Wednesday, May 8, 2013

….तो मोदी भी सलवार बाबा की तरह भागेंगे !!!

….तो मोदी भी सलवार बाबा की तरह भागेंगे !!!


क्या मोदी पीएम नहीं, उमा भारती और कल्याण के नसीब को प्राप्त होने वाले हैं।

 संघ और मोदी दोनों एक दूसरे के पैंतरों को ताड़ गये हैं।

अमलेन्दु उपाध्याय

मोक्ष नगरी हरिद्वार में गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी और योग के कॉरपोरेटी अवतार रामकृष्ण यादव उर्फ बाबा रामदेव के बीच जमकर घुटी। बाबा को मोदी इतने भाये कि उन्होंने भाजपा को मोदी नहीं तो भाजपा नहीं, टाइप की धमकी दे डाली। मोदी ने भी बाबा की शान में कसीदे काढ़े।

मोदी और बाबा के मिलन के निहितार्थ बड़े गहरे हैं। बाबा अपने कारोबार के सिलसिले में आयकर विभाग और अन्य सरकारी महकमों की जाँच में घिरे हुये हैं और अगर सीबीआई उनके लापता गुरु शंकरदेव मामले की निष्पक्ष जाँच करती रही तो बाबा का नपना भी तय है। ऐसे में बाबा को अगर मोदी में अपना तारणहार दिख रहा है तो कोई आश्चर्य भी नहीं है। लेकिन मोदी ने जिस तरह से बाबा के कंधे पर बन्दूक रखकर भाजपा और संघ नेतृत्व को धमकी दिलवाई है उसके पीछे की रणनीति समझने की जरूरत है।

दरअसल मोदी अपने कॉरपोरेट संरक्षकों की बदौलत मीडिया मैनेजमेन्ट के सहारे संघ-भाजपा पर हावी तो हो गये हैं लेकिन संघ और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मोदी की इन हरकतों से काफी नाराज़ बताया जा रहा है। मोदी संघ के अनुशासन के लिये गम्भीर चुनौती बनकर उभरे हैं जिसके चलते संघ को अपना हिन्दू राष्ट्र का सपना धूल-धूसरित होता नजर आ रहा है। संघ के दुलारे पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को जिस तरह आखरी समय में अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा उससे संघ की खासी किरकिरी हुई और संघ नेतृत्व को मोदी विरोधी भाजपा का धड़ा यह बात समझा रहा है कि गडकरी के खिलाफ मीडिया में माहौल बनाने में मोदी की भूमिका थी। और संभवतः यह आरोप सही भी हैं।

ऐसी शंका इसलिये भी प्रबल हो जाती है कि मोदी के विरोधी समझे जाने वाले सुषमा स्वराज और लाल कृष्ण अडवाणी के खिलाफ भी मोदी की शह पर भ्रष्टाचार के शोशे छोड़े गये हैं। मोदी की इन हरकतों से संघ की चिन्ता का बढ़ना हर लिहाज से जायज है। एक तो चुनाव का वर्ष है ऐसे में अगर किसी खुलासे पर सरकार ने सख्त एक्शन ले लिया तो आरोप साबित होंगे या नहीं होंगे, बाद की बात है लेकिन भाजपा का दिल्ली अभियान तो ठप्प हो जायेगा।

लगता यही है कि मोदी संघ के कब्जे से बाहर जा चुके हैं और लगातार वह संघ नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। मोदी की इस रणनीति को साफ देखा जा सकता है। मोदी जब भी अपने गुणगान करते हैं तो कभी भी अपने उत्थान में भाजपा के योगदान की बात नहीं करते हैं। वह लगातार 6 करोड़ गुजरातियों के स्वाभिमान की बात करते हैं, अपने विकास मॉडल की बात करते हैं लेकिन भूलकर भी अपनी उपलब्धियों के लिये भाजपा का नाम नहीं लेते हैं। अब संघ का मोदी के इस पैंतरे से सतर्क होना जायज है। जाहिर सी बात है कि हेडगेवार ने संघ की स्थापना इसलिये थोड़े न की थी कि 21 सदी में कोई मोदी भारत का पीएम बनाया जायेगा। संघ तो हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिये बनाया गया था। और मोदी तो लगातार संघ को ही चुनौती दे रहे हैं।

अमलेन्दु उपाध्याय: लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं। http://hastakshep.com के संपादक हैं. संपर्क-amalendu.upadhyay@gmail.com

