Friday, January 20, 2012

पंकज पचौरी ने कभी कहा था, हमारा मीडिया चोर है!

पंकज पचौरी ने कभी कहा था, हमारा मीडिया चोर है!



पंकज पचौरी ने मीडिया को विदा कहा, पीएम को सलाह देंगे

19 JANUARY 2012 9 COMMENTS
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सवाल ये नहीं है कि एनडीटीवी के विशेष संपादक पंकज पचौरी अब प्रधानमंत्री और सरकार की जबान बोलेंगे, सवाल ये है कि यह जबान बनने के लिए उन्‍होंने एनडीटीवी में रहते हुए सरकार के पक्ष में जो लॉबिंग की होगी, वह पत्रकारिता के साथ किस किस्‍म का भितरघात रहा होगा। वैसे तो राडिया कांड ने सरकार और मीडियाकार के रिश्‍तों से थोड़ा परदा उठाया ही था और एक हद के बाद मीडिया का प्रतिपक्षी स्‍वर मद्धिम पड़ने से जुड़ी सरकारी नकेल के बारे में बहुत सारी बातें जगजाहिर ही है – फिर भी पता नहीं क्‍यों, देश के नागरिकों में मीडिया को लेकर तीस-चालीस फीसदी भरोसा अब भी बना हुआ है। इसी भरोसे की जमीन पर जब कल शाम मैंने फेसबुक पर पंकज पचौरी के बारे में यह नयी सूचना डाली, तो लोग हैरान रह गये। कुछ तैश में भी आये, लेकिन कुछ ने इस किस्‍म की आवाजाही को नौकरी की अदल-बदल बताया। उनके लिए मीडिया और सरकार महज नौकरी करने के दो ठिकाने हैं। दायित्‍वबोध मानो दोनों ही जगह से गायब हो। भूमिका क्‍या बांधनी है, देख ही लीजिए कि जनता बोल क्‍या रही है…

अविनाश



आमुखमीडिया मंडी

पंकज पचौरी ने कभी कहा था, हमारा मीडिया चोर है!

19 JANUARY 2012 7 COMMENTS

♦ विनीत कुमार

"मीडिया को आज डिसाइड करना है कि आपको राजनीति करनी है, कार्पोरेट बनना है या मीडिया बनकर ही रहना है। मीडिया में भ्रष्टाचार है, गड़बड़ी है और वो इसलिए है कि हम अपने धर्म का पालन नहीं कर रहे हैं। आज जो बर्ताव बाबा रामदेव के साथ हुआ, यही बर्ताव बहुत जल्द ही हमारे साथ होनेवाला है। हमारे खिलाफ माहौल बन चुका है। लोग टोपी और टीशर्ट पहनकर कहेंगे – मेरा मीडिया चोर है।"

पंकज पचौरी


संवाद 2011 में "मीडिया और भ्रष्टाचार की भूमिका" पर बात करते हुए एनडीटीवी के होनहार मीडियाकर्मी पंकज पचौरी जब अंदरखाने की एक के बाद एक खबरें उघाड़ रहे थे और ऑडिएंस जमकर तालियां पीट रही थी, उन तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अंबिका सोनी (सूचना और प्रसारण मंत्री, भारत सरकार) की ताली भी शामिल थी। चेहरे पर संतोष का भाव था और वो भीतर से पंकज पचौरी की बात से इस तरह से गदगद थी कि जब उन्हें बोलने का मौका आया, तो अलग से कहा, पंकज पचौरीजी ने जो बातें कही हैं, वो मीडिया का सच है, इस सच के आईने को बाकी पत्रकारों को भी देखना चाहिए। पंकज पचौरी के नाम पर एक बार फिर से तालियां बजीं और उस दिन वो उस सर्कस/सेमिनार के सबसे बड़े कलाबाज साबित हुए। ये अलग बात है कि पंकज पचौरी की ये कलाबाजी किसी घिनौनी हरकत से कम साबित नहीं हुई। पंकज पचौरी ने कहा था CWG 2010 पर कैग की आयी रिपोर्ट को मीडिया ने जोर-शोर से दिखाया, लेकिन इसी मीडिया को हिम्मत नहीं थी कि वो रिपोर्ट में अपने ऊपर जो बात कही गयी है, उसके बारे में बात करे। वो नहीं कर सकता, क्योंकि वो पेड मीडिया है। लेकिन पंकज पचौरी ने ये नहीं बताया कि उनके ही चैनल एनडीटीवी ने कैसे गलत-सलत तरीके से टेंडर लिये थे। आप चाहे तो कैग की रिपोर्ट चैप्टर-14 देख सकते हैं।

