Monday, October 14, 2019

बक्सादुआर का बाघ-3 कर्नल भूपाल लाहिड़ी अनुवादःपलाश विश्वास

बक्सादुआर के बाघ-3
कर्नल भूपाल लाहिड़ी
अनुवादःपलाश विश्वास


         दस


 एडवोकेट सुनील सान्याल ने हर बार की तरह इस बार भी सच्चे मित्र की भूमिका का निर्वाह किया है।उन्होंने साबित कर दिया कि वे सिर्फ बक्सादुआर के जंगल के वंचित लांछित असहाय मनुष्यों के मित्र नहीं हैं,बल्कि इस दुःसमय में सुमन और अदिति के भी सच्चे मित्र हैं।लिस्ट की सारी किताबें खरीदकर उन्होंने भेज दीं,साथ ही अदिति के गहने भी वापस भेज दिये हैं। सुमन को पत्र लिखा है,मेरे रहते गहने बेचने की बात आपने कैसे सोच ली?


  किंतु सुमन के सारे शहरी दोस्त,इस खराब वक्त पर उनकी क्या भूमिका है? उन सारे दोस्तों ने जिनके साथ वह कभी इज्म के तत्व को लेकर वह घंटों चर्चा करता रहा है, बहस में एक दूसरे को चित्त करता रहा है,काफी हाउस में काफी की प्याली में तूफां खड़ा करता रहा है- वे आज कहां हैं?
   एक के बाद एक पत्र लिखकर किसे से कोई उत्तर नहीं मिला है।इसलिए अब उसके मन में एक के बाद एक सवाल खड़े हो रहे हैं- इन सभी वंचितों के किस काम में आयी है इन सभी इज्म की अवधारणाएं, दोस्तों के साथ नाना तर्क वितर्क की कचकचाहट?
उन सभी तत्वों के मुताबिक ,प्रतिवाद और आंदोलन के मध्य ही ये तमाम वंचित लोग मनुष्य की तरह जीने के हक हकूक हासिल कर लेंगे! किंतु सुमन समझ नहीं पा रहा है कि सम्मिलित राष्ट्र शक्ति -पुलिस प्रशासन,फारेस्ट डिपार्टमेंट,सशस्त्र सीमा बल- जिन्होंने जंगलात के इन लोगों को अपने बूटों के नीचे दबाकर रखा है,वहां से सर उठाकर कमर सीधी करके खड़ा होने में ये विचारधाराएं किस तरह इन दुर्बल असहाय मनुष्यों के मददगार हो सकती हैं?
अल्फा और कामतापुरी जैसे मिलिटेंट संगठन- जो आज अपने हित साधने के लिए इन्हें अपने दल में भुला भटकाकर शामिल कराने की कोशिश  कर रहे हैं, उन्हें मालूम नहीं है, राष्ट्रशक्ति चाहे तो उनके जैसे बड़बोलों को टैंकों के नीचे रौंद सकती है, कंबैट हेलीकाप्टर से राकेट छोड़कर सिर्फ चौबीस घंटे के साझा अभियान में उनके सभी गुप्त अड्डों को मिट्टी में मिला सकती है। वे लोग टिके हुए हैं राजनैतिक नेताओं की इच्छाशक्ति के अभाव के कारण।जिनका अपना भविष्य नाम का कुछ नहीं है,वे वनों में रहने वाले इन मनुष्यों का संकट मोचन कैसे कर सकते हैं? इसके उलट, उनकी बातों पर यकीन करके या दबाव में आकर अगर ये सहज सरल असहाय लोग अपने हाथों में हथियार उठा लें, आतंकवादियों के साथ मिलकर राष्ट्र के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दें, तो इनकी दुर्गति की कोई सीमा नहीं होगी- हो सकता है इस तरह हमेशा के लिए वन में रहने वाले इन मनुष्यों का अस्तित्व ही बक्सादुआर के जंगल में खत्म हो जायेगा।
विरुप परिस्थिति मनुष्य को बहुत कुछ सीखा देती है।सुमन ने भी सीखा है।वह अब समझ गया है कि इन लोगों के दुर्भाग्य को पूंजी बनाकर जो दोहा और वाशिंगटन में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में ह्युमैन राइट्स पर लंबा लंबा भाषण देते हैं,उनका उद्देश्य इन अभागा लोगों की किस्मत बदलने का कतई नहीं है,बल्कि अपनी किस्मत सवांरने का है- विशिष्ट होना,विख्यात होना,अंतरराष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार पाना है।यदि ऐसा नहीं होता,इनकी कोशिशों में अगर तनिक भी ईमानदारी होती,गणतंत्र की घोषणा के साठ साल बाद भी इतने घने अंधेरे में पड़े नहीं रहते,गणतंत्र के सारे अधिकारों से वंचित न होते जंगल के ये हतभाग्य मनुष्य।
   सुमन आज एक बात साफ तौर पर महसूस कर रहा है,उसकी तरह शहरी विशिष्ट लोगों का किताबों में पढ़े तत्वों,विचारों को लेकर चर्चा,तर्क वितर्क शिक्षित शहरी लोगों के शौक के अलावा कुछ नहीं है।
   इस जंगल के बारे में इन कुछ दिनों में जो तथ्य सुमन के हाथ लगे हैं,उनके मुताबिक इस बस्ती में एक भी ऐसा कोई नहीं है ,जिसने माध्यमिक परीक्षा पास कर ली है।समूचे बक्सादुआर इलाके में एक भी ग्रेजुएट खोजने पर नहीं मिलेगा।किसी तरह की स्वास्थ्य सेवा न होने की वजह से पिछले तीन साल के दौरान बारह तेरह महिलाओं की संतान प्रसव करने में मौत हो गयी है,सांप काटने से तीन, हाथी और अन्य वन्य पशुओं के हमलों मेे दो लोग मारे गये हैं।प्रसव के बाद यहां शिशु मृत्यु दर प्रति तीन शिशुओं में एक है।इसका मुख्य कारण,शिशु चिकित्सा की कोई व्यवस्था न होना और गर्भवती  मांओं की अपुष्टि है।यहां राशन की कोई व्यवस्था नहीं है,बीपीएल कार्ड नहीं है।एक सौ दिनों के रोजगार प्रकल्प नहीं है।किसी के पास वोटर कार्ड नहीं है,इसलिए वोट भी कोई देता नहीं है।वैज्ञानिक तकनीक की अचिंतनीय उन्नति और वैश्वीकरण के युग में विश्व के वृहत्तम गणतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक बक्सा जंगल के मनुष्यों की ऐसी ही तस्वीर आज सुमन के मन में है,उसके इस संक्षिप्त वनवास के बाद।
   फिर सुमन भी इन हतभाग्य मनुष्यों का इस दुर्गति से उद्धार करने,अपने विवेक की प्रेरणा से उनके लिए कोई त्राता बनकर यहां नहीं आया है।वह सुरक्षित आश्रय की तलाश में पुलिस की दबिश की वजह से खुद को बचाने की गरज से यहां चला आया है।किंतु न जाने कैसे इन हतभाग्यों के भाग्य के साथ आज उसकी अपनी किस्मत भी जुड़ गयी है।गणतंत्र के सुफल पुष्ट,शहरी सभ्यता में पला,श्रेष्ठ विश्वविद्यालय में शिक्षित सुमन आज जंगल के इन अनपढ़ लोगों की तरह ही असुरक्षित,गणतांत्रिक अधिकारों से वंचित है। इन्हीं की तरह हजारों दृश्यमान और अदृश्य शत्रुओं के भय से नित्य आतंकित, अनिश्चयता के घने अंधकार में निमज्जित है।उसके मन में भी इन्हीं की तरह वंचितों का क्षोभ,असहाय की हताशा,सर्वहारा की वेदना है।शहरी शिक्षित सुमन और जंगली अनपढ़,लांछित ये लोग अब एक पांत में हैं।खूब नजदीक,एक दूसरे से सटे हुए।
अदिति तड़के ही निकल गयी नोकमा के घर।रात में रोबार्ट ने आकर खबर दी कि नोकमा की छोटी बेटी ग्लोबिया का पेट दर्द बहुत बढ़ गया है।वहां से अदिति अभी अभी लौटी है।
अदिति ने कहा, उस लड़की का यह पुराना गाइनी प्राब्लम है।उसे भीषण कष्ट हो रहा है।शहर के किसी अस्पताल या नर्सिंग होम में भर्ती करा पाते तो बेहतर होता।
-वह तो हो सकता है,लेकिन सुनील दा पर और कितना बोझ डालेंगे! रुपये पैसों के अलावा अस्पताल और नर्सिग होम में भागदौड़  का मामला भी है।कोर्ट में प्रैक्टिस करेंगे या फिर दिनरात यही करते रहेंगे?
- एक बात कहूं? उसे लेकर मैं चली जाउं अलीपुरदुआर?वहां जाकर देख सुन कर कहीं भर्ती कर दूंगी।
- सुनीलदा को बिना बताये?बाद में उन्हें मालूम होगा तो बातचीत बंद कर देंगे।हमारे लिए उन सज्जन ने इताना किया है!
-ना, ना,क्यों नहीं बतायेंगे? अलीपुरदुआर पहुंचकर सबसे पहले उनसे मिलुंगी, खोज खबर लेंगे अस्पताल और नर्सिंग होम के बारे में-
-तुम्हारे साथ कौन जायेगा?
-रोबार्ट।


