Monday, May 7, 2012

हमने यह कैसा समाज रच डाला है? #SatyamevJayate

http://mohallalive.com/2012/05/07/pros-and-cons-on-satyamev-jayate/

हमने यह कैसा समाज रच डाला है? #SatyamevJayate

7 MAY 2012 11 COMMENTS

क्‍या सत्‍यमेव जयते भारतीय टेलीविजन का चेहरा बदल पाएगा?

अरसा बाद एक टीवी शो आया है, जो बड़े पैमाने पर देश के सजग नागरिकों का ध्‍यान अपनी ओर खींच रहा है। इसकी एक वजह ये है कि पिछले कई सालों से भारतीय टेलीविजन यह तय नहीं कर पा रहा था कि उसको सरोकारों पर बात करने के साथ आगे बढ़ना है या महज मनोरंजन ही उसकी प्रगति का अंतिम हथियार है। एक कद्दावर अभिनेता की पहल ने संवेदनशील ढंग से इस मसले को सुलझाया है कि आप अपने जीवनयापन और मनोरंजन के लिए कुछ भी करें, समाज के स्‍याह कोनों की अनदेखी आप नहीं कर सकते। ऐसा करते हैं, तो आने वाले वक्‍त में भी कोई कवि वीरेन डंगवाल कागज के पन्‍नों पर अफसोस करेगा कि पर हमने यह कैसा समाज रच डाला है, इसमें जो दमक रहा शर्तिया काला है। हालांकि आमिर के इस शो पर भी उनके कुछ कॉरपोरेट कारनामों के बादल मंडरा रहे हैं, जिसे कुछ लोग इस शो को लेकर अपनी असहमति का आधार बना रहे हैं। हम हर तरह की राय को समेटने की कोशिश कर रहे हैं, अपने इस पक्ष के साथ, कि इस तरह के शो भारतीय टेलीविजन का चेहरा बदल सकते हैं।

अविनाश


कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना

♦ अजीत अंजुम

चित भी मेरी, पट भी भी मेरी। जो लोग टीआरपी के तथाकथित पैमाने को खारिज करते हैं, वही लोग किसी टीवी शो के हिट या फ्लॉप होने का पैमाना उसी रेटिंग को मान लेते हैं। दस हजार घरों में लगे डब्बे के आधार पर अगर ये तय भी हो जाए कि सत्यमेव जयते या ऐसा कोई कार्यक्रम फ्लॉप हो गया, तो क्या आप इसे फ्लॉप मान लेंगे और कहेंगे कि देखो – मैंने तो पहले ही कहा था। अगर किसी घटिया शो या घटिया कंटेंट के हिट होने पर आप टीआरपी सिस्टम को कोसते हैं, तो फिर किसी शो के पिटने पर उसी सिस्टम को कैसे सही मान लेते हैं? ये तो अपनी सुविधा के हिसाब से कुतर्क है। फेसबुक पर कई भाई लोग फतवा दे चुके हैं कि ये शो बुरी तरह पिटेगा। देखना टीआरपी नहीं आएगी। दर्शक इसे रिजेक्ट कर देगा। मेरा सवाल ऐसे लोगों से है कि ये देखने-सुनने-कहने और एलान करने से पहले क्या आपने कोई जनमत संग्रह किया है या फिर आप उसी टीआरपी को अपने तथाकथित पुर्वानुमान का पैमाना मान लेंगे? मैं तो कह ही नहीं रहा हूं कि ये शो हिट होगा या फ्लॉप होगा। मैं तो सिर्फ इतना कह रहा हूं कि ऐसे शो बनने चाहिए और चलने भी चाहिए, ताकि ऐसे शो बनते रहें।

अभी पहला एपोसोड है। कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों को उठाया गया है। कल को ऐसे और मुद्दे उठेंगे। हमारे-आपके भीतर रचे-बसे विलेन अपनों के बीच शर्मिंदा होंगे या फिर नजरें चुराएंगे। ये क्या कम होगा? हां, अगर दूसरे, तीसरे या चौथे एपिसोड के बाद ये शो बेदम और बेकार नजर आएगा तो हम उस पर भी बात करेंगे। लेकिन उससे पहले ये फतवा जारी नहीं कीजिए ये शो नहीं चलेगा। जब आप नहीं चलेगा कहते हैं तो अपनी बातों की तस्दीक के लिए उन्ही दस हजार डब्बों से निकलने वाले नतीजे पर आश्रित हो जाते हैं, जिसे आप खारिज करते आये हैं। भई, यहां कोई फिल्म वाला सिस्टम तो है नहीं कि बॉक्स ऑफिस पर टिकट बिक्री के आधार पर हिट या फ्लॉप माना जाए? और जाहिर है मनोरंजन और मौज मस्ती के लिए टीवी देखने की मानसिकता के बीच अगर गंभीर मुद्दों वाला कोई शो आएगा, तो उसकी कामयाबी का रास्ता संकरा तो होगा ही।

