| Tuesday, 07 February 2012 10:29 |
सत्येंद्र रंजन समस्याग्रस्त यह इसलिए है कि पार्टी ने वाम की स्वतंत्र भूमिका को मजबूत करने को अपना लक्ष्य घोषित करते हुए कहा है कि 'बुनियादी तबकों के बीच पार्टी के कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।' इसके आगे वाम जनतांत्रिक कार्यक्रम की सूची बनाते हुए पार्टी ने भूमि सुधारों और कृषि संबंधों के जनतांत्रिक रूपांतरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। साथ ही इसमें नियोजित विकास, खनन और प्राकृतिक संसाधनों के राष्ट्रीयकरण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह पर कडेÞ विनियमन जैसी मांगें भी शामिल हैं। सवाल है कि अगर क्षेत्रीय दल ग्रामीण धनी तबकों की हित-रक्षक पार्टियां हैं, तो क्या उनके साथ इन मांगों पर कोई वास्तविक सहमति बन सकती है; या जब माकपा बुनियादी तबकों को संगठित करने का प्रयास करेगी, तब उसका इन दलों से अंतर्विरोध नहीं उभरेगा? यह सवाल इसलिए है, क्योंकि पार्टी ने अपना लक्ष्य 'कांग्रेस और भाजपा से राजनीतिक संघर्ष' घोषित किया है। माकपा इन दोनों पार्टियों को 'बड़े बुर्जुआ, जमींदारी व्यवस्था की प्रतिनिधि' मानती है, जिन्हें वह वर्ग-शोषण और विभिन्न जन-समूहों के सामाजिक उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार मानती है। यह बात बड़ी विचित्र है कि ग्रामीण धनी वर्गों की प्रतिनिधि पार्टियों से सहयोग का रास्ता खुला रखा जाए, जबकि सिर्फ दो पार्टियों को वर्ग-शोषण और सामाजिक उत्पीड़न के तर्क पर मुख्य शत्रु घोषित कर दिया जाए। यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक स्थितियां काले और सफेद में नहीं बंटी होतीं। बल्कि 'जनतांत्रिक' की भी कोई तयशुदा परिभाषा नहीं है। यह समय और स्थान के आधार पर बदलती रहती है। हम किसे जनता का हिस्सा मानें और किसे शत्रु- यह खास परिस्थिति पर निर्भर करता है। यह समाज में मौजूद विभाजन-रेखाओं (फॉल्टलाइन्स) की अपनी समझ से तय होता है। भारतीय समाज में आज आखिर कौन-सी विभाजन-रेखाएं सबसे प्रमुख हैं? भारतीय जनता पार्टी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद माकपा ने जो दिशा तय की थी, उसमें सांप्रदायिकता (जो बाद में सांप्रदायिक फासीवाद की आशंका में तब्दील होती गई) को सर्वप्रमुख विभाजन-रेखा माना गया था। इसी मान्यता से कांग्रेस से सहयोग की राह निकली थी, जो यूपीए-एक के जमाने में वाम मोर्चे द्वारा बाहर से दिए गए समर्थन के तौर पर ठोस रूप से सामने आई। यह सहीहै कि कांग्रेस ने 2004 के जनादेश से एक तरह से विश्वासघात किया। इसकी पीड़ा माकपा कार्यकर्ताओं के मन में हो, यह अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन राजनीतिक दिशा जज्बातों से नहीं, ठोस हकीकत से तय होती है। क्या सांप्रदायिक फासीवाद का खतरा आज देश से खत्म हो गया है? क्या सांप्रदायिकता अब एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक विभाजन-रेखा नहीं रही? माकपा को अपनी कांग्रेस में इन प्रश्नों पर जरूर विचार करना चाहिए। नव-उदारवाद, पूंजीवाद की सेवा, भ्रष्ट-आचरण आदि भी निसंदेह विभाजन-रेखाएं हैं, जिनके आधार पर राजनीतिक दिशा तय हो सकती है। लेकिन इन आधारों पर तय 'जनतांत्रिक' दायरे में आखिर वे क्षेत्रीय दल किस आधार पर समाहित होंगे, यह समझना कठिन है। पार्टियों के दायरे से बाहर 'जनतांत्रिक' शक्तियों की खोज माकपा के लिए और भी दुरूह साबित होने वाली है। जो मनोवैज्ञानिक समस्या वामपंथ के संगठनों और व्यक्तियों में है, वह कथित व्यापक जनतांत्रिक दायरे में कोई कम नहीं है। भारत की वाम-जनतांत्रिक राजनीति की मुश्किल यह है कि इसमें रुख 'जनता के आंतरिक अंतर्विरोधों' की समझ और उनके आधार पर तय रणनीति से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत या सांगठनिक राग-द्वेष से ज्यादा तय होते हैं। अगर एकता का सपना छोड़ दिया जाए, तो अपने-आप में भारत का जनतांत्रिक दायरा संकरा नहीं है। अस्मिता आधारित संगठनों से लेकर एक-मुद्दा केंद्रित संघर्षों तक फैले इस दायरे ने राष्ट्रीय राजनीति के एजेंडे को भी एक हद तक प्रभावित किया है। संघर्षों के एनजीओकरण संबंधी शिकायतें अपनी जगह सही हैं, लेकिन इस क्रम में हुई एडवोकेसी (जन-वकालत) ने जनतांत्रिक बहसों को समृद्ध करने में एक भूमिका निभाई है। लेकिन इस परिघटना की सीमा यह है कि उससे कोई वैकल्पिक राजनीति नहीं निकलती। बल्कि वह उस राजनीति को कुंद करती ज्यादा नजर आती है, जिसमें नव-उदारवादी व्यवस्था को चुनौती देने की संभावना हो। माकपा जब वाम-जनतांत्रिक एकता की बात करती है, तो इसलिए उसकी एक विशिष्ट प्रासंगिकता समझ में आती है। मगर दिक्कत यह है कि व्यवहार में उस एकता में समाहित होने वाली शक्तियों की पहचान और उन तक पहुंच अत्यंत कठिन है। माकपा और प्रकारांतर से वाम मोर्चे को वामपंथ की स्वतंत्र भूमिका को मजबूत करने के रास्ते पर ही चलना होगा। इसका रास्ता 'बुनियादी तबकों' में अपनी जड़ें मजबूत करना ही है। लेकिन जब बात विभिन्न शक्तियों से सहयोग की हो, तब उसे मौजूदा सामाजिक विभाजन रेखाओं की यथार्थवादी समझ का परिचय देना चाहिए। दलित, आदिवासी और मुसलिम अल्पसंख्यक अगर उत्पीड़ित हैं, तो वर्ग आधारित शोषण के अलावा पुरातन सोच पर आधारित सांप्रदायिक विचारधारा भी उसका एक बड़ा पहलू है। इस बात को नजरअंदाज कर उनकी मुक्ति की राजनीति विकसित नहीं हो सकती। |
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वाम-जनतांत्रिक एकता की मुश्किलें
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