Tuesday, February 7, 2012

निर्जन नगर पर छाया हुआ वक्त का धुंधलका ‘मुअनजोदड़ो’

निर्जन नगर पर छाया हुआ वक्त का धुंधलका 'मुअनजोदड़ो'



 पुस्‍तक मेलाशब्‍द संगत

निर्जन नगर पर छाया हुआ वक्त का धुंधलका 'मुअनजोदड़ो'

14 OCTOBER 2011 4 COMMENTS
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♦ कृष्‍णा सोबती

ओम थानवी की कृति मुअनजोदड़ो का प्रकाशन इस वर्ष मार्च में हुआ था। वाणी प्रकाशन ने इसका पहला संस्करण पांच हजार प्रतियों का छापा, जो हिंदी प्रकाशन जगत में असाधारण बात थी। ख्यातिनाम लेखक और अर्थशास्त्री कृष्णनाथ पुस्तक की प्रस्तावना की। वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण ने लोकार्पण करते हुए पुस्तक के गद्य और शिल्प की तुलना ओरहान पामुक से की। अक्सर सरसरी तौर पर ही किताबों को पढ़ने वाले अशोक वाजपेयी ने कहा कि पूरी किताब उन्होंने एक बैठक में पढ़ डाली। इसके बाद किताब की समीक्षाओं का सिलसिला शुरू हुआ। डॉ नामवर सिंह ने किताब की विवेचना दूरदर्शन पर की। आम तौर पर गंभीर कृतियों को लेकर उदासीन रहने वाली हिंदी पत्रिकाओं और अखबारों ने भी समीक्षा के मामले में मुअनजोदड़ो को बड़ी उदारता से लिया। वाणी प्रकाशन के अनुसार गत चाह महीनों में इसकी अब तक 35 समीक्षाएं छप चुकी हैं। फ्लिपकार्ट पर हिंदी किताबों में इसकी बिक्री अत्यधिक हुई है! जिन पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षा छपी है, उनमें वागर्थ, पूर्वग्रह, हंस, कथादेश, अकार, पाखी, समयांतर, हिंदुस्तान, भास्कर, जागरण, अमर उजाला, इंडिया टुडे, आउटलुक, तहलका आदि के अलावा अंग्रेजी के दि हिंदू, इंडियन बुक रिव्यू जैसे प्रकाशन भी शामिल हैं। सिर्फ एक पत्रिका पुस्तक वार्ता में समीक्षा निंदा में है। इसे भगवान सिंह से लिखवाया गया है, जिनके हिंदूवादी संकीर्ण नज़रिये की ओम थानवी ने अपनी इसी किताब में धज्जियां उधेडी हैं। ख़याल रखें पुस्तक वार्ता महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका है, जिसके कुलपति वीएन राय जनसत्ता से ज्ञानोदय प्रकरण के मामले में आहत हैं।

हालांकि इस बहुचर्चित किताब पर कैलाश वाजपेयी और गिरिराज किशोर जैसे स्थापित लेखक तक कलम चला चुके हैं, इस सिलसिले में सबसे दिलचस्प बात वरिष्ठ कथाकार कृष्ण सोबती का मुअनजोदड़ो की समीक्षा लिखना है। यह समीक्षा उनकी जानी पहचानी शैली में एक तरह का ललित निबंध जैसा है, जो साहित्य अकादमी की पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के नये अंक में प्रकाशित हुआ है। सुनते हैं इन दिनों खुर्दबीन के सहारे किताब पढ़ने वाली कृष्णा जी ने स्वेच्छा से इसे लिखा और संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय को भेज दिया। ओम थानवी कहते हैं, कृष्णा जी का लिखना उनके लिए "सुखद आश्चर्य" है। हम यहां कृष्णा जी का वह आलेख साभार प्रकाशित कर रहे हैं : मॉडरेटर

