Saturday, May 4, 2013

फेसबुकिया ब्राह्मण मित्रों से एक संवाद ब्राह्मण प्रभुत्व के पीछे अद्भुत बात एच एल दुसाध

फेसबुकिया ब्राह्मण मित्रों से एक संवाद   

          ब्राह्मण प्रभुत्व के पीछे अद्भुत बात

                               एच एल दुसाध  

मेरे फेसबुकिया मित्र श्रीनिवासजी ने 2 मई को पोस्ट किये गए  मेरे लेख-वर्णवादी आरक्षण का सर्वव्यापी दायरा- पर कमेन्ट करते हुए  लिखा था,' कुछ तो अद्भुत बात रही होगी प्राचीन काल के ब्राह्मणों में ,जो अल्पसंख्यक होकर भी सबके सम्मान और सेवा के एकाधिकारी बने रहे,हजारों साल तक.आखिर वे कौन से कारण थे,जो बहुसंख्यक जनता अल्पसंख्यक लोगों का अनुसरणकारी और अनुगामिनी बनी रही,वह भी हजारों साल तक.आखिर इस सवाल का जवाब भी ढूंढने की कोशिश कीजिये,क्यों बहुसंख्यक आबादी गुलाम बनी रही,क्यों कोई क्रांति या विद्रोह नहीं किया ब्राह्मण साम्राज्यवादियों के विरुद्ध ?आखिर वह कौन सी कमजोरियां थीं,जिनके चलते बहुसंख्य लोग मुट्ठी भर ब्राह्मणों के गुलाम बने रहे...'

फेसबुक श्री निवासजी की टिप्पणियां बड़ी चाव से पढते रहता हूँ.वे  हल्की बातें नहीं करते.अक्सर उनकी बातों में राष्ट्रहित की गंभीर चिंता झलकती है,इसलिए मैं समझता हूँ उन्होंने ने सकारात्मक भाव से ही ब्राह्मणों के प्रभुत्व और बहुजनो की गुलामी के कारणों को जानने  का प्रयास किया है.हां.इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दलित बुद्धिजीवियों द्वारा ब्राह्मणों पर अविराम बौद्धिक प्रहार से ही आहत होकर ही उन्होंने सवाल दागे हैं. बहरहाल उन्होंने जो जिज्ञासा रखी हैं, बहुजन बुद्धिजीवी खुद से वही सवाल करते हुए, लंबे समय से अपने-अपने तरीके से उसके कारणों की तफ्तीश और उसके निवारण में जुटे हैं.इस विषय पर अपनी राय ज़ाहिर करने के पूर्व मैं अपने फेसबुक मित्रों को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि वे ब्राह्मण वर्ग के जरुर आलोचक हैं,पर व्यक्तिगत जीवन में किसी ब्राह्मण से मित्रता कायम करने से कोई परहेज़ नहीं करते .यह परंपरा बाबासाहेब डॉ.आंबेडकर के ज़माने से ही चली आ रही है.कट्टर चित्तपावन ब्राह्मण बालगंगाधर तिलक के लड़के श्रीपन्त धर ,जिन्होंने महाद तालाब अभियान के दौरान मनुस्मृति दहन में अग्रणी भूमिका अदा किया तथा दलित सरोकार के लिए आत्महत्या तक कर लिया,ब्राह्मणों के विराट आलोचक डॉ.आंबेडकर के बहुत प्रिय रहे.इतने प्रिय कि जब महाद अभियान के दौरान ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज संगठन  ने अपने समर्थन के विनिमय में श्रीपन्त धर व अन्य ब्राह्मणों को अभियान से बाहर रखने के की शर्त रखा तो उसे खारिज करने में आंबेडकर ने जरा भी बिलम्ब नहीं किया.उन्होंने सत्यशोधकों के बजाय अपने ब्राह्मण मित्रों को तरजीह दिया.खुद मेरे लेखों में आपको ब्राह्मणों के विरुद्ध काफी उग्रता झलकती होगी,पर सच्चाई यह है कि व्यक्तिगत जीवन में मेरे भी कई मित्र ब्राह्मण हैं जो मेरे मिशन में बढ़ चढ कर सहयोग करते हैं.सच्ची बात तो यह है कि ब्राह्मणों ने इस देश और यहाँ के बहुसंख्य लोगों के साथ इतना अन्याय किया है कि कोई भी व्यक्ति यदि निरपेक्षभाव से इतिहास में अदा की गई उनकी भूमिका का आकलन करे तो हमारी तरह वह भी उनका आलोचक बन जायेगा. बहरहाल जिस अद्भुत कारण से ब्राह्मणों का प्रभुत्व कायम हुआ उसे यदि एक वाक्य में बताना हो तो यही कहा जा सकता कि उन्होंने स्व-हित में बेनजीर तरीके से हिंदू ईश्वर और धर्मशास्त्रों का इस्तेमाल किया उसके कारण ही चिरस्थाई तौर पर उनका प्रभुत्व कायम हुआ.

