डॉ. बाबासाहब आंबेडकर और उनका "आर्थिक जनतंत्र" मिशन
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बाबासाहब का जन्म भारत के एक अछुत समझे जानेवाले "महार" नामक जाती में हुआ. जाती व्यवस्था हिन्दू धर्म की उपज रही. हिन्दू का मतलब भले ही "हिन" हो, पर उसके हिन होने के अन्य कुछ कारण है, उसमे पहला कारण है, वह कुछ लोगों को मानवीय अधिकार देने से इंकार करता है, जैसे की अस्पृश्य जातियों को. जो अवर्ण जातियों का एक हिस्सा है. दूसरा की कुछ लोगों को मानवीय अधिकार तो बहाल किया जाता है, पर वह जन्म के आधार पर, बुद्धि के आधार पर नहीं. जिस जाती, वर्ग के परिवार में जन्म हुआ उनकी जात ही उसे मिलती है, व्यक्ति चाहकर भी दुसरे जाती में नही जा सकता. जिसे जनतंत्र नही कहा जा सकता. क्योंकि उसमे न न्याय है, न आझादी है, न समता है और न भाईचारा है. व्यकी का जिस जाती में जन्म होगा, उसे उसी जाती में मरना है. अगर वह जाती नीच है, तो उसे नीच ही समझा जाएगा. यह "वर्ण" के आधार पर तय होता है. जन्म आधारित वर्ग ही वर्ण है. तीसरा कारण जन्म के आधारपर अन्याय, गुलामी, विषमता और तिरस्कार निर्भर होता है.
जो सबसे ऊँचे जाती के परिवार में पैदा हुआ है, उसे उस जाती के अनुसार अन्याय, गुलामी, विषमता और तिरस्कार फ़ैलाने का अधिकार है. कहा जाता रहा है की वर्ण व्यवस्था ईश्वर, परमात्मा, भगवानने बनाई है, जिसने मानव और पुरे विश्व को बनाया. उनके बनाने में कोई दोष नहीं है. उसपर जीवनयापन किया जाए तो जीवन सुखदायी होगा. लेकिन इसे ईश्वर ने कब बनाई? क्या ईश्वर को संस्कृत भाषा आती थी जिसमे वेद, पुराण, ब्राह्मन्य, रामायण, महाभारत तथा मनुस्मृति नामक हिन्दू ग्रन्थ लिखे गए है? इन सभी ग्रंथो में वर्णव्यव्यस्था को उछाला है, सत्कार किया है, प्रसंशा और पालन हुआ है.
जाती जन्म की देन है. जन्म परिवार में होता है. परिवार में स्त्री और पुरुष का होना तय है. दोनों की शादी होना जरुरी है. वह चाहे स्वयंवर पद्धति से हो, या चुनाव के तौर पर हो. पर स्त्री को शादी के बाद "कन्यादान" किया जाता है. बाप, भाई या अन्य व्यक्ति कन्या को पुरुष के लिए दान किया जाता है, और स्त्री उसे मान्यता देती है. धन को मालिक जिस ढंग से, अपने मन मर्जी से प्रयोग में लाता है. जब चाहे उसे बेच भी सकता है, उसी ढंग से भारतीय स्त्री की साथ व्यवहार हुआ है. उसे भी परिवार में अवर्ण में ही जगह मिली है. "शुद्र, पशु और नारी, यह सब ताडन के अधिकारी" इस प्रकार शुद्र (और अतिशूद्र) तथा भारत के हिन्दू धर्मीय स्त्री वर्ग (चाहे वह फिर किसी भी वर्ण/ वर्ग की हो) उसे जानवर के जैसा पिटा जा सकता है. क्या हिन्दू धर्म की वर्ण, जाती व्यवस्था शुद्र, अतिशूद्र, भटके, एनटी, आदिवाशी (वनवाशी) तथा भारतीय हिन्दू धर्मीय स्त्रीयों को न्याय, स्वतंत्रता, समता और भाईचारा प्राप्त है? क्या उन्हें जनतंत्र के नैतीक मूल्यों के अनुसार आचरण मरने की आझादी हिन्दू धर्म ने दी है?