मय और काल के पंखों को चीन्हती, खोजती, छानती, पहचानती, पुरातत्‍व के सन्नाटों के धड़कते मौन का लिप्यांतर करती ओम थानवी कृत 'मुअनजोदड़ो' सिंधु घाटी सभ्यता और संस्कृति का रोमांचक आख्यान है।

इसके मुखपृष्ठ पर है नश्वर नस्ल की जीती-जागती हाड़-मांस की मुखाकृति। हमारी ही तरह धरती की दहलीज पर उघड़ी आंखों वाली मुअनजोदड़ी कोई मूरत, इसी पृथ्वी के सर्द-गर्म में सांस लेकर इंसानी अस्तित्व का अधिकार अर्जित कर सकी और आज फिर इस किताब के आवरण पर प्रकट हो गयी।

यह मात्र कोई काल्पनिक मुखौटा नहीं है। यह मानवीय विकास की शृंखला का ठाठ है। जन्म लेता है, जीता है, मरता है और अपने जीने में शेष हो जाता है। मगर पीछे अपना भविष्य छोड़ जाता है।

इस लोक के तिलिस्म की आहटों को संजोने वाला मुअनजोदड़ो का वर्णन सिंधु घाटी सभ्यता की पुरानी दहलीजों से शुरू होता है और हमें पुरातत्‍व की खोजों तक ले आता है। थानवी का टफ्फ और गफ्फ वृत्तांत पाकिस्तान में स्थित जिस 'दैय्या' को छूता है, वह कभी दस लाख किलोमीटर वाली सिंधु सभ्यता-संस्कृति मिस्र, मेसोपोटामिया से कहीं बड़ी रही होगी।

यह धूप में पकी अनुकृति एक साथ जीवित है। वह नि:शब्द है, मगर बेजान नहीं है। पुरुषोचित संस्कार को समेटे चेहरे की कड़ियल खामोशी में सुगठित और संयमित काल का यह प्रतिबिम्ब है।

हम थानवी साहिब से रश्क कर रहे हैं कि लाड़काणा की ओर जाती बस में हम न हुए। बाहर फैले अंधेरे में आंखें गड़ाये हम भी कुछ ढूंढ़ते। सीमांतों की राहदारी संभाले इधर और उधर की जड़ों को सूंघते-टटोलते। सगे-पराये, अपने-दूसरे … जो कुछ भी होते रहे … हसरत इतनी ही कि ऐसे आने-जाने को हम भी लेखक की तरह उसे तीर्थयात्रा ही समझें। सिंध के इस टुकड़े को देखकर पुरानी राजनीतिक गुम चोटें पिघल जाएंगी।

वक्त है क्या भला? वक्त पहले ऋतुओं और मौसमों को बुनता है। उस बुनत में से उघड़ता है। धीरे-धीरे छीजता है। फिर परिवर्तनों के ताने-बाने में से नया होकर उभरता है। फिर किसी एक दिन प्रकृति की संहारक हलचलों में मुअनजोदड़ो मुर्दों का टीला बन खड़ा का खड़ा रह जाता है। हजारों वर्ष पहले कभी दहाड़ते सिंध दरिया के किनारे बसा यह शहर आज भी अपने पुराने वुजूद में मौजूद है। भले ही खंडहर होकर।

मानवीय संतानों के प्राणवान कोलाहल से सूना पड़ा इस शहर का स्थापत्य सदियों से नि:शब्द है: चुपचाप और अवाक। खंडहर हैं, मगर अपने पुरानेपन से। विस्मयकारी है यह पकी ईंटों की जड़त, भूगोल में भीगी और इतिहास के पिछवाड़े से झांकती हुई। पुरातत्‍व की खुदाई और खोजों में सांस लेती हुई।