   अगले दिन अदिति ग्लोबिया और रोबार्ट को साथ लेकर अलीपुरदुआर रवाना हो गयी। जंगल से होकर बहुत सारा रास्ता पैदल तय करना होगा,बीमार ग्लोबिया को प्रचंड कष्ट होगा। किंतु दूसरा कोई चारा भी नहीं है।ठीक इसी तरह जंगल के रास्ते होकर अस्पताल ले जाते हुए कुछ साल पहले मोहन माराक की बीवी का गर्भपात हो गया था।बच्चा जच्चा दोनों में से किसी की जान नहीं बची।


    करीब ग्यारह बजे नोकमा आ गये,साथ में दो वर्दीवाले।वर्दी के ऐपलेट में कंधे के पास पीतल से ढलाई किये तीन अक्षर हैं-स सी ब.,सीने पर नेमप्लेट।एक का नाम अजय सिंह तो दूसरे का नाम बलवंत हुड्डा।इनके बारे में सुमन को अनुभव है।


   मिनिस्ट्री आफ होम ने ससीब अर्थात सशस्त्र सीमा बल (यह बीएसएफ अर्थात बार्डर सिक्युरिटी फोर्स नहीं है) को भारत भूटान सीमा पर नजरदारी के लिए तैनात किया है।जयंती में साल दो साल पहले इनमें से कई के साथ सुमन की मुलाकात हुई थी।वह मुलाकात बहुत सुखद नहीं थी।
 काम खत्म करके वह गाड़ी से शाम को अलीपुरदुआर लौट रहा था,ससीब के दो जवानों ने अपने कैंप के सामने हाथ दिखाकर गाड़ी रोक दी।लिफ्ट चाहिए।साथ में खूब सारा समान, शायद छुट्टी पर जा रहे होंगे।गाड़ी में काफी लोग थे,ढेर सारा सामान था, तिलभर जगह बची नहीं थी। लिफ्ट देने के लिए राजी न होने पर घंटेभर गाड़ी रोक कर दोनों जवानों ने तलाशी ली,सड़क के किनारे से लगे कैंप में बैठे बैठे बाकी कौतुकप्रिय जवान और अफसर तमाशा देखते रहे।
    तुच्छ घटना।किंतु इसीमें एक निर्मम सच छुपा है।आतंक का बीज निहित है।सत्य यह है कि पुलिस या बार्डर सिक्युरिटी फोर्स की तरह ससीब भी एक अनियंत्रित बल या फोर्स है।फिर एक अनियंत्रित फोर्स कितना सांघातिक और बेपरवाह हो सकती है,इसके ढेरों दृष्टांत सुमन की स्मृतियों में उज्ज्वल हैं। आतंकवादियों को पकड़ने के लिए कार्डन और सर्च आपरेशन के वक्त बेलगाम जवान बस्तीवालों पर जो अकथ्य अत्याचार करते हैं, ऐसी तमाम घटनाओं से कोई अनजान नहीं है।कंबिंग आपरेशन के दौरान महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं भी विरल नहीं हैं।यह सब किसी शक्तिशाली फोर्स पर निंयंत्रण न होने की वजह से है। किसी तरह जवाबदेही का डर न होने का नतीजा।
  आज सुबह सुबह दोनों जवानों के दर्शन मात्र से सुमन उनके गारो बस्ती में आगमन का कारण समझ गया।बाघ का साथी जैसा फेउ(बंगाल में मान्यता है कि बाघ के साथ साथ एक और जानवर चलता है,जिसे फेउ कहते हैं),ये लोग भी वैसे ही हैं।लंबे दुबले बरदोलोई और नाटा मोटा पुकन के इस बस्ती में आने की खबर किसी तरह ससीब कैंप तक पहुंच गयी होगी।इन्हें सुमन की उपस्थिति के बारे में उन दोनों की खोज के सिलसिले में आज यहां आने पर मालूम हुआ होगा।
  अजय सिंह का सवाल सुमन से-आप यहां कैसे?
-इस जंगल में कितने बाघ हैं,गिनती कर रहा हूं।
-फारेस्ट के आदमी हैं आप?
-नहीं,एक एनजीओ की तरफ से यह काम कर रहा हूं।
-कौन सा एनजीओ?
-नवदिशारी।
-कहां से आये?
-कोलकाता से।
-कितने दिन ठहरेंगे यहां?
-काम खत्म होने तक।
-कब काम खत्म होगा?
-पता नहीं।
-अरे, कब तक काम खत्म होगा,कुछ तो आइडिया होगा आपको?
-नहीं,कुछ आइडिया नहीं है।निर्विकार होकर सुमन ने जवाब दिया।
   सवालों के जवाब में सुमन की यह लापरवाही शायद अजय सिंह को पसंद नहीं आयी। बोला-आपको जयंती में हमारे कैंप में आना होगा- कल या परसो,जब मर्जी।साथ में पहचान पत्र जरुर ले कर आना।
   इतना कहकर नोकफांते के नजदीक खड़े शाल के पेड़ों के नीचे बिछी पत्तियों पर बूटों की गूंज पैदा करके घनी हरियाली की आड़  में अदृश्य हो गये हरी वर्दी पहने सीमा सुरक्षा के प्रहरी।
   किंतु,यहां,इस मुहूर्त पर उसकी सुरक्षा?
   सुमन धीरे धीरे समझने लगा है कि बाहर से शांत और निस्तब्ध लगने के बावजूद बक्सादुआर का यह जंगल भीतर से कतई  शांत और निस्तब्ध नहीं है।हर पल यह शांति हिंस्र बाघों की गोपन आवाजाही से विघ्नित हो रही है। नैःशबद सूखी पत्तियों पर बाघ शिकारियों के भारी बूटों की खस खस आवाज से टूट रहा है।दांत नख वाले मनुष्यों के शहरी जंगल से वह भाग आया लता गुल्म और वृक्षराजि आच्छादित वन्य श्वापद अध्युषित इस अंधकार अरण्य में निरापद आश्रय की खोज में- किंतु यह अंधकार अरण्य भी उसके लिए कतई सुरक्षित नहीं है,यह बात सुमन के लिए अब दिन की रोशनी की तरह साफ है।सुमन को यह भी मालूम है कि शहरी जंगल में वापस लौटें तो फिर वे ही दांत नख वाले लोग उसे काट कर,खरोंचकर रक्ताक्त करके असहनीय बना देंगे उसका जीवन।उसे अगर जीना है तो यहीं लड़ते हुए जीना होगा। यहां, बक्सादुआर के इसी जंगल में,बाघों और बाघों के शिकारियों,इन दोनों के साथ,एकसाथ।
   किंतु अदिति?क्या वह सह सकेगी दिन रात लड़ाई की यह भयंकर तपिश? सह पायेगी काटे जाने और खरोंचे जाने की जलन, यंत्रणा? खुद को संभाल पायेगी इस नित्य अशांत अनिश्चित, दुःसह परिस्थिति के मुकाबले?
  नोकफांते के बरामदे में बैठे शालवन की ओर शून्य दृष्टि से देखते हुए चिंता में डूब गया सुमन।