हिन्दू धर्म जाती व्यवस्था पर टिका है, जातीयों को वर्ण व्यवस्था के सभी नियम लागु है. वर्ण व्यवस्था परिवार पर निर्भर है, परिवार व्यक्ति पर निर्भर है, व्यक्ति में पुरुष को महान कहा गया है और स्त्रीयों को धन, माया. पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था में स्त्री गुलाम है, जैसे जानवर गुलाम होते है. शुद्र भी गुलाम है. व्यक्ति जिस परिवार में जन्मा उस परिवार की जाती शुद्रों को प्राप्त होता है, जो उनके लिए अन्यायकारी है. वैसे ही जिस परिवार का समाज समझा जाता उसमे स्त्रीयों को व्यक्ति, मानव नही, तो "धन" समझा गया है. उस धर्म के निति, नियम, आचार, पूजापाठ, देव, देवी, ईश्वरी विचार धारण करना, क्या अन्याय को बढ़ावा देना नहीं है? क्या यह जनतंत्र की हत्या करना नहीं है? स्त्रीयों को आर्थिक और राजकीय गुलामी से भले ही मुक्त किया जाएगा, पर वह परिवार से तो मुक्त नही होगी. परिवार में वह सौतेले व्यवहार की हमेशा शिकार रही है? जो जनतांत्रिक विचारों की शिकार है, उसकी मुक्ति कैसे संभव है? जिस परिवार में वह समता के लिए संघर्ष करना चाहती है. पुरुष उन्हें उनके मानवीय अधिकार बहाल करना नहीं चाहते, क्योंकि वे जातिवादी और वर्णवादी है, ऐसे परिस्थिति में वह "शादी" को स्वीकारती है? शादी के त्यौहारों में उसे "धन" (निर्जीव) का दर्जा दिया है. अगर वह खुद को धन नही, इन्सान, व्यक्ति मानव के रूप में देखती है, तो उसने परिवार की कल्पना, लालच क्यों करनी चाहिए?
क्या परिवार में औलाद के कोई मालिक होते है? अगर उसके पालक होते है, तो वे अपने अवलादों के साथ मालिक जैसा व्यवहार करके उसपर "शादी" क्यों थोंपते? स्त्री-पुरुष की परस्पर चाहत ही मैत्री है. जबतक चाहत है तबतक मैत्री है. चाहत नहीं, तो मैत्री क्यों? शादी यह जन्म- जन्मान्तर के बंधन कैसे है? परस्पर व्यवहार में खटास पैदा होनेपर भी उसे ढोना और ढोना नही हुआ तो दहेज़ की मांग करना, दहेज़ देना नही हुआ, तो जनतांत्रिक मूल्यों को चोंट पहुँचाना कितने प्रतिशत उचित है? गुनाह करनेवाले जितने दोषी है, उतने ही उसे बर्दास्त करनेवाले भी होते है, इस दृष्टी से देखा जाए, तो स्त्रियाँ भी जनतंत्र की अवहेलना करते रही है, फिर उसे जनतंत्र की मांग करने को कोनसा नैतिक अधिकार है? तथा जो लोग जाती के नामपर सौवलते लेना चाहते है, तो वे जातिविरोधी कैसे? जो जातियों को बढ़ावा देते है, वे जनतांत्रिक कैसे? जाती तो भेदभाव करती है. एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति का जाती के नामपर शोषण करता है, फिर वह योनिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, राजकीय हो या आर्थिक, तबतक उन्हें जनतांत्रिक अधिकार कैसे मिलेंगे?
बाबासाहब आंबेडकर जातिगत कोई भी लाभ लेने-देने के पक्ष में नही थे. उन्हें तो समाज के सभी अंगों में जनतंत्र ही चाहिए था. वह मिला सिर्फ राजकीय, पर उससे बाबासाहब संतुष्ट नही थे. उन्हें आदर्श, "आर्थिक जनतंत्र" की जरूरत थी. क्या हिन्दुधर्म के अनुसार जो लोग शुद्र और नारी के वर्ग में आते है, वे सब अम्बेडकरी दृष्टी से, "आदर्श जनतंत्र" पाना चाहते है? अगर उन्हें उसकी जरूरत है, तो उसने जातियों के नामपर दिए गए सभी सौवलते क्यों नही त्यागना चाहिए? परिवार में स्त्रियों को सम्मान नही मिलता हो तो उन्होंने पारिवारिक जीवन क्यों नही त्यागना चाहिए? पशुपक्षी में शादी, ब्याह नही होते, फिर भी उनके संताने बढती है या नहीं? व्यक्ति पर समाज की इच्छा क्यों थोंपनी चाहिए? जिस भारतीय हिन्दू परिवार को जाती का सिख्खा लगा है, वह परिवार जनतांत्रिक कैसे हो सकता? जो परिवार जनतांत्रिक नही है, उसका समाज जनतांत्रिक कैसे हो सकता? जो समाज जनतांत्रिक नही, जातिवादी, वर्णवादी है, उसमे न्याय, स्वतंत्रता, समता और भाईचारा कैसे हो सकता? जो समाज जातिवादी है, उसका देश जनतांत्रिक है, ऐसा कौन बुद्धिजीवी व्यक्ति कहेगा?