ओम थानवी ने शब्दों को संयमित-संक्षिप्त वैचारिकता और संस्कारी संपन्नता में इस मुर्दा शहर को पन्नों पर कुछ ऐसा उतारा है कि वह हमारे दिल-दिमाग में जीवित हो उठता है। विविध प्रसंग, संदर्भ, विवरण, वृत्तांत संयोजित करते हुए 'मुअनजोदड़ो' का पाठ अपने में उपन्यास का कौशल और रोचकता समेटे हुए है।

मुअनजोदड़ो की सुनसान दहलीजों के अंदर जिस 'बाहर' का प्रवेश है, वह काल्पनिक नहीं – बाकायदा आपके पांव तले मौजूद है। उन्हें लांघकर उन घरों तक पहुंचा जा सकता है जो 'संतानों' के कोलाहल से सूने हैं, पर अपने मूल स्थापत्य में तो आज भी जिंदा हैं। यहां इतिहास और पुरातत्‍व दोनों एक-दूसरे को देख भर रहे हैं।

लेखक ने फ्रांसीसी विद्वान जां ऑनरी की एक पंक्ति उद्धृत की है:

"इतिहास दोगले शासकों का ही नाम दर्ज करता है। वह यह नहीं बताता कि गेहूं का उद्गम किस काल में कहां की धरती में हुआ। मात्र विद्वत्ता से पता नहीं लगता, इसके लिए फावड़ा उठाना होता है। सलीके से जमीन खोदनी पड़ती है। असल में यह काम पुरातत्‍व का है। शायद इसीलिए उसे इतिहास की रीढ़ कहा जाता है। पुरातत्‍व इतिहास का प्रमाण है और प्राण भी।"

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इतिहास और पुरातत्‍व की परिभाषाएं अपने-अपने अनुशास्त्रीय मुखड़ों में 'मुअनजोदड़ो' के पन्नों पर लगातार तैरती रहती हैं। सिंधु किनारे के ओझल नागरिक सुख, संतोष और अपने लंबे मौन में भी पुरानी छवियां प्रस्तुत करते हैं और समय के हाथों धुल-पुंछकर हमारे सामने फिर वैसे ही खड़े हैं जैसे कभी थे।

"इस आदिम शहर की सड़कों और गलियों में आप आज भी घूम-फिर सकते हैं। यहां की सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो – शहर जहां था वहां अब भी है। आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिकाकर सुस्ता सकते हैं। वह कोई खंडहर क्यों न हो, किसी भी घर की देहरी पर पांव रखकर सहसा सहम जा सकते हैं। जैसे भीतर कोई अब भी रहता हो। रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं।"

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जीने वालों के दहकते चूल्हों के अंगारे और उन पर भुनती गेहूं और घी में पगी रोटी की सुगंध – पुरातत्‍व भला काल्पनिक संवेदन को क्या कहेगा? आग पर पके-भुने उन पकवानों की महक को। भट्ठे से निकली पक्की ईंटों को। अगली-पिछली दूरियों को जो ठंडी पड़ी हैं, मगर आज भी मजबूती से खड़ी हैं।

इस पर रहस्य की सैकड़ों परतें होंगी, जिनको विशेषज्ञों को खोजना है। फिर भी कुदरत के खेल देखिए, आज भी मुअनजोदड़ो और हड़प्पा प्राचीन भारत के ही नहीं, दुनिया के सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। आज सिंधु घाटी की धारा सिंध, पंजाब, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा आदि को पीछे छोड़कर बलूचिस्तान के मेहरगढ़ तक पहुंच गयी है।

प्रकृति की विनाशकारी शक्तियों का सामना करते हुए भी इस वीरान नगर की प्राणवान कोशिकाएं सदियों-सदियों से मजबूती से अपनी नींव पर टिकी हैं। बस्तियों की तरतीब ऐसी है कि एक घर से दूसरे घर में जाने के लिए आपको वापस बाहर नहीं आना पड़ता। एक घर दूसरे में खुलता है। दूसरा तीसरे में।