   उस दिन देर रात को सुशीला आ गयी।बंद दरवाजे पर बार बार दस्तक।
दरवाजा खोलते ही घर में इधर उधर झांकने के बाद उसने पूछा,आपनार बउटा कुथाय?
-कौन?अदिति?
-हां,हां, ओई- कुथाये से? घर के एक कोने में बैठ गयी सुशीला।
   यहां बस्ती के दूसरे तमाम लोगों की तरह सुशीला ने भी अदिति को उसकी पत्नी समझ लिया है।यही स्वाभाविक है।निमति की उस रात से अब तक उन दोनों को साथ साथ उसने देखा है।सुमन ने सुशीला की यह गलती सुधारने की कोई ताकीद या जरुरत महसूस नहीं की।अदिति के साथ उसके सही रिश्ते को समझाने की कोशिश की तो अनेक गैरजरुरी सवालों का सामना करना पड़ेगा उसे।इसलिए यह मामला टाल देना ही बेहतर है।
    सुमन ने कहा-नोकमा की छोटी बेटी ग्लोबिया को लेकर वह अलीपुर दुआर गयी है-उसे अस्पताल में भर्ती करने के लिए।
-कि होइछे ग्लोबियार?
-बीमार है वह-पेट में भयंकर दर्द है-
-कैमन मरद गो आपनि? एई जंगलेर भीतर दिया ऐतोटा रास्ता बउटाक ऐका पठा दिया? जंगले हाथी आछे, बाघ आछे!
-अकेली नहीं गयी,साथ में रोबार्ट है-
-आपनि गैला ना कैन?
-मुझे कुछ असुविधा है-
-असुविधा।किसेर असुविधा?
-है असुविधा!
    वह असुविधा क्या है ,सीधे तौर पर सुशीला को इसका जवाब देने को सुमन तैयार नहीं है। इस लड़की के दिमाग का भरोसा नहीं है।यह बात वह कब किसे कह देगी, क्या इसकी कोई गारंटी है? फिर जवाब दे भी दिया तो इस मानसिक स्थिति में वह बात समझने की क्षमता क्या सुशीला की है?
  इसलिए जबावी सवाल से विषय बदलना चाहा सुमन ने।बोला- तुम भी तो रात बिरात अकेली ही इस जंगल में भटकती रहती हो!
-हमार मरद नाई,मइरे गेछे,इसलिए।वो जिंदा रहइले घुइरताम ना ऐका ऐका।सब खाने साथे साथे जाइताम।उ दिन भी जंगले काठ खुइजते ऐक साथे गेछिलाम,किंतु सालारा उयाक खाइलो! तार पाछत आमाक!
-क्यों भटकती हो जंगल में रात बिरात?
-बाघेरा तो रात्तिर बेलातेई जंगले घोरा फिरा करे,आंखें बड़ी बड़ी करके सुशीला ने कहा।
-किंतु तुम तो बाघ नहीं हो,तुम तो मनुष्य हो-
-के कइछे हमी मानुष? माइनसे कि माइनसेक खाय?ओई मानुषगुला बाघ हया आमाक खाइलो,ऐखोन आमि बाघ हया उयादेर खामो!
     सुशीला की आंखों में ,चेहरे में बाघ की हिंस्रता।बक्सा अरण्य के गाढ़े अंधकार ने नोकफांते के एक कोने में धूमिल लालटेन की रोशनी -अंधियारे के साथ मिलकर,उस हिंस्रता को और भंयकर बना दिया!
    किंतु निमति के जंगल में उस रात इसी रोशिनी अंधियारे ने मायाजाल विस्तार करके क्षण भर के लिए पूर्णयौवना उद्दाम सुशीला को तुलनाहीन वाइल्ड फ्लावर में रुपांतरित कर दिया था! सुमन के मन में अकाल वसंत का आवाहन कर दिया था! किंतु आज कहां है वह वसंत,कहां है वह वाइल्ड फ्लावर?
   भाग्य के निष्ठुर परिहास से उसका वह वाइल्ड फ्लावर आज एक हिंस्र श्वापद में रुपांतरित है- गुस्से और घृणा में प्रतिशोध की आकांक्षा में घने जंगल में रात के अंधेरे में भटकती  भागती जा रही है।
-मनुष्य क्या कभी बाघ बन सकता है? तुमसे किसने ऐसा कहा है,तुम्हारे उस जगरु ने? काफी हद तक गुस्सैल स्वर में सुमन ने सुशीला से प्रश्न कर दिया।
- ना,जगरु कय नाई-
-तो तुम फिर खाली पीली जगरु के वहां क्यों पड़ी हो? इसी बस्ती में तुम्हरा बाड़ी घर है,मां बाप हैं!
-कैने पड़े आछि? जगरुक कहिछि जल छिटा दिया मोक बाघ बानाये दे।जैमन करि जल छिटा दिया अयं नरराक्षस बने!
-वह सब पानी का छींटा विटा सब झूठ है।जगरु ने तुम्हें छला है,वह तुम्हेंं कभी बाघ नहीं बना सकता।
- की कइलेन? जगरु आमाक छल कइरछे?अचानक कोंचने पर आहत बाघ की तरह हुंकारने लगी सुशीला।बाघ की तरह हिंसक उसकी दोनों आंखें,गुस्से में सुर्ख लाल हो गया उसका गोरा चेहरा।तेज सांसों के साथ उसके भारी सुगठित सीने में हलचल होने लगी,जो ऊपर नीचे होने लगा।
      इसके बाद थोड़ा शांत होकर बोली,सुनेन बाबू,धोखा खाया खाया मुई ऐखोन माइनसेक चीन्हबार पारि।आपनागुला चेहरा देखि माइनसेक विचार करेन- जगरुर चेहरा खराब,ताई भावेन माइनेसटा खराब। किंतुक असल में उयार मन भालो।अयं आमाक धोखा दिया नाई।धोखा दिछे अन्य माइनसे।
     बात करते करते फिर हिंस्र हो उठीं सुशीला की आंखें,उसका चेहरा हिंस्र हो गया। जानि राखेन,जारा मोक धोखा दिछे, सेगुलार ऐकटाकओ छाइड़बो ना मुई- बाघ हया सब कयटाक खामो- सब कयटाक खामो! पागल की तरह चीखती हुई  सुशीला नोकफांते की सीढ़ियों से उतरकर अंधकार जंगल की तरफ भाग निकली। बक्सा के जंगल के अजगर जैसे अंधियारे ने उसे निगल लिया।
सुशीला के जाने के बाद देर तक बिस्तर पर चुपचाप बैठा रहा सुमन।दिमाग में उठ रहे तरह तरह के प्रश्नों की भीड़ में नींद खो गयी।
   सुशीला को उस काले कुत्सित आदमी के चंगुल से रिहा करने के लिए वह इतना क्यों उतावला हो रहा है? यह क्या सिर्फ मनुष्यता की गरज से ,सुशाली की सुरक्षा के मद्देनजर- या और कुछ?
 पहली मुलाकात में सुशीला उसके मन में जो वसंत की जो हवा लेकर आयी थी, इतनी आंधी झंझा के बाद भी उसका कोई अवशेष तो बाकी नहीं रह गया? सुशीला के शरीर की दुर्गंध पर हावी वाइल्ड फ्लावर की वह सुगंध क्या उस तक अब भी पहुंच रही है? तब उसके मन में जो संगीत की झंकार होने लगी थी,क्या अभी उसकी गूंज बाकी है?
   सुशीला को लेकर सुमन के मन में प्रश्न अनेक हैं,लेकिन किसी प्रश्न का स्पष्ट कोई उत्तर नहीं है। ऐसा तो नहीं है कि वह उस काले कुत्सित आदमी से ईर्षा करने लगा है और सुशीला के साथ उसका अंतरंग संबंध उसे बर्दाश्त हो नहीं रहा है?
  छिः छिः,यह सब क्या अनाप शनाप सोचने लगा वह, अपने प्रतिद्वंद्वी के रुप में किसकी कल्पना करने लगा!कहां एक समय का प्रेसीडेंसी कालेज का टापर,सुदर्शन, कोलकाता के सारस्वत समाज में विख्यात सुमन चौधुरी,और कहां बक्सादुआर जंगल के एक गुमनाम बस्ती का वह आदमी, भयंकर काला कुत्सित जंगली जगरु! किसके साथ वह अपनी तुलना करने लगा है!

ग्यारह


  तीन दिनों के बाद शाम को रोबार्ट को लेकर अलीपुरदुआर से लौट आयी अदिति।वहां एक प्राइवेट होम में ग्लोबिया को भर्ती करा दिया है। भर्ती की सारी व्यवस्था सुनीलबाबू ने की है।हफ्ताभर और ग्लोबिया को नर्सिंग होम में रहना होगा। उसकी देखभाल करने के लिए रोबिन इसी बीच अलीपुरदुआर पहुंच गया है।
-रुपये पैसे का क्या बंदोबस्त हुआ? सुमन ने सवाल किया।
-वह सब सुनील बाबू ने ही कर दिया।मुझे किसी भी तरीके से गहने बेचने नहीं दिया।
-उनका कर्ज हम कैैसे उतार पायेंगे,नहीं जानता!
-बस्ती में घुसने के वक्त नोकमा से मुलाकात हो गयी।सुना,पुलिस आयी थी? प्रश्न अदिति का।
-पुलिस नहीं,सशस्त्र सीमा बल।संक्षेप में ससीब।मुझसे उन्होंने जयंती कैंप में जाकर मिलने को कहा है।सोच रहा हूं कि कल सुबह चला जाउंगा।
-वहां क्यों बुलाया आपको?
-ठीक कह नहीं सकता,किंतु लगता है कि वे मेरे बारे कुछ जानना चाहते हैं।
-क्या जानना चाहते हैं?
-मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, यहा जंगल में क्या कर रहा हूं-संभवतः यही सब।
- देख रही हूं के इनमें से कोई हमें यहां चैन से रहने नहीं देगा।दुश्चिंता का काला मेघ अदिति के चेहरे पर।
   मोड़ा से उठकर अदिति ने कहा, जाती हूं,किताबें सहेजकर रख देती हूं।शाम को महिलााएं आने वाली हैं।कल कौन जा रहा है आपके साथ?
-विलियम।संक्षिप्त उत्तर दिया सुमन ने।
अगले दिन तड़के विलियम को साथ लेकर जंगल के रास्ते पैदल जयंती पहुंचने में करीब साढ़े दस बज गये।कभी यह छोटा शहर कर्मव्यस्त रहा है रेल यातायात की वजह से। जयंती नदी पर लंबा रेलवे पुल था,वह पुल पार करके एक के बाद एक मालगाड़ी डलोमाइट और बोल्डर लेकर अलीपुरदुआर जंक्शन चली जाती थीं।और जाता था जंगल से काठ। राजाभातखाओवा में विशाल लाम्बारिंग डिपो था।
   सरकारी आदेश से डलोमाइट उत्खनन और नदीगर्भ से बोल्डार उठाना बंद होने के बाद रेल यातायात बहुत अरसे से बंद है। जयंती में पुराने उस रेल पथ का अस्तित्व जयंती नदी में बोल्डरों के ढेर के बीच पड़ा एक टुकड़ा टूटा हुआ रेलवे ब्रिज वहन कर रहा है।
    इस वक्त जयंती पर्यटकों की वजह से जिंदा है।जो यहां बक्सा जंगल और बक्सा फोर्ट देखने आते हैं। संप्रति जयंती के माथे पर एक और तिलक अंकित हुआ है- लेकिन वह तिलक गौरव का है या कलंक का,यह निर्णय आगामी समय करेगा।यह तिलक मेइन रोड के बगल में विशाल बड़े साइन बोर्ड के साथ सशस्त्र सीमा बल का गेरुआ सफेद रंगा विशाल कैंप है।
  फिलहाल उसी कैंप के आफिस में सुमन चौधरी एक कुर्सी पर आसीन है।उसके सामने टेबिल की उस तरफ ससीब की वर्दी में  इंस्पेक्टर दर्जे के एक अफसर बैठे हैं। अफसर ने पिछले आधे घंटे में सुमन के वंश परिचय से लेकर उसके विद्यालय और विश्विद्यालय तक पठन पाठन का सारा विवरण जान लिया है।सवाल किया है, जन्म से लेकर अब तक कहां कहां गये हैं,क्या क्या किया है,कहां कितने दिन बिताये हैं और वहां किन किन से मिले हैं, इत्यादि- इत्यादि।
    जिस विषय मे अधिकारी की सबसे ज्यादा दिलचस्पी है ,वह है सुमन का शहर छोड़कर जंगल में चले आने की वजह और जंगल की बस्ती में  उसके रहने की संभाव्य अवधि।
    सुमन के उत्तर से अधिकारी जो कतई संतुष्ट नहीं है,ऐसा उनकी आंखों से, चेहरे से ही साफ है।जबड़ों को सख्त करके जल्दी ही उन्होंने फरमान सुना दिया।काफी हद तक जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ  जारी नात्सी फरमान की तरह।आपको एक हफ्ते के भीतर जंगल छोड़कर जाना होगा।
   सुमन को लगा कि जैसे कोई नियंत्रणहीन बुलडोजर उसकी तरफ तीव्र वेग से दौड़ा आ रहा है। दो हाथ खड़े कर या लाल झंडा दिखाकर उस रोकने की कोशिश की तो वह अपने लोहे के बड़े बड़े पहियों से उस कुचलकर रख देगा।
सुमन मूर्ख नहीं है।किसी तरह का तर्क वितर्क या प्रतिवाद कनने की चेष्टा न करके सीधे निकल आया ससीब के कैंप से।


