निभाई।

पिपुलिया,विजय नगर और नेताजीनगर कम्युनिस्ट पार्टी के गढ़ थे।नेताजीनगर के बंगाली शरणार्थी अपनी आठ आठ एकड़ जमीन सिर्फ दो हजार रुपये वायनामा करके भूमिहीन कामगार बन गये तो पिपुलिया और विजयनगर की जमीन भी उसी समय बिकी।

पुलिनबाबू, हरिपद विश्वास और तराई के नेताओं ने बंगाली शरणार्थियों की जमीन बचाने के लिए फिर आन्दोलन छेड़ा लेकिन 1967 में शरणार्थियों को भूमिधारी हक मिल जाने की वजह से तराई के दिनेशपुर इलाके में सभी बंगाली कालोनियों मे  शरणार्थियों की जमीन के हस्तान्तरण का सिलसिला जारी रहा।

नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद आन्दोलन की वजह से थारु बुक्सों की तरह बंगालियों की जमीन सिर्फ बंगालियों को बेचने का प्रावधान किया गया,जिससे बंगाली शरणार्थियों में ही सूदखोर महाजनों का एक नया तबका पैदा हो गया,जिन्होंने आहिस्ते आहिस्ते अपने पैसे के दम पर हरिपद विश्वास और पुलिनबाबू जैसे नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया।वेलोग ही नये जमींदार बन गये और उनके हवाले हो गयी तराई।

मास्साब की लड़ाई आम जनता के हित में इस नये वर्ग के खिलाफ थी।सत्ता के खिलाफ जनता के हक हकूक के लिए थी।

1978 में पन्तनगर कृषि विश्विद्यालय में मजदूरों का आंदोलन शुरु हुआ तो 13 अप्रैल,1978 को विश्वविद्यालय परिसर में अनेक मजदूरों को पुलिस ने गोलियों से भून डाला।सरकार ने तेरह मजदूरों के मारे जाने की बात कबूल की।

इस बीच पहाड़ और तराई में चिपको आंदोलन चला जिसमें तराई के छात्रों,युवाओं की बड़ी भागेदारी थी।

पुलिनबाबू भी इस आन्दोलन के समर्थन में थे।मास्साब से पहले वे अलग उत्तराखंड राज्य के एक मात्र समर्थक थे।

फिर शुरु हुआ बिन्दुखत्ता का किसान आन्दोलन और ढिमरी ब्लाक की नाकामी के बाद भारी दमन के बावजूद किसानों ने इस आन्दोलन में बहादुर सिंह जंगी जैसे जुझारु साथियों के नेतृत्व में कामयाबी हासिल की।

1988 के दुर्गोत्सव के दौरान महतोष मोड़ पर भूमिहीन किसानों को बेदखल करने के लिए पुलिस और भूमि माफिया के गुंडों ने कई महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया और इसका विरोध करने के अपराध में आस पास के गांवों में पुलिस ने भारी जुल्म ढाये।

बलात्कारी छुट्टा घूमते रहे जिन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी का संरक्षण हासिल था।

बंगाली और पहाड़ी ध्रूवीकरण की तिवारी की राजनीति के खिलाफ तराई और पहाड़ की महिलाओं ने इसके खिलाफ जबर्दस्त आन्दोलन किया और इन्हीं महिलाओं ने फिर उत्तराखंड लड़कर हासिल किया।

इसी दौरान 1988 में मास्टर प्रताप सिंह ने संस्थागत सामाजिक आन्दोलन के मिशन के तहत प्रेरणा - अंशु का प्रकाशन शुरु किया और तराई में जनान्दोलनों की बागडोर संभाल ली।

मास्साब को अपनी मृत्यु से पहले तक पुलिनबाबू का समर्थन हासिल था।

हमने मई अंक में मास्साब के आंदोलनों,सामाजिक सक्रियता और रचनात्मकता पर फोकस किया है।