"ज्यादातर घरों का आकार तकरीबन बीस गुणा तीस फीट होगा। कुछ इससे भी दोगुने-तिगुने आकार के हैं। इनकी वास्तु-शैली कमोबेश एक-सी प्रतीत होती है। ऐसे व्यवस्थित और नियोजित शहर में कुछ निर्माण-नियम जरूर लागू होंगे। क्या नगरपालिका जैसा कोई संस्थान इसे निर्देशित करता रहा होगा? यहां वह घर भी है, जिस घर को मुखिया का घर कहकर पुकारा जाता है। इसमें दो आंगन और करीब बीस कमरे हैं…

"नगर की ऐसी सुगठित व्यवस्था को भला क्या नाम दिया जा सकता है? नगरपालिकाओं का मूल रूप शायद। सड़कों के दोनों ओर घर हैं लेकिन सड़क की ओर सारे घरों की पीठ है। यानी कोई घर सड़क पर नहीं खुलता है। शहर की मुख्य सड़क बहुत लंबी है। कभी पूरे शहर को मापती होगी। इसकी चौड़ाई तैंतीस फीट है…

"ढंकी हुई नालियां मुख्य सड़क के दोनों तरफ समांतर दिखाई देती हैं। बस्ती के भीतर से इनका यही रूप है। हर घर में एक स्नानघर है। घरों के भीतर से पानी या मैले की नालियां बाहर हौदी तक जाती हैं और नालियों के जाल से जुड़ जाती हैं। सिंधु घाटी सभ्यता संसार में पहली ज्ञात संस्कृति है जो कुएं खोदकर भू-जल तक पहुंची। पुरातत्‍व के अंदाज से यहां सात सौ के करीब कुएं थे और व्यापारियों और किसानों के आंगन में अपने कुएं रहे होंगे। नदी, कुएं, कुंड और बेजोड़ जल निकासी। मुअनजोदड़ो में कुओं को छोड़कर लगता है जैसे सब कुछ चौकोर और आयताकार है। नगर की योजना बस्तियां – घर, कुंड, बड़ी इमारतें, ठप्पेदार मुहरें, चौपड़ के खेल की गोटियां, तौलने के बाट आदि सब।"

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मुअनजोदड़ो की धूप, हवा, धूल और ऊपर चमकता आकाश स्तब्ध खड़े मुर्दा शहर के ताप को निखारते हैं। कभी रहा होगा यहां भी वह शोर जो तौल के बाटों से तुलता है और समेटता है उसके एवज में माल। ये गलियां, यह चौक, बाजार और मंडियां। इनके बीचोबीच से गुजरती माल से लदी बैलगाड़ियां। बैलों के गले की टनटनाती घंटियों की इलाही रागिनी जैसे एक साथ लय-ताल में कोई जीवित संगीत सुना रही हो… झन… झन… झन… झन…

"मुअनजोदड़ो में उस रोज बहुत तेज हवा बह रही थी। किसी बस्ती के टूटे-फूटे घर में दरवाजे या खिड़की के सामने से हम गुजरते तो सांय-सांय की ध्वनि में हवा की लय साफ पकड़ में आती थी। वैसे ही जैसे सड़क पर किसी वाहन के गुजरते हुए किनारे की पटरी के अंतरालों में रह-रहकर हवा के लयबद्ध थपेड़े सुन पड़ते हैं। सूने घरों में हवा और ज्यादा गूंजती है। इतनी कि कानों का अंधियारा भी सुनाई पड़े।"

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कानों का अंधियारा और अंधियारों को रौशन करती वह लहराती आवाजों की दुनिया। नहीं – अब यहां इस सिंधु काल के नगर में चलते-फिरते, हंसते-बोलते, गाते-बजाते लोग नहीं हैं। शायद उनकी रूहों के पुराने अक्स ही कहीं हों। घुमेर पैदा करती हवाएं रेतीले भभकों में खनकने लगती हैं।