असल में संघ और मोदी दोनों एक दूसरे के पैंतरों को ताड़ गये हैं। इसलिये अगर आने वाले कुछ दिनों में भाजपा में सिर फुटौव्वल बढ़ी दिखाई दे तो कोई आश्चर्य नहीं। दरअसल संघ मोदी के कॉरपोरेट कनेक्शन और मीडिया मैनेजमेन्ट का उपयोग अपनी ताकत बढ़ाने के लिये तो करना चाहता है लेकिन समय आया भी तो संघ किसी भी हाल में अनुशासनहीन मोदी को पीएम नहीं बनायेगा बल्कि उसकी प्राथमिकता शिवराज सिंह चौहान होंगे जिन्हें अडवाणी जी का आशीर्वाद प्राप्त है। सूत्र बताते हैं कि संघ ने इस दिशा में माहौल बनाने का काम शुरू कर दिया है और शिवराज को उदारवाद का अटल मार्का मुखौटा ओढ़ाना शुरू कर दिया है। इसी पहल के तहत शिवराज सरकार मुसलमानों को तीर्थ यात्रा जाने पर सब्सिडी देने जैसे काम कर रही है ताकि समय आने पर नीतीश, मुलायम और मायावती जैसे सहयोगियों के सामने उदार मुखौटा रख दिया जाये। उधर मोदी भी संघ के इस पैंतरे को ताड़ गये हैं इसलिये वह अपने हर संभावित प्रतिद्वंदी को निपटाने में लगे हैं।

भोपाल पहुँच कर उमा भारती का मोदी के समर्थन में बयानबाजी करना सीधे-सीधे शिवराज सिंह को चुनौती है। ठीक इसी तरह कल्याण सिंह का मोर्चा लेना भी यूपी में राजनाथ सिंह को चुनौती है। और बाबा रामदेव का भाजपा को धमकी देना अडवाणी जी को चुनौती देना है।

जो बात काबिले गौर है वह यह है कि मोदी की तरफ से संघ के चित्पावन ब्राह्मण नेतृत्व को चुनौती देने के लिये भाजपा के गैर ब्राहमण चेहरे मोर्चा संभाल रहे हैं। फिर चाहे वे उमा भारती हों, कल्याण सिंह हों या यशवंत सिन्हा और चाहे वह बाहरी रामकृष्ण यादव उर्फ बाबा रामदेव हों। इतना ही नहीं मोदी जिन तथाकथित संतों के पास जा रहे हैं वे भी सभी गैर ब्राह्मण हैं।

गौर करने लायक एक बात यह है कि जो भी लोग मोदी की तरफ से मोर्चा ले रहे हैं वे लोग वह हैं जो कभी न कभी संघ नेतृत्व के आदेशों की अवहेलना करते रहे हैं। उमा और कल्याण तो भाजपा से बाहर भी किये जा चुके हैं जबकि यशवंत भी संघ को मुँह चिढ़ाते ही रहते हैं।

तो क्या संघ मोदी जैसे अनुशासनहीन को अपनी कमान सौंप देगा। संघ देख रहा है कि गुजरात में भी मोदी की खिलाफत करने वाले स्वयंसेवकों का हश्र या तो हरेन पण्डया जैसा होता है या फिर संजय जोशी जैसा। ऐसे में कोई यह उम्मीद कैसे कर सकता है कि संघ जानते बूझते केन्द्र में भी अपने स्वयंसेवकों का भविष्य हरेन पण्डया या संजय जोशी जैसा बन जाने देगा?

इसीलिये दबी जुबान में ही अब संघ समर्थकों ने ही कहना शुरू कर दिया है कि मोदी और बाबा रामदेव की इतनी हैसियत बन गई है कि वह भाजपा को निर्देश दें कि कौन 2014 में भाजपा की कमान संभाले तो भाजपा से अलग होकर लड़ क्यों नहीं लेते। बात कायदे की भी है। ऐसा ही मुगालता एक समय में कल्याण सिंह और उमा भारती को हो चुका है और उसका नतीजा सामने है।

तो क्या मोदी पीएम नहीं, उमा भारती और कल्याण के नसीब को प्राप्त होने वाले हैं। बहुत संभव है। 2014 के बाद हर हाल में मोदी कल्याण सिंह या उमा भारती बना दिये जायेंगे। जब भाजपा औंधे मुँह गिरेगी तो उसका दोष हर हाल में मोदी के सिर आना है, जो जायज भी है। सामान्य सी बात है जब मोदी की आँधी पर चढ़ कर भाजपा 2014 में समर में उतरेगी तो आँधी के बाद की तबाही आडवाणी, राजनाथ या कोई भागवत क्यों झेलेगा, उसे भी तो मोदी ही झेलेंगे। इसलिये मोदी का सारा उतावलापन 2014 के बाद गुजरात में खुद को बचाने की कवायद है वरना सबको मालूम है भाजपा का जो हश्र होना है। वैसे जिसके घर में अंबानी, अडानी और बाबा रामदेव हों वह ईमानदार भी हो सकता है?  इस सदी का महानतम चुटकुला यही है। वैसे भी संघ को चुनौती देंगे तो मोदी भी उसी तरह भागेंगे जैसे बाबा दिल्ली के रामलीला मैदान से भागे थे। जय बोलो रामकृष्ण यादव उर्फ बाबा रामदेव की।

 

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