घने जंगल होकर गारो बस्ती की तरफ लौटने के रास्ते पर सुमन के दिमाग में तरह तरह की चिंताओं की भीड़ होने लगी।आज एक बात जल की तरह साफ है।आईन अनुशासन के बिना गणतंत्र, मानवाधिकार की बातें -शिक्षित सुमन या अशिक्षित गारो बस्ती के लोगों- दोनों के लिए समानरुप से अर्थहीन हैं। किंतु आईन अनुशासन अगर मुद्दा है तो गणतांत्रिक राष्ट्र की घोषणा के साठ साल बाद भी कानून के राज की प्रतिष्ठा क्यों नहीं की जा सकी? क्यों देश की कानून व्यवस्था को नये सिरे से सजाया नहीं जा सका? जरुरत के मुताबिक क्यों नहीं संविधान में संशोधन किये गये? अनुशासनहीनता क्यों सुशीला से बलात्कार करने वालों को साहसी बना रही है? क्यों न्याय की वाणी एकांत में रोयेगी? न्याय विचार के सवाल पर क्यों जस्टिस अमरेश मजुमदार को इतने असहाय होने का बोध होगा?
सुमन की धारणा है कि पिछले साठ सालों में राष्ट्र चलाने की जिम्मेदारी जिन पर रही है,उनमें से किसी ने देश में कानून और न्याय व्यवस्था को सक्रिय और मजबूत बनाना नहीं चाहा।उलट इसके उन्होंने उसे दुर्बल बनाकर ध्वस्त करने की चेष्टा की है। प्रार्थना की है ईश्वर से,सबकुछ अस्त व्यस्त कर दें मां,लूट खसोटकर खाउं! कानून व्यवस्था शक्तिशाली होने पर देश की धन संपत्ति और खनिज संपदा लूटकर,गरीबों को वंचित करके इसतरह विदेशी बैंकों में करोड़ों करोड़ों रुपये वे जमा नहीं कर पाते।
सिर्फ अतीत में नहीं,वह धारा अभी जारी है और भविष्य में भी जारी रहेगी। जानबूझकर,अत्यंत सुचिंतित और सुनियोजित तरीके से राष्ट्र नायक देश की कानून व्यवस्था को दुर्बल बनाये रखेंगे,ताकि वे अपनी अबाध लूट जारी रख सकें।
इसके अलावा एक और परेशान करने वाले सवाल से जूझने लगा सुमन।बस्ती में पांव रखते ही वह वहां रहनेवालों को उपदेश देता रहा है कि एकमात्र शिक्षा ही उन्हें अन्याय, वंचना और अत्याचारों से मुक्ति दिला सकती है। स्वामी विवेकानंद के जैसे मनीषियों ने अतीत में यही उपदेश दिया है।लेकिन इतनी शिक्षा दीक्षा के बावजूद वह खुद आज अन्याय अत्याचार का शिकार क्यों है? क्यों उसे जेल तोड़कर फरार कैदी की तरह भागते फिरना पड़ रहा है,छुपकर रहना पड़ रहा है बक्सा के इस जंगल में? वह अकेले नहीं है।शिक्षित होने के बावजूद, इस देश के नागरिकों का एक बड़ा अंश उसी की तरह गणतांत्रिक अधिकारों से वंचित है।अतएव, वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा ही इस दुर्गति से मुक्ति का एकमात्र उपाय है,इस तत्व की सत्यता को लेकर अब घोरतर संदेह की सृष्टि सुमन के मन में हो रही है।
सुमन की अपनी सोच है कि समस्या शिक्षा की नहीं है,यह समस्या बल्कि असमानता की है।उस असमानता की तस्वीर के एक तरफ सोने की तरह चमकदार, इंडिया शाइनिंग- दूसरी तरफ गाढ़ा काला अंधकार।एक तरफ कुछ लोग हर तरह की स्वतंत्रता, सुख और स्वाच्छंद्य भोग रहे हैं- दूसरी तरफ के लोगों के लिए गरीबी, पराधीनता, वंचना, लांछना हैं।फिर जब इन्हीं वंचितों के मध्य कोई अन्याय के विरुद्ध प्रतिवाद करने का दुस्साहस करके दिखायें तो उस पर गणतंत्र के तथाकथित प्रहरी  तत्काल पूर्ण शक्ति के साथ धावा बोल देंगे,भारी एेमिउनिशन बूटों के नीचे जल्द ही उसे किसी कीट की तरह कुचलकर रख देंगे।
ठीक जिस तरह सुमन को आज परेशान किया गया।जिस तरह फारेस्ट डिपार्टमेंट के अधिकारियों द्वारा बार बार लांछित हो रहे हैं जंगल के लोग।जिस तरह उन्हें आधी आधी रात जयंती के रेंज आफिस और राजाभातखओवा बिट आफिस ले जाकर बिट अफसर और फारेस्ट रेंजर ने बेधड़क उनकी हड्डियां तोड़ दी हैं ।
जन सुनवाई के दौरान बस्ती वालों से उनके दुःख कष्ट और उन पर हो रहे अत्याचारों के बारे में उनकी जुबानी सुना है,इन कुछ महीनों में बस्ती में रहकर सुमन को अनुभव हो रहा है कि वास्तव में वे कहीं ज्यादा अत्याचार और वंचना के शिकार हैं। किंतु जिसकी अपनी यह असहाय स्थिति है,वह कैसे अंधेरे जंगल के इन वाशिंदों को उनकी इस दुर्दशा से मुक्ति पाने में मदद कर सकता है?अब तक शहरों की विभिन्न सभा समिति में नाना मनीषियों के उपदेशों को लेकर आलोचना और वितर्क सभा में उसने  भाग लिया है ,वे सभी उपदेश क्यों आज उसे कोई पथ दिखा नहीं पा रहे हैं? घंटों लगातार दिन पर दिन जिन विचारधाराओं को लेकर उसने काफी हाउस में काफी की प्याली में तूफान खड़ा किया है, वे विचारधाराएं आज उसकी अपनी और बक्सा जंगल के बस्तीवालों की समस्याओं का समाधान करने में मदद क्यों नहीं कर रही हैं?
रास्तेभर सुमन को इन सवालों का कोई जवाब नहीं मिला।
गारो बस्ती तक पहुंचने में संध्या हो गयी। बस्ती में घुसते ही बुरी खबर लंगड़ा मोहन माराक से मिल गयी।
मोहन माराक ने कहा,फारेस्त दिपार्तमेंटेर लोकरा गारो बस्तीर  मानुषगुलाक आज खूब पिटाईछे।सुनछि,एकजनके ऐमन पिटाई पिटाईछे जे उयार हांड़ पंजर तोड़ि उसे बेहोश करि दिछे।कयेकजन बस्तीर मानुष उयाक निया गिछे अलीपुरदुआर अस्पताले।खबर पाया तार पीछे बस्तीर तमाम मानुष दौड़ाइछे, हमार पांव टूटा,ताइ जाबार पारि नाई।
जल्दी से पांव चलाकर नोकफांते पहुंचकर देखा,वहां कोई नहीं है।सुमन ने सोचा कि हो सकता है कि सभी नोकमा के घर गये हों। सीने में अनजानी आशंका लेकर दौड़ा सुमन।
नोकमा के घर में सिंथिया अकेली थी।उसका चेहरा आषाढ़ के मेघ की तरह गंभीर। उससे ही सुमन ने पूरी घटना का ब्यौरा सुना।जो मोटे तौर पर इस प्रकार हैः
आज सुबह गारो बस्ती के उत्तर में छत्तीस नंबर वनसृजन इलाके में पांच ट्रक घुसे,जिनके साथ फारेस्ट डिपार्टमेंट और कांट्रक्टर के लोग थे।पहले उन्होंने नंबर लगे पेड़ों को काटना शुरु किया।सात आठ नंबरदार पेड़ काटने के बाद उन्होंने तीन और पेड़ बिना नंबर के काट लिये।यह खबर गारो बस्ती तक पहुंची।नोकमा बस्ती की फारेस्ट प्रोटेक्शन कमिटी के चार पांच लोगों को लेकर जब मौके पर पहुंचे,तब भी कांट्रक्टर के लोग बिना नंबर का एक बड़ा पेड़ काट रहे थे।प्रोटेक्शन कमिटी के लोगों ने पेड़ काटने से उन्हें रोक दिया।तब फारेस्ट डिपार्टमेंट और कंट्राक्टर के लोगों ने एकजुट होकर बस्ती वालों पर हमला कर दिया और उनसे भीषण मार पीट की।उनके साथ रोबार्ट भी था। रोबार्ट को फारेस्ट डिपार्टमेंट के लोगों ने राइफल की बट से इस कदर मारा कि वह बेहोश होकर गिर पड़ा।खबर मिलने पर बस्ती के सारे लोग भागे भागे मौके पर पहुंच गये। हालात नियंत्रण से बाहर जाते देखकर फारेस्ट डिपार्टमेंट और कांट्रक्टर के लोग ट्रकों में भाग निकले।बस्ती के लोग रोबार्ट को लेकर अलीपुर दुआर सरकारी अस्पताल गये हैं और नोकमा उनके साथ गये हैं।
-अदिति,वह कहां है?
-वो भी गिछे नोकमार साथे अलीपुरदुआरे-
-तब तो मुझे भी वहां जाना चाहिए।
-एई राइतेर बेलाय जंगलेर भीतर दिया इत्ता पथ जाइबेन कैमोन करि? काइल सक्काले जाइबेन।नोकफांतेत आइज केह नाई।ओठे खाओवा दाओवारओ बंदोबस्त नाई। एठेई खाया दाया शुति थाकेन।
  इतनी रात जंगल का रास्ता पार करके भी कोई लाभ नहीं होने वाला,इस वक्त अलीपुरदुआर के लिए कोई गाडी साधन नहीं मिलने को है- सुमन ने मन ही मन सोच लिया।सुबह कबके निकला था, लंबा रास्ता पैदल आने आने के कारण शरीर भीषण क्लांत है।सारा दिन कुछ खाया नहीं,भूख भी जोर की लगी है।इसलिए सुमन ने सिंथिया का प्रस्ताव मानकर रात नोकमा के घर ही बिताने का फैसला कर लिया।