फिलहाल अपनी बात यही तक।



Saturday, August 13, 2016

पेनफुल साइट्स! बंगाल भुखमरी के दौरान अपने गांव में भूखों की कोई मदद किये बिना श्यामाप्रसाद ने भव्य वल्गर बागान बाड़ी कैसे बनाया जिसे देखकर घिन आ रही थी? हिंदू महासभा का भुखमरी रिलीफ वर्क का गिरोहबंद ढकोसला उतना ही फर्जीवाड़ा था,जितना मुनाफावसूली के लिए श्यामाप्रसाध का हाट या आशुतोष मैंसन की डिस्पेंसरी। मशहूर चित्रकार चित्तोप्रसाद की भूखमरी पर रपट में खुलासा



पेनफुल साइट्स!
बंगाल भुखमरी के दौरान अपने गांव में भूखों की कोई मदद किये बिना श्यामाप्रसाद ने भव्य वल्गर बागान बाड़ी कैसे बनाया जिसे देखकर घिन आ रही थी?
हिंदू महासभा  का भुखमरी  रिलीफ वर्क का गिरोहबंद ढकोसला उतना ही फर्जीवाड़ा था,जितना मुनाफावसूली के लिए श्यामाप्रसाध का हाट या आशुतोष मैंसन की डिस्पेंसरी।
मशहूर चित्रकार चित्तोप्रसाद की भूखमरी पर रपट में खुलासा
अनुवादः पलाश विश्वास
(हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल के सवर्ण जमींदारों के हितों के मुताबिक बंगाल विभाजन पर अड़े थे और इस मकसद को उनने भारत विभाजन के जरिये अंजाम तक पहुंचाया। जबकि कविगुरु के शांति निकेतन में चित्रकला विभाग के नंदलाल बसु ने जिन चित्तप्रसाद को वहां दाखिला देने से इंकार कर दिया, वही चित्तप्रसाद  लीनाकोट माध्यम के न सिर्फ भारत के श्रेष्ठ चित्रकारों में हैंं,सोमनाथ होड़ की तरह चित्रकला के माध्यम से उनने बंगाल भुखमरी की जिंदा रिपोर्टिंग की और तेभागा आंदोलन को बेहतर जानने का माध्यम भी चित्तप्रसाद हैं।कला जगत में जनपक्षधर प्रतिबद्धता मेंं वे बेमिसाल हैं।इन दिनों भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी का भयंकर महिमामंडन करके  गांधी हत्या को अंजाम तक पहुंचाने की बजरंगी बिरादरी की मुहिम बहुत तेज है।चित्तप्रसाद ने चित्रकला के अलावा समसामयिक ज्वलंत मुद्दों पर चिट्ठियां भी लिखी हैं।उनकी ये तमाम चिट्ठियां समय के  प्रकाशित दस्तावेज हैं।1943-44 के दौरान चित्तप्रसाद ने बंगाल भुखमरी पर अनेक सचित्र आलेख कम्युनिस्ट पार्टी के समाचार पत्र पीपुल्स वार में लिखे।इनमें से एक आलेख श्यामाप्रसाद मुखर्जी के गांव जिराट को लेकर भी है।उस वक्त गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध कर रही हिंदू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुत बड़े नेता थे।इस आलेख के कुछ अंश दि वायर ने फिर प्रकाशित किये हैं।इस आलेख में हिंदू राष्ट्र भारत के बारे में श्यामाप्रसाद मुखर्जी की दृष्टि का खुलासा है।हुगली जिले के श्यामाप्रसाद के गांव जाकर बंगाल की भुखमरी की पृष्ठभूमि में श्यामाप्रसाद के कृतित्व व्यक्तित्व पर लिखा यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।चित्तप्रसाद अगस्त ,1944 में श्यामाप्रसाद के गांव जिराट गये थे तो वहां बलागढ़ इलाके के तमाम आम लोगों के नजरिये से भुखमरी के दौरान श्यामाप्रसाद के बनाये बागान बाड़ी और उनके नये हाट के ब्यौरे पेश करके उनने श्यामाप्रसाद की असल तस्वीर पेश की है।)


