Sunday, April 21, 2013

See the enthusiasm of the Delhi Police in beating up unarmed women protesting peacefully.


Like This Page · December 24, 2012 

See the enthusiasm of the Delhi Police in beating up unarmed women protesting peacefully.

Women , Old people & Students beaten up and are lying injured and bleeding in the cold.

We Demand Resignation Of The Delhi Police Commissioner and the Home Minister. 

pstr ctrsy proude to be an INDIAN













अफ्स्पा के उन्मूलन के लिए आंदोलन नहीं चलाता , तो रेप का प्रतिरोध एक वक्ती भावुकता से ज़्यादा और क्या है ?

सन २००४ की ग्यारह जुलाई को मणिपुर की मनोरमा देवी को आसाम रायफल्स के सिपाहियों उन के घर से उठाया था . बाद में उनकी क्षत -विक्षत लाश मिली . उसकी योनि पर भी गोलियों के घाव मौजूद थे . फोरेंसिक जांच से साबित हुआ कि हत्या के पहले उनके साथ क्रूरतापूर्वक बलात्कार किया गया था . इस बर्बर बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की १२ साहसी स्त्रियों ने आसाम रायफल्स के मुख्यालय पर पूरी तरह निर्वस्त्र हो कर प्रदर्शन किये .उनके पास बैनर थे , जिस पर लिखा था - इन्डियन आर्मी , रेप अस. जांच के लिए सरकार द्वारा बनाए गए जस्टिस उपेन्द्र आयोग ने सुरक्षा बलों को दोषी पाया . ये जानकारी उन्होंने खुद मीडिया को दी. लेकिन मुसलसल विरोध के बावजूद सरकार ने आयोग की रिपोर्ट दबा रखी है . दोषी सिपाहियोंके खिलाफ आज तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुयी है, क्योंकि उनके पास अफ्स्पा का ब्रह्म- कवच मौजूद है . अगर देश 
अफ्स्पा के उन्मूलन के लिए आंदोलन नहीं चलाता , तो रेप का प्रतिरोध एक वक्ती भावुकता से ज़्यादा और क्या है ?
सन २००४ की ग्यारह जुलाई को मणिपुर की मनोरमा देवी को आसाम रायफल्स के सिपाहियों उन के घर से उठाया था . बाद में उनकी क्षत -विक्षत लाश मिली . उसकी योनि पर भी गोलियों के घाव  मौजूद  थे . फोरेंसिक जांच से साबित हुआ कि हत्या के पहले उनके साथ क्रूरतापूर्वक बलात्कार किया गया था . इस बर्बर बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की १२ साहसी स्त्रियों ने आसाम रायफल्स के मुख्यालय पर पूरी तरह निर्वस्त्र हो कर प्रदर्शन किये .उनके पास बैनर थे , जिस पर लिखा था - इन्डियन आर्मी , रेप अस. जांच के लिए सरकार द्वारा बनाए गए जस्टिस उपेन्द्र आयोग ने सुरक्षा बलों को दोषी पाया . ये जानकारी उन्होंने खुद मीडिया को दी. लेकिन मुसलसल विरोध के बावजूद सरकार ने आयोग की  रिपोर्ट दबा रखी है . दोषी सिपाहियोंके खिलाफ आज तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुयी है, क्योंकि  उनके पास अफ्स्पा का ब्रह्म- कवच मौजूद है . अगर देश   अफ्स्पा के उन्मूलन के लिए आंदोलन नहीं चलाता , तो रेप का प्रतिरोध एक वक्ती भावुकता से ज़्यादा और  क्या है ?
Unlike ·  ·  · 9 hours ago · 

 
palashcbiswas,
 gostokanan, sodepur, kolkata-700110 phone:033-25659551

दिल्‍ली में पांच साल की बच्‍ची के साथ घिनौने बलात्कार की घटना के बाद स्‍त्री मुक्ति लीग ने लखनऊ और अन्‍य शहरों में एक सप्‍ताह के सघन अभियान की शुरुआत की है।


कल की विभिन्‍न सभाओं में वक्‍ताओं ने कहा कि अभी चार महीने भी नहीं हुए जब दिल्ली में दरिन्दों की शिकार हुई हमारी एक बहादुर बहन ज़िन्दगी की लड़ाई हार गयी थी। मगर लगता है जैसे उसकी शहादत भी बेकार चली गयी। स्त्री-विरोधी बर्बर अपराध लगातार इस तरह बढ़ते जा रहे हैं जैसे समाज के सड़े-गले शरीर से जगह-जगह कोढ़ फूट पड़ा हो! हमें सोचना ही होगा कि दिल्ली में 16 दिसम्बर की घटना के बाद पूरे देश में उठी ग़ुस्से और शर्म की लहर के बावजूद बलात्कार, गैंगरेप और घिनौनी छेड़खानी की घटनाएँ बदस्तूर क्यों जारी हैं। उत्तर प्रदेश में अखबारों के पन्‍ने सामूहिक बलात्‍कार की ख़बरों से रंगे हुए हैं। रिपोर्ट लिखाने गई बच्चियों को कहीं पुलिस पीटती है तो कहीं हवालात में डाल दिया जाता है। 
इसलिए बलात्कारियों को सख़्त से सख़्त सज़ा दिलाने और पीड़ितों को इंसाफ़ के लिए सड़कों पर उतरने के साथ ही हमें इस सवाल पर भी सोचना ही होगा कि स्त्रिायों और बच्चियों पर बर्बर हमलों और बलात्कार की घटनाएँ इस क़दर क्यों बढ़ती जा रही हैं और इनके लिए कौन-सी ताक़तें ज़िम्मेदार हैं! हमें सोचना ही होगा कि क्या बलात्कार या फिर कोई भी स्त्री-विरोधी अपराध महज़ कानून-व्यवस्था या सुरक्षा का मसला है? पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भी साबित किया है कि सख़्त क़ानून बनाने और कुछ प्रशासनिक कदम उठाने जैसी पैबन्दसाज़ियों से समस्या हल नहीं होने वाली। इन तात्कालिक माँगों के साथ ही हमें उस पूरे सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक ढाँचे को ही उखाड़ फेंकने की लम्बी लड़ाई शुरू करनी होगी, जिसमें इंसान को भी एक माल बना दिया गया है, और औरत को महज़ जिस्म में तब्दील कर दिया गया है जिसे कोई भी नोच-खसोट सकता है!
वक्‍ताओं ने कहा कि आज सिर्फ़ अपना गुस्सा, अपनी नफ़रत और अपनी भड़ास निकाल लेने से कुछ नहीं होगा। यह सिलसिला यहीं रुक नहीं जाना चाहिए। हमें इसे एक शुरुआत बनाना होगा! स्त्री की ग़ुलामी के सभी रूपों, स्त्री उत्पीड़न के सभी रूपों के ख़िलाफ़ और उन्हें पैदा करने वाले सामाजिक ढाँचे को तोड़ डालने के लिए अपने संघर्ष को हमें संगठित करना होगा।
http://www.scribd.com/doc/137266649/Campaign-Leaflet-by-Stree-Mukti-League-on-Delhi-Child-Rape-Case


Like ·  ·  · 7 minutes ago · 

लटक गया चार पालिकाओं का चुनाव

लटक गया चार पालिकाओं का चुनाव


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​

​हाबड़ा,डालखोला,दुबराजपुर , बालुरघाट और गुसकरा नगरपालिकाओं के वार्डों के पुनर्विन्यास की सूचना चुनाव आयोग को दी थी राज्य ​​सरकार ने।लेकिन  गुसकरा को छोड़कर बाकी चार पालिकाओं में पुनर्विन्यास का काम अधूरा है।इन पालिकाओं का कार्यकाल पूरा होने को है। लेकिन अधूरे पुनर्विन्यास की वजह से चारों पालिकाओं में चुनाव असंभव है। पहले से ही पंचायत चुनाव का मामला राज्य सरकार की ओर से दो दो बार अधिसूचना जारी होने के बावजूद कितने चरणों में चुनाव हो और मतदान के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बल की तैनाती के मुद्दे पर अदालती​​ विवाद में फंस गया है। पंचायतों और पालिकाओं के उपचुनाव भी नहीं हो रहे हैं।जाहिर है कि इन स्थानीय निकायों का कार्यभार अब प्रशासनिक अधिकारिों के हवाले किये जाने की प्रबल संभावना है। जबकि केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने पहले से चेतावनी जारी कर दी है कि चुनाव समय पर नहीं हुए और निर्वाचित निकाय न हो तो सामाजिक योजनाओं के लिए केंद्र से मिलने वाला अनुदान नियमानुसार रोक दिया गाय। जाहिर है कि​​ यह समस्या अब आम आदमी के हित अहित से ज्यादा जुड़ा हुआ है। राजनीतिक समीकरण के बजाय प्रशासनिक गुत्थियों में उलझ गयी​​ है लोगों की किस्मत।इन पालिकाओं में इलाका पुनर्विन्यास के तहत सीटों का आरक्षण भी ने सिरे से तय होना है।


