Monday, October 14, 2019

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस एक विश्वासघात की कथा शम्सुल इस्लाम अनुवादःपलाश विश्वास

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस
एक विश्वासघात की कथा
शम्सुल इस्लाम
अनुवादःपलाश विश्वास


शम्सुल इस्लाम


भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और आरएसएस
एक विश्वासघात की कथा


शम्सुल इस्लाम

नरेंद्र दाभोलकर
गोविंद पानसरे
और एमएम कलबुर्गी
की स्मृति में


जिन्होंने धार्मिक कट्टरता
के खिलाफ आजीवन लड़ते हुए
अपने प्राणों की आहुति दीं


विषय सामग्री


भूमिका……


स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की भूमिका बनाने का अभियान…


अखंड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को खंडित करने के लिए धार्मिक राष्ट्रीयता का जन्म…


स्वतंत्रता आंदोलन से जानबूझकर विश्वासघात….


केबी हेगड़ेवार की स्वीकारोक्ति--


गोलवलकर का इकबालिया बयान…


शहादत की परंपरा को धार्मिक नजरिये से बदनाम करना…


हिंदुत्व भारतीय राष्ट्रीयता के विरुद्ध…


प्रार्थना…
प्रतिज्ञा…


ब्रिटिश शासकों और नाजियों के लिए प्रेम…


आरएसएस ने हिंदू रजवाड़ों का पक्ष लिया जो औपनिवेशिक शासकों के पिट्ठू थे…


आरएसएसः द्विअर्थी वक्तव्य का विशेषज्ञ…


तिरंगे की बदनामी…


बतौर सांस्कृतिक संगठन आरएसएस---


आरएसएस और ` वीर’ सावरकर ने एक साथ मिलकर ब्रिटिश शासकों और मुस्लिम लीग की मिलीभगत से स्वतंत्रता आंदोलन के साथ विश्वासघात किया…


भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ ब्रिटिश शासकों का समर्थन….


सुभाष चंद्र बोस से विश्वासघात…


निष्कर्ष---
आजादी से पहले के आरएसएस के साहित्य की इस विषय से संबंधित  संदर्भ सूची---

भूमिका


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आज भारतवर्ष में राष्ट्रीयता का महानतम अवतार होने का दावा करता है।संघ परिवार के इस धार्मिक राष्ट्रवाद को भारत में देशभक्ति का पर्याय बनाने के लिए लगातार एक ठोस अभियान, खास तौर पर 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद जारी है। वे तमाम लोग जो हिंदुत्व की राजनीति का विरोध करते हैं, राष्ट्रद्रोही ब्रांडेड किये जा रहे हैं। यह सबकुछ आरएसएस के राष्ट्रवादी दावों को उन व्यक्तियों और संगठनों की चुनौती के बावजूद हो रहा है, जो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के हिस्सा बने रहे हैं और जिन्होंने इसी वजह से ब्रिटिश हुकूमत के चरम उत्पीड़न का सामना किया है। स्वतंत्रता आंदोलन के विरोध में उस दौरान आरएसएस की विश्वासघाती भूमिका को पर्दाफाश करनेवाले लेखन का कोई अकाल नहीं है।ऐसे में आरएसएस के अपने तथ्य भंडार(आर्काइव) में उस समयकंड के बारे में उपलब्ध तथ्यों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के उस युग के सच को सामने लाने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।लेखक का उद्देश्य यह रहा है कि आरएसएस के अपने ही दस्तावेजों के जरिये सच को सामने लाया जाये। यह पुस्तक उन लोगों के लिए सदमे की वजह बन सकती है, जो मानते हैं कि आजादी हासिल करने की लड़ाई में आरएसएस की कोई भूमिका रही है। आप घोडे की जुबानी यानी आरएसएस के अपने कहे के मुताबिक सच जान सकते हैं कि कैसे विदेशी हुकूमत की तमाम बुराइयों के मामलों में आरएसएस ने खामोशी अख्तियार की हुई थी और कैसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में उसने भीतरघात किया।
इस पुस्तक के साथ एक विषय से जुड़े स्वतंत्रत आंदोलन में शामिल होने के मुद्दे पर आरएसएस के नेताओं के भाषणों और लेखन की संदर्भ सूची नत्थी है,जिससे भारत के महान साम्राज्यवाद विरोधी संग्राम के विभिन्न घटनाबहुल मोड़ पर आरएसएस के नेताओं का रवैय्या क्या रहा है, वह सबकुछ स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सेदारी के बारे में उनके इन भाषणों और उनके लेखन से मालूम पड़ सकता है।पुस्तक के अंत में यह संदर्भ सूची दी जा रही है।
मैं डा. डीआर गोयल का आभारी हूं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं और उन्होंने मुझे इस अध्ययन के लिए प्रेरित किया। वे कभी आरएसएस के कैडर थे और इस लिहाज से इस हिंदुत्ववादी संगठन के अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रविरोधी दस्तावेजों के बारे में उन्हें मालूम था। उन्होंने मुझे आरएसएस को उसकी संपूर्णता में समझने के लिए दिशा निर्देश दिये। सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ अदम्य लड़ाई लड़ने वाली सुभद्रा जोशी का लेखन धर्मसत्ता के एजंडे वाले इस संगठन पर अध्ययन करने वाले मेरे जैसे  शोधार्थी के लिए ज्ञान का महान स्रोत रहा है। एक अन्य खास दोस्त अनिल नौरिया जो सांप्रदायिक राजनीति पर खुद एनसाइक्लोपीडिया जैसे हैं, विस्तृत ब्यौरे के साथ हमेशा मदद के लिए मौजूद रहे हैं। मैं उनका आभारी हूं। मैं अपनी पत्नी नीलिमा शर्मा, बेटी शीरीं और दामाद समीर दासानी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करना  चाहता हूं, जिन्होंने विषय वस्तु जुटाने और इस काम के संशोधन में मेरी मदद की है। जोशी- अधिकारी सामाजिक अध्ययन इंस्टीच्यूट के प्रोफेसर अमर फारुकी का भी मसविदे पर उनके विभिन्न सुझावों और मंतव्यों के लिए आभार।
शम्सुल इस्लाम
                                                                                          notoinjustice@gmail.com