इतने भीषण उद्वेग और दुश्चिंता के बावजूद,सिंथिया ने सुमन की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी।सामने बैठकर आदरपूर्वक गरम गरम मुर्गी को झोल और भात परोसकर खिलाया। नोकमा के कमरे में जतन से सोने के लिए बिस्तर लगा दी।रोबार्ट को लेकर सिंथिया की आंखों और चेहरे में उत्कंठा की काली छाया होने के बावजूद भादो महीने के आसमान की तरह उस काले अंधकार मेघों के बीच मुस्कान की धूप भी खिल रही थी।रात में खाने पीने के बाद,यह चाहिये या नहीं,वह चाहिये या नहीं,तरह तरह के बहाने बनाकर सिंथिया  सुमन के कमरे में कई दफा चली आयी।एक बार आकर सवाल किया कि लालटेन की रोशनी आंखों में चुभ तो नहीं रही है,थोड़ा कम कर दें?
हो सकता है कि मन के कोने में छुपी कोई गुप्त इच्छा की अभिव्यक्ति के लिए रातभर सिंथिया इसीतरह परेशान रही।हो सकता है कि वह कुछ अनकही बातें कहना चाहती रही हो,किंतु उसे कह देने की हिम्मत नहीं हुई।बार बार उसकी यह आवाजाही शायद सुमन की तरफ से किसी उकसावे या मामूली किसी इशारे की उम्मीद में थी। किंतु बक्सादुआर की झींगुरों की पुकारों वाली निर्जन विषण्ण उस रात में सुमन की ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला सिंथिया को।लंबी पैदल यात्रा की क्लांंति और दुर्घटना की खबर ने शायद उसके शरीर और मन को इतना अवसादग्रस्त कर दिया कि उसने सिंथिया के पांवों की आहट ही नहीं सुनी।या फिर,जान बूझ कर न सुनने का बहाना बनाया था सुमन ने,इस सवाल का जवाब शायद सिंथिया को कभी नहीं मिलेगा।
भोर होते न होते रवाना हो गया सुमन।रवाना होने से पहले सिंथिया ने आगाह कर दिया,ऐका जाइतेछेन, जंगलेर रास्ता सावधाने पार हइबेन।
बक्सा के जंगल में बाघ और हाथी की तरह हिंसक प्राणी हैं,इस बात से सुमन अनजान नहीं है।किंतु इस पल में घने जंगल के रास्ते अकले पैदल चलते हुए हिंस्र बाघ या दतैल हाथी के भय से वह जितना आशंकित है,उससे बहुत ज्यादा आशंकित है वह उन मनुष्यों से डर की वजह से जो पलक झपकते न झपकते राइफल की बट से रोबार्ट जैसे तर ताजा जवान के शरीर की हड्डी पसलियां  चूर चर कर दें। जो पेडो़ं की आड़ से राइफल से गोली चलाकर सुलेमान के जैसे  प्राणवंत किशोर को निस्प्राण बना सकते हैं। बरदोलोई के हाथों में आटोमेटिक स्टेनगन उसके छह फुट के शरीर में सैकड़ों छेद बना सकता है।
सुमन ने डरते डरते हुए जंगल किसी तरह पार करके अलीपुरदुआर की बस पकड़ ली ।
बस से उतरकर सीधे सुनील सान्याल के घर पहुंचा।वहीं अदिति मिली।मुलाकात होते ही सुमन का पहला सवाल,कैसे है रोबार्ट?
-ठीक नहीं है।गंभीर स्वर में कहा अदिति ने,चेहरे पर उत्कंठा की काली छाया।
-जाइये,उस कमरे में जाकर अच्छी तरह पहले फ्रेश हो लें,फिर एकसाथ अस्पताल जाना होगा,बगल का कमरा दिखाते हुए सुनील सान्याल ने कहा।
निःशब्द अदिति उसके पीछे पीछे चली आयी।कमरे में घुसकर उसके उदास चेहरे की तरफ कुछ देर तक चुपचाप देखता रहा सुमन।क्या तो बोलना चाह रही है अदिति, लेकिन कह नहीं पा रही!
-वह लड़का बच जायेगा तो?गंभीर चिंता के स्वर में पूछा सुमन ने।
-कह नहीं सकती,कल डाक्टर चार पांच घंटे तक आपरेशन करते रहे।पसलियों की कई हड्डियां टूट गयी हैं,स्पाइनल कर्ड भी डैमेज हुआ है।बच भी गया तो जिंदगीभर बिस्तर से उठ नहीं सकता।
-फारेस्ट डिपार्टमेंट के लोग मनुष्य हैं या जानवर!हठात् गुस्से में फट पड़ा सुमन।
-आप बिना दोष वन्य पशुओं को गाली दे रहे हैं।वन्य पशु कभी अकारण निरीह निर्दोष मनुष्य को इसतरह राइफल की बट से निर्मम तरीके से मारकर हड्डी पसलियां चूर चूर नहीं करते हैं!
अदिति का उत्तर सुनकर अचरज से सुमन ने उसके चेहरे को देखा।वह सोच ही नहीं सका कि वनवास के इन कुछ महीनों में वन्य पशुओं और मनुष्यों के बारे में अदिति की चिंता भावना इतनी गहरी,इतनी स्वच्छ हो गयी है।समझ ही नहीं सका कि इतने कम समय में जंगल के असहाय लोगों से उसका प्यार इतना गाढ़ा, इतना आंतरिक हो गया है।
अदिति की चिंता की स्वच्छता को स्वीकृति देकर सुमन ने कहा,यह बात इस तरह से कभी मैंने सोचकर नहीं देखा!तुमने ठीक ही कहा है,मनुष्य को जानवर कहकर गाली देने से जंगल के पशुओं का अपमान होता है?
-लीजिये,झटपट नहा लीजिये।आपको साथ लेकर अस्पताल जायेंगे,इसलिए सुनील बाबू इंतजार कर रहे हैं।सुमन के हाथों एक तौलिया ठूंसकर अदिति ने कहा।