मालूम हो कि तीस जून तक राज्य की तेरह पालिकाओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है। लेकिन इन चार पालिकाओं में इलाका पुनरविन्यास में कम से कम छह महीने लगने हैं।


जीटीए को लेकर विवाद के नये आयाम खुलने लगे

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​  


जीटीए को लेकर विवाद के नये आयाम खुलने लगे हैं।गोरखा जन मुक्ति मोर्चा से राज्य सरकार के संबंध जीटीए समझौते के समय की तरह उतने मधुर नहीं हैं अब। यह तो सारे लोग समझते हैं। राज्य सरकार पिछले छह महीने से पूर्णकालिक जीटीए सचिव की नियुक्ति नहीं कर पायी है प्रशासनिक और​ ​ सरकारी तालमेल के अभाव में हालत यह है कि हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से बाकायदा पूछ ही लिया कि वह जीटीए सचिव की नियुक्ति कब​ ​ करेगी।समझौते के मुताबिक छह महीने में ही जीटीए के मुख्य सचिव की नियुक्ति होनी थी। पर राज्य सरकार ऐसा नहीं कर सकी। पहाड़ में खिली मुस्कान इस बीच लेकिन मुरझाने लगी है।दार्जिलिंग के जिलाधिकारी सौमित्र मोहन ही मुख्य सचिव का कामकाज तदर्थ रुप सेसंबाल रहे हैं, जिसपर विमल गुरुंग का मूड लगातार बिगड़ता जा रहा है। इससे नयी क्या उलझनें सुरु होंगी , इसका अंदाजा किसी को नहीं है।हालंकि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को सूचित किया है कि अगली सुनवाई के दरम्यान तीन नामों का पैनल वह अदालत में पेश कर देगी। इसपर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा क्या रुख अख्तियार करता है, देखना अभी बाकी है।


उद्योग जगत की उम्मीदें धूमिल​

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​

​​

​राज्य सरकार के कार्यकाल के  दो साल पूरे होने को है। वाम सासन के अवसान के दो दो साल बीत जाने के बवजूद राज्य में औद्योगिक और कारोबारी माहौल लेकिन बदला नहीं है। पहले लालझंडा लेकर यूनियनें तांडव मचाती थीं। अब झंडे और चेहरे बदल गये हैं, लेकिन तांडव का सिलसिला थमा नहीं है। इस सिलसिले में हल्दिया का उदाहरण सामने है। राज्य में राजनीतिक संरक्षण में प्रोमोटर सिंडिकेट के दबदबे के कारण कहीं भी निर्माण उन्हें पत्र पुष्पम के साथ सतुष्ट किये बिना असंभव है। इस पर तुर्रा यह कि राज्य सरकार ने अपनी उद्योग नीति को अभी अंतिम रुप नहीं दिया है। जमीन अधिग्रहण की हालत जस की तस है। जो जमीन अधिग्रहित है, उस पर भी नया उद्योग शुरु नहीं हो पा रहाहै। नया निवेश हो नही रहा है। जो पुराने निवेशक फंसे हुे हैं, वे भागने का रास्ता तलाश रहे हैं।इस पर तुर्रा यह कि चिटफंड मामले में सत्तादल के बड़े बड़े नाम हैं। इससे सरकार की विश्वसनीयता बाजार में नीलाम होती दिख रही है।न उद्योग मंत्री पार्थ चट्टोपाध्याय और न ही वित्तमंत्री अमित मित्र यह बताने की हालत में हैं कि कब ये हालात बदलेंगे। हालांकि दोनों सार्वजनिक तौर पर राज्य में कारोबार और निवेश का माहौल इंद्रधनुषी बताने में कोताही नहीं कर रहे हैं। पर उद्योग जगत को निवेशका रिट्न से मतलब है, ख्याली पुलाव खाने के लिए वे कतई कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। राज्य में राजनीतिक हिंसा और तनाव के माहौल से कारोबार के लिए कोई अनुकूल स्थिति नहीं बन पा रही है।


उद्योग नीति , भूमिनीति और भूमि बैंक के बारे में सरकारी वायदे और दावे  सुनते सुनते कान पक गये हैं। लोग अघा गये है। परिवर्तन से​​ खुश उद्योग जगत के लिए हात मलते रहने के सिवाय फिलहाल कोई चारा नहीं है।पार्थ चट्टोपाध्याय और सौगत राट क सार्वजनिक विवाद से भी उद्योग जगत हताश है। जब नीति निर्धारकों में ही सहमति नहीं बन पा रही ​

​है तो आकिर लाल फीताशाही से क्या कुछ उम्मीद पालें।


बेरोजगारी के आलम में बीएड प्रशिक्षण पर संकट के बादल, मदहोश शिक्षा महकमे के लोग।

बेरोजगारी के आलम में बीएड प्रशिक्षण पर संकट के बादल, मदहोश शिक्षा महकमे के लोग।


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


बंगाल में बेरोजगारी का आलम तो पिछले दिनों प्राथमिक शिक्षकों के ३५ सौ पदों के लिए अदालती विवादों के मध्य हुई परीक्षा में शामिल ४५ लाख युवाओं की दुर्गति से नंगा हो ही गया है। नई सरकार और परिवर्तन के साल पूरे होने चले। उद्योग कारोबार की कोई दशा नहीं बिनी। नीति निर्धारण में सरकारी विकलांगता का खामियाजा भुगत रहा है युवा भविष्य और वर्तमान। अब छिट फंड को लेकर मचे कोहराम से यह भी उजागर हो गया है कि कितने बड़े व्यापक परिमाण में फर्जी कंपनियों के लिए एजंट कर्मचारी होकर अपना सबकुछ दांव पर लगाया हुआ है। निश्चित नौकरी के लिए अब भी बीएड प्रशिक्षण की प्रासंगिकता बनी हुई है। तकनीकी पेशेवर प्रशिक्षण में लाखों खर्च करके दिवालिया होने वाले युवाओं को नौकरी के नाम पर अस्थाई चौबीसों घंटे का काम दो चार छह महीने या दो चार साल के लिए माहवार दो से दस हजार की दर पर मिलता है। पर बीएड प्रशिक्षण प्राप्त होने पर आजीवन स्थाई नौकरी की उम्मीद बनी रहती है। वर्षों से प्रशिक्षित नौकरी की कतार में खड़े हैं। हजारों शिक्षकों के पद खाली है। धीरे धीरे नियुक्तियां होती हैं। पर कम ही सही होती है और पक्के तौर पर होती है। यह क्षेत्र राज्य पर पसरे सुरसामुखी बेरोजगारी के आलम में शिक्षित युवाओं के लिए किसी मरुद्दान से कम नहीं है। पर हालत यह है कि उसकी हालत नाजुक है। बीएड प्रशिक्षण की पूरी व्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं और शिक्षा महकमे से जुड़े तमाम लोग होशोहवास में नहीं है।


