शाहनवाज आलम
एक प्रोफेसर को ममता बैनर्जी के कार्टून वाले ई मेल को प्रसारित करने, दूसरे को एक गरीब बस्ती उजाडे जाने के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने के चलते जेल भेजने, सरकारी पुस्तकालयों से सरकार मुखालिफ अखबारों को प्रतिबंधित करने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा लोगों से न्यूज चैनलों के बजाये म्यूजिक चैनल देखने की अपील से समझा जा सकता है कि तृणमूल सरकार इस समय कितनी असुरक्षाबोध में जी रही है। जहां उसे किसी भी तरह की लोकतांत्रिक आलोचना तक गंवारा नहीं है। लेकिन सवाल है कि क्या ममता सरकार की यह असुरक्षाबोध दूसरे राज्य सरकारों की असुरक्षाबोध जैसा ही है या भिन्न है। क्योंकि अपनी आलोचना से तो हर सरकार डरती है।
दरअसल, तृणमूल सरकार, कई मायनों में अन्य राज्य सरकारों से अलग है। खास कर जिस तरह वह 35 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को हटा कर सत्ता में पहुंची है। इसलिए, ममता सरकार के इन लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों, कुंठाओं और असुरक्षाबोध को उसके वाम मोर्चा विरोधी 'पोरिर्बोतन' के नीतिगत एजेंडे से काट कर नहीं समझा जा सकता। जिसके चलते साल भर पूरा करने से पहले ही यह सरकार वह सब कुछ करने लगी है, जो अमूमन कोई मायावती-मुलायम या जयललिता-करूणानिधि सरकारें अपने शासन के अंतिम सालों में करती हैं। मसलन, राजनीतिक विरोधियों और मुखालिफ मीडिया का दमन।
दरअसल, ममता बैनर्जी के साथ सबसे बडी दिक्कत यह नहीं है कि वे बहुत 'विद्रोही' तुनक मिजाज या 'एकला चलो' की लाइन वाली हैं, जैसा कि अक्सर कहा जाता है। उनके साथ सबसे बडी दिक्कत यह है कि उनके पास वाम मोर्चा के समानांतर कोई वामपंथी आर्थिक विकास का माॅडल नहीं है। जिसके वायदे पर उन्हें बंगाल की जनता ने सत्ता में भेजा था। दरअसल, जो लोग मौजूदा घटनाक्रम के लिये उनके अति महत्वाकांक्षी और विद्रोही होने के तर्क दे रहे हैं, वे पूरे मामले को गैरराजनीतिक और व्यक्तिवादी बनाना चाहते हैं। जबकि उन्हें यह याद रखना चाहिये कि पूरे चुनाव अभियान के दौरान ममता बंगाल की जनता को यही विश्वास दिलाती रहीं कि वे वाम मोर्चा से ज्यादा माक्र्स और लेनिन के सिद्धांतो पर चलती हैं। माकपा नकली वामपंथी है-टीएमसी असली वामपंथी है। वहीं 60 से ज्यादा सीटें उन्हें माओवादीयों के समर्थन से मिली थीं। जिनके साथ उन्होंने रैलियां तक कीं। ऐसे में आज अगर तृणमूल सरकार जनता और बुद्धिजीवियों के निशाने पर है तो इसका सीधा-सपाट मतलब यही है लोग अब उसके वामपंथी नारों और जनपक्षधरता के दावों की हकीकत को समझने लगे हैं।
दरअसल, ममता जिस 'पोरिर्बोतन' के नारे पर सवार हो कर रायर्टस बिल्डिंग पहुंची थीं उसका खोखलापन उसी वक्त उजागर हो गया था जब काॅर्पोरेट लॅाबियों से खुले तौर पर जुडे लोगों को उन्होंने मंत्री पद से नवाजा और मीडिया के सामने यह घोषित कर दिया कि 'हडताल और आंदोलन' अब बंगाल के पुराने इतिहास का हिस्सा हो गये हंै। यानी उन्होंने सत्ता में आते ही एक तरह से साफ कर दिया था कि वे वैसा कुछ भी नहीं करने जा रही हैं जैसा उन्होंने चुनाव के दौरान कहा था। आज अगर महाश्वेता देवी, राजनीतिक बंदी मुक्ति संगठन के खोखॅन दास या ममता के मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद से तृणमूल सांसद कबीर सुमन ममता पर बंगाल की जनता को 'पोरिर्बोतन' के नाम पर धोखा देने का आरोप लगाते हुये सडकों पर हैं तो यह अकारण नहीं है। इसके ठोस वैचारिक और भावनात्मक आधार हैं।
बहरहाल, ममता के सामने सबसे बडी दिक्कत यह है कि वे उन नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को, जिनकी वे मूल रूप से समर्थक हैं, बंगाल में खुल कर लागू भी नहीं कर सकतीं। क्योंकि अव्वल तो उन्हें जनादेश ही इन नीतियों के खिलाफ मिला है। और दूसरे, सांगठनिक तौर पर वाम मोर्चा अभी भी तृणमूल से कहीं ज्यादा मजबूत है। जिसकी तस्दीक पिछले दिनों कोलकाता में हुयी माकपा की रैली में उमडी जबरदस्त भीड से हो जाती है। यानी, ममता के सामने न तो कुछ कर सकने का विकल्प है और ना ही चुप बैठने का। क्योंकि जहां पहली स्थिति में बुद्धिजीवी वर्ग और आम जनता उसके खिलाफ चली जाएगी, जैसा कि हो भी रहा है, जिसने उसके पक्ष में माहौल बनाया था। तो वहीं कुछ न करने की स्थिति में वाम मोर्चा बढत बना लेगा।
ऐसी स्थिति में किसी भी सरकार में खास तौर पर अगर वहां आंतरिक लोकतंत्र न हो या पार्टी का मतलब सिर्फ एक व्यक्ति हो तो, दो तरह की अलोकतांत्रिक प्रवृत्तियां विकसित होनी लाजमी हैं। पहला, राजनीतिक आलोचना को बिल्कुल बर्दाश्त न करना। और दूसरा, अपनी छवि को लेकर आक्रामक हद तक अतिसंवेदनशील हो जाना। जैसा कि उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु की सत्ता-राजनीति में देखा जा सकता है।
दरअसल, अगर ममता बैनर्जी भरी सभा में मीडिया के एक हिस्से को सरकार विरोधी बताते हुये उसके बायॅकाट की अपील करती हैं और दूसरी तरफ अमरीकी पत्रिका 'टाईम्स' जो हर महीने दुनिया के सौ ताकतवर लोगों की गिनती गिनाता है, की सूचि में अपने नाम के उल्लेख को अपनी लोकप्रीयता का पैमाना बताती हैं तो समझा जा सकता है कि अब वे अपने ही दिये नारे 'मां-माटी-मानुष' के शोर से भागने लगी हैं। सत्ता की राजनीति में जिसका मतलब किसी भी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो जाना होता है।
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Sunday, May 6, 2012
ममता और ‘पोरिर्बोतन’ की सीमाएं
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