बारह


अस्पताल पहुंचकर खबर मिली कि रोबार्ट को सुबह फिर आपरेशन थिएटर में ले गये हैं।आपरेशन कब तक खत्म होगा,कोई कह नहीं सका।तेजी से जा रही एक नर्स ने संक्षिप्त उत्तर में कहा,पेशेंट की हालत अच्छी नहीं है।
यह खबर मिलने पर रोबिन को साथ लेकर ग्लोबिया सुबह ही नर्सिंग होम से चली आयी है।वह चुपचाप आपरेशन थिएटर के बाहर एक कुर्सी पर बैठी है। उसके बगल में नोकमा उदास बैठे हैं।सुनील सान्याल औऐर सुमन को देखकर नोकमा कुर्सी से उठकर उनकी तरफ चले आये। कहा,हेई कोन सक्काले अपारेशन कइरबे बलि भितरे निया गिछे, ऐखनो बाहिर हय नाई! जिग्गेस कइरले केह किछु आओ बाओ करे ना! एकटु खबर निया दैखेन ना,की हइतैछे घरेर भीतरत!
ऊपर लालबत्ती जल रहे आपरेशन थिएटर के दरवाजे के बाहर काफी देर तक खड़े रहने के बाद दरवाजा हल्का सा खोलकर,भीतर से मुंह निकालकर एक नर्स ने कहा,आपरेशन अभी चल रहा है।कब तक खत्म होगा,कह नहीं सकती।
गारो बस्ती के करीब तीस चालीस औरत मर्द कारीडोर के एक तरफ गोल होकर बैठे हैं।उनमें रोबार्ट के मां बाप भी हैं।सबके चेहरे पर उत्कंठा की छाप।नोकमा ने कहा, काइल थिका मानुषगुला किछु खाय नाई,चा बीड़ी पइर्यंत ना।
घड़ी के कांटे के साथ साथ उत्कंठा जैसी बढ़ रही है,उसी तरह धीरे धीरे अस्पताल के कारीडोर में मनुष्यों की संख्या भी बढ़ने लगी है।सिर्फ गारो बस्ती से ही नहीं,खबर पाकर आस पड़ोस की बस्तियों से समूहों में लोग चले आ रहे हैं।आतंकित अस्पताल प्रशासन के बुलावे पर भागे भागे पुलिस चली आयी है।हुक्म भी जारी कर दिया गया, यहां गोलमाल मत करो,गेट के बाहर चले जाओ।
-गोलमाल कुथाय?हमरागुला तो चुपचाप बसि आछि।एठे हमरा गोलमाल कइरबार जइन्यो आसि नाई,मरीज की खबर निते आइच्चि-नरम स्वर में वहां इकट्ठे बस्तीवासियों में से किस ने समझाने की कोशिश की।
क्षमता दंड हाथ में आ जाये तो वह दंड खो देने के भय से सदा शंकित प्रशासन की सामान्य बुद्धि का भी लोप हो जाता है,तब रस्सी देखकर सांप होने का भ्रम पैदा हो जाता है और नर्वस होकर क्षमता के उस दंड को अंधाधुंध चला दिया जाता है।
इस मामले में इसका कोई व्यतिक्रम नहीं हुआ।पुलिस ने लाठी उठाकर अस्पताल के कारीडोर से रातभर जगे बस्ती के थके हारे ,विषादग्रस्त,चिंतित मनुष्यों को खदेड़ दिया।ऐसी करुण परिस्थिति में अकारण शक्ति प्रदर्शन शांत निरीह मनुष्यों के अंतर के भीतर विषाद-वेदना और उत्कंठा को पलभर में तीव्र घृणा और प्रतिशोध- स्पृहा में बदल सकता है,दंडधारी क्षमता अंध प्रशासन की तरफ से ऐसी बुद्धिमत्ता और चिंता भावना को कोई आभास नहीं मिला।जख्मी बाघ को कोंचने से वह कितना भयानक हो सकता है,इस साधारण ज्ञान का परिचय भी नहीं मिला।निश्चित तौर पर पुलिस की इसी अदूरदर्शिता का असर परवर्ती घटनाक्रम पर हुआ।इसकी प्रतिक्रिया में बारुद के ढेर में जो आग भड़क उठी,ऐसा यकीनन कहा जा सकता है,उस बारुद के ढेर में पलीता लगाकर आग के हवाले कर देने का सौ फीसद कृतित्व इन डंडाधारी वीरपुंगव पुलिस वाहिनी का है।
बहुत कोशिशों के बावजूद रोबार्ट को डाक्टर बचा नहीं सके।सफेद कपड़े में लिपटी उसकी प्राणहीन देह जब ट्राली में रखकर आपरेशन थिएटर से निकाली गयी, उससे लपककर लिपटकर जोर जोर से बहुत देर तक रोती रही ग्लोबिया।
बक्सादुआर जंगल के करीब दो सौ मर्द और औरतें पोस्ट मार्टम के बाद राबार्ट की लाश कंधे पर ढोकर ले गये करीब बारह मील दूर तालचिनि थाने तक।इस लंबी शवयात्रा में सुमन और सुनील सान्याल शामिल हो गये।थाना पहुंचते पहुंचते अपरान्ह ढलकर संध्या हो गयी।रोबार्ट की लाश गेट के सामने रखकर उन दो सौ लोगों ने थाने का घेराव कर दिया।उनकी मांग थी,अपराधियों को तुंरत गिरफ्तार करना होगा और उन्हें सजा देनी  होगी।