पत्रकार से मीडियाकर्मी, मीडियाकर्मी से मालिक और तब सरकार का दलाल होने के सफर में नामचीन पत्रकारों के बीच पिछले कुछ सालों से मीडिया के किसी भी सेमिनार को सर्कस में तब्दील कर देने का नया शगल पैदा हुआ है। उस सर्कस में रोमांच पैदा करने के लिए वो लगातार अपनी ही पीठ पर कोड़े मारते चले जाते हैं और ऑडिएंस तालियां पीटने लग जाती है। ये ठीक उसी तरह से है, जैसे गांव-कस्बे में सड़क किनारे कोई कांच पर नंगे पैर चलता है, पीठ पर सुइयां चुभो कर छलांगें लगाता है… दर्शक उसकी इस हरकत पर जमकर तालियां बजाते हैं। मीडिया सेमिनारों में राजदीप सरदेसाई (हम मालिकों के हाथों मजबूर हैं), आशुतोष (मीडिया लाला कल्चर का शिकार है) के बाद पंकज पचौरी विशेष तौर पर जाने जाते हैं। उस दिन भी उन्होंने ऐसा ही किया और अपनी ईमानदारी जताने के लिए खुद को चोर तक करार दे दिया। मीडिया का यही चोर अब देश के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी के कम्युनिकेशन अडवाइजर नियुक्त किये गये हैं। हमें सौभाग्य से देश का ऐसा प्रधानमंत्री नसीब हुआ है, जो अच्छा-खराब बोलने के बजाय चुप रहने के लिए मशहूर है। ऐसे में पंकज पचौरी दोहरी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए उनकी टीम के सूरमा होने जा रहे हैं। पंकज पचौरी की सोहबत में हमारे प्रधानमंत्री बोलेंगे, टीवी ऑडिएंस की हैसियत से उन्हें अग्रिम शुभकामनाएं।

एनडीटीवी से मोहब्बत करनेवाली ऑडिएंस और प्रणय राय के स्कूल की पत्रकारिता पर लंबे समय तक यकीन रखनेवाली ऑडिएंस चाहे तो ये सवाल कर सकती है कि जो मीडियाकर्मी (भूतपूर्व) प्रणय राय का नहीं हुआ, वो कांग्रेस का क्या होगा? चाहे तो ये सवाल भी कर सकती है कि जो पत्रकार कांग्रेस का हो सकता है, वो किसी का भी हो सकता है। लेकिन मीडियाकर्मी और सरकार की इस लीला-संधि में एक सवाल फिर भी किया जाना चाहिए कि तो फिर तीन-साढ़े तीन सौ रुपये महीने लगाकर टीवी देखनेवाली ऑडिएंस क्या है? मुझे कोई और नाम दे, उससे पहले मैं खुद ही अपने को कहता – चूतिया। बात सरकार की हो या फिर मीडिया की, हम चूतिया बनने और कटाने के लिए अभिशप्त हैं। अब इसके बाद आप चाहे तो जिस तरह से मीडिया विमर्श और बौद्धिकता की कमीज ऐसी घटनाओं पर चढ़ाना चाहें, चढ़ा दें।

