| Tuesday, 15 May 2012 11:35 |
कुमार प्रशांत शरद पवार ने अपनी राजनीतिक अनुकूलता भांप कर कहा है कि अगला राष्ट्रपति गैर-राजनीतिक व्यक्तिहोना चाहिए तो मुलायम सिंह यादव ने अपनी संभावना जिंदा रखने की गरज से कहा कि अगला राष्ट्रपति सक्रिय राजनीतिक व्यक्तिही होना चाहिए। ममता बनर्जी, मायावती आदि की दिलचस्पी इसमें नहीं है कि राष्ट्रपति कौन बनता है, बल्कि इसमें है कि किसके बनने की प्रक्रिया में शरीक होकर वे ज्यादा से ज्यादा लाभ उठा सकती हैं। और फिर भारतीय जनता पार्टी है जिसके पास राष्ट्रपति बनने की योग्यता वाले कई नाम हैं, लेकिन उनमें एक भी ऐसा नहीं है कि जिसका नाम भी लेना कोई दूसरा चाहेगा। इसलिए वह भी दूसरों के पत्ते का इंतजार कर रही है। और संघ परिवार की जगजाहिर रणनीति के मुताबिक कई मुंह से, कई बातें हवा में छोड़ रही हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि इस वक्तहमें किसी स्वयंभू राष्ट्रपति की जरूरत है। पर हमें संविधान से मिली मर्यादा के भीतर अपनी जगह और भूमिका तलाशने वाला राष्ट्रपति चाहिए। न्यायपालिका में भी और चुनाव आयोग में भी हमें ऐसी ही भूमिका निभाने वाले आदमियों की जरूरत है। यह तिकड़ी अगर सही बैठ गई तो हम संसदीय लोकतंत्र की गाड़ी को वापस पटरी पर ला पाएंगे। राष्ट्रपति न्यायपालिका से बंधा होगा, चुनाव आयोग संविधान से बंधा होगा और न्यायपालिका संविधान की आत्मा को शब्द देने की अपनी जिम्मेवारी से बंधी होगी। सारी नजाकत इसमें ही है कि आप संविधान की आत्मा को किस तरह समझते और उसे क्या और कैसे शब्द देते हैं। एक पार्टी के खुदमुख्तार नेता और संसद में लंबी पारी खेल रहे सांसद ने अभी मुझसे पूरी गंभीरता से कहा कि चुनाव का एक ही आधार होता है- जाति! जाति छोड़ कर चुनाव न तो लड़ा जा सकता है और न जीता जा सकता है! और आप बताइए कि संविधान में कहां लिखा है कि जाति के आधार पर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए? जाति गैर-संवैधानिक नहीं है भाई! मैं सोचता ही रह गया कि इस भाई को संविधान पढ़ना कैसे सिखाया जाए और कैसे यह अहसास भी जगाया जाए कि संविधान में सब कुछ शब्दों में नहीं लिखा है, कुछ तो उसकी दिशा भी है न! उसे समझ कर, उसे शब्द देना ही सही राजनेता का काम है- अगर वह राजनेता है। जब वह ऐसा करना छोड़ देता है या जब ऐसा करने का बौद्धिक सामर्थ्य या ईमानदारी उसमें नहीं होती तब न्यायपालिका को आगे बढ़ कर सूत्र संभालना पड़ता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि पटरी से उतर गई संसद से हमारी दुश्मनी नहीं है और न उसके प्रति हमारे मन में कोई खटका है। हमारी कोशिश तो उसे फिर से पोंछ-पांछ कर, पटरी पर खड़ा करने की ही है ताकि वह गाड़ी के साथ तालमेल बिठा कर दौड़ सके। वह दौड़ेगी तभी उसका विकास भी होगा। अभी वह हमारे समाज की सबसे गर्हित शक्तियों से गठजोड़ बिठा कर सांस ले रही है, क्योंकि वह दौड़ नहीं रही है। दौड़ने में जीवन भी है और दिशा खोजने की जरूरत भी तभी पड़ती है जब आप दौड़ते हैं। ऐसे किसी भी प्रसंग में आधारभूत बातों का जिक्र कर देना काफी माना जाता है। नाम देने की जरूरत नहीं समझी जाती है। लेकिन मुझे लगता है कि आज परिस्थिति की मांग है कि हम इस परिपाटी को छोड़ें और नाम के साथ आगे आएं। परिपाटी यह भी है कि आप जिसका नाम आगे करें, पहले उससे स्वीकृति ले लें ताकि वह भी और आप भी शर्मिंदा न हों। लेकिन मुझे लगता है कि ऐसी औपचारिकताओं के निर्वाह का भी एक वक्तहोता है। अभी तो वक्त है कि आप अपना सिर आगे करें तो हम कांटों से भरा यह ठीकरा आपके सिर पर फोड़ें। इसलिए इस बार, इस घड़ी में राष्ट्रपति बनने की योग्यता रखने वाला एक नाम मैं सुझाता हूं- ब्रह्मदेव शर्मा। अभी-अभी सुकमा के कलेक्टर को नक्सलियों के अपहरण से वापस लाने वाले बीडी शर्मा गहरे अनुभव वाले, भारत सरकार के उच्च प्रशासनिक अधिकारी रह चुके हैं। उनकी कुशलता और ईमानदारी के बारे में कोई विपरीत टिप्पणी की ही नहीं जा सकती- उनके तरीकों से असहमति-सहमति की बात दूसरी है। वे भारतीय समाज के सबसे कमजोर, उपेक्षित और शोषित वर्ग के साथ एकाकार होकर अरसे से देश में काम कर रहे हैं। वे किसी राजनीतिक दल से जुडेÞ, बंधे नहीं हैं। सामाजिक न्याय और आर्थिक समता से अलग किसी दूसरे राजनीतिक दर्शन के वे हामी नहीं हैं। उनकी विद्वत्ता कई दूसरे तरह के विद्वानों से भारी पड़ती है। राष्ट्रप्रमुख की परिपक्वता भी उनमें है और बाजवक्त राज्यप्रमुख की भूमिका निभाने का साहस भी। वे भारतीय संविधान के अच्छे जानकार ही नहीं हैं, उसे सही शब्द देने की गहरी कुशलता भी उनमें है। हमारे लोकतंत्र की इस नाजुक घड़ी में वे हमारे सबसे अच्छे मार्गदर्शक कप्तान हो सकते हैं- बशर्ते कि हम उनसे यह अनुरोध करें और वे हमारा अनुरोध स्वीकार करें। हमारी दलीय राजनीति में कितनी दूरदृष्टि बची है और कितना लचीलापन शेष है, इसकी कसौटी भी हो जाएगी, अगर बीडी शर्मा का नाम हमारा कोई प्रमुख राजनीतिक दल आगे करता है। |
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अगले राष्ट्रपति की तलाश में
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