Friday, March 14, 2014

भाजपा की तो बल्ले बल्ले, बंगाल में भगवा वोटों की वजह से दर्जनभर सीटों में कुछ भी हो सकता है!

भाजपा की तो बल्ले बल्ले, बंगाल में भगवा वोटों की वजह से दर्जनभर सीटों में कुछ भी हो सकता है!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



चुनाव सर्वेक्षण में भले ही इसे नजरअंदाज कर दिया गया है और दूसरे राजनीतिक दल भले ही अपने अपने समीकरण से बल्ले बल्ले हैं,हकीकत यह है कि बंगाल में केशरिया लहर खूब है और कम से कम दर्जनभर सीटों में भगवा वोटों की वजह से कुछ भी हो सकता है।भाजपा ने हावड़ा, बारासात, वनगांव, बारुईुपुर , राणाघाट, हुगली, आसनसोल लोकसभा क्षेत्रों में अपनी ताकत बढ़ाई है और जीत के लिए मैदान में वजनदार उम्मीदवार उतारे हैं। हुगली से चंदन मित्र,आसनसोल से बाबुल सुप्रिय और बारासात से जादूगर पीसी सरकार बेहद दमदार उम्मीदवार हैं तो बारुईपुर में संघी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा दक्षिण 24 परगना में भी केशरिया लहराने के लिए लामबंद हैं। पहाड़ों में दार्जिलिंग,जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से भाजपा के हैरतअंगेज नतीजे निकालने के आसार हैं।तो दमदम और कृष्णनगर में भाजपाई जीत के अतीत से कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद है।दीदी का अंध वाम विरोध वामदलों का सफाया तो कर सकता है लेकिन वह बंगाल और बाकी देश में दरअसल संघ परिवार और भाजपा केहित में सबसे बेहतरीन मोका है।दीदी के वाम विरोध की वजह से तीसरा मोर्चा आकार ले ही नहीं पाया।बंगाल में साफ हो जाने के बाद वाम पक्ष का सही मायने में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप न बंगाल में संभव है और न बाकी देश में।इसी तरह वामदल भी दीदी का खेल गुड़ गोबर करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे।भाजपा की तो बल्ले बल्ले है।


दरअसल लोग यह भूल जाते हैं कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी और एनसी चटर्जी की अगुवाई में ही बंगाल में बजरिये हिंदुत्व राजनीति शुरु हुई।श्यामाप्रसाद बाबू तो भारतीय जनसंघ के संस्थापक हैं, इसी जनसंघ का आधुनिक कायाकल्प भाजपा है।1977 में जिस जनतादल ने बंगाल में लोकसभा चुनावों में कमाल किया थी ,उसके उम्मीदवार भी संघी ज्यादा थे। 1977 से संघ परिवार की विचारधारा और उसके कैडरआधारित संगठन को वामपंथियों का मुकाबला करना पड़ा।इस लंबी अवधि मेंं दार्जिलिंग में गोरखा समर्थन से लोकसभा चुनाव तो भाजपा ने जीता ही,माकपाइयों के गढ़ दमदम में भी तपनसिकदर दो दो बार जीते और बतौर दमदम के संसदीय प्रतिनिधि ममता बनर्जी के प्रबल प्रतिरोध के बावजूद केंद्र में मंत्री रहे।कृष्णनगर सीट भी वामजमाने में बाजपा ने माकपाइयों से छीनी है।


वाम के अवसान के बाद बंगाल में संघ परिवार गुपचुप बैहतरीन काम करता रहे है। वाम जनाधार,संगठन के ढह जाने का फायदा भाजपा को ही हुआ है,इसे सिरे से समझने की जरुरत है। परिवर्तन की जो मां माटी मानुष की सरकार बनी, उसके पास न विचारधारा है,न कार्यक्रम है, न संगठन है और न कैडर। फौरी तौर पर बढ़त अल्पसंख्यक वोट बैंक की वजह से दीदी को नजर आ रही है।लेकिन वामदलों के साथ जो स्थाई नाता अल्पसंख्यकों का रहा है,वैसा ही दीदी के साथ बना रहेगा,इसकी कोई गारंटी नहीं है। वामदलों ने भी बारह अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं,इससे चुनावी समीकरण में फेरबदल हो सकता है।गनीमत है कि अभी नजरुल इस्लाम और रज्जाक मोल्ला का दलित मुस्लिम संगठन मैदान में नहीं है,जो विधानसभा चुनावों में यकीनन होगा। भाजपा को उनके नेताओं की उम्मीदों के मुताबिक सात आठ सीटे लोकसभा चुनाव में न भी मिले तो भी भाजपा का मत प्रतिशत देश भर में चल रही नमो सुनामी की वजह से बीस फीसद तक पहुंच जाये तो कोई अचरज नहीं।


ममता बनर्जी को तीस से ज्यादा सीटों का दावेदार माना जा रहा है और समझा जा रहा है कि वामदलों को दहाई पार करने का मौका भी नही है जबकि कांग्रेस साइन बोर्ड में तब्दील है।कांग्रेस के फीसड्डी होने का सीधा लाभ भाजपा को ही मिलने जा रहा है क्योंकि कांग्रेस के मुकाबले बतौर राष्ट्रीय दल भाजपा ही मैदान में है।


फिर चतुर्मुखी चुनाव में पहले की तरह एकदम समांतर ध्रूवीकरण इसबार नहीं होने जा रहा है।भाजपा न पांच फीसद मतों तक सीमित रहेगी और न परंपरागत कांग्रेसी कांग्रेस उम्मीदवारों को वोट डालते रहने की आदत छोड़ेंगे।वोट बंटेंगे तो कुछ भी हो सकता है। दीदी की कामयाबी का राज कांग्रेस के साथ गठबंधन है।इस गठबंधन केटूटने का फायदा,माफ कीजिये वाम दलों के बजाय भाजपा को होना है।कांग्रेसियों के वोट मजबूत भाजपाई उम्मीदवारों को बहुत मजे मजे में स्थानांतरित हो सकता है।


जैसे उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा ने आपसी लड़ाई में कांग्रेस की विदाई के साथ भाजपा लहर की हालत पैदा कर दी है,वामदलों और तृणमूल की लड़ाई के मध्य कांग्रेस की विदाई बंगाल में संघ परिवार के लिए वरदान साबित हो सकता है। माकपा और वामदलों के प्रतिबद्ध वोट चालीस फीसद से किसी सूरत में कम होने को नहीं है तो तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन का संयुक्त मत कम से कम आधी सीटों पर हर हालत में घटना है। इस सूरत में सबसे ज्यादा फायदे में भाजपा है। बाकी दल इस हकीकत को नजरअंदाज करके और भाजपाई चुनावी शतरंज के खेल को समझने की कोशिश न करके मीडिया रपटों की रोशनी में जमीनी हकीकत से कट रहे हैं।


दीदी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का भी सीधा फायदा भाजपा को है। तृणमूल और कांग्रेस के वोटर स्वभाव से वामविरोधी हैं और अपने दल को वोट न देने की हालत में उनका स्वाभाविक विकल्प भाजपा है।ऐसे कट्टर वामविरोधी वोटर वामदलों को वोट करने से तो रहे।


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