रात बढ़ते बढ़ते बस्ती के लोगों की संख्या में भारी इजाफा होने लगा।दो सौ से ढाई सौ, ढाई सौ से तीन सौ,तीन सौ से पांच सौ।
खबर पाकर आधी रात सदर से पुलिस सुपर और डिस्ट्रक्ट मजिस्ट्रेट दौड़े चले आये।धारा 144 जारी कर दी गयी।पब्लिक ऐड्रेस सिस्टम से उसका ऐलान कर दिया। जमायत में शामिल सबको चेतावनी जारी कर दी, आप सभी यहां से तितर बितर हो जायें,वरना हम बल प्रयोग के लिए बाध्य हो जायेंगे।
इसी बीच थाने में अलीपुरदुआर से ट्रकों में लदकर अतिरिक्त राइफलधारी पुलिस वाहिनी चली आयी।परिस्थिति धीरे धीरे गरमाने लगी,किसी भी पल धमाका होने वाला था। सुनील सान्याल ने सुमन से कहा,एक बार भीतर चलें।बात करके देखें,कुछ किया जा सकता है या नहीं।
सुनील सान्याल को देखते ही थाने के बड़ेबाबू ने कहा कि आप जो इनके पीछे होंगे,इसका मुझे अंदाजा था,किंतु आधी रात आप सशरीर यहां उपस्थित होंगे,यह मैंने सोचा नहीं था। इन्हें तो मैंने पहचाना नहीं -सुमन की ओर दखते हुए बड़े बाबू बशीर अहमद ने पूछा।
-सुमन चौधुरी,कोलकाता में घर है।एक एनजीओ के साथ जुड़े हैं।बाघों की संख्या दिनोंदिन घट रही है,इसे लेकर बक्सा के जंगल अनुसंधान चला रहे हैं।एक कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा सुनील सान्याल ने।
-बक्सा के जंगल में बाघों की गिनती करने आये हैं,किंतु आधी रात वे थाने में आपके साथ क्या कर रहे हैं? भौंहें सिकुड़कर सुमन को देखते हुए बड़े बाबू ने सुनील सान्याल से पूछ लिया।
-अलीपुरदुआर मुझसे मिलने आये थे। मैं थाने आ रहा हूं, सुनकर कहा कि,चलिए, मैं भी आपके साथ चलता हूं।
सुनाल सान्याल की बातें सुनकर होंठों के कोण से थोड़ा मुस्कराये बड़े बाबू। इसके बाद बोले,तालचिनि थाना तो आगरा का ताजमहल या पेरिस का आईफल टावर नहीं है जो आधी रात उनको शौक चर्राया कि थोड़ा  घूमकर आयें!जाने दीजिये, आप लोगों के यहां मध्य रात्रि आगमन का कारण बताइये।
-देख ही तो रहे हैं,बाहर लोग कितने गुस्से में हैं।उन्हें बुलाकर थोड़ा आश्वस्त कर दें,कहिये,चौबीस घंटे में अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया जायेगा।
-अच्छा,हमें आप क्या समझते हैं सुनील बाबू?हम क्या मशीन हैं? मशीन का बटन दबा दिया और तुरंत अपराधी गिरफ्तार हो गया!फिर इन लोगों के गुस्से में आने की बात कर रहे हैं,इसके पीछे भी तो आपके जैसे लोग हैं!मौका मिलते ही आप इ्न्हें भड़का देते हैं!
-आप लेकिन अकारण मुझ पर दोषारोपण कर रहे हैंं।
-अकारण? आपस में मारपीट करके एक ने दूसरे का सर फोड़ दिया और इसे लेकर कितना हंगामा इनने शुरु कर दिया है,देख लीजिये!
-आपस में मारपीट,क्या कह रहे हैं आप? बस्ती के इतने सारे लोगों के सामने फारेस्ट गार्ड ने राइफल की बट से इस लड़के की हड्डी पसली तोड़ दी और आप इसे आपसी मारपीट बता रहे हैं?
-अच्छा सुनील बाबू,एक बात मैं आपसे पूछ सकता हूं? घटना के वक्त क्या आप वहां थे? ठंडे गले में सवाल किया बड़े बाबू ने।
-मैं नहीं था। लेकिन गारो बस्ती के कई लोग थे,बस्ती के प्रधान जास्टिन मोमिन भी थे-
-अरे रहने दें! यह सब इनकी बनायी हुई कहानी है।एकदम यकीन न करें इन पर!
सुमन को याद आया कि सुशीला के मामले में ठीक इसी तरह की बातें सुनील सान्याल से इन्हीं बड़े बाबू ने की थीं।पूरी घटना बनायी हुई है,बलात्कार  टलात्कार कुछ नहीं हुआ, सुशीला ने झूठ कहा है।
दुनिया में सब कुछ बदल जाने के बावजूद पुलिस का चरित्र कभी नहीं बदलता है,सुमन ने मन ही मन कहा।मुंह से बोला,आप क्या यही समझते हैं कि जंगलात के ये लोग हमेशा झूठ बोलते हैं?
-हां,वही उनका स्वभाव है।जंगल के पेड़ काटते हैं,लकड़ी चुरा लेते हैं और सारा दोष थोंपते हैं वन दफ्तर के लोगों पर!
- तो आप कह रहे हैं कि कल जंगल में जो इतने ट्रक घुसे,बिना नंबर के जो पेड़ उन्होंने काट डाले,गांव की फारेस्ट प्रोटेक्शन कमिटी के लोगों ने उन्हें रोका और इसीसे फार्स्ट गार्ड ने रोबार्ट नाम के लड़के पर हमला करके उसे बुरी तरह मारा पीटा-जिसके नतीजतन आज सुबह अलीपुरदुआर अस्पताल में उस लड़के की मृत्यु हो गयी-आप कह रहे हैं कि यह सब झूठ है? थोड़ा उत्तेजित होकर ही सुमन ने ये बातें कहीं।
-हां,सब झूठ है,सरासर झूठ है।सब गढ़ा हुआ है।
- तहकीकत किये बिना आपने कह दिया कि वे जो कह रहे हैं,सारा झूठ है?
-आपने कैसे कह दिया की हमने तहकीकात नहीं की है? हमने खोजबीन करके मालूम किया है कि कल जंगल में ठेकेदार का कोई ट्रक घुसा ही नहीं।
सुनील सान्याल के चेहरे की तरफ मायनेखेज नजर से देखा सुमन ने।मतलब यह,अब यहां वक्त बर्बाद करने से क्या फायदा!चलिये ,निकलें।
उठते उठते सुनील सान्याल ने बड़े बाबू से कहा,जो आप ठीक समझते हैं, कीजिये। देखियेगा,अकारण कुछ और निरीह प्राण नष्ट न हों!हम चलते हैं।दोनों दरवाजे की तरफ बढ़े।
-वकील साहब,आपको सलाह के लिए धन्यवाद।हांलाकि इसके लिए आपको मैं कोई फीस नहीं दे पा रहा हूं।इसके लिए मुझे माफ करें।
बड़े बाबू के गले से व्यंग्य के स्वर ने सुमन के मन की विषण्णता को ही नहीं, उसके सीने में दबे गुस्से को कई गुणा बढ़ा दिया।साथ साथ खुद को बहुत दुर्बल,असहाय महसुस हुआ उसे।वह स्पष्ट समझ रहा है कि राष्ट्र शक्ति यदि कमजोर लोगों की रक्षा न करें,उनके लिए न्याय सुनिश्चित न करें -तो ऐसे हालात में वह या सुनील सान्याल जैसे दो चार आम लोग क्या कर सकते हैं? वनों के दो-चार पांच सौ लोगों के थाना का घेराव कर देने से ही क्या रोबार्ट माराक की हत्या का न्याय हो जायेगा,हत्यारों को सजा दिलायी जा सकेगी? सुमन ने वहां जमा लोगों को समझाने की बहुत कोशिश की,खास तौर पर जास्टिन नोकमा को।जाते हुए कहा,यहां झमेला करके कोई फायदा नहीं होने वाला है। तुम लोग बस्ती में वापस चले जाओ,वरना किसी भी पल हालात नियंत्रण से बाहर हो जायेंगे।
किंतु कौन किसकी बात सुनें! बस्ती के सैकड़ों लोग शोक और क्रोध में अनियंत्रित। उसी अनियंत्रित जनता को तितर बितर करने के लिए आखिरकार पुलिस ने गोली चला दी।जिससे तीन लोग मारे गये और जख्मी हो गये बारह और लोग।
तालचिनि थाने में बस्तीवालों को उकसाने और भड़काने के आरोप में अगले दिन भोर में सुनील सान्याल के घर से पुलिस ने सुमन और सान्याल को गिरफ्तार कर लिया।
उसी दिन उन्हें अलीपुरदुआर की अदालत में पेश किया गया।जज साहब ने तालचिनि थाने के पुलिस इंस्पेक्चर खाँड़ा से सवाल किया,आप कह रहे हैं,कल रात जो दुर्भाग्यजनक घटना हुई,उसके पीछे इन दोनों का हाथ है,इन्होंने ही थाने पर हमले के लिए जंगल के लोगों को उकसाया?
-जी हां,इंस्पेक्टर खाँड़ा ने कहा।
-जो कह रहे हैं,उसे साबित कर सकते हैं?
-करेंगे सर,घटना के वक्त ये दोनों वहां उपस्थित थे।
-क्या कह रहे हैं आप? घटना के वक्त वे मौके पर उपस्थित थे और इसीसे साबित हो गया कि उन लोगों को उन्होंने ही उकसाया है? काफी हद तक धमकाने के लहजे से जज साहब ने सवाल किया।इसके बाद थोड़ा शांत होकर कहा कि मान लीजिये, इसी पल कोर्ट परिसर में एक मर्डर हो गया।वहां अनेक लोग उपस्थित हैं।आप भी वहां उपस्थित हैं। तो इससे क्या यह साबित हो जाता है कि हत्या के लिए आपने ही मर्डरर को उकसाया? इंस्पेक्टर खाँढ़ा जज साहेब के सवाल का सही जवाब खोज नहीं सकें। अगले दिन, सुनील सान्याल के वकील मित्रों के सौजन्य से दोनों व्यक्तिगत जमानत पर रिहा हो गये।
घटना के अगले दिन,सिर्फ अलीपुरदुआर नहीं, जलपाईगुड़ी और सिलिगुड़ी के सारे अखबारों के पहले पेज पर तालचिनि थाने पर गोलीकांड की खबर सुर्खियां बनकर छप गयीं।कोलकाता के अखबारों ने हेडलाइन नहीं बनाया,लेकिन तीसरे पेज पर घटना का मोटे तौर पर एक ब्यौरा छापा ।इन खबरों में सुनील सान्याल और सुमन चौधुरी की गिरफ्तारी की खबर भी थी।