पुरातत्‍वी जिज्ञासाओं और जानकारियों के होते भी 'मुअनजोदड़ो' के पाठ में साहित्यिक निजता कुछ ऐसे स्‍पंदित है, जो बिना अनावश्यक हस्तक्षेप के इन वीरानी सिलवटों में बिना सिलवटों के शब्दों की बयार देती जाती है। अब इन घरों में कोई बसने नहीं आएगा। इतिहास का पिछवाड़ा भरा है जाने किन अनजान चेहरों से। सदियों की धूप, सदियों-सदियों यहीं ठिठकी, पुराने अंधेरों के सन्नाटों को रह-रह बजाती जाने किस उम्मीद में खड़ी है। क्या शाह लतीफ के बोल सुनने के लिए?

सामने मुअनजोदड़ो का अजायबघर। साधारण-सी इमारत। उसकी नंगी ईंटोंवाली दीवार पर दो सफेद आकृतियां बनी हैं। एक – वृषभ, दूसरा – हाथी, देखते ही पहचान में आते हैं कि ये मुअनजोदड़ो की खुदाई में मिली उन मुहरों के रूपाकार हैं जिन्होंने रातोरात दुनिया के सामने भारत के इतिहास का नक्शा ही बदल दिया।

पर यह साधारण-सा दीखता अजायबघर मुअनजोदड़ो के पुरातत्‍व-महत्‍व के अनुरूप नहीं है। भारत-पाकिस्तान दोनों देशों को सिंधु संस्कृति की इस प्राचीनतम विरासत की सुरक्षा और पुरातत्‍व के वैज्ञानिक रख-रखाव के लिए एक बड़ी योजना बनानी चाहिए। राजनीतिक मनोमालिन्य और असमंजस को अलग रखकर उसे एक ऐसे प्रतिष्ठान का रूप दें जो इसकी पुरातन ख्याति के अनुरूप हो। आखिर तो यह सिंधु संस्कृति की बरकतों का ही प्रतीक है – जहां वक्त अपने स्वामित्व में खड़े-खड़े सुबह-शाम खुद अजान देता है।

"मौसम जाड़े का था। पर दुपहर की धूप बहुत कड़ी थी। सारे आलम को जैसे एक फीके रंग में रंगने की कोशिश करती हुई। यह इलाका राजस्थान से बहुत मिलता है। इसे भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप माना गया है। रेत के टीले नहीं। धूल, बबूल। ज्यादा ठंड, ज्यादा गर्मी। पर यहां की धूप का मिजाज जुदा है।"

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राजस्थान की धूप पारदर्शी है। सिंध की धूप चौंधियाती है। तस्वीर उतारें तो सारे रंग कुछ उड़े-उड़े से लगते हैं। कहां हैं वे चेहरे, वे पोशाकें, वे आग पर पकती देगें और देगचियां। कुछ घरों में ऊपर की मंजिल के निशान हैं, पर सीढ़ियां नहीं। शायद वहां लकड़ी की सीढ़ियां रही हों जो कालांतर में नष्ट हो गयीं।

पूरा मुअनजोदड़ो छोटे-मोटे टीलों पर आबाद था। वे टीले प्राकृतिक नहीं थे। कच्ची-पक्की दोनों तरह की ईंटों से धरती की सतह को ऊंचा उठाया गया था। ताकि सिंधु का पानी बाहर पसर जाए और उससे बचा जाए। शहर के शहर को वीरान कर जाने वाला शायद कोई विध्वंसकारी हल्ला रहा हो – सुनामी जैसी प्रलयकारी विपदा या किसी बाहुबली सेनानी के खौफजदा हमले से ऐसे सुव्यवस्थित नगर से नागरिकों का विस्थापन हो गया हो। यह साधारणजन की कल्पना है, विशेषज्ञों की नहीं। इस जहान में सबसे गहरे इंसानी संबंध, अपने परिवार, घर, गांव, शहर, देश को सदा के लिए पीठ देने से बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है।

विस्थापन के छोटे-बड़े ऐतिहासिक दस्तावेज देखने पर भी 'मुअनजोदड़ो' के लेखक द्वारा सहज, संक्षिप्त से वर्णित घर को, घर की मालिकी को पीठ देने वाला जिक्र निहायत सादा है, मगर अत्यंत प्रभावशाली है। सिंधु संस्कृति की पराकाष्ठा पर क्या कुछ ऐसा भी घट सकता था?