महज दो साल में पूरे भारत में किसी बंगाली सज्जन ने राष्ट्रीय ओहदा हासिल करने में कामयाब हुआ हो,तो वे इकलौते डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हैं।ऐसा क्यों न हो?वे आधुनिक बंगाल के निर्माताओं में से अन्यतम सर आशुतोष मुखर्जी के सुपुत्र हैं जिन सर आशुतोष ने ब्रिटिश सरकार से लड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय को संस्कृति और ज्ञान का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बना दिया।1943 में गवर्नर एमरी के कुशासन के खिलाफ पदत्याग करके श्यामा प्रसाद मुखर्जी रातोंरात राष्ट्रीय नेता बन गये।जाहिर है कि बंगाल की भुखमरी के विभीषिकामय दिनों में बंगाल के गवर्नर के खिलाफ वे ही सबसे सशक्त कंठस्वर थे पूरे देश में।इन्हीं डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बंगाल रिलीफ फंड में देश के चारों हिस्सों से लाखों रुपये की आमद हुई।असल मसला यही है कि बंगाल को बचाने के लिए जो लाखों रुपये देश की जनता ने देश के हर हिस्से से ऐसे राष्ट्रीय नेतृत्व के हवाले कर दिये तो उनने भुखमरी का  अमावस जी रहे अपने खुद के गांव में एक भी दिया इन रुपयों से जलाया क्या उन्होंने।देश के लोगों को शायद इस बारे में जानने में दिलचस्पी होनी चाहिए।


यही जानने और इसी मकसद से बंगाल का एक मामूली कलाकार मैं सर आशुतोष और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गांव हुगली जिले के जिराट की तीर्थयात्रा पर निकला।बहरहाल जून महीना शुरु होते न होते एकदिन मैं ट्रेन पकड़कर कलकत्ता से चालीस किमी दूर खरनारगाछी पहुंचा और फिर वहां से पैदल कुछ ही किमी दूर जिराट पहुंच गया।रास्ते में मैं  बलागढ़ इलाके के  छह सात गांवों से गुजर गया।इस दरम्यान अपनी आंखों से जो कुछ मैंने देखा वह अत्यंत भयानक था।हुआ यह कि सालभर उस इलाके की भयंकर नदी बेहुला में बाढ़ें आती रहीं।इस नदी से यह इलाका दो हिस्सों में बंटा हुआ था।बाढ़ की वजह से दोनों किनारों पर बसे तमाम गांव उपजाऊ कीचड़ में दब गये।देहाती लोगं की तमाम झोपड़ियां न सिर्फ बाढ़ के पानी में समा गयीं बल्कि तूफां में कुछ उड़ भी गये।बंगाल के गांवों में धान को जमा करने वाले देसी गोदाम तमाम धान गोला खत्म हो गये हर गांव में।बलागढ़ इलाके के सात गांव लगातार बारह दिनों तक पानी के नीचे जलसमाधि में थे और करीब सात हजार देहाती विस्थापित थे।यह हादसा पिछले साल हुआ था।कायदे से नदी की तलहटी की उपजाऊ कीचड़ से खेतों को इस साल सोना उगलाना चाहिए था।उपजाऊ और समृद्ध माटी से उपजे धान से इस इलाके को किसी बगीचे की तरह लहलहाना चाहिए था।ऐसा हुआ क्या? क्या पिछले साल का अभिशाप इस साल किसानों के लिए वरदान बना?ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।दरअसल किसानों को खेत जोतने तक का मौका नहीं मिला।बेहुला की बाढ़ के कहर के तुरंत बाद पूरा बंगाल भुखमरी के शिकंजे में था और चूंकि उनकी धान की फसल बाढ़ से तहस नहस हो चुकी थी तो बलागढ़ इलाके के किसानों को भी दूसरे इलाके के लोगों की तरह बाहर से आने वाले चावल मंहगे दरों पर खरीदना पड़ा और नये सिरे से घर बनाने के लिए जो सरकार की तरफ से दस रुपये का लोन उन्हें मिला,उसे उन्हें इसी मद में खर्च कर देना पड़ा।जब वे दस रुपये भी खर्च हो गये तो खाने के लिए चावल खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे,बीज के लिए वे धान कैसे खरीदते और बीज भी न हो तो वे खेत कैसे जोत लेते।नई फसल की उम्मीद भी नहीं रही।


गरीब देहाती आम खाकर जी रहे थे
इसलिए पूरे इलाके में मैंने मुस्कुराते हुए लहलहाते धान के खेत नहीं देखे।इसके बदले जमीन बंजर पड़ी थी।कड़ी धूप में पकती हुई जमीन ऊपर नीचे फट रही थी।दरारें दीख रही थीं।जिसमें कहीं कहीं घास और खर पतवार उगे हुए थे।बेहतर हालत में जो इ्क्के दुक्के किसान थे,उनने अपने अपने खेत में जूट लगा रखे थे। लेकिन वे भी इतने बदकिस्मत निकले कि  इस साल मानसून इतना लेटलतीफ रहा कि खड़े खड़े खेत में ही जूट सूख गया।किसानों ने मुझे सिलसिलेवार बताया कि कलकत्ता के बाजार के लिए उगाये जाने वाले आलू,प्याज और पूरी रबि की पसल कैसे तबाह हो गयी लेट मानसून की वजह से।गनीमत यह थी कि इलाके में आम के पेड़ सारे के सारे पुराने और लंबे थे।बाढ़ उनका कुछ बिगाड़ न सकी।इसी वजह से एक चौथाई बलागढ़ की किसान आबादी आम और आम की गुठलियां खाकर गुजर बसर कर रही थी।जाहिर है कि आम एक फल है जिसे खाया तो जा सकता है लेकिन खालिस आम खाकर जीना मुश्किल होता है।नतीजतन जैसा हमने देखा कि इलाके में बड़े पैमाने पर हैजा फैला हुआ था।मलेरिया का प्रकोप अलग था।ऊपर से चेचक।महामारियों से भूखे किसान जूझ रहे थे इसीतरह।मसलन राजापुर गांव के  52 परिवारों में से सिर्फ छह परिवार बचे थे और वे भी मलेरिया से बीमार और उनके पास न खाने के लिए अनाज था और न पहनने के कपड़े थे।यह किस्सा हर उस गांव का था ,जहां जहां से होकर मैं गुजरा।मैंने उन देहातियों से पूछा कि उसी इलाके के महान नेता डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनकी मदद के लिए क्या किया।मैंने बांएं दाएं सबसे यही सवाल पूछा लेकिन उस पूरे इलाके में एक भी शख्स ऐसा नहीं मिला ,जिसने उनके बारे में कुछ अच्छा कहा।


इसके बदले मुखर्जी के इलाके के  उन देहातियों ने मुझसे सिलसिलेवार कहा कि कैसे गांव में सरकारी लंगरखाना खुला, जहां चार सौ लोगों को खाना देने का इंतजाम था।रोजाना यह लंगर खाना दो महीने तक चालू रहा।उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने उन्हें हर परिवार के हिसाब से पंद्रह आना दिये और गांव के हर व्यक्ति को चुवड़ा खाने के लिए दिये। इसके अलावा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने हर आदमी को चौदह पैसे,हर औरत को दस पैसे और हर बच्चे को पांच पैसे दिये। किसानों ने उसी गांव में स्टुडेंट्स फेडरेशन और मुस्लिम स्टुडेंट लीग की मदद के बारे में भी बताया जिन्होंने बाढ़ के तुरंत बाद गांव वालों को कपड़े बांटे।बारह मन बीज दिये।काफी सब्जियां बांटीं और इसके अलावा हर परिवार को पांच पांच रुपये दिये।उन्होंने बताया कि कम्युनिस्ट पार्टी ने भी हर व्यक्ति के हिसाब से एक पाव चावल और एक पांव आटा दिये।डुमुरदह उत्तम आश्रम ने हर परिवार को दो रुपये का अनुदान दिया और कंट्रोल रेट पर हर परिवार को तीन महीने तक आटा दिया।संक्षेप में हर किसी ने संकट की उस घड़ी में उन बेसहारा किसानों की मदद करने की कोशिश की।लेकिन जिले के सबसे बड़े आदमी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सबसे शक्तिशाली संगठन हिंदू महासभा ने उनकी किसी किस्म की कोई मदद नहीं की।मैंने श्रीकांति गांव में उनके मातबर किस्म के एक व्यक्ति से सीधे पूछा कि उनकी क्या मदद की है बेंगल रिलीफ कमिटी ने।लेकिन उनने न किसी बेंगल रिलीफ कमिटी के बारे में सुना था और न किसी श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में।लेकिन सर आशुतोष का नाम बताते ही यह सवाल वे समझ गये।उन्होंने फिर साफ साफ कह दिया कि नहीं,उनसे कुछ भी नहीं मिला।यह जवाब सुनने काे बाद जिराट तक पहुंचने से पहले मैंने किसी से फिर श्यामाप्रसाद की चर्चा नहीं की।


जैसे जैसे मैं जिराट के नजदीक पहुंचता गया,मुझे जिराट के आसपास के गांवों के इन देहातियों पर टूटते मुसीबत के पहाड़ का नजारा देखने को मिला।एक वाक्य में कहें तो मैंने देखा कि नैसर्गिक नेता ने जब इन देहातियों को मंझधार में बेसहारा छोड़दियातो उनकी हालत कितनी दयनीय थी और वे जिंदा रहने के लिए क्या कर रहे थे।श्यामा प्रसाद उनकी कोई मदद नहीं कर रहे थे और पूरे इलाके में किसी का कद इतना बड़ा नहीं था जो उनकी मदद कर पाता।इसपर तुर्रा यह कि तमाम आवारा और चोर आजाद थे कि जो भी कुछ मदद इन मरते हुए लोगों को बाहर से  भोजन,कपड़ा,दवा, और दूसरी छिटपुट शक्ल में मिल रही थी,उसे भी वे ले उड़े।मसलन श्रीकांति गांव में हर कोई एक शख्स का नाम ले रहा था जो सही मायनों में  उनका गला रेंत रहा था और वह डिस्ट्रिक्ट बोर्ट की रिलीफ एक्टिविटी से जुड़ा था।(मैं उस शख्स का नामोल्लेख करना नहीं चाहता।)उसने अपने अमचों चमचों के डेढ़ सेर प्रति सप्ताह की दर से चावल खैरात में बांट दिये।फिर जब कदमडांगा गांव के किसान उसके पास मदद मांगने गये,उसने खुल्ला ऐलान कर दिया कि वह किसी की मदद किसी कीमत पर नहीं कर सकता।कहा,मैं किसी को किसी  कीमत चावल बांट नहीं सकता,तुम सबको मालूम होना चाहिए।फिर उसने साफ साफ उनसे पेशकश की कि किसान उसके खेतमें बेगार खटे तो कंट्रोल रेट में वह चावल भी दे देगा।पूरे गांव ने इसके खिलाफ एकसाथ आवाज उठायी,फिरभी डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने उसी शख्स को कपड़े के 15 लट्ठे सौंपे ताकि वह यह कपड़ा किश्त दर किश्त 83 परिवारों को बांट दें।उसने फिर वही पुराना खेल चालू कर दिया और जो भी कपड़ा मांगने आया,उसे बैरंग वापस भेज दिया।फिर अपनों को वह सारा कपड़ा कैरात में बांट दिये।


एक ही परिवार उन सबका बास बना हुआ था
ऐसी तकलीफदेह आवाजें मेरे कानों में लगातार गूंजती रहीं और आखिरकार मै श्यामा प्रसाद के अपने  गांव में दाखिल हो गया और सीधे सर आशुतोष के प्राचीन मैंसन में दाखिल हो गया।आशुतोष के किसी दूर के रिश्तेदार,किसी गोस्वामी ने इस पुराने भवन का नाम आशुतोष मेमोरियल रखा था।लेकिन मेरा सामना एक जराजीर्ण,गमशुदा,टूटता हुआ भग्नप्राय रायल बेंगल टाइगर का स्मारक से हुआ।( सर आशुतोष का यही लोकप्रिय नाम है रायल बेंगल टाइगर)।वे बहुत बड़े कद के इंसान थे और जिन्होंने आधुनिक बंगाल का निर्माण किया।जिन्होंने इस भवन की परिकल्पना तैयार की और उसे साकार करके भी दिखाया।मैंने एक रेखाचित्र तैयार किया है जिसे देखकर आपको अंदाजा होगा कि कितना राजकीय भवन यह रहा होगा।इसके तमाम शानदार क्लासिक मजबूत स्तंभ भरभराकर गिरने लगे थे।टैरेस का आधा हिस्सा ढह चुका था और दीवारों से ईंटें निकल रही थीं। खंडहर में तब्दील हो रही उस इमारत की दीवारों,खिड़कियों पर काईं जमने लगी थीं।दरारों में जंगली पौधे जहां तहां उग आये थे,जिसके नतीजतन ऊपर से नीचे तक  तमाम खंभे तहस नहस हो रहे थे।