जंगलात के मनुष्यों को लेकर जिस विरोधी राजनैतिक दल को इतने दिनों तक  कोई सरदर्द नहीं था,इस घटना की खबर मिलने पर कमर में गमछा बांधे वे गंदा पानी में मछली पकड़ने में जुट गये।जयंती, राजाभातखओवा और अलीपुर दुआर में 24 घंटे के बंद का ऐलान कर दिया गया।लाउड स्पीकर लगाकर,पार्टी का झंडा फहराकर  साइकिल वैन और आटोरिक्शा लेकर मोहल्ला मोहल्ला कैडर घूमने लगे-साथियों,कल रात तालचिनि थाने पर पुलिस ने गोली चलाकर बक्सा जंगल के तीन बेगुनाह लोगों की हत्या कर दी है,इसके विरोध में अगले दिन सुबह छह बजे से बारह घंटे का बंद-
पिछले साठ सालों के दरम्यान जंगल के जिन मनुष्यों के संकट आपदा के वक्त जिनका कभी अता पता नहीं रहा है,वे सारे टीवी चैनल भी अपनी अपनी  टीआरपी बढ़ाने की होड़ में मैदान में छंलाग लगाकर उतर गये।लाइव इंटरव्यू के लिए सुनील सान्याल और सुमन को लेकर खींचतान शुरु हो गयी।
अपना अस्तित्व प्रमाण करने के लिए अचानक मानवाधिकार कमीशन भी सक्रिय हो गया।हर टीवी चैनल के पैनल डिस्कशन में भागेदारी करने में कमीशन के चेयरमैन की हालत खस्ता हो गयी।
-अपराधियों को जल्द गिरफ्तार करने और सजा दिलाने की मांग लेकर हम कल कोलकाता के मेट्रो चैनल पर लगातार अनशन पर बैठ रहे हैं।बस्ती के कुछ लोगों को लेकर हमारे साथ चलिये।विपक्ष के नेता सत्यसाधन मल्लिक महाशय ने सुमन से अनुरोध किया।
-माफ कीजिये, इस परिस्थिति में बस्तीवालों का साथ छोड़कर हमारे लिए कोलकाता जाना संभव नहीं है,विनम्रता पूर्वक सुमन ने कहा।
-ठीक है,यह सब मसला हल हो जाये ,उसके बाद ही आइये।मेट्रो चैनल पर हमारा प्रोग्राम काफी दिनों तक चलेगा।इसके बाद हम इस गोलीकांड की सीबीआई जांच की मांग लेकर लगातार अनशन करेंगे।
सुमन को यह समझने में तनिक असुविधा नहीं हुई कि एक के बाद एक करके कमसकम महीनेभर का लंबा कार्यक्रम सत्यसाधन बाबू के दल ने तैयार कर लिया है। सामने इलेक्शन है।उन्हें अब उम्मीद है कि इस घटना को फोकस बनाकर सत्तारुढ़ राजनीतिक दल के खिलाफ वे बड़ा मुद्दा खड़ा कर देंगे
रोबार्ट को जिस दिन दफनाया गया,उस दिन सुमन हाजिर न हो सका।तब वह सुनील सान्याल के साथ जेल हिफाजत में था।अदिति थी।ग्लोबिया को पकड़कर सहारा देते हुए  वह सारा वक्त खड़ी थी। रुक रुक कर ग्लोबिया जोर जोर से रो  रही थी।अदिति उसे सांत्वना दे रही थी ,मातृस्नेह के साथ अपने आंचल से बार बार उसके आंसू पोंछ रही थी।
जमानत पर रिहा होने के बाद जेल हाजत के दरवाजे पर इंतजार कर रहे जास्टिन मोमिन की बात सुनकर सुमन अवाक्।जास्टिन ने कहा ,बस्तीर मानुषगुला ठीक कइच्चे,आपनारा दुईजन रिहा हो तो राजाभातखाओवा थेइके जयंती पर्यंत तीन जनेर बोडी निया परसेशन कइरबे। बोडी तीनटा हस्पतालेर ठंडा घरे आछे।उयारा खूब चापाचापि कइरतेछिलो जल्दी खालास करार जइन्य,आमरागुला मानि नाई।उयादेर कहिछि, पांच दिन लगे,दस दिन लगे, बाबुरा रिहा ना हया पइर्यंत बोडी इखानेई थाकबे।  
-जयंती,वह तो यहां से बहुत दूर है,करीब पंद्रह मील।
-ओ निया चिंता कइरबेन ना,सब बंदोबस्त हया जाइबे।
अद्भुत नजारा था।संप्रतिकाल में ऐसा दृश्य इस अंचल के लोगों ने नहीं देखा है। सुमन ने भी नहीं देखा है।करीब दो तीन मील लंबे जुलूस में पंद्रह सोलह हजार लोग शामिल।सिर्फ बक्सादुआर जंगल से ही नहीं,अलीपुरदुआर,राजाभातखाओवा और आसपास की दूसरी तमाम बस्तियों से असंख्य मनुष्य आ गये।इलाके के चाय बागानों से कतारों में नारी पुरुष,उनके दूधमुंहे बच्चों को पीठ पर बांध कर सड़क पर उतर आये।
-इतने लंबे रास्ते पर सड़क के  दोनों तरफ की बस्तियों के लोगों ने भूखे शिशुओं के लिए दूध और थके शवयात्रियों के लिए खाने पीने का सामान दिया।कोई बीमार पड़ा तो उसकी यथासंभव सेवा भी की उन्होंने।
सांप्रतिक घटनाक्रम और खास तौर पर अपनी गिरफ्तारी के बाद गांवों के लोगों की आंतरिक श्रद्धा और निर्मल प्रेम की धारा ने सुमन की नकारात्मक चिंताओं और धारणाओं को आहिस्ते आहिस्ते बहाना शुरु कर दिया,जिन चिंताओं धारणाओं का बोझ जीवन की नाना घटनाओं दुर्घटनाओं और प्रतिकूल अभिज्ञताओं से उसके मन में  दीर्घकाल से जमा हो रहा था।
आज इस दीर्घ पथ पर पैदल चलते चलते ,मनुष्य से मनुष्य के सहज और स्वाभाविक संबंधों की जो छवि उसकी आंखों की पकड़ में आने लगी,उससे धीरे धीरे सरल होने लगी मनुष्य और समाज को लेकर उसकी तिर्यक दृष्टिभंगी।सिर्फ नजरिया ही नहीं।शहरों,मनुष्यों के जंगल,मनुष्यों में उसकी आस्था खो गयी थी।जंगल के इन मनुष्यों के साथ कदम से कदम मिलाकर पैदल चलते चलते,गोलियों से छलनी वनों के मनुष्यों की इस शव यात्रा में  सुमन को वह आस्था फिर वापस मिल गयी।।मनुष्य समाज और उस समाज के भविष्य को लेकर दीर्घ काल से उसके मन में निराशा का जो अंधकार बर्फ की तरह परत दर परत जमा होने लगा था,पसीने में सराबोर होकर सहस्र मनुष्यों के  चलमान उष्ण सान्निध्य से निराशा के अंधकार की वह जमी हुई बर्फ पिघलने लगी। हजारों मनुष्यों के साथ विषाद सागर में साथ साथ डुबकी लगाते हुए असंख्य मनुष्यों के अनिश्चित भविष्य के साथ जुड़ जाने के बाद अपने व्यक्तिगत भविष्य को लेकर अब सुमन उतना उद्विग्न,उतना शंकित नहीं है।
शवयात्रा जयंती पहुंचते पहुंचते शाम हो गयी।तारों से भरे आसमान के नीचे खुले मैदान में अलाव जलाकर शवयात्रा में शामिल  कई हजार लोग रातभर पहरा देते रहे। उस रात कोई अपनी बस्ती में लौटा नहीं।सुमन और अदिति भी उन्हीं के साथ वहीं थे। एक साथ लिटाई हुई गोलीबिद्ध शवदेहों को घेरे हुए जंगल के तमाम मनुष्यों के शरीर से सटकर, उऩके साथ शहरी अदिति और समुन का शारीरिक दुरत्व ही नहीं, मानसिक दूरी भी उस रात खत्म हो गयी।विषाद के सागर को पार करते हुए,एक दूसरे से सांत्वना पाने और मन में साहस भरने के लिए बस्तियों के लोगों ने सारी रात एक दूसरे का हाथ मजबूती से थामे रखा।उसी श्रृंखल-बंधन में,निकट आत्मीय की तरह उन लोगों ने अदिति और सुमन को भी शामिल कर लिया।
सुबह जयंती के जंगल के एक किनारे तीनों को कब्र में सुलाने के बाद जब सुमन और अदिति गारो बस्ती पहुंचे, तब दोपहर ढल चुकी थी।दोनों क्लांत और क्षुधार्त। नोकमा से उनके नोकफांते पहुंचने की खबर मिलते ही सिंथिया भोजन लेकर चली आयी। खाना थालियों में सजाकर सिंथिया बोली, नैन, खाया नैन।सकाल थिका बोध हय किछु पैटे पड़े नाई।
-ग्लोबिया कैसी है? खाते हुए अदिति ने सवाल किया।
-भालो नाई,शरीलटा दुर्बल होइछे-
-सांझ को उसे देखने जाउंगी-
-आइज रहने दें,विश्राम करेन।गत कय दिन धरि आपनागुलार शरीलेर ऊपर अइत्याचार होइछे अनेक।खाना नाई,नींद नाई!
-वैसा कुछ नहीं है! ग्लोबिया से कहना संध्या को घर में रहें।
-ठीक आछे, कथाटा ताक कमो।किंतुक आपनागुलाक ओ ऐकटा कथा कइबार चाहि।शरीलेर ऊपर नजर दैओवा नागे,भारी असुख होइले एई जंगले डाक्टर वद्यि नाई, हमार कथाटा जैनो मने राखेन।यह कहकर खाने के बाद खाली बर्तन समेटकर, सीढ़ी से उतरकर,आंगन लांघकर,सामने शालवन में अदृश्य हो गयी सिंथिया।
उस तरफ देखते हुए दोनों को अहसास होने लगा कि कब किस वक्त उन दोनों के अनजाने कर्तव्यों की सीमारेखा पार करके सिंथिया उनके रोजमर्रे की जिंदगी में खामोशी के साथ दाखिल हो गयी है।अंगागी रुप में उनके सुख दुःख व्यथा वेदना के साथ जुड़ गयी है-यहां तक कि उनके शरीर स्वास्थ्य को लेकर छोटी मोटी दुश्चिंताओं के साथ भी।इस सुदूर वनवास में, समस्त आत्मीय स्वजन और बंधु बांधव से संपूर्ण विच्छिन्न होकर भिन्न एक आरण्यक परिवेश में अशांत और अस्थिर जीवन यात्रा में धीरे धीरे किस तरह एक गहरी आत्मीयता का निर्माण होने लगा है शहरी मानुष सुमन और अदिति के साथ जंगल की इस लड़की सिंथिया का।










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