उच्चशिक्षा सचिव विवेक कुमार हालांकि यह दावा करते नहीं भूलते कि राज्य के १८४ कालेजों और १७ डायट में बीएड प्रशिक्षण व्यवस्था का इंतजाम है। इसके अलावा राज्य के प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर अप्रशिक्षित साढ़े उनतीस हजार शिक्षक शिक्षिकाओं को दूरशिक्षा के माध्यम से इसी साल जुलाई महीने से ही प्रशिक्षित किया जा रहा है।लेकिन विवेक कुमार की ही स्वीकारोक्ति है कि जिलावार परिस्थिति एक सी नहीं है। हर जिले में यथेष्ट कालेज न होने के काऱम और किसी किसी जिले में जरुरत से ज्यादा  कालेज होने के कारण बीएच प्रशिक्षण के लिए युवाओं को कई कई जिलापार बाधादौड़ पार करनी होगी।विवेक जी को साफगोई के लिए धन्यवाद पर  हमने तो देखा है​  कि टेट परीज्क्षा के दौरान इस बाधा दौड़ का अंजाम क्या हुआ है।अतिरिक्त सचिव मधुमिता राय के मुताबिक ढांचागत असुविधाओं तो रहेंगी। मौजूदा ढांचे के अंतर्गत एकसाथ बड़े पैमाने पर बीएड प्रशिक्षण देने में दिक्कतें तो होंगी ही।


बल्कि उनकी राय है कि इस सिलसिले में राज्य के विश्वविद्यालयों से पहल हो तो शायद बात बने। हमारी शंका तो यह है कि राजनीतिक तौर पर ​​बंधक बने हुए विश्वविद्यालयों से युवाहित में ऐसे किसी कदम की हम तो खैर परिवर्तन राज में भी उम्मीद नहीं कर सकते।


आलू के लिए तरस सकते हैं लोग!अरुप बाबू ने आखिर आलू मार्ग खोज लिया!


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


जिन्हें मधुमेह नहीं है और जिनका आलू के बिना रसोई का कामकाज बेकार लगता है, उनके लिए बहुत बुरी खबर है।इस बार आलू की कीमतें आसमान छू सकती हैं। प्याज का काम ही है रुलाना। बाहर से आपूर्ति ठप हुई तो बाजार में प्याज को हाथ लगाने का मतलब है करंट को छूना। वहीं हाल अब आलू का होने जा रहा है। वैसे आलू उत्पादन में बंगाल आत्मनिर्भर है। शीतघरों की मेहरबानी से सड़ा बासी जैसा भी हो हर मौसम आलू से गृहिणी की मुस्कान खिली रह सकती है।ये शीतघर भी राजनीतिक चंदाखोरी का बहुत बड़ा जरिया है। लाखों की दर से वहां से वसूली होती है। आम उपभोक्ताओं की जेबकटी की खास वजह यह है।बिजली कटौती का आम जनजीवन के साथ साथ उद्योग धंधों पर और शीतगृहों पर भी असर पड़ रहा है। बिजली कटौती के कारण शीतगृहों में भंडारित आलू के अंकुरित होने के आसार बढ़ गए हैं।देश के कई इलाकों में हुई बेमौसम बारिश से आलू की पैदावार पर असर पड़ने की आशंका है। वहीं कोल्ड स्टोरेज की लागत बढ़ने से आने वाले दिनों में आलू की कीमतें और बढ़ सकती हैं। प्याज तो निर्यात की वजह से महंगा होता है। लेकिन आलू अब तक विदेशी कारोबार से बचा हुआ है और गनीमत है कि विदेशी मुद्रा के भाव से आलू खरीदना नहीं पड़ता। लेकिन अब खबर है कि पंजाब को आलू भेजा जा रहा है जहां से हम चावल और आटा दोनों मंगाते हैं। वहां से यहां पहुंचते पहुंचते​ चावल आटे का बाजार दर कैसे आसमान चूमता है बारह महीने ,खाने पीने वाले लोग मसलन बीपीएल के सड़े गले अनाज से जिनका पेट नहीं भरता, वे इसे अच्छी तरह जानते हैं। इस हिसाब से बहिर्मुखी आलू के नखरे तेज हो जाये तो आप क्या करेंगे , सोच लीजिये!


गौरतलब है कि आलू एक सब्जी है। वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से यह एक तना है। इसकी उद्गम स्थान दक्षिण अमेरिका का पेरू (संदर्भ) है । यह गेहूं, धान तथा मक्का के बाद सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है।आलू से अनेक खाद्य सामग्री बनती है जैसे वड़ापाव, चाट, आलू भरी कचौड़ी, चिप्स, पापड़, फ्रेंचफ्राइस, समोसा, टिक्की, चोखा, आदि। आलू को अन्य सब्जियों के साथ मिला कर तरह-तरह कि पकवान बनाये जाते हैं।

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​वैसे पश्चिम बंगाल में इस साल आलू की बंपर फसल हुई है। लेकिन यहां का ज्यादातर आलू देश के पूर्वी राज्यों में ही खप जाता है। जबकि उत्तर प्रदेश और पंजाब से दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े महानगरों को भी आलू की सप्लाई होती है। ऐसे में महंगे आलू की वजह से आने वाले दिनों में सब्जी खानी महंगी पड़ सकती है।अब हाल यह है कि पंजाब को बंगाल से आलू मंगाना पड़ रहा है।


राज्य के कृषि विपणन मंत्री अरुप राय मंत्रित्व की बजाय पार्टी के कामकाज के लिए बेहतर परिचित है। आखिर आलू राज्य से बाहर भेजकर उन्होंने अपनी कर्मठता का परिचय दे ही दिया।उन्होंने बड़े गर्व से कहा है कि पंजाब को बंगाल से दो हजार चन आलू भेजा गया है।अगले हफ्ते और दो हजार टन आलू इस हफ्ते भेजा जा रहा है। यानी पंजाब और पंजाबियों को बताने का वक्त आ गया है कि ज्यादा मस्ती न करें क्योंकि उनके पेट में बंगाली आलू है। रणवीर कपूर भी अपने पेप्सी विज्ञापन में पंजाबी मुंडे को डांट सकते हैं कि अकड़ते क्यों हो, बंगाल का आलू जो खाते हो!


​अरुप बाबू का हालांकि दावा है कि इससे राज्य में तरह तरह के संकटों के अलावा अब कोई आलू संकट नहीं होने वाला।उनके मुताबिक राज्य में इस महीने एक करोड़ टन आलू का उत्पादन हुआ है जो पिछले साल के मुकाबले चार लाख टन ज्यादा है। आपको मालूम ​​पड़ा क्या? आलू का बादजार भाव तो गिरना चाहिए कि नहीं?मंत्री का तर्क है कि राज्य में सालाना साठ लाख टन आलू की खपत होती है। चालीस लाक टन जो ज्यादा उत्पादन  हुआ है , उसे बाहर खपाया​​ जा रहा है। चलिये, कारोबार में पिछड़े बंगाल के लिए अरुप बाबू ने आखिर आलू मार्ग खोज लिया।अरुप बाबू ने हालांकि चेता दिया है कि आलू का उत्पादन जरुर बढ़ा है , पर आलू की कामते घटेंगी नहीं। क्योकि आलू को मौजूदा बाजार दर से कम कीमत में बेचने पर किसानों का सर्वनाश हो जायेगा। जाहिर है कि सरकार को किसानों की भी परवाह है।