थानवी लिखते हैं:

"मुझे कुलधरा की याद आयी। वह जैसलमेर के मुहाने पर पीले पत्थर के घरों वाला एक खूबसूरत गांव है। उस खूबसूरती में अब हरदम गमी छायी रहती है। गांव में घर हैं, पर लोग नहीं। कोई डेढ़ सौ साल पहले राजा से तकरार होने पर स्वाभिमानी गांव का हर वासी रातोरात अपना घर-गांव छोड़ गया। घरों के चौखट असबाब आदि सब वहीं पड़े रह गये। लोग घरों से निकल गये। वक्त वहीं का वहीं रह गया।"

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मुअनजोदड़ो भी अब वक्त है। सिर्फ 'वक्त'। निर्जन नगर पर छाया हुआ वक्त का धुंधलका। चंदोवा उसकी पहरेदारी में लगा है। न इसकी पक्की ईंटें भुरें, न ठंडे गर्म मौसम इसके खंडहरों को कुतरें और सिंधु सभ्यता के इस प्रत्यक्ष प्रमाण की छटा खामोशी से चमकती रहे। इसकी मिट्टी तले टोह-टाह खोजबीन करनेवाला पुरातत्‍व विभाग खोजों में लगा रहा है। 'मुअनजोदड़ो' में पुरातत्‍व और इतिहासकारों के बड़े नामों से हमारा परिचय होता है। जॉन मार्शल, मॉर्टीमर वीलर, राखालदास बंद्योपाध्याय, माधोस्वरूप वत्स, हीरानंद शास्त्री, जोनाथन मार्क केनोयर, ग्रेगरी पोसेल, राहुल सांकृत्यायन, रामविलास शर्मा, बीबी लाल, बृजमोहन पांडे, नयनजोत लाहिड़ी, शीरीन रत्नाकर।

कुछ विद्वान सिंधु सभ्यता को वैदिक सभ्यता के हवालों से भी जांचते-मापते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सिंधी लिपि दो हजार साल पुरानी जुबान है। सिंधी के बावन अक्षर हैं। सिंधी भाषा की लिपि दायें से बायें से शुरू होती थी। 1872-73 में भारतीय पुरातत्‍व विभाग के पहले महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम के सर्वेक्षण के थोड़े ही समय बाद हड़प्पा में पहली ठप्पेदार मुहर बरामद हुई थी। तब से कोई तीन हजार चित्रलिखित अभिलेख सिंधु सभ्यता के विभिन्न शहरों की खुदाई में मिल चुके हैं। हड़प्पा शोध परियोजना के निदेशक रिचर्ड मीडो ने दावा किया कि हड़प्पा के मृद्भांडों पर साढ़े पांच हजार साल पुरानी इबारत मिलने के बाद सिंधु-लिपि दुनिया की सबसे पुरानी लिपि हो गयी है। अब तक मिस्र की लिपि सबसे पुरानी मानी जाती थी।

पुरातत्‍व और साहित्य सहज ही एक-दूसरे से मैत्री संबंध जोड़ सकते हैं। यह कृति इसका प्रमाण है। विवरण, जानकारियां, खोजों के रचनात्मक कथ्य के मुखड़े पुरातत्‍वी पाठ को शुरू से आखीर तक किसी उपन्यास की तरह बांधे रखते हैं।