यहां तो लग रहा है कि लोग फिल्मफेयर या स्टारडस्ट खरीदने गये थे, उन्हें पकड़ा दिया गया डाउन टू अर्थ या ओपन या सेमिनार। अब वो अलबला रहे हैं कि अरे इसमें तो मजा ही नहीं आया! तो भाई, मजा लेना है तो डांस इंडिया या कोई भी जलवा फरोश शो देखो न! रही शो के रिसर्च और प्रजेंटेशन की बात, तो उसमें काफी कुछ करने की गुंजाइश है। कुछ लोग कह रहे हैं कि ऐसी कहानियां हमने देखी सुनी है, लेकिन मैंने खुद नहीं देखी थी, तो कैसे मान लूं कि जो आपने देखी है, वो मेरा भी देखा हुआ हो? वैसे भी स्टार प्लस और डीडी का इतना बड़ा दर्शक वर्ग है, जिसके मुकाबले सारे न्यूज चैनल को भी मिला दें, तो कहीं नहीं ठहरता।

मैं तो कामना करता हूं कि सत्यमेव जयते देश भर में देखा जाए (अगर इसी तरह मुद्दे उठते रहे और शो भटके नहीं तो)। आमिर जैसे कलाकार और स्टार प्लस और डीडी जैसे चैनल की पहुंच का नतीजा ये तो होगा ही कि इसे देखा जाएगा। इसी बहाने सही न्यूज चैनलों पर भी बहस होगी, बात होगी। हो भी रही है। कुछ न कुछ असर तो होगा। एक पत्रकार साथी ने टिप्‍पणी कि कि आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे इस शो से क्रांति हो जाएगी। भाई, मैं कहां कह रहा हूं कि क्रांति हो जाएगी। क्रांति तो सदियों में एकाध बार ही होती है। जिन्होंने समझा था कि अन्ना से क्रांति हो जाएगी, उन्हें भी धोखा हुआ है (इसमें हम और आप शामिल हैं) … मैं ये मानने को तैयार नहीं हूं कि ऐसे शोज से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लाख में से सौ पर भी फर्क पड़ा, तो उसे मैं कामयाबी मानता हूं। ऐसी मिसालों की कमी नहीं है, जब छोटी-छोटी कोशिशें कामयाब हुई हैं, छोटे स्तर पर ही सही।

आप एक बात बताइए … इस शो पर अगर इतनी बात हो रही है तो कम है क्या? शाहरुख खान ने इमेजिन पर दो कौड़ी का शो किया, क्या किसी ने चर्चा की? सलमान ने दस का दम किया, लोगों को मजा आया लेकिन क्या उस पर बहस हुई या वाद -विवाद की कोई गुंजाइश भी थी? केबीसी को करोड़ों ने देखा। अमिताभ ने अरबों कमाया लेकिन क्या उससे कोई मुद्दा उठा? या उसने समाज के भीतरी सड़ांध को उघाड़ कर दिखाया? सपने जरूर दिखाये कि कैसे कोई गंवई आदमी करोड़पति बन गया। तमाम शोज की अपनी अहमियत है। एंटरटेनमेंट की भी है। लेकिन इस शो या ऐसे शो को पॉपुलर शोज के पैमाने पर नहीं कसा जाना चाहिए। बस, मैं यही कह रहा हूं। बार बार और हजार बार कहूंगा।

मैं भी कल से आज तक इसी शो के इंपेक्ट पर बात कर रहा हूं। कितने ऐसे शोज होते हैं, जिन्हें देखने के बाद लोग सोचने को मजबूर हो जाएं? बहस करें, बात करें? जिन घरों में, समाज में बेटियों को कोख में ही मार देने की मानसिकता वाले लोग रहते हैं, क्या वो खुद को जलील होते नहीं महसूस कर रहे होंगे? क्या वो अपनों के बीच अपने को बेनकाब होते नहीं देख रहे होंगे? ऐसा नहीं है कि चोर नहीं जानता कि वो चोरी कर रहा है … लेकिन उसे पकड़े जाने या रुसवा होने का डर पक्के तौर पर हो जाए तो कुछ चोर रास्ता जरूर बदल लेंगे। ऐसे चोरों के लिए डर का आईना बने सत्यमेव जयते। [ Facebook ]

मोहल्‍ला लाइव की पोस्‍ट
ओ री चिड़ैया, नन्‍हीं सी चिड़िया… अंगना में फिर आ जा रे!
पर टिप्‍पणी | प्रतिटिप्‍पणी
♦ संदीप पांडे