मालूम हो कि गर्मी का सीजन शुरू होने के साथ ही आलू का दाम भी गरमाने लगा है। सब्जी में बेताज बादशाह आलू के दामों के मामले में दिन प्रतिदिन नखरे बढ़ते जा रहे है। मार्च के अंत में देश भर की मंडियों में आलू की कीमतें करीब 200 रुपये प्रति क्विंटल तक बढ़ चुकी हैं। उत्तर भारत में हुई बेमौसम बारिश से आने वाले दिनों में आलू की कीमतें और भड़क सकती हैं। फिलहाल ज्यादातर आलू खेतों से सीधे कोल्ड स्टोरों मे जा रहा है। पंजाब के कोल्ड स्टोर करीब 70 फीसदी तक भर गए हैं। उत्तर प्रदेश में भी करीब 60 फीसदी तक आलू स्टोरों तक पहुंच गया है। कारोबारियों की दलील है कि स्टोरों की लागत बढ़ने से आगे आलू की कीमतें और बढ़ सकती हैं।दरअसल उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में बिजली की दरें काफी बढ़ गई हैं, इस वजह से कोल्ड स्टोरों को भी अपनी दरें बढ़ानी पड़ी हैं। पीक सीजन के दौरान पंजाब की मंडियों में इस समय करीब 600 रुपये क्विंटल आलू बिक रहा है, जबकि खुदरा में आलू 10-15 रुपये किलो है। आने वाले महीनों में जब कोल्ड स्टोरों से आवक शुरू होगी, तब आलू के दाम में और तेजी आना तय है।मार्जिन से बेपरवाह आलू के वायदा भाव पर तेजी सवार है। 15 फीसदी मार्जिन के बाद यह करीब 12 फीसदी महंगा हुआ है। महीने भर में भाव करीब 34 फीसदी चढ़ चुके हैं। कीमतों में तेजी को देखते हुए नेशनल कमोडिटी ऐंड डेरिवेटिव एक्सचेंज (एनसीडीईएक्स) में आलू वायदा अनुबंधों में शुरुआत से ही 35 फीसदी मार्जिन रखा गया है। वायदा की चाल पर हाजिर बाजार में भी आलू महंगा हुआ है। जानकारों के मुताबिक अब तक मौसम ज्यादा गर्म न होने से खेतों में रखे आलू के खराब होने का डर नही है। इसलिए किसान मंडियों में आराम से आलू ला रहे हैं जिससे से कीमतों में तेजी का रुख है।अब तक गर्मी ज्यादा नही पड़ी है। मौजूदा मौसम में आलू को खेतों में रखने पर नुकसान नही है। इसलिए किसान मंडियों में हड़बड़ी में आलू नहीं ला रहे हैं। लिहाजा बीते दो सप्ताह में आलू 80-100 रुपये महंगा होकर 600-900 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है।एनसीडीएक्स में आलू के अप्रैल, मई, जून अनुबंधों का कारोबार शुरू हुआ है। एमसीएक्स में तेजी को देखते हुए इन अनुबंधों पर शुरू से ही 35 फीसदी का मार्जिन रखा गया।  


पिछले साल 16 दिसंबर की रात 23 साल की मेडिकल स्टूडेंट से बर्बर गैंग रेप के बाद पूरा मुल्क आहत था। गौरतलब है कि इस रेप के बाद पीड़िता की मौत हो गई थी। उस बहादुर बेटी के माता-पिता को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एनडीटीवी की तरफ से 'डॉटर ऑफ इंडिया' अवार्ड से नवाजा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने उस मां की आंखों से आंसू बहते रहे। उस मां ने प्रधानमंत्री के सामने हाथ जोड़कर कहा, 'जो मेरी बेटी के साथ हुआ वह किसी और बेटी के साथ हर हाल में नहीं होना चाहिए।'


आलू खाकर बेटी को पढ़ाया

उस लड़की के पिता ने टूटे स्वर में कहा कि हम बेटी को मेडिकल की शिक्षा देने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन मेरी बहादुर बेटी भी पढ़ाई को लेकर हमेशा ऊर्जा से भरी रहती थी। उसने मुझसे कई बार कहा था, 'पापा जो पैसे मेरी शादी में लगाएंगे उसी पैसे से मुझे पढ़ा दीजिए। हमारे पड़ोसी और परिवार वाले भी कहते थे कि जल्दी से बेटी की शादी कर दो पढ़ाई के चक्कर में मत पड़ो। बेटी परायी संपत्ति होती है। जितने पैसे उसे पढ़ाने में खर्च करोगो उतने में तो उसकी शादी हो जाएगी। लेकिन हम बेटी के कोमल सपनों को तोड़ना नहीं चाहते थे। हमने महीनों आलू खाकर खुद को जिंदा रखा। अपने दोनों छोटे बेटों को भी आलू खिलाकर महीनों रखा। तब जाकर बेटी के उस मुकाम तक पहुंचाया था। लेकिन होना तो कुछ और ही था। इतना कहकर वह भी रोने लगते हैं। पूरे समारोह में गम का सन्नाटा पसर जाता है।


बंगाल के लिए भारी पड़ा सुदीप्त नाम​!

बंगाल के लिए भारी पड़ा सुदीप्त नाम​!


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​

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​पुलिस हिरासत में एसएफआई नेता सुदीप्त मित्र की दुर्भाग्यजनक मौत के बाद फिर सुदीप्त सेन के नाम से बंगाल में कहर बरपा हुआ है। बंगाल एक भयानक चक्रवाती तूफान में फंस गया है। यहां अब हर कालबैशाखी समुद्री तूफान का आकार ले रहा है।कब सुनामी आ जाये , सुंदरवन के वजूद के बावजूद इसका कोई ठिकाना नहीं है। वर्टिकली राजनीतिक परिचय में दोफाड़  बंगाल के ​​लिए इस अप्राकृतिक मानवनिर्मित आपदा से बच निकलने का फिलहाल कोई रास्ता नहीं दीख रहा है।पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से कहा गया है कि शारदा ग्रुप के मामले में हम कुछ नहीं कर सकते। फर्जी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने का काम सेबी, रिजर्व बैंक और कंपनी मामले के मंत्रालय का है। सनद रहे कि केन्द्र सरकार की ओर से कहा जाता है कि कार्रवाई राज्य सरकारों को करनी चाहिए।अब कहा जा रहा है कि चिटफंड मामले में ममता दीदी कार्रवाई कर रही हैं और  सुदीप्त सेनी की गिरफ्तारी के लिए लुक आउट नोटिस भी जारी किया गया है। लेकिन इससे पहले पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से कहा गया  कि श्रद्धा ग्रुप के मामले में हम कुछ नहीं कर सकते। फर्जी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने का काम सेबी, रिजर्व बैंक और कंपनी मामले के मंत्रालय का है। सनद रहे कि केन्द्र सरकार की ओर से कहा जाता है कि कार्रवाई राज्य सरकारों को करनी चाहिए।तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय ने कहा कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकती है। उन्होंने कहा, 'हम इस मसले पर बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। इस तरह की कंपनियों के खिलाफ बाजार नियामक सेबी, रिजर्व बैंक और कंपनी मामलों के मंत्रालय को कार्रवाई करनी चाहिए। रॉय ने कहा कि इसके लिए पर्याप्त कानून हैं और नियामकों को राज्य से उम्मीद करने के बजाय इस मसले का हल निकालने के लिए संयुक्त रूप से प्रयास करने चाहिए।फरार चल रहे सेन की गिरफ्तारी पर चटर्जी ने कहा कि इस पर विचार चल रहा है, लेकिन अभी तक कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। सेबी ने सामूहिक निवेश योजनाओं पर कठोरता बरतनी शुरू कर दी है। मई 2012 में उसने कोलकाता की एक कंपनी के खिलाफ आदेश जारी किया था और उसे आम निवेशकों से पैसा नहीं जुटाने के निर्देश दिए थे। दिसंबर 2012 में सेबी ने एक अन्य आदेश में पैसा जुटाना जारी रखने के लिए कंपनी के खिलाफ मुकदमा चलाने का इरादा जाहिर किया था। 10 अप्रैल को सेबी ने पश्चिम बंगाल की एक कंपनी द्वारा जारी की गई आलू बॉन्ड जैसी योजनाओं से निवेशकों को सावधान करने के लिए एक अन्य आदेश जारी किया था।


एसएफआई के प्रदर्शन के बाद घटनाक्रम ​​तेजी से मुड़ा और सुदीप्त की मौत के विरोध में दिल्ली में योजना भवन के सामने बंगाल के वित्तमंत्री अमित मित्र से बदसलूकी हो गयी। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी नहीं बख्शा। अस्वस्थ ममता बंगाल लौट आय़ी ।गुस्साई ममता बनर्जी ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर अपना रोष उतारते हुए घटना को षड्यंत्र बताया।दीदी प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री से मिले बिना कोलकाता चली आयी और अपनी पार्टी को बेलगाम छोढ़ दिया। घटना के तत्काल बाद तृणमूल कांग्रेस समर्थकों ने कोलकाता सहित राज्य के कई हिस्सों में माकपा कार्यालयों और नेताओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया।लोकसभा में तृणमूल के नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने घटना के लिए सीधे-सीधे माकपा नेता प्रकाश करात और सीताराम येचुरी पर आरोप जड़ दिया। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले दोनों नेताओं ने बंग भवन का घेराव किया था। अब पर्दे के पीछे खड़े होकर ऐसी घटना करा रहे हैं।वाममोर्चा चेयरमैन विमान बसु ने दिल्ली में एसएफआइ [स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया] समर्थकों की ओर से बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा का विरोध जताए जाने की निंदा की। बसु ने कहा कि इस प्रकार के विरोध के तरीके की राजनीति वाममोर्चा नहीं करती है।