सिंधुकाल के लोक द्वारा रचित हस्तशिल्प और कलात्मक टुकड़ों के नमूने भी मौजूद हैं। दिलचस्प है यह तथ्य भी कि राजतंत्र और धर्मतंत्र की ताकत का इजहार करने वाले महल, उपासना स्थल, मूर्तियां उपलब्ध नहीं हैं। न भव्य राजप्रासाद, न मंदिर और न महंतों की समाधियां। सिंधुघाटी सभ्यता के नगर संयोजन में प्रतिबिंबित होती जीवन-शैली से यह अंदाजा भी क्यों नहीं लगाया जा सकता कि उस सभ्यता-संस्कृति में बुना-पनपा सामाजिक, राजनीतिक ताना-बाना 'लोकतंत्र' का ही मूल स्वरूप रहा होगा। मुअनजोदड़ो नगर की संपूर्ण व्यवस्था और नागरिक के लिए उपलब्ध साझी सुविधाएं इसी जनतांत्रिक प्रणाली की ओर लक्ष्य करती हैं। स्तूपवाला चबूतरा खास सिरे पर स्थित है। इस हिस्से को 'गढ़' कहते हैं। अनुष्ठानिक कुंड और स्नानागार भी जो सिंधु घाटी सभ्यता के अद्वितीय वास्तु-कौशल को स्थापित करते हैं। इस पर अभी रहस्य की बहुत-सी परतें हैं जिन्हें पुरातत्‍वविदों को खोजना, सुलझाना बाकी है।

शुरू से अंत तक 'मुअनजोदड़ो' के पाठ में घुली पुरातत्‍व की खोजें और जिज्ञासाएं, उन पर लेखक की अपनी संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएं, इस कृति के सुथरे गद्य में विचित्र-सी साहित्यिक थिरकन पैदा करती हैं। मुअनजोदड़ो जैसे तथाकथित वीरान नगर को आखिर तक अपने संवाद से आबाद रखती हैं। मानो किसी रुकी हुई बस्ती को नई धड़कन देने के आसार बन रहे हों। खोजों तक पहुंचे अंदाजों की सुव्यवस्थित शृंखला में अगली-पिछली छवियां लगातार झिलमिलाती चलती हैं। प्रस्तुति की बुनत में खास तरह की सघनता गठित रहती है, जैसे चरखे के सूत पर सुच्चे पट की गुलकारी हवा में लहरा रही हो। मुअनजोदड़ो की मिट्टी की खुदाई में से निकली सोने की सुइयां इस लोक की गुनगुनी धूप में सुच्चे पट की बाग-फुलकारियां – यानी बेहद सघन गुलकारी – रंगीन टुकड़ियों से काढ़ती, भरती रही होंगी।

'मुअनजोदड़ो' काल में विलीन हो जाने वालों का नहीं – सलीके-सुभीते से जीने वालों का इतिहास है। जिसमें जितनी तौफीक है, वह उतना उसके पिछवाड़े पहुंचकर डुबकी मारे।

इस विशेष कृति का नैरेटिव एक साथ कड़क और लचकीला है और शैली अद्भुत!

हमने गहरे संतोष और सराहना से एक बार फिर 'मुअनजोदड़ो' का आवरण देखा और अलमारी में वापस रखने को हाथ बढ़ाया ही था कि उसकी जिल्द में कुछ सरसराया। किसी ने तगड़ी हांक दी थी: घणी खम्मा थानवी महाराज! बिना चूनर-घाघरे वाली उस नचनिया की इतनी बड़ाई और इस भरपूर ठसियोड़ी चालवाले वजूद की ओर उस्तादों ने आंख तक न उठायी!

(कृष्‍णा सोबती। अपनी संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने हिंदी की कथा भाषा को विलक्षण ताजगी दी है। डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार तिन पहाड़, बादलों के घेरे, सूरजमुखी अंधेरे के, जिंदगीनामा, ऐ लड़की, दिलोदानिश, हम हशमत और समय सरगम चंद किताबों के नाम। साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता समेत कई राष्ट्रीय पुरस्कार।)

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