एनडीटीवी मौजूदा सरकार की दुमछल्‍ला है, ये बात आज से नहीं बल्कि उस जमाने से मशहूर है, जब एनडीटीवी के हवा हो जाने और बाद में सॉफ्ट लोन के जरिये बचाये जाने की खबरें आ रही थी। कॉमनवेल्थ की टेंडर और बीच-बीच में सरकार की ओर से हुई खुदरा कमाई का असर एनडीटीवी पर साफतौर पर दिखता आया है। विनोद दुआ को लेकर हमने फेसबुक पर लगातार लिखा। एनडीटीवी की तरह ही दूसरे मीडिया हाउस के सरकार और कार्पोरेट के हाथों जिगोलो बनने की कहानी कोई नयी नहीं है। सच्चाई ये है कि नया कुछ भी नहीं है। संसद के गलियारे में पहुंचने के लिए या फिर मैरिन ड्राइव पर मॉर्निंग वॉक की हसरत पाले दर्जनों मीडियाकर्मी सरकार और कार्पोरेट घरानों के आगे जूतियां चटखाते फिरते हैं। नया है, तो सिर्फ इतना कि जो दलाली करता है, वही पत्रकारिता कर सकता है और वही ईमानदार करार दिया जा रहा है। पिछले दो-तीन सालों में अच्छी बात हुई है कि सब कुछ खुलेआम हो रहा है। जो बातें आशंका और अनुमान के आधार पर कही जाती थीं, उसे अब मीडिया संस्थान और मीडियाकर्मी अपने आप ही साबित कर दे रहे हैं। ये हमारे चूतिया बनने के बावजूद बेहतर स्थिति है कि हम उन्हें सीधे-सीधे पहचान पा रहे हैं। ये अलग बात है कि ऐसे में देश के दल्लाओं का हक मारा जा रहा है और शायद मजबूरी में वो आकर पत्रकारिता करने लग जाएं।

मीडिया और मीडियाकर्मियों के कहे का भरोसा तो कब का खत्म हो चुका है। पंकज पचौरी के शब्दों में कहें, तो ये खुद समाज का खलनायक बन चुका है। ऐसे में चिंता इस पर होनी चाहिए कि हम चूतिये जो सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते-बकते आये हैं, इन मीडिया खलनायकों के लिए क्या उपाय करें? क्या ये सिनेमा में परेश रावल और गुलशन ग्रोवर को रिप्लेस करने तक रह जाएंगे या फिर सामाजिक तौर पर भी इनका कुछ हो सकेगा? मीडिया की श्रद्धा में आकंठ डूबे भक्त जो इसे चौथा स्तंभ मानते हैं, उनसे इतनी अपील तो फिर भी की जा सकती है कि अब तक आप जो पत्रकारिता के नायक या मीडिया हीरो पर किताबें लिखते आये हैं, प्लीज ऐसी किताबें लिखनी बंद करें। अब मीडिया खलनायक और खलनायकों का मीडिया जैसी किताबें लिखें, जिससे कि मीडिया की आनेवाली पीढ़ी इस बात की ट्रेनिंग पा सके कि उन्हें इस धंधे में पैर जमाने के लिए अनिवार्यतः दलाल बनना है और या तो कॉर्पोरेट या फिर सरकार की गोद में कैसे बैठा जाए, ये कला सीखनी है? ऐसी किताबें आलोक मेहता, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, विनोद दुआ और बेशक पंकज पचौरी लिखें, तो ज्यादा प्रामाणिक होंगी।

डिस्क्लेमर : हमें इस पूरे प्रकरण में अफसोस नहीं है बल्कि एक हद तक खुशी है कि जो पंकज पचौरी स्क्रीन पर जिस दलाली की भाषा का इस्तेमाल करते आये हैं, हम उसे सुनने से बच जाएंगे… और किसी तरह का आश्चर्य भी नहीं क्योंकि एनडीटीवी पर पिछले कुछ सालों से इससे अलग कुछ हो भी नहीं रहा है। एक तरह से कहें, तो उन्होंने प्रणय राय के साथ भी किसी किस्म का धोखा नहीं किया है, जो काम वो अब तक अर्चना कॉम्प्लेक्स में बैठकर किया करते थे, अब उसके लिए मुनासिब जगह मुकर्रर हो गयी है। रही बात भरोसे और लोगों के साथ विश्वासघात करने की, तो इस दौर में सिर्फ मौके के साथ ही प्रतिबद्धता जाहिर की जा सकती है और किसी भी चीज के साथ नहीं।

(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्‍ण मीडिया विश्‍लेषक। ओजस्‍वी वक्‍ता। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्‍लॉग राइटर। कई राष्‍ट्रीय सेमिनारों में हिस्‍सेदारी, राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। हुंकार और टीवी प्‍लस नाम के दो ब्‍लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)



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