उन्होंने सबसे पहले तो मानव सृष्टि के दैविक –सिद्धांत (divine -theory)का अनूठा इस्तेमाल किया.दूसरे संगठित धर्मो ने जहां अपने अपने दैविक सिद्धांत के तहत अपने-अपने ईश्वर द्वारा नर-मादा पैदा करवाया वहीँ ब्राह्मणों ने हिंदू-ईश्वर के विभन्न अंगों से चार किस्म (वर्ण) के लोग पैदा करवाया.इनमें हिंदू ईश्वर के उत्तमांग(मुख) से पैदा होने के कारण ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ तो उसी ईश्वर के जघन्य अंग(पैर) से पैदा होने के कारण शुद्रातिशूद्र चिरकाल के लिए निकृष्ट कोटि के मनुष्यप्राणी में गण्य होने के लिए अभिशप्त हुए.प्रत्येक धर्म का चरम लक्ष्य अपने-अपने धर्मावलम्बियों को पारलौकिक सुख(मोक्ष) सुलभ कराना रहा.इस  कार्य के लिए हिंदू उर्फ ब्राह्मण धर्म(इस्लाम विजेताओं के आगमन पूर्व हिंदू धर्म असल में ब्राह्मण धर्म के नाम से प्रचलित रहा)में जिस तरह स्व-धर्म पालन हेतु 'कर्म-शुद्धता'  व 'वर्ण-शुद्धता' को अनिवार्य तथा 'कर्म-संकरता' तथा 'वर्ण-संकरता' को निषेध किया गया उससे शक्ति के स्रोतों के अत्यंत असम बंटवारे का जो चिरस्थाई प्रावधान सृष्ट हुआ,उसके फलस्वरूप मानवजाति की सबसे बड़ी समस्या , आर्थिक और सामाजिक –विषमता, के मामले में भारत हमेशा के लिए विश्व चैम्पियन बन गया.कर्म-शुद्धता और वर्ण शुद्धता की जो कीमत शुद्रातिशूद्र और महिलाएं आज भी अदा कर रहे हैं ,उसकी कल्पना अन्य किसी सभ्य समाज में दुष्कर है.मोक्ष की आड़ में ब्राह्मण उर्फ हिंदू उर्फ वर्ण- धर्म में शक्ति के स्रोतों का असम बंटवारा किया गया  उसमे अर्थ –सत्ता और राज-सत्ता भले ही क्रमशः वैश्यों और क्षत्रियों के हाथ में आई,किन्तु जिस तरह ब्राह्मणों ने अपनी छवि 'भू-देवता' के रूप में प्रतिष्ठित करने का सफल उद्योग लिया, उससे लक्ष्मी-पुत्र(वैश्य) जहां उनके चरणों में लोटने के लिए विवश रहे वहीं जन-अरण्य के 70 वर्ष के सिंह (क्षत्रिय)तक भी उनके 10 वर्ष के बच्चों तक को पिता मानकर आशीर्वाद देने के लिए मजबूर रहे.जब शास्त्रों से शक्तिमान बने भू-देवों के सामने शस्त्रधारी क्षत्रिय और अपार धन दौलत के स्वामी वैश्य पूरी तरह घुटने टेकने के लिए विवश रहे तो आर्थिक-राजनीतिक और धार्मिक शक्ति से पूरी तरह शून्य शुद्रतिशूद्र और महिलाओं की उनके समक्ष क्या औकात रही होगी, इसकी कल्पना कोई भी कर सकता है.बहरहाल धर्म की आड़ में हर तरह का अन्याय करने के बावजूद ब्राह्मण तमाम गैर-ब्राह्मणों( क्षत्रिय-वैश्य और शुद्रातिशूद्रों) के लिए पूज्य बने रहे तो इसलिए कि उन्होंने सभी अपकर्म ईश्वर की आड़ में किया.जो वर्ण-व्यवस्था भारत की तमाम समस्यायों की जड़ है तथा  जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित हो रहा है ,उसके प्रवर्तक आर्य ब्राह्मण किन्तु वैदिक काल के अनाम मनीषियों;मध्ययुग के सुर-तुलसी-मीरा तथा आधुनिक युग के निराला,प्रसाद ,प्रेमचंद, महादेवी वर्माओं द्वारा रचित असंख्य साहित्य के माध्यम से प्रचारित किया गया उसे ईश्वर- सृष्ट.वर्ण-व्यवस्था के ईश्वर-सृष्ट प्रचारित होने के फलस्वरूप गैर-ब्राह्मणों के समक्ष ब्राह्मण  सीधे शोषक के रूप में आने से बच गए और धर्म-भीरु गैर-ब्राह्मणों द्वारा भू –देवता के रूप में आज भी पूजित हो रहे हैं.

वर्ण-व्यवस्था के ईश्वर-सृष्ट प्रचारित किये जाने का परिणाम कितना प्रभावी रहा इसका अंदाज़ा हम  ईसा .पू.चौथी सदी में ग्रीस के  महान दार्शनिक प्लेटो द्वारा 'द रिपब्लिक'में प्रतिपादित त्रि-वर्ग सिद्धांत की विफलता में देख सकते हैं.इतिहास बताता है कि प्राचीन एथेंस और उसके पार्श्ववर्ती इलाकों में जब दार्शनिक सुकरात ने वहां के युवा समुदाय को युक्तिशील स्वाधीनता और साम्य के नशे में मतवाला बनाना शुरू किया तब वहां के शासकों के समक्ष उन्हें 'हैमलेक'नामक जहर पिलाकर मृत्यु वरण करवाने से भिन्न कोई उपाय नहीं रहा.वैसे में उनके योग्य शिष्य प्लेटो प्राण-भय से पलायन करने के लिए बाध्य हुए.किन्तु एक अंतराल के बाद न सिर्फ उन्होंने आत्म-समर्पण कर दिया बल्कि शासक समुदाय के हित में भारत की  वर्ण-व्यवस्था सादृश्य त्रि-वर्ग-(क)सत्यसंरक्षक अथवा शासक ,(ख)शासन सहायक अथवा योद्धा और (ग)शिल्प-संचालक अथवा कृषक एवं मजदूर -का सिद्धांत गढा.वेद  के पुरुष-सूक्त की भांति उन्होंने विभिन्न वर्गों की तुलना मानव देह से की .उन्होंने हिंदू धर्म-शास्त्रकारों की भांति प्रत्येक वर्ग के सदस्यों के लिए विशेष-विशेष दायित्व एक अनिवार्यरूप से पालनीय कर्तव्य के रूप में स्थिर किया .उनका कहना था  एक वर्ग के सदस्य के लिए,दूसरे वर्ग के लिए निर्दिष्ट कर्तव्य करना या उस काम को करने की योग्यतार्जन क्षमता दूसरे वर्ग के सदस्य में नहीं होगी.किन्तु तमाम प्रयासों के बाद बावजूद एथेंस के जागरूक अवाम ने प्लेटो की त्रि-वर्गीय परिकल्पना को नकार दिया.उनके त्रि-वर्गीय सिद्धांत के ध्वस्त होने के पीछे एकमात्र कारण यह रहा कि  वे अपनी परियोजना को ईश्वर-सृष्ट प्रचारित करने में वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों की भांति सफल न हो सके.

बहरहाल ब्राह्मणों ने वर्ण-व्यवस्था के निर्माण के पृष्ठ में 33 करोड देवताओं और असंख्य धार्मिक साहित्य का इस खूबी के साथ इस्तेमाल किया कि शुद्रातिशूद्र दैविक-गुलाम (divine-slave) में तब्दील होकर इस कदर वीभत्स-संतोषबोध के शिकार बन गए कि  उनमें राजा,किसी धाम का शंकराचार्य होने या उद्योगपति-व्यापारी बनने की महत्वाकांक्षा चिरकाल के लिए कपूर की भांति उड़ गई.किन्तु 21 वीं सदी में भी उनकी स्थिति गुलामो जैसी है तो इसलिए कि  वे वर्ण-व्यवस्था के अर्थशास्त्र को पहचानने में पूरी तरह विफल रहे.सिर्फ वे ही क्यों देश  के बाघा –बाघा समाजशास्त्री तथा विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर तक इसे आर्थिक नहीं मुख्यतःसामाजिक समस्या मानते रहे हैं,शायद इच्छाकृत रूप से .इससे पूर्व यदि मध्य युग में जाएँ तो पता चलेगा कि उस ज़माने के रैदास और कबीर जैसे कथित क्रन्तिकारी संतों को वर्ण-व्यवस्था के पीछे क्रियाशील साम्रज्यवादी षड्यंत्र तो दूर इसके अर्थशास्त्र तक का  रत्ती भर भी इल्म नहीं था.इसके लिए उन्हें दोष भी नहीं दिया जा सकता जब हर चीज को आर्थिक को नज़रिए से परखनेवाला मार्क्स इसके अर्थ शास्त्र को समझने में पूरी तरह व्यर्थ रहा तो औरों से क्या प्रत्याशा करना.बहरहाल वर्ण-व्यस्था के निर्माण के पीछे एक साम्राज्यवादी परिकल्पना है,जबतक इसकी उपलब्धि कर बहुजन समाज के लोग शक्ति के स्रोतों में अपना प्राप्य हासिल करने की सफल लड़ाई नहीं लड़ लेते तबतक उन्हें हमारे फेसबुक मित्र श्रीनिवास राय शंकर की भाषा में उन्हें गुलाम बने रहना पड़ेगा.

मित्रों चूंकि यह फेसबुक के ब्राह्मण मित्रों से संवाद है,मार्क्सवादियों से नहीं ,इसलिए कोई शंका आपके सामने रखना नहीं चाहता फिर भी  निम्न  निवेदन करने से खुद को नहीं रोक पा रहा हूँ-

मेरे गैर-मार्क्सवादी मित्रों क्या ऐसा नहीं लगता कि 33 करोड देवताओं और असंख्य धर्म-शास्त्रों का स्व-हित में उत्तमोत्तम इस्तेमाल करके ही ब्राह्मण वर्ग आज भी, दीन-हीन बहुजन ही नहीं,धनवान और बलवान वैश्य एवं क्षत्रियों तक  का सम्मान जीतने में कामयाब है जबकि दैविक गुलाम (दलित-पिछड़े) वर्ण-व्यवस्था का अर्थशास्त्र नहीं समझ पाने के कारण आतंरिक साम्राज्यवाद के गुलाम बने हुए हैं?

दिनांक:4 मई,2013      जय भीम-जय भारत          

                           


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