मुख्यमंत्री दिल्ली गयी थीं तब, जब राज्य में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी यहां गुजराती विकास माडल का प्रदर्शन करके निवेशकों को नैनो के बाद एकबार फिर गुजरात ले जा रहे थे। दीदी राज्य की बेहाल​ ​ आर्थिक हालत सुधारने के लिए केंद्र से मदद मांगने गयी थीं। द्रमुक के केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने की स्थिति में दिल्ली में उनके पक्ष में माहौल बन ही रहा था।पंचायत चुनाव को लेकर अदालती विवादों के मध्य कांग्रेस की ओर से उन्हें फिर मनाने का कार्यक्रम था। पर सुदीप्त की मृत्यु के खिलाफ उग्र प्रदर्शन से नाराज दीदी ने एक झटके से यह संवाद तोड़ दिया। नतीजा क्या हुआ?


नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व का विरोद करते हुए बिहार के लिए बारह हजार करोड़ का पैकेज ले गये। ओड़ीशा के नवीन पटनायक भी अपने राज्य के लिए केंद्रीय मदद लेने में कामयाब हो गये। उत्तर प्रदेश को तो पहले ही मदद मिल चुकी है। अब दीदी फेसबुक के पन्ने रंग करके बंगाल के ​​खिलाफ केंद्र के सौतेला बर्ताव की शिकायत करती नजर आ रही है। वे चुनाव आयोग से भिड़ गयी हैं कि राज्य में कानून व्यवस्था की हालत देश में अव्वल है , लिहाजा राज्य में पंचायत चुनाव के दरम्यान केंद्रीय वाहिनी की जरुरत नहीं है।


दिल्ली में दीदी पर हुए कथित हमले की खबर पैलते ही राजनीतिक ​​उन्माद में माकपा के कार्यालयों पर जो हमले हुए, जिसतरह आगजनी की वारदातें हुईं, उससे राजनीतिक हिंसा का माहौल बुरी तरह बिगड़ गया और हाईकोर्ट में चुनाव आयोग ने इसका हवाला भी दिया।फिर प्रेसीडेंसी कालेज में हमला हो गया।


इस राजनीतिक ध्रूवीकरण से राज्य में वित्तीय प्रबंधन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। राजनीति के कारण जहां उद्योग नीति, भूमि नीति जैसे नीति निर्धारण के अनिवार्य काम लटके पड़े हैं,उसीतरह राजनीतिक संरक्षण से सालाना १५ हजार करोड़ के चिटफंड कारोबार पर कोई अंकुश लग नही पाया। नतीजतन, पहले से राजनीति तनाव के उग्रतम माहौल में श्रद्धा समूह के भंडाफोड़ से सुदीप्त सेन का नाम राज्य सरकार और बंगाल के लिए दानवीय हो गया है। राज्यभर में राजनीतिक मुद्दों पर प्रदर्शन और हिंसा का सिलसिला चल ही रहा था कि अब फिर नये सिरे से राज्यभर में चिटफंड कंपनियों की धोखाधड़ी के शिकार लोग सड़कों पर उतर आये हैं। बेरोजगारी के आलम में जो लोग इन कंपनियों के हक में लाखों करोड़ों का कारोबार कर रहे थे, वे अब अपना जान माल बचाने के फेर में हैं, वे भी पीड़ित जनता की कतार में शामिल हो गये हैं और चिटफंड के पीछे मंत्रियों, सांसदों , नगरपालिका प्रधानों, अन्य नेताओं के नाम चीख चीखकर पुकार रहे हैं।​


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​एक अनंत भूलभूलैय्या में फंसी है मां माटी मानुष की सरकार।जो जयराम रमेश हर संभव मदद के लिए पैरों पर खड़े थे, कमलनाथ दीदी कहते हुए अघा नहीं रहे थे, प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी की ओर से  हरसंभव दीदी को खुश रखने की जो हिदायतें थीं, सबकुछ बदल गया है,। जयराम रमेश कानून का हवाला दे रहे हैं कि स्थानीय निकायों का चुनाव नहीं हुा तो सामाजिक योजनाओं में केंद्रीय अनुदान बंद हो जायेगा। पहले से बदहाल राज्य में अगर ऐसा हुआ तो ग्रामीण रोजगार बंद होने की हालत में स्थिति कितनी विस्फोटक होगी, अंदाजा लगाया जाना बाकी है, शारदा और सुदीप्त का अनुकरण करते हुए क्योंकि दीदी भी मजबूरन चिटफंड पर देर सवेर कार्रवाई करेंगी ही, बाकी चिटफंड कंपनियां कारोबार समेट कर गायब होने लगे तो हर कोने में खड़ा सुदीप्त वनजर आयेगा और धरा का धरा रह जायेगा लुक आउट नोटिस। राजनीतिक जो प्रतिद्वंद्वी धूल चाटते नजर आ रहे हैं, वे भी पूरी संगठनात्मक शक्ति के साथ जनता को सड़कों पर गोलबंद करने लगेंगे तो दोनों सुदीप्त के आगे सरकार और प्रशासन को बेबस ही नजर आना है।पूर्ववर्ती सरकार पर दोषारोपण करके चिटफंड कंपनियों को मौजूदा राजनीतिक संरक्षण के आरोप को इस विस्फोटक हालत में कारिज करना मुश्किल है। खासकर ऐसे समूहों द्वारा संचालित अखबार और टीवी चैनल तक बंद होने लगे हैं, जिनके उद्घाटन में मुख्यमंत्री समेत सत्तादल के तमाम बड़े नाम थे।वर्ष 2010 में वैश्विक स्तर पर छाई मंदी के दौरान जब पूरे देश का मीडिया संकट से जूझ रहा था, तब पश्चिम बंगाल के मीडिया में अचानक तेजी देखने को मिली थी। राज्य के मीडिया जगत में अब तक अनजान शारदा समूह अचानक नई ऊंचाई छू रहा था। समूह ने एक के बाद एक कुल 10 मीडिया संस्थान अपने नाम कर लिए। समूह ने चैनल 10 (अब राइस समूह), बंगाल पोस्ट, सकालबेला, आजाद हिंद, प्रभात वार्ता, परमा और सेवन सिस्टर्स पोस्ट शुरू करके मंदी की गिरफ्त में फंसे मीडिया बाजार में तेजी ला दी थी।कलम का उद्गाटन तो खुद ममता बनर्जी ने किया।हकीकत यह है कि राज्य में बड़ी संख्या में बंगाली चैनलों को चिटफंड कंपनियों के माध्यम से ही पैसा मिला है। इस पूंजी पर लगी नियामकीय बाधाओं के चलते अब इन मीडिया संस्थानों का परिचालन बाधित हुआ है। राज्य के उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा कि भले ही दोषियों को पकडऩे के प्रयास जारी हैं, लेकिन एक बिंदु के बाद राज्य सरकार कुछ खास नहीं कर सकती। उन्होंने कहा, 'हम सेबी और रिजर्व के नियमों के मद्देनजर इस तरह की कंपनियों पर गौर करेंगे। अगर अनियमितताएं पाई जाती हैं तो हम कार्रवाई करेंगे लेकिन हम जल्दबाजी में कोई गिरफ्तारी नहीं कर सकते।




कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी श्रद्धा ग्रुप को बचाने का आरोप लगाया। डूबने के कगार पर पहुंची कंपनी जमाकर्ताओं को पैसा नहीं दे पा रही है और जमाकर्ता अपने पैसे की मांग करते हुए सड़कों उतर आए हैं।