स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की भूमिका बनाने का अभियान…


नई दिल्ली में लाल किले पर किसी दिन हिंदू राष्ट्र का भगवा झंडा फहराने के सपने के साथ 1998 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने 18 मार्च,1999 को नई दिल्ली में `स्वतंत्रता सेनानी’ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा. केबी हेगड़ेवार की 110 वीं जन्म वार्षिकी के उपलक्ष्य में स्मारक डाक टिकट जारी कर दिया। भारत की आजादी के बाद यह पहला मौका था जबकि आरएसएस के संस्थापक या इस संगठन के किसी नेता के जन्मदिन पर स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। इस अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने समारोह में उपस्थित  मुख्यतः आरएसएस के स्वयंसेवकों की भीड़ को संबोधित करते हुए यह डाक टिकट  जारी करने का श्रेय लेते हुए कहा कि महान स्वतंत्रता सेनानी और देशभक्त हेगड़ेवार को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका योग्य स्थान नहीं दिया गया है और उनकी सरकार अब इस गलती को  सुधार रही है। तत्कालीन संघ प्रमुख राजेंद्र सिंह और तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवानी ने भी इस अवसर पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए डा. हेगड़ेवार को महान क्रांतिकारी कहा। (1)
इस स्थान पर फिलहाल यह चर्चा करने की कोई जरुरत नहीं है कि क्या महाबलि ब्रिटिश हूकुमत की शक्ति को चुनौती देने वाले क्रांतिकारीऔर स्वतंत्रता सेनानी इस सरकार या यूं कहें कि किसी और सरकार के सम्मान के मोहताज होते हैं या नहीं। बहरहाल, इस प्रकरण का कुल सच  यह है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और आरएसएस के प्रमुख इस तरह अपना इतिहास गढ़ रहे थे और इस सिलसिले में बेईमानी भी कर रहे थे। आजादी से पहले आरएसएस जिस राजनीतिक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व कर रहा था, जिसके तहत  औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संग्राम के सिलसिले में आरएसएस  दरअसल भारतीय जनता के साम्राज्यवाद विरोधी संग्राम का हिस्सा कभी नहीं रहा है और वे इस सच को झूठलाने की कोशिश कर रहे थे। इसके विपरीत सच यह है कि 1925 में अपनी शुरुआत से आरएसएस अपनी पहचान हिंदू राष्ट्रवादी संगठन बतौर बनाने की कोशिश में लगा हुआ था और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय जनता के महान साम्राज्यवादविरोधी संग्राम को विफल बनाने में उसी तरह लगा हुआ था जैसे मुस्लिम राष्ट्रवादी मुस्लिम लीग के बैनरतले कर रहे थे।