बाबासाहब आंबेडकर भारतीय "जातियों का उच्छेद" चाहते थे, इसलिए उन्होंने "एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट" ग्रन्थ लेखन कर सन १९३६ में भी उनके खिलाफ बगावत सुरु की. जाती के आधारपर अचुतों के साथ जो भेदभाव किया जाता था, उसका उन्होंने विरोध किया. "गोलमेज परिषद" में जातिविरोधी भुमिका ली और जातिगत किसी सवलतों आग्रह करने के बजाए पुरे भारतियों के सुखों के लिए "राजकीय तथा आर्थिक जनतंत्र" की मांग की. उसके पहले "सायमन कमीशन" के सामने भी उन्होंने संयुक्त भारत की वकालत की थी, जिसमे राजकीय तथा आर्थिक जनतंत्र की ही उनकी मांग थी, जिसमे सभी जातियों के लोगों को अपना हितैशी उमेदवार चुनने का अधिकार हो.
जातिगत आरक्षण पाना यह बाबासाहब का उद्धेश नहीं था, वह मज़बूरी में सवर्ण हिन्दुओं ने किया परिणाम था. जातियों के दुष्परिणामों को धोने के लिए सवर्ण हिन्दू नेताओं ने मज़बूरी में वह दिया है, जो पर्याप्त और अनुचित नही था. इसलिए बाबासाहबने भारतीय संविधान में आर्थिक जनतंत्र सम्मिलित करना चाहते थे. उसके लिए उनका अंतिम समयतक प्रयास रहा. मात्र कांग्रेस ने भारतीय संविधान में "धारा-३१" को सम्मिलित कर बाबासाहब के "आर्थिक जनतंत्र" के सपने पर पानी फेर दिया. बाबासाहब को पूरा पता था, की पुना समझौते में सवर्ण हिन्दू नेताओं ने दिया हुआ जातिगत राजनैतिक आरक्षण भारतीय संविधान लागु होने के बाद केवल १० साल में ही ख़त्म होनेवाला है. जातिगत आरक्षण यह जनतंत्र के लिए हानिकारक है. उसके बजाए "आर्थिक जनतंत्र" असीमित समय के लिए होगा. न की उन्होंने जातियों के अनुपात में आर्थिक सुविधाओं की मांग की थी. उससे जातियों के परिणाम भी सफा होने थे तथा जाती भी. इतनाही नहीं तो सभी वर्ग, वर्ण की स्त्रीया भी आझाद हुयी होती.
बाबासाहब की जय-जयकार करने वाले अम्बेडकरीभक्त, बाबासाहब के उद्धेश को नही जान पाए, जिन्होंने जाना भी होगा उन्होंने उसपर अमल नहीं किया. वे कार्य को कारण समज बैठे और कारण को कार्य. हेतु को भुले और उनके परिणामों को ही हेतु समज बैठे. अम्बेडकरीभक्त लोग परिणामों को साध्य, उद्धेश समझकर उनके प्राप्ति के लिए समय, संपत्ति और बुद्धि बर्बाद कर बैठे. जातिगत आरक्षण यह परिणाम, हेतु था. सभी भारतियों के लिए "राजकीय जनतंत्र के अंतर्गत ही आर्थिक जनतंत्र" की कायम स्वरूपी बहाली करना ही उनका उद्धेश, ध्येय था. भारतीय अछूत जातियों के सरकारी कर्मचारी और सभी भारतीय सक्षम स्त्रीयों ने बाबासाहब को धोका दिया. वे अपने और अपने परिवार को ही अम्बेडकरी समाज क्रांति समझ बैठे. "भीम नाम जपना और पराया धन अपना" समजकर ९०% भारतीय गरीब, शोषित, पीड़ित लोगों का शोषण करते रहे. वे जातीअंत अर्थात आदर्श "आर्थिक जनतंत्र" के अम्बेडकरी मिशन को जातिवादी वना बैठे. क्या वे बुद्धिजीवी थे/है? क्या वे इमानदार थे/है? क्या वे जनतांत्रिक थे/है?