प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि केंद्र ने चिटफंड के मुद्दे पर राज्य को आगाह किया था। उन्होंने कहा, 'दुर्भाग्य से राज्य सरकार ने कदम नहीं उठाया क्योंकि सत्तारूढ़ दल से जुड़े कुछ लोगों का इस ग्रुप के साथ गहरा संबंध है। उन्होंने कहा, 'यदि राज्य सरकार ने कदम उठाया होता हो तो इतने सारे लोग प्रभावित नहीं होते।' केंद्रीय मंत्री दीपा दासमुंशी ने कहा, 'यह नहीं कहा जा सकता कि राज्य सरकार को चिटफंड के बारे में मालूम नहीं था। वह किसे बचा रही है? उसे सफाई देनी होगी।'


चिटफंड के खिलाफ अपनी आवाज मुखर करने वाले तृणमूल कांग्रेस सांसद सोमेन मित्रा ने कहा, 'मैंने राज्य में चिटफंड के कुकुरमुत्ते की तरह उगने के बारे में पहले ही प्रधानमंत्री को लिखा था। जिन लोगों ने इन चिटफंड में धन निवेश किया है वे गरीब लोग हैं। उन पर बहुत बुरा असर पड़ा है।'


राज्य के परिवहन व खेल मंत्री मदन मित्रा खुद आरोपों के गेरे में हैं और वहीं कह रहे हैं कि  राज्य में आम जनता से रुपया ठगनेवालों के खिलाफ राज्य सरकार कड़ी कार्रवाई करेगी। आम जनता को पैसा दिलवाने के लिए भी कदम उठाया जाएगा। उक्त बातें मदन मित्रा ने राजबांध में राहुल फाउंडेशन में कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद पत्रकारों से कही।न्होंने कहा कि राज्य सरकार लोगों के साथ ठगी करनेवाले संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई करने की योजना बना रही है। मुख्यमंत्री आम जनता के हित के लिए कदम उठाएंगी।


बताया जा रहा है कि दीदी चिटफंड कंपनियों की अनियमितताओं की जांच के लिए आयोग का गठन करने वाली है। पर मामला इतनी आसानी से दबने वाला नहीं है।आर्थिक तौर पर पूरी तरह लुट चुके लोग, जो कि आत्महत्या तक करने की नौबत तक पहुंच गये हैं, सिर्फ जांच पड़ताल तहकीकात से संतुष्ट​ ​नही होने वाले। सुदीप्त गिरफ्तार भी हो, तोबी शायद कोई पर फर्क पड़े, लोगों को इस संकट से निकलने के उपाय करने होंगे। बेरोजगारी खत्म करने के कारगर उपाय करने होंगे ताकि इतने वायपक पैमाने पर लोग ऐसे अवैध धंधे में शरीक न हो। अल्प संचय प्रणाली को पुनर्जीवित करना होगा ताकि लोगों को वैध निवेश जोखिमविहीन लगे। सबसे ज्यादा जरुरी है राजनीतिक तनाव और हिंसा के माहौल को खतम करना। जब तक ऐसा नहीं होता, न तो स्थानीय निकायों का चुनाव संभव है, न सरकारी कामकाज और न ही आर्थिक प्रबंधन और न औद्योगिक विकास, कारोबार और निवेश के लिए अनुकूल माहौल। सबसे खतरनाक बात तो यह है कि विपुल जनादेश के साथ सत्ता में आयी सरकार बड़ी तेजी से जनता की आस्था खोने लगी है। यह अनास्था समस्याओं को और जटिल बनायेगी, सुलझायेगी नहीं।




हंगामा न किया तो अपनी जनता को संबोधित कैसे करेंगे जनप्रतिनिधि?

हंगामा न किया तो अपनी जनता को संबोधित कैसे करेंगे जनप्रतिनिधि?


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा की कार्यवाही के सीधे प्रसाऱम का यह तर्क दिया था कि जिस जनता ने वोट देकर निर्वाचित किया, उसके नसमने बेनकाब होने के बजाय संसाद संयम बरतेंगे। लेकिन कैमरे ने तो संयम के सारे बंधन तोड़ दिये। सीधे अपनी जनता को संबोधित करने के चक्कर में हर हथकंडा अपनाया जाने लगा। बिना प्रसारण सदन में हंगामे के ारे रिकार्ड टूटते जा रहे हैं। जनविरोधी नीति नर्धारण में समान हिस्सेदार माननीय जनप्रतिनिधियों को अपनी जनता को यह दिकलाने की गरज ज्यादा होती है कि वे किस जबरद्सत ढंग से उनके हितों की बात कर रहे हैं। जनता के हित कैसे सधे, भारत अमेरिका परमामु संधि पर अनास्था प्रस्ताव के दौरान हुई बहस इसका क्लासिक उदाहरण हैं। बीच संसदीय अधिवेशन पिछले दिसंबर में ेक बलात्कार कांड हुआ तो सारे जरूरी मुद्दे हाशिये पर चले गये। लेकिन जो कानून बनने थे वे निर्विरोध बन गये। जनता अपने नेताओं के तीखे तेवर पर बाग बाग होती रही। अब बजट अधिवेशन के मौके पर दिल्ली में एक और बलात्कारकांड संयोगवश घटित हो गया। पहले से ज्यादा नृशंस। जनांदोलन के बाद जस्टिस वर्मा की सिफारिशों को किनारे परबनाये गये स्त्री उत्पीड़न निरोधक कानून के बाद। कानून का क्या हश्र है कि फांसी के बाद बी बलात्कार थम नहीं रहे। जाहिर है कि फिर संसदीय कार्यवाही हंगामे में निष्णात होनी है कानून बनाने की प्रक्रिया और  जनविरोधी नीति निर्धारण की कारपोरेट प्रक्रिया में व्यवधान डाले बिना। इसकी जिम्मेवारी टालने के लिए कुछ तो करना ही पड़ता है और इसीलिए बजट सेशन के दूसरे दौर में कोई हंगामा न हो और ऐसा करने वालों का खुद-ब-खुद निलंबन हो जाए, इस पर राजनीतिक दलों में एकराय नहीं है। रविवार को इस मसले पर राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी की ओर से इस मसले पर बुलाई गई ऑल पार्टी मीटिंग में कोई नतीजा नहीं निकला। मीटिंग में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित कई दलों के सीनियर नेता मौजूद थे।


गौरतलब है कि संसद के बजट सत्र के दूसरे दौर में एक बार फिर यूपीए सरकार के सामने कई तरह की चुनौतियां होगी। इस सेशन के दौरान जहां सरकार को कुछ अहम बिल पास कराने हैं, वहीं उसे कुछ विवादित मुद्दों पर विपक्ष के तीखे तेवर भी झेलने होंगे। एनडीए ने अपनी मंशा जाहिर भी कर दी है। ऐसे में अगले एक महीने मौसम की तरह सियासत के पारे के भी गर्म रहने की संभावना है। तमाम दलों की ओर से अक्टूबर में चुनाव होने की संभावना जाहिर करने के बाद संसद सेशन के दौरान राजनीतिक उठापटक देखने को मिल सकती है।संसद में बजट सत्र के दूसरे चरण का आगाज संप्रग सरकार के लिए काफी मुश्किल भरा होगा क्योंकि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी संप्रग सरकार को गिराने की रणनीति पर काम करेगी। भाजपा ने यह आक्रामक रुख 2जी घोटाले की जांच के लिए बनी जेपीसी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम शामिल किए जाने के बाद लिया है। इसके अलावा कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला और गुड़िया रेप केस में भी भाजपा सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करेगी। करीब एक महीने तक चलने वाले इस सत्र में हालांकि सरकार की पूरी कोशिश होगी कि किसी तरह का विवाद न खड़ा होने पाए और सभी दलों को भरोसे में लेकर चला जाए, लेकिन ऐसा होना मुमकिन नहीं दिख रहा है। भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर संप्रग को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी सरकार को चेतावनी देने में कसर नहीं छोड़ रही है। यहां हम परखने की कोशिश करते हैं कि कौन सा मुद्दा सरकार के लिए कितनी मुश्किल खड़ी कर सकता है।कमजोर हो चुकी इकॉनमी को टॉनिक देने वाले कुछ पेंडिंग बिलों को पास कराने के लिए पूरा जोर लगा रही है। फाइनेंस मिनिस्टर निवेशकों को लुभाने के लिए दुनिया के दौरे पर हैं। वहीं, यहां सरकार इन बिलों को पास कराने के लिए विपक्ष से भी लगातार संपर्क में है। इंश्योरेंस बिल, पेशन बिल और लैंड बिल पर बाजार की नजर रहेगी। अगर ये तीनों पास हो गए तो आर्थिक मोर्चे पर पॉजिटिवअसर देखने को मिल सकते हैं। सरकार को इसी सेशन में फाइनेंस बिल भी पास कराना है।सरकार राज्यसभा में पहले से ही अल्पमत में है वहीं लोकसभा में डीएमके की ओर से सपोर्ट वापस लिए वहां भी मुश्किलें बढ़ी हैं। ऐसे में नंबर गेम फिर अहम होने वाला है और सरकार को मुलायम सिंह और मायावती से एक बार फिर उम्मीद रहेगी। लेकिन हाल में जिस तरह मुलायम सिंह सरकार पर हमलावर रहे हैं ऐसे में उनका संसद के अंदर रुख देखना दिलचस्प। जेडीयू बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग संसद में उठाएगा और सरकार उसे किस तरह से डील करती है उससे भी राजनीतिक संदेश जाएगा।


सरकार के सामने अहम चुनौती

-लैंड बिल को संसद में पास कराना

-फूड सिक्युरिटी को बिल को पास करना जिसे सरकार अगले आम चुनाव में चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का मंशा रखती है

-इंश्योरेंस बिल को पास कराना।

सरकार को घेरेगा विपक्ष

-जॉइंट पार्लियामेंट कमिटी (जेपीसी) की रिपोर्ट लीक होने और इसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को क्लीन चिट दिए जाने के मामले पर

-कोलगेट मामले में सीबीआई पर रिपोर्ट बदलवाने के लिए कानून मंत्री के ओर से दबाव दिए जाने की खबरों पर विपक्ष सरकार को घेरेगा

-दिल्ली रेप के बाद उपजी कानून व्यवस्था और दिल्ली पुलिस के कामकाज पर भी सवाल उठाए जाएंगे


हामिद अंसारी के सुझाव : सूत्रों ने बताया कि बजट सेशन के पहले दौर में 23 मार्च को श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर एआईएडीएमके सदस्यों के माइक तोड़े जाने और कागज फेंके जाने की घटना का जिक्र करते हुए हामिद अंसारी ने कहा कि मैं बेहद व्यथित और दुखी था। उन्होंने सुझाव दिया कि आसन के समीप आने वाले सदस्यों के नाम राज्यसभा की बुलेटिन में न दिए जाएं और इसका प्रसारण भी न किया जाए। सभापति ने यह भी सुझाव दिया कि बदइंतजामी फैलाने वाले सदस्यों का स्वत: निलंबन हो जाए।


जेटली को ऑब्जेक्शन :बैठक में राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा कि सदन सदस्यों की जिम्मेदारी की भावना के आधार पर चल सकती है। स्वत: निलंबन के मामले पर आपत्ति जताते हुए उन्होंने कहा कि सरकार ऐसी स्थिति का इस्तेमाल विवादित विधेयक पास कराने के लिए कर सकती है। तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि प्रसारण बंद करने का सुझाव व्यावहारिक नहीं है और इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। सीपीएम के सीताराम येचुरी ने भी कहा कि प्रसारण बंद करने का सवाल ही नहीं है। उन्होंने कहा कि लोगों को यह जानने का हक है कि सदन में क्या हुआ।


संसद के ऊपरी सदन में प्रश्नकाल के सीधा प्रसारण को निलंबित किए जाने का सुझाव देते हुए राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति एम. हामिद अंसारी ने रविवार को कहा कि सदन की कार्यवाही में बार-बार बाधा के लिए जिम्मेवार 'सामूहिक आचरण' को सुधारने की जरूरत है।


सर्वदलीय बैठक में उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने यह बैठक 'व्यथित और दुखी' होकर बुलाई है, क्योंकि सदस्यों द्वारा सदन में पैदा की जाने वाली बाधाओं से संसद के बारे में लोगों के बीच गलत धारणा बनती जा रही है।


अधिकृत सूत्रों ने उपराष्ट्रपति के शब्दों को उद्धृत किया, "चूंकि बाधा का उद्देश्य कार्यवाही के सीधे प्रसारण के जरिए 'प्रचार पाना' हो सकता है इसलिए हम प्रश्नकाल का लगातार सीधा प्रसार खत्म कर सकते हैं और इसकी जगह दूसरा आधार अपना सकते हैं।"


अंसारी ने यह भी कहा कि सदस्य सभापति की आसंदी की तरफ बढ़कर या अत्यंत अमर्यादित आचरण के जरिए बाधा उत्पन्न करते हैं। ऐसे में उनके नाम रिकार्ड में लिखे जाएं।

उन्होंने सुझाव दिया कि नियमावली में ऐसा प्रावधान जोड़ा जाए जिससे सदन में अव्यवस्था उत्पन्न करने वाला सदस्य एक विशेष अवधि के लिए स्वत: निलंबित हो जाए। इस संदर्भ में परामर्श शुरू किया जाना चाहिए। यह संभव है, क्योंकि ऐसा नियम लोकसभा में पहले से है।


अंसारी ने कहा, "यह दुख और अत्यंत निराशाजनक सत्य है कि बार-बार बाधाओं के कारण कार्यवाही स्थगित करनी पड़ती है। यदि यह परंपरा यूं ही जारी रही तो हमारे लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच के रूप में संसद के सार्वजनिक सम्मान पर आघात पहुंचेगा और इसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा हो जाएगा।"


विपक्ष ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर जेपीसी की मसौदा रिपोर्ट तथा कोयला घोटाले से संबंधित सीबीआई की रिपोर्ट में विधि मंत्रालय के कथित हस्तक्षेप पर विरोध का फैसला कर लिया है।सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक पर मुख्य विपक्षी दल से संपर्क साधकर संसद सत्र में शांतिपूर्ण कामकाज के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश तो की लेकिन खबरों में नए-नए खुलासों से उसके लिए हालात मुश्किल वाले हो सकते हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जेपीसी रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई है जिसमें 2जी मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम को क्लीनचिट दे दी गई है।


सोमवार से शुरू होने जा रहे संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की बैठक से पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यहां पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक की । विपक्ष द्वारा संसद सत्र के दौरान कोयला घोटाला और टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले को उठाये जाने की संभावना है ।सोनिया की पार्टी नेताओं से हुई इस बैठक में रक्षा मंत्री ए के एंटनी, संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ और गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे उपस्थित थे । शिंदे लोकसभा में सदन के नेता भी हैं ।


बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने भी हिस्सा लिया


भाजपा रिपोर्ट में लगाए गए इन आरोपों से भी नाराज है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार की दूरसंचार नीति के कारण सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ।

वाम दल भी रिपोर्ट से नाखुश हैं और उन्होंने संसद में अपना असंतोष जाहिर करने का फैसला किया है। कोयला घोटाले में सीबीआई की रिपोर्ट में कानून मंत्रालय के हस्तक्षेप की खबरों को लेकर भी भाजपा तथा वाम दल असंतुष्ट हैं।


विपक्ष का कहना है कि घोटाले के तार प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े हैं और वह सरकार को घेरने का यह मौका नहीं जाने देगा। मनमोहन सिंह सरकार 10 मई को समाप्त हो रहे बजट सत्र के शेष चरण में कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराना चाहती है। भूमि अधिग्रहण विधेयक पर कांग्रेस और भाजपा में सहमति बन गई है और इस पर चर्चा हो सकती है। लंबे समय से लंबित खाद्य सुरक्षा विधेयक, बीमा और पेंशन विधेयक को भी लाया जा सकता है। सरकार विपक्षी दलों को मनाने और इन विधेयकों को पारित कराने की उम्मीद कर रही है। वाम दल इन विधेयकों का विरोध कर रहे हैं।


माकपा नेता प्रकाश करात ने मांग की है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक को स्थाई समिति को या एक संयुक्त प्रवर समिति को भेजा जाना चाहिए। भाजपा बीमा और पेंशन विधेयकों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) को 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने के खिलाफ है लेकिन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने उसका समर्थन हासिल करने का विश्वास जताया है।

दिल्ली में पांच साल की मासूम बच्ची के साथ बलात्कार की वीभत्स घटना को भी जोरशोर से संसद में उठाया जा सकता है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने बच्चियों से दुष्कर्म के मामले में अपराधियों को मौत की सजा दिये जाने की मांग की है। सुषमा ने नए दुष्कर्म रोधी कानून को और अधिक सख्त बनाने की वकालत की।


सरकार को सत्र के दौरान सपा और बसपा को भी साधकर चलना होगा जिनका बाहरी समर्थन उसके लिए बहुत महत्व रखता है। वित्त विधेयक और कुछ अनुदान की मांगें अभी पारित होना बाकी हैं इसलिए सरकार कोई जोखिम नहीं लेना चाहेगी। सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से संप्रग सरकार को संबंध टूटने का खतरा जब तक सामने नजर आता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सूखे का सामना कर रहे उत्तर प्रदेश के पिछड़े बुंदेलखंड क्षेत्र को 4,400 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। मुलायम प्रदेश के लिए विशेष पैकेज की मांग कर रहे हैं।


जेपीसी की मसौदा रिपोर्ट

2जी केस में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की मसौदा रिपोर्ट में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम को बरी करने और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर टिप्पणी के विषय को संसद में उठाने पर जोर देते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सभी सदस्यों से इस रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज करने की अपील की। जेपीसी की मसौदा रिपोर्ट की टिप्पणियों से क्षुब्ध एनडीए ने सवाल खड़ा किया कि इस मामले में दो अहम मंत्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम को किस आधार पर बरी कर दिया गया? यह कैसे संभव है कि एक काबीना मंत्री प्रधानमंत्री को गुमराह करे? सरकार की सामूहिक जवाबदेही कहां गई? भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने साफ किया है कि कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के आचरण को देखकर आने वाले दिनों में भाजपा महत्वपूर्ण विधेयकों पर सरकार को संसद में सहयोग करने के बारे में फिर से सोचने को मजबूर हुई है। दरअसल आडवाणी इस बात को लेकर काफी नाराज हैं कि जेपीसी की मसौदा रिपोर्ट को सदस्यों को दिए जाने से पहले कुछ चुनिंदा पत्रकारों को लीक कर दिया गया और इसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह और अरुण शौरी का नाम लेते हुए कहा गया कि इनके कारण देश को नुकसान हुआ। आडवाणी के गुस्से का अंदाजा उनके इस कथन से लगाया जा सकता है, `वास्तव में यह मसौदा रिपोर्ट जेपीसी के अध्यक्ष ने तैयार की या संप्रग के किसी छद्म व्यक्ति ने।' भाजपा नेताओं का कहना है कि इस रिपोर्ट के लीक होने को लेकर 25 अप्रैल को होने वाली जेपीसी की बैठक में आपत्ति जताई जाएगी।


कोल ब्लॉक घोटाला केस

कोयले की कालिख से पहले से ही परेशान संप्रग सरकार बजट सत्र के दूसरे चरण में एक और मुश्किल में घिर गई है। सरकार के कानून मंत्री पर आरोप है उन्होंने सीबीआई द्वारा इस मामले पर तैयार की गई स्टेटस रिपोर्ट ही बदलवा दी है। अभी हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट ने यह खुलासा किया कि कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री कार्यालय और कानून मंत्री ने संशोधन करवाए हैं। सीबीआई ने घोटाले की जांच की स्टेटस रिपोर्ट शीर्ष अदालत को मार्च में सौंपी थी। इस मामले में कानून मंत्री अश्विनी कुमार पर रिपोर्ट बदलवाने का आरोप है। घोटाले में जांच की स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपने से एक दिन पहले कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने समन भेजकर सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा एवं अन्य अधिकारियों को बुलाया था। भाजपा ने सरकार को भ्रष्ट बताते हुए इस मुद्दे पर कानून मंत्री से इस्तीफे की मांग की है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने भी कहा है कि कोल ब्लॉक आवंटन मामले में प्रधानमंत्री को बचाने की कोशिश की जा रही है। इस मुद्दे को लेकर संसद में भाजपा पूरी तैयारी के साथ सरकार को घेरेगी। चूंकि कानून मंत्री की पोल खुल चुकी है इसलिए सदन में भाजपा के आरोपों का जवाब देना सरकार के लिए बड़ी मुश्किल होगी।


गुड़िया बलात्कार प्रकरण

बीते साल 16 दिसंबर को दिल्ली गैंगरेप की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि गुड़िया रेप केस ने संप्रग सरकार के लिए नई मुश्किल खड़ी कर दी है। पांच साल की बच्ची से रेप की पृष्टभूमि में आज से शुरू हो रहे बजट सत्र के दूसरे चरण में कानून व्यवस्था को लेकर सरकार का घिरना तय है। दिल्ली में इस रेप कांड को लेकर जबरदस्त जनाक्रोश है। दिल्ली पुलिस एक बार फिर से कठघरे में खड़ी है। इस प्रकरण को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को सदन में जवाब देना मुश्किल होगा। भाजपा तो दूर, कांग्रेस पार्टी के सांसद और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित भी सरकार से दिल्ली पुलिस के कमिश्नर नीरज कुमार को हटाने की मांग पर अड़े हैं। मालूम हो कि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है और कानून व्यवस्था के बिगड़ने की जब बात आती है तो जनता को जवाब दिल्ली सरकार को देना पड़ता है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पहले भी दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करने की मांग कर चुकी हैं। दिल्ली में पीएम आवास, 10 जनपथ, दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर जबरदस्त प्रदर्शनों के बीच शुरू हो रहे सत्र में विपक्षी हमलों से सरकार का बचना आसान नहीं होगा।


वित्त विधेयकों की मुश्किलें

बजट सत्र के दूसरे हिस्से में वित्त विधेयक पारित कराने में विफल रहने पर सरकार का बहुमत का दावा खंडित हो सकता और देश में समय से पहले सरकार को आम चुनाव कराना पड़ सकता है। संक्षिप्त अवकाश के बाद संसद में बजट सत्र के दूसरे हिस्से में सरकार की प्राथमिकता महत्वपूर्ण वित्त विधेयकों को पारित कराने की होगी। खाद्य सुरक्षा विधेयक, भूमि अधिग्रहण, भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक के अलावा पेंशन और बीमा क्षेत्र में सुधारों से संबंधित विधेयक इस कड़ी में शामिल हैं। सरकार ने सर्वदलीय बैठक में हालांकि भूमि अधिग्रहण विधेयक पर राजनीतिक सहमति बना ली है, लेकिन 2जी पर जेपीसी की मसौदा रिपोर्ट से सरकार ने भाजपा से नाराजगी मोल ले ली है। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने साफ तौर पर कहा है कि कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के आचरण को देखकर भाजपा अहम विधेयकों पर सरकार को संसद में सहयोग करने के बारे में पुनर्विचार कर सकती है। संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव का रूख भी भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सकारात्मक नहीं दिख रहा। अगर सपा और भाजपा का इस मुद्दे पर गठजोड़ हुआ तो सरकार के लिए भूमि अधिग्रहण विधेयक समेत अन्य कई विधेयकों का भविष्य अधर में लटक सकता है। अगर ऐसा हुआ तो संप्रग सरकार के लिए यह बड़ी मुश्किल होगी क्योंकि इसमें खाद्य सुरक्षा विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधेयक लटक जाएंगे जिसके सहारे कांग्रेस पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में एक बड़े वोट बैंक को लुभाने की तैयारी में है।


बहरहाल, करीब एक महीने तक चलने वाला संसद सत्र संप्रग सरकार के लिए काफी मुश्किल भरा होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्र के दौरान भाजपा और सपा की पूरी कोशिश सरकार को बैकफुट पर लाने की होगी। जिस तरह से मुलायम लगातार इस बात की भविष्यवाणी कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव इसी साल होंगे, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि मुलायम ने निश्चित रूप से कोई सियासी चाल सोच रखी होगी जिसे अंजाम देकर सरकार को सदन में मात दे दिया जाए।


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