दिलचस्प बात यह है कि  भाजपा की सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम में जिस `योगदान’ के लिए डा. हेगड़वार को सम्मानित किया, हेगड़वार ने यह योगदान बाहैसियत एक कांग्रेस कार्यकर्ता किया था। यह बहुत लोगों को मालूम नहीं होगा कि डा.हेगड़ेवार खिलाफत आंदोलन (1920-21) के समर्थन में भड़काउ भाषण देने के आरोप में  पहलीबार  जेल गये। इसके लिए उन्हें एक साल की बामशक्कत कैद की सजा हो गयी थी।गौरतलब है कि हेगड़ेवार के कारावास की इस अवधि से दो महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ी हुई हैं। पहली घटनाः उन्होंने एक जाने माने वकील की सेवा  अपने बचाव के लिए खरीद ली और इस तरह एमके गांधी और कांग्रेस के इस दिशा निर्देश का खुला उल्लंघन  किया कि खिलाफत आंदोलन में हिस्सा लेने पर गिरफ्तार होने की स्थिति में  कोई किसी वकील की सेवा नहीं लेगा और न ही अपने कानूनी बचाव की कोशिश करेगा। हेगड़ेवार को सख्त अनुशासन के प्रतीक बतौर पेश किया जाता है जबकि उन्होंने यह महत्वपूर्ण निर्देश तोड़कर अनुशासनहीनता कर दी। यह अनुशासनहीनता  कायरता की किसी भावना से प्रेरित रही होगी लेकिन इस मामले में आरएसएस की व्याख्या इस तरह हैः `डाक्टर साहेब यह समझते थे कि  स्वतंत्रता के संदेश के प्रसार का कोई अवसर व्यर्थ जाने नहीं देना चाहिए। इसी उद्देश्य के तहत उन्होंने अपने बचाव में वकील खड़ा करने का निर्णय किया।’(2)
दूसरी घटना के बारे में आरएसएस के प्रकाशन के मुताबिक बामशक्कत एक साल की कैद के बाद जब वे अजनी जेल से 12 जुलाई,1922 को रिहा हुए तोः
जब उन्होंने कैदी की वर्दी छोड़ी और वे अपने पुराने कपड़े पहनने लगे तो वे कपड़े बहुत छोटे पड़ गये। बामशक्कत सालभर की कैद के बाद उनका वजन 25 पौंड (यानी 11 किलो से ज्यादा) बढ़ गया था। (3)
दरअसल ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कुख्यात ब्रिटिश जेलर सर जैठर के साथ उनकी दोस्ती हो गयी थी और आरएसएस प्रकाशन में इसका इसी तरह महिमामंडन किया गया है।
इस बीच हेगड़ेवार स्वतंत्रता आंदोलन से दूर भागते जा रहे थे।।आरएसएस की ओर से प्रकाशित उनकी जीवनी में लिखा गया हैः
हिंदी उद्धरण (4)
इसी पुस्तक में आगे उल्लेख किया गया है कि डा. हेगड़ेवार 1925 तक हिंदुत्व के प्रति आकर्षित हो गये थे और
हिंदी उद्धरण (5)   
सच यह है कि  ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध आंदोलन को धार्मिक ध्रूवीकरण के रास्ते तोड़ने के रास्ते पर खुलकर उन्होंने पहले ही चलना शुरु कर दिया था, जिस रास्ते को बाद में मोहम्मद अली जिन्ना ने बाद में अपनाया।  
डा.हेगड़ेवार को दूसरी बार ब्रिटिश हुकूमत ने नमक सत्याग्रह के दौरान 1930 में जेल में कैद कर लिया। यह आखिरीबार था जबकि वे ब्रिटिश जेल में गये।इसी जीवनी में दूसरी बार उनकी जेलयात्रा और नमक सत्याग्रह में  उनके शामिल होने के गुