Saturday, October 29, 2011

वंचित तबके की नई परिभाषा

http://www.samayantar.com/2011/04/20/vanchit-tabke-ki-nai-paribhasha/

वंचित तबके की नई परिभाषा

April 20th, 2011

महिला दिवस के सौ साल

जुलैखा जबीं

सामंती समाज का औरत को सिर्फ जिस्म मानना और उसका मनमाना उपभोग का नजरिया, उस पर गरीबी, भूख, बेबसी ने इंसानी समाज की परिभाषा और लोकतंत्र की परिभाषा पर आज सवालिया निशान लगा दिया है। अब वक्त आ गया है कि सरकारें न सिर्फ अपने नजरिए को महिलावादी बनाएं बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी ईमानदारी दिखाएं।

आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के नाम से दुनिया भर में चर्चित वह दिन आया और गुजर भी गया। और इस साल तो इस अनुष्ठान के सौ वर्ष हो रहे थे। जो भी हो यह हमारे समाज मैं औरत की स्थिति पर एक नजर और डालने का मौका तो था ही, चाहे देर से ही सही।
बड़े फख्र से हमारा समाज 24 घंटों में हजारों बार घोषणा करता है कि हम विकास में यां-वां तक पहुंच गए हैं। मगर जब औरतों के साथ अपने व्यवहार की बात आती है तो बगलें झांकने लगते हैं। अपनी सफाई में हजारों तर्क देते हैं मगर हकलाते और थूक निगलते हुए। कुछ बेशर्म अपने बगल में औरत का एक वजूद लिए हुए भी दीदा-दिलेरी से अपना गुणगान करते हैं और बगल में मौजूद औरत निर्विकार भाव से उसे सुनते हुए या तो मुस्कराती है या उसे नजरअंदाज कर देती है। और गुणगानकर्ता शेर हो जाता है- वो मारा छक्का। अक्सर पार्टियों या समारोहों में कुछ ऐसी औरतें मिल जाती हैं जिनके बदन के दिखाई देने वाले हिस्सों में नीले, काले निशान नजर आ जाते हैं पूछने पर पता चलता है कि कहीं मेज से टकरा गईं या बाथरूम में फिसल पड़ीं या फिर बेखयाली में छज्जे का कोना लग गया। ऐसे बहुत सारे बहाने औरतें गढ़ लेती हैं घर की इज्जत (?) बचाने की खातिर। जरा देखिए तो राज्य की एक जानी-मानी आईएएस अफसर को अपनी शादी बचाने के लिए पति और ससुर की ज्यादतियों के खिलाफ अपनी जुबान न खोलने का समझौता साइन करना पड़ा है। एक बहुत प्रतिष्ठित राजनीतिक घराने की होनहार प्यारी-सी बिटिया पिछले दिनों एक सादे समारोह में बगैर किसी शोर-शराबे के गुपचुप ब्याह दी गई, उसका गुनाह सिर्फ इतना था कि वह अपने पसंदीदा गैर धनाढ्य पार्टनर के साथ घर से भाग गई थी।

अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ की एक तेज-तर्रार पुलिस अधिकारी के चरित्र को लेकर पुलिस विभाग ने जो जंग छेड़ी थी वह किसी से छिपी नहीं है। उनका गुनाह यही था कि वह अपराधियों से सख्ती से निपटती थीं, चाहे फिर कोई रसूखदार ही क्यों न हो। यही नहीं वह आमजन की चहेती भी थीं। मगर उससे क्या? थीं तो औरत। अगर आज के छत्तीसगढ़ की बात की जाए तो कई युवा आईएएस, आईपीएस महिला अफ सरों के मातहत, पुलिसकर्मी उनके पीठ फेरते ही ऐसी गंदी बातें करते हैं जिनका उच्चारण सामाजिक शालीनता को लांघने जैसा है। पिछले दिनों रायपुर की एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से बात करते हुए एक अफ सर का जिक्र आते ही उन्होंने कहा, "उनके सामने जाने में शर्म आती है। उनकी नजरें जिस तरह औरतों के बदन के कुछ हिस्सों में बार-बार अटकती है, उससे लगता है कि हम वहां बगैर कपड़ों के खड़े हैं।'' राज्य के धुर नक्सली जिले की कलेक्टर का तो उनके सहकर्मियों ने उनसे मिलने आने वाले हर शहरी नौजवान से याराना फि ट कर रखा था, जिसे लेकर वे चटखारे भरे शब्दों की चाट खाया/ खिलाया करते हैं। कुछ बरस पहले एक आईएएस की डाक्टर बहू को जहर का इंजेक्शन देकर मार डाला गया जिसे खुदकुशी का केस बनाने में पुलिस को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। यह और बात है कि मायके वालों ने 'पति का घर ही सब कुछ है' कह कर होनहार डाक्टर बेटी को हत्यारों की मांद में तने-तन्हा डाल दिया था।

मुद्दा यह नहीं है कि ऐसा सभी औरतों के साथ होता है या कुछ खास किस्म की औरतों के साथ। कुछ यह भी कहते हुए मिल जाती हैं कि हम भी तो वहीं हैं, हमारे साथ तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसी में कुछ खराबी होगी। और यह डायलॉग मनुष्य जाति की हर मादा पे हर कहीं लागू किया जाता है। वह पढ़ी-लिखी हो या अनपढ़। कामकाजी हो या घरेलू। युवा हो या बूढ़ी। गांवों में रहती हो या महानगर में। औरत कहीं भी हो, कोई भी हो, किसी मुकाम पे भी हो, उसका औरत होना ही अपने आप में मर्दों की नजर सेंकनेे, मौका मिलते ही झपट पडऩे, दबोच लेने के लिए काफी है। किसी कमी या कुंठा की वजह से ये न कर पाए तो शब्दों का चाट सेंटर लगाने से भला किसने रोका है? हमारे समाज में औरत सिर्फ एक जिस्म है जो मर्द को मजा/नशा देता है बस – इसके आगे औरत की कोई पहचान, कोई वजूद नहीं है। खुद को भले, प्रगतिशील, जेंडर फ्रेंडली समझने वाले मर्दों को भी हमेशा न सही, गाहे- बगाहे औरतों से सिर्फ इसी पहचान की चाहत दिखाई पड़ ही जाती है।
औरत इंसान है इसका सुबूत कहीं तो दिखाई दे जाए। धर्म मर्दवादी, भाषा मर्दवादी, संस्कृति मर्दवादी, रीति-रिवाज मर्दवादी नहीं तो औरत विरोधी हैं ही। जिस कृत्य के लिए औरत को छिनाल, रखैल शब्द गढ़कर अपमानित किया गया है उसका दूसरा हिस्सा मर्द के लिए ऐसा कोई लफ्ज इंसानी समाज की डिक्शनरी में आज भी दिखाई नहीं देता। साहित्य जगत की औरतें भी इसी भाषा में खुद को व्यक्त करने पे मजबूर हैं। यही नहीं इसका इस्तेमाल तथाकथित शरीफ सफेदपोश, लेखक, साहित्यकार और भी न जाने कौन-कौन से कार की पदवी धारण किए लोग सार्वजनिक रूप से करते हैं। जब उनकी आलोचना होने लगती है तो इन्हीं में से कुछ उनकी पैरवी करते नजर आते हैं। और यही वजह है कि ऐसे लोग इतनी गंदगी फैलाने के बावजूद भी मंचों, मठों, खानकाहों और अखाड़ों में आसीन ही नहीं सम्मानित भी होते हैं। कलफ लगे कपड़ों की तरह अकड़े समाज में विचरण करते पाए जाते हैं। लेकिन औरत अपनी जानकारी के बगैर अपने पर हुए हमले को एक हादसा समझ कर जिंदा नहीं रह सकती। वह खुद से, परिवार से, समाज से, दुनिया से किनारा कर लेती है। अंधेरों में खो जाती है। और प्रबुद्धजन भी उसे भुला देते हैं क्योंकि ऐसा करने में ही तो भलाई है – वर्ना अगला शिकार कैसे मिलेगा?

औरत सिर्फ एक शरीर है इंसान नहीं – इसके हजारों सुबूत समाज में, हमारी- आपकी दुनिया में, हमारे आसपास रोज मिलते/दिखाई दे जाते हैं। मगर समाज उन्हें देखकर भी अनदेखा करता है, करता रहा है। यह इसकी हमेशा की आदत है वर्ना तंदूर में झोंक दी गई नैना साहनी, टुकड़े करके मगरमच्छ को खिला दी गई सुषमा सिंह, मां होने का एहसास पाले अपना गर्भ गिराने से इंकार कर देने पर जान से मार दी जाने वाली मधुमिता के अलावा भी कई गुमनाम औरतें-बालाओं का आखेट क्यों किया गया? क्यों उनकी जिंदगियां दरिंदगी से छीन ली गईं? उनके जिंदा रह जाने भर से कौन-सी कयामत टूट पड़ती दुनिया में? जेसिका लाल तो इनमें से किसी किरदार में फिट नहीं होती थी, फिर भी उसे मार दिया गया। क्यूं? हत्यारे के अंदर कौन-सी मानसिकता थी और उसके बाद हत्यारे को बचाने की बेशर्म कवायद (न्यायपालिका सहित) क्या यह समझने के लिए काफी नहीं कि औरत इंसान नहीं है।?

छत्तीसगढ़ राज्य बनते ही एक जिले के बुढ़ा-चुके कलेक्टर द्वारा महिला बाल विकास विभाग में कार्यरत एक अधिकारी का लगातार शारीरिक शोषण और पीडि़ता के न्याय की गुहार लगाने पर राजनैतिक गुंडागर्दी से उस अधिकारी का बचाव किया जाना राज्य के लोग भूल चुके होंगे। इस या उस नहीं, दोनों राजनैतिक पार्टियों की सरकारों ने बलात्कारी अफसरों, पार्टी कार्यकर्ताओं के गुनाहों की बदबूदार कालिख अपने मुंह पर मल रखी है। 8 मार्च, 2007 को रायपुर की लाखों की सभा में लालकृष्ण आडवानी के सामने चीख-चीख कर अपने पर किए जा रहे लगातार बलात्कार का आरोप लगाने वाली वह बाला आज कहां है और उसका आरोपी किस पार्टी की किस शाखा/विभाग में प्रमुख है? कोई पुलिस, कोई आयोग (मानव या महिला) है जवाबदेह? हैलो…कोई सुन रहा है? क्योंकि औरत इंसान नहीं है। अगर इंसान होती तो 14 फरवरी को राजधानी रायपुर के ब्लाक घरसीवां में एक निजी इंजीनियरिंग कालेज के 6 छात्रों, जिनमें से कुछ पड़ोसी मध्यप्रदेश के रीवा के राजनैतिक रसूखदार घराने के बलात्कारी वंशवाहक भी हैं अब तक गिरफ्तार हो गए होते। यही नहीं चाउरवाले बाबा उस गरीब कुंभकार परिवार की सुध लेने खुद नहीं तो कम से कम अपने मातहत किसी चपरासी को ही उसके घर भेज देते जिससे उस गरीब परिवार का गम हल्का होता। नक्सली हमले में शहीद चौबे जी के परिवार पर तो बड़ी कृपा है राज्य के मुखिया और पुलिस प्रमुख की। पिछड़ी जाति के उस गरीब कुंभकार के परिवार में, जिसकी 15 बरस की बिटिया से संस्कृति के छह ठेकेदारों ने उसके मंगेतर के सामने सामूहिक बलात्कार किया, आज तक कोई छोटा सरकारी ठेकेदार भी नहीं भेजा है उन्होंने। और अभी तक मुख्य बलात्कारी राज्य की कर्मठ पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। राज्य की जिम्मेदार और संवेदनशील पुलिस ने 15 बरस की लड़की की उम्र उसके बताने के बावजूद भी 18 बरस दर्ज की है तो समझा जा सकता है कि एफआईआर पीडि़ता के बयान के अनुसार लिखी गई है या फिर छत्तीसगढ़ की पुलिस के अनुसार, जिससे अदालत में माई-बाप की बेलगाम अय्याश औलादों को बाइज्जत बरी करवाया जा सके।