रसे बाद आज टेलीविजन पर कोई शो पूरा देखा बिना चैनल बदले। लेकिन कुल मिलाकर बहुत अलग नहीं लगा यह शो। ऐसे न जाने कितने शो टेलीविजन पर कब से चल रहे हैं। हां, यह जरूर है कि आमिर खान की मौजूदगी और दूरदर्शन पर प्रसारण इसे बड़े दर्शक वर्ग से जोड़ेगा, जिसके अपने फायदे हैं। शो की बात करें तो कुछ मिसिंग लगा। हो सकता है अपनी उम्मीद ही कुछ ज्यादा हो। इसकी तुलना में आईबीएन 7 पर जिंदगी लाइव में ऋचा अनिरुद्ध दर्शकों से ज्यादा आसानी से कार्यक्रम से खुद को जोड़ पाती हैं। शायद वह सेलिब्रिटी नहीं हैं, इसलिए भी वह हममें से एक नजर आती हैं। एक एपिसोड को अगर जल्दबाजी न माना जाए, तो मुझे यह जिंदगी लाइव से कमतर लगा। पेड न्यूज के इस दौर में मुझे अब एंटरटेनर्स के साथ-साथ किसी के भी रोने पर तो यकीन ही नहीं आता। और हां, सत्य की जय की कीमत पता है आपको? इस कार्यक्रम से 'जुड़ने' के आमिर को प्रति एपिसोड तीन करोड़ रुपये भी मिल रहे हैं। भारतीय टेलीविजन के इतिहास में अब तक किसी प्रस्तोता को इतनी रकम नहीं मिली, न अमिताभ, न शाहरुख, न ही और किसी और को। इस कार्यक्रम का एक प्रायोजक कोका-कोला भी है। आमिर कोका-कोला के ब्रांड दूत रहे हैं। जहर बेचने के अलावा कोका कोला ने अपने बॉटलिंग प्लांट वाले इलाकों में जमीन की क्या हालत कर दी है, यह बात किसी से भी छिपी नहीं है।

♦ शशिभूषण

संदीप, संवेदना का कोई मोल नहीं होता। अगर कहानी कहने की संवेदनहीनता में जाएं तो भी सत्य हरिश्चंद्र वह नाटक था, जिसने न जाने कितने महापुरुषों को महापुरुष बनाया। और तुम जिस अमिताभ और शाहरुख खान से तुलना कर रहे हो उनमें से एक सट्टा शो के संचालक हैं, दूसरे स्त्रियों के भेष में अश्लील मनोरंजन के प्रस्तोता। आमिर खान ने जिस खूबसूरती से कार्यक्रम को प्रस्तुत किया, वह व्यावसायिक अर्थों में भी अमिताभ से आगे की बात है। उनकी समझ का दावा बाबूजी की साहित्यिक विरासत का है, पर आज आमिर की जो भाषा हमने सुनी वह अमिताभ से खूब और दिल में उतरने वाली थी। बाकी क्या कहें? प्रायोजकों, विज्ञापनदाताओं की गिरफ्त में भी यह जरूरी अपील तो थी ही। ऐसा भी नहीं है कि पहले नहीं कही गयी चीजें।

♦ संदीप पाण्डेय

शिभूषण, आमिर खान की सरोकारी टाइमिंग ही उनको संदेह के घेरे में ला देती है। फिर चाहे बात रंग दे बसंती के समय नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ने की हो या ऐसे ही अनेक अन्य मौकों की जिनमें भोपाल और अन्ना का आंदोलन भी शामिल है। इस कड़ी का ताजा नमूना है बनारस के अपने 'दोस्त' रिक्शेवाले के बेटे की शादी में शिरकत। रही बात तुलना की तो आमिर खुद को केवल और केवल एक एंटरटेनर कहते हैं तो फिर एक एंटरटेनर की तुलना दूसरे से क्यों न हो भला? अगर आमिर इतने अधिक संवेदशनील हैं (हालांकि वो इतने अच्छे अभिनेता होने के बावजूद रिचा अनिरुद्ध की तुलना में 10 फीसदी भी नहीं दिखे) तो उनको यह शो करते हुए कम से कम अपनी एंटरटेनर वाली फीस में तो थोड़ा समझौता करना चाहिए था। उनके पास ऐसी नजीर पेश करने के बहुत सारे मौके हैं लेकिन उनके पास अपनी मर्जी से सामाजिक कार्यकर्ता और एंटरटेनर की चादर बदलने की वह सुविधा है, जो ढेर सारे अन्य सरोकारी लोगों के पास नहीं है।


अब बुद्धिजीवी ही मशहूर आदमी के लिए गाइडलाइन तय करें

♦ गौरव सोलंकी

कोई स्टार सामाजिक मुद्दों पर न बोले तो स्वार्थी, लालची, गैरजिम्मेदार और अपने समाज से कटा हुआ। बोले तो वह इमेज बनाने के लिए ऐसा कर रहा है, कार्यक्रम में कंपनियों के विज्ञापन क्यों आते हैं, वह रो क्यों रहा है।

अब देश के बुद्धिजीवी राह सुझाएं कि किसी मशहूर आदमी को क्या कहना चाहिए और क्या नहीं, कब रोना चाहिए और कब हंसना चाहिए, ताकि आप उसके काम को 'गंभीर' मानने को तैयार हो जाएं।

और आप कोई समांतर व्यवस्था विकसित कीजिए न प्रसारण और पहुंच की। या कम से कम एक पत्रिका के छपने और बिकने लायक पैसा ही लाकर दीजिए। नहीं आएंगे विज्ञापन भी। [ Facebook ]

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