बाबासाहब की जयजयकार करने के बजाए उनके "आर्थिक जनतंत्र" के उद्धेश को पाने के लिए सभी "जयभीम"वाले लोगों ने संघर्ष करना चाहिए, न की उनके "नाम" के लिए, न की उनके "स्मारक" के लिए, न की "जातिगत आरक्षण" के लिए. याद रखे, बाबासाहब खुद के नामों की जयजयकार नहीं चाहते थे, वे तो पुरे भारत के सभी लोगों के जीवन में सुख और चमन चाहते थे, जो "आर्थिक जनतंत्र" के शिवाय संभव नही था. धम्म स्वीकार करना भी यह उनका उद्धेश नही था, धम्म यह एक मार्ग, साधन है जो साध्य तक पहुंचाता है. उनका उद्धेश सिर्फ आदर्श "आर्थिक जनतंत्र" बहाल करना था, धम्म केवल एक महान साधन है, साध्य नही. जो लोग बाबासाहब की केवल जय जयकार करते रहे उन्हें, मूर्तिपूजक, व्यक्तिपुजक रहे, वे बाबासाहब को सर्वांगीन ढंग से नहीं समझे. वे उनके उद्धेश पूर्ति के लिए कार्य कैसे कर सकते? महापुरुष गौतम बुद्ध का भी उद्धेश लोगों को धम्म देना नहीं था, बल्कि "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" के जरिए/बाद मे "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" ही करना था. यह निरन्तर सुख प्राप्ति का लक्ष पाना अगर कार्ल मार्क्स के "साम्यवाद" से संभव होता, तो उन्हें धम्म स्वीकार करने की जरुरत ही नही थी. साम्यवाद जनतंत्र के खिलाफ है, वह गुलामों, पीड़ितों की तानाशाही समाज में कायम करना चाहती है, जो दुसरे कुछ लोगों के लिए यानि पूंजीपति लोगों के लिए कष्टदायी है, उनके आझादी पर हमला करता है, यही सोच के साथ बाबासाहबने "साम्यवाद" को नकारा ही नही तो उनका डटकर मुकाबला, विरोध करने का सन्देश भी दिया है.
अगर बुद्धधम्म भी भारतीय लोगों को "आर्थिक जनतंत्र" बहाली का माध्यम, साधन, साबित नही होगा, तो उसे शोषित-पीड़ित जनता के जरिए नकारा जायेगा. हिन्दुधर्म को नकारने का उनका उद्धेश क्या था? जनतांत्रिक मूल्यों का अभाव ही था ना! भारत में "आर्थिक जनतंत्र" का अभाव यह जाती व्यवस्था का विपरीत, अनिष्ट, अनुचित परिणाम है. जाती व्यवस्था को हटाने से उनके परिणाम नही हटेंगे. उनके विषमतामय परिणामों को हटाने के लिए "आर्थिक जनतंत्र" की बहाली सर्वोत्तम उपाय है. उसके बहाली के लिए सतत संघर्ष करना ही "सच्चे अम्बेडकरी अनुयानी" होने का सबुत होगा. केवल जयभीम, जयभीम कहना और उनके उद्धेशों की ओर नजर अंदाज करना, बेईमानी है. इसी ढंग की बेईमानी अबतक बामसेफ, बीएसपी और तत्सम जातिवादी संघटनोंने की है. इसलिए भारत में सुख और अमन नही आ पाया. बाबासाहब के उद्धेशपुर्ती विरोध के लिए जितने जिम्मेवार कांग्रेस, बीजेपी, शिवसेना जैसे राजकीय, धार्मिक हिन्दू संघटन जबाबदार है, उसी तरह आंबेडकरभक्त संघटना भी जबाबदार है. अपनी जबाबदारी निभाना ही सही अम्बेडकरी होने का सबूत होगा. यही उनकी बाबासाहब के प्रति सही श्रद्धांजलि होगी. (साभार - आर्थिक जनतंत्र जनांदोलन)
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