सर आशुतोष के बेटों ने इस भवन को उन लोगों के हवाले छोड़ रखा था जो आशुतोष स्मृति मंदिर या आशुतोश चैरिटेबिल डिस्पेन्सरी जैसा कुछ खोलकर उनके पिता की स्मृति की पवित्रता सहेजे हुए थे।उस डिस्पेंसरी के डाक्टर इंचार्ज ने कड़ुवा सा मुंह बनाकर मुझसे कहा कि रोज सुबह वे इस डिस्पेंसरी को तीन घंटे के लिए खुला रखते हैं और तीस चालीस मरीजों का इलाज रोज करते हैं।मैं लगातार दो रोज सुबह वहां गया लेकिन डिस्पेंसरी एक घंटे से ज्यादा खुला नहीं देखा और तीस चालीस मरीज भी मैंने नहीं देखे।दस या बारह से ज्यादा मरीज वहां आ नहीं रहे थे जबकि आस पड़स में सैकडो़ं लोग मलेरिया से बिस्तर पर थे।यह मेरे लिए अकथनीय दुःख सा है और वहां का पूरा माहौल मुझे रहस्यजनक लगा।


पैतृक विरासत काफी नहीं
हुआ यह कि जब बाढ़ से बलागढ़ इलाका में हर मकान ढहने लगा तो सर आशुतोष के बेटों ने एक ब्रांड निउ मैंसन बनाने के बारे में निश्चय कर लिया।जाहिर है कि ओल्ड आशुतोष मैंसन उनके किसी काम का नहीं था।बहरहाल मैं यह समझ नहीं सका कि बंगाल में भुखमरी के इस कहर के बीच श्यामा प्रसाद ने नया भव्य मेंसन बनाने की क्यों सोची जबकि अपने पिता के पुराना भव्य भवन देख रेख के बिना भरभराकर ढहने लगा था।मीलों तक तमाम दूसरे मकान भी ढह रहे थे।फिरभी मैंने उस घृणा करने लायक,वल्गर नया बागान बाड़ी देखने के लिए गया ।पूरे बलागढ़ में भुखमरी के दौर में सालभर में इकलौता वह नया मकान बना था।फिर वह इकलौता मकान था जिसमें दो दो धान गोला (देशी गोदाम) धान से भरे थे।बहरहाल इस नये मकान में भव्य कीमती फर्नीचर से लदे फंदे बैठक घर तो थे ही,मुख्यगेट के दोनों तरफ गेस्टहाउस भी अलग से थे।इस्पात का सिंहद्वार था तो खिड़कियों पर भी सींखचे मजबूत थे ताकि बलागढ़ के उस सबसे समृद्ध धनी बागानबाड़ी की सुरक्षा में कोई कसर बाकी न रह जाये।फिर उस बागान बाड़ी में शानदार तरीके से रचे हुए बगीचे में एक ग्रीन हाउस भी था।
वह पूरी जगह रेगिस्तान के बीच मरुद्यान की तरह लग रहा था।छुट्टियों के दिनों में मुखर्जी परिवार के लोग सबांधव पिकनिक मनाने वहां मोटर गाड़ी से कोलकाता से लैंड करते रहते थे।गंगा में तैराकी का आनंद लेते थे।फिर बिना स्थानीय जनता से मिले जुले मोटरगाड़ी में सवार कलकत्ता चल देते थे। सर आशुतोष के बेटों की बनायी यह वल्गर बागानबाड़ी टुकड़ों में बिखर रहे भव्य राजकीय सर आशुतोश के प्राचीन भवन के लिए अपमान के सिवाय कुछ नहीं लग रही थी।यहीं नहीं ,वहां लबालब उमड़ती समृद्धि आसपास मरते खपते भूखे हजारों इंसानों के हुजूम के लिए भी अपमानजनक थी।भीतर से उमड़ रही घिन की वजह से मैं उस घृण्य बादानबाड़ी से भाग निकला,लेकिन फिर भी इस किस्से का अंत कहीं नहीं था।


उस वक्त बलागढ़ के गांवो में खास चर्चा का मुद्दा भुखमरी के दौरान बागानबाड़ी दो दो बार पधारे श्यामाप्रसादे की एक यात्रा के दौरान जिराट में खोले नये हाट को लेकर था, जिसका बड़े ठाठ बाट के साथ भव्य समारोह के जरिये उनने शुरु किया था। सारे ईमानदार लोग इस हाट के बारे में कसमें खाकर बातें कर रहे थे।क्यों? क्योंकि बलागढ़ इलाके में पहले से एक पुराना हाट जिराट के पास ही सिजे गांव में मौजूद था।भुखमरी के वक्त वही इकलौता हाट काफी था।मुद्दा साफ साफ भुखमरी के मध्य सीधे तौर पर मुनाफावसूली का था।जबकि जरुरत उस वक्त की यह थी कि भूखों मरते खपते लोगों को बिन बिचौलिये सीधे सौदा करने का मौका देने का था।बजाय इसके श्यामाप्रसाद ने  अपना नया हाट खोल दिया सिजे के पुराने हाट को बंद करने के मकसद से।जाहिर है कि लगभर  हर इंसान के नजरिये से यह मामला….


हिंदू महासभा के रिलीफ का सच


श्यामाप्रसाद के खोले नये हाट में दिनदहाड़े बेशर्म मुनाफावसूली के दौर में जिराट गांव में हिंदू महासभा के राहत सहायता अभियान से मेरे तनिक भी प्रभावित होने की नौबत बन नहीं रही थी।मैंने ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं की थी।फिरभी मैंने पूरी छानबीन इसलिए की कि मुझे मालूम था कि जिराट की जनता ने भुखमरी के दौरान श्यामाप्रसाद के राहत सहायता कार्यक्रमों के बारे में सुना ही होगा।वहीं इकलौता  गांव था,जहां ऐसा था।बहरहाल मैंने तहकीकात के बाद पाया कि हिंदू महासभा  का भुखमरी  रिलीफ वर्क का गिरोहबंद ढकोसला उतना ही फर्जीवाड़ा था,जितना मुनाफावसूली के लिए श्यामाप्रसाद का हाट या आशुतोष मैंसन की डिस्पेंसरी।चार रिलीफ सेंटर से हिंदू महासभा को 28 सेर चावल और 28 सेर आटा ही भूखी जनता को बांटना था। इसके अलावा श्यामाप्रसाद के दो भाइयों ने अलग दुकान खोल रखी थी,जहां बाजार की आधी कीमत पर चावल बेचा जाना था।इसके बावजूद यह तामझाम  गरीबों के किसी काम का न हुआ क्योंकि बाजार में चालीस रुपया मन चावल बिक रहा था।यही वजह थी कि जिराट गांव के किसानों और मछुआरों की आम शिकायत यह थी कि यह सारी चैरिटी बाबुओं की मदद के लिए थी।दरअसल चंद लोगों को छोड़कर दरअसल हिंदू महासभा की चैरिटी के तहत बीस रुपया मन चावल खरीदने की औकात भूखी जनता में से किसी की नहीं थी।


इसी लिए धनी वर्ग के लोगों से जिराट के लोगों को सख्त नफरत थी और सबसे ज्यादा नफरत थी श्यामाप्रसाद से।उनसे वे डरते भी थे सबसे ज्यादा।