औरत इंसान नहीं है साहब अगर इंसान होती तो सरकारों के चरित्र में भी औरत की नाजुकी, इंसानियत, संवेदनशीलता, सरोकार और मोहब्बत कहीं न कहीं होती ही। अगर औरत इंसान होती तो इरोम शर्मिला के गम में पूरा देश सिर्फ शरीक ही नहीं होता सड़कों पे निकल आया होता। औरतें इंसान होतीं तो मणिपुर की औरतें असम रायफल्स के मुख्यालय के सामने 'इंडियन आर्मी रेप अस' (भारतीय फौज आओ हमारा बलात्कार करो)का बैनर लगाकर बगैर कपड़ों के प्रदर्शन नहीं करतीं। औरतें इंसान होतीं तो दंतेवाड़ा की सोनी सोरी का रुदन सुनकर सरकारें उसके आरोपी पुलिस अधिकारी की जांच का कम से कम नाटक ही कर लेतीं। इसी जिले की नेंद्रा सहित कई गांवों की युवतियां एसपीओ और सलवाजुड़ुम के नेताओं के बलात्कार की शिकार होकर न्याय में आस्था जताने की सजा आज तक नहीं भुगत रही होतीं। अगर औरतें इंसान होतीं तो अपने ऊपर हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ ब्रा-पैंटी में एक औरत अहमदाबाद की सड़कों पर दिन-दहाड़े नहीं चल पड़ती। औरतें इंसान होतीं तो अहमदाबाद के धनाड्य परिवार की इस बहू को ससुराल के जुल्म को बाहर लाने की बतौर सजा सामाजिक बहिष्कार झेलते हुए गुमनाम जिंदगी नहीं भुगतनी पड़ती। अपराधी जेल में होते। हमारे देश में औरतें वंचित तबके की परिभाषा बना दी गई हैं भले ही वो अफजलों की (मुस्लिम सवर्ण) जाति से हों या ब्रह्मा के मुख से पैदा हुई जाति से । हर जगह ये दलितों से भी दलित हैं।

विकास के नाम पर जिस तरह इंसान विरोधी गतिविधियों में आज की सरकारें लिप्त होती जा रही हैं, उसमें धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की कोई जगह नहीं है। ऐसे में वंचित तबके जिनमें अब आदिवासी भी शामिल कर दिए गए हैं, हाशिए पे किए जा रहे हैं। विकास और विस्थापन का चोली-दामन का तो नहीं (अगर सरकारें चाहेें तो) मगर हां, फिलहाल साथ तो है ही। अपनी जमीन, अपनी संस्कृति से खदेड़े जा रहे लोगों की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, असुरक्षा, स्वास्थ्य की सुविधाएं न मिल पाने की बेबसी ने इनके साथ औरतों और बच्चों की जिंदगी भी नर्क बना रखी है। सामंती समाज का औरत को सिर्फ जिस्म मानना और उसका मनमाना उपभोग का नजरिया, उस पर गरीबी, भूख, बेबसी ने इंसानी समाज की परिभाषा और लोकतंत्र की परिभाषा पर आज सवालिया निशान लगा दिया है। अब वक्त आ गया है कि सरकारें न सिर्फ अपने नजरिए को महिलावादी बनाएं बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी ईमानदारी दिखाएं। शैक्षणिक संस्थाओं को भी जेंडर फ्रेंडली (महिलाओं के प्रति संवेदनशील) बनाना होगा। हमारे प्रशिक्षण केंद्र और प्रशिक्षण संस्थाओं में भी औरत इंसानी हकूक की हकदार हैं, समझाए जाने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो हमें यह याद रखना होगा कि हमारे संविधान में दो लफ्ज 'बराबरी' और 'न्याय' अभी भी मौजूद हैं, इनका मतलब जिस दिन ये तबके समझने लगेंगे उस दिन या तो संविधान रहेगा या फिर लंपट सरकारें। मिस्र की क्रांति टीवी में लोगों ने खूब देखी है। तानाशाही से आजादी के लिए दूसरे देशों का बेचैनी भरा संघर्ष भी लगातार लोग देख रहे हैं। तथाकथित धार्मिक कर्मकांडों की कट्टरपंथी दबंगई भी काम नहीं आएगी। सारे त्रिशूल, तलवार धरे रह जाएंगे जब अपमान का ज्वालामुखी फूटेगा।

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