कुल मिलाकर मैंने यही श्यामाप्रसाद के पैतृक गांव जिराट में देखा।मैंने भुखमरी के दौरान बंगाल की तमाम बड़ी हस्तियों के गांवों को देखा लेकिन कहीं भी धनी तबके के लिए इतनी घृणा और कटुता नहीं देखी।खासतौर पर उस गांव के सबसे कद्दावर शख्स के खिलाफ।


वापसी के रास्ते मुझे कुछ और ऐसा मिला जिसके लिए मैं कतई तैयार न था।मुझे तो पहले से ऐसा लगता रहा था कि मध्यवर्ग की पूरी की पूरी नई पीढ़ी श्यामाप्रसाद के महिमामंडन के लिए कोई भी सफेद झूठ कहने से हिचकती नहीं है। पूरे  बलागढ़ इलाके और  जिराट गांव में हर किसी  ने साफ तौर पर बता दिया कि दो साल में श्यामाप्रसाद अपने गांव सिर्फ दो बार गये।भुखमरी के दौरान एकबार और फिर जिराट में नया हाट बसाने के लिए। इसके विपरीत बगल के कसलपुर में एक डाक्टर साहेब मिले जिनने दावा किया कि श्यामाप्रसाद तो कलकता से लगातार गांव आते जाते रहते हैं और मसलन पिछले दो महीने में वे चार बार पधारे।क्या उनके गांव में एक भी शख्स ऐसा नहीं है जिसे श्यामाप्रसाद से मुहब्बत हो? जिराट के रिलीफ सेंटरों में चावल और आटा बांटने का काम देख रहे बीरनलेंदु गोस्वामी ने खुद मुझसे कहा कि वे सिर्फ रविवार को ही रिलीफ बांट रहे थे।जबकि हिंदू महासभा पर गर्व करने वाले हाईस्कूल के एक युवा छात्र ने दावा किया कि वहां रिलीफ केंद्रों पर रोजाना 24 छात्र काम कर रहे थे और रोज सौ डेढ़ सौ मुंहों को भोजन खिला रहे थे।


इसी लिए धनी वर्ग के लोगों से जिराट के लोगों को सख्त नफरत थी और सबसे ज्यादा नफरत थी श्यामाप्रसाद से।उनसे वे डरते भी थे सबसे ज्यादा।फिरभी इस यात्रा के अंत पर मुझे कुछ ऐसा सकारात्मक भी सुनने को मिला कि जिससे पता चला कि श्यामाप्रसाद और उनके तमाम कृत्यों के बावजूद प्राचीन बंगाली सभ्यता के मुताबिक सर आशुतोष की आत्मा प्रेरणा अभी सही सलामत हैं।शाम ढलने लगी थी और स्कूल तालाबंद था,जिसके सामने पेड़ों के नीचे लड़के लड़कियों के शोर मचाते झुंड जमा थे।किसी ने भद्दी भाषा में कोसना शुरु कर दिया तो तत्काल एक बूड़े आदमी ने चीखकर पूछा,`कौन भद्दी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है? क्या तुम सभी जानवरों में तब्दील हो गये हो?’ इसके जबाव में किसी ने कहा कि वे लोग कैसे इंसान हो सकते हैं,जिन्होंने स्कूल तक बंद कर दिये।फिर मेरे गाइड,एक किसान कार्यकर्ता के मुखातिब हुए वे।उन्होंने बिना लाग लपेट के मांग की,`प्लीज,हमारे लिए एक स्कूल टीचर दे दीजिये।हम भूखं रहकर उन्हें खाना खिलायेंगे।केरोसिन का भाव दस आना पिंट(0.473 लीटर) है।लेकिन हम उसके लिए भी पैसे जुगाड़ कर लेंगे।ईश्वर के वास्ते,हमारा स्कूल फिर चालू कर दीजिये।अगर ऐसा नहीं हो सका तो सर आशुतोष के गांव की सभ्यता खत्म हो जायेगी।हमारे बच्चे गुंडे बदमाश निकलेंगे।’ जीने के लिए,श्रम के लिए कितना फौलादी इरादा है यह! यकीनन वे लोग जिंदा रहेंगे और रायल बेंगल टाइगर की तरह लड़ेंगे-श्यामाप्रसाद के बावजूद!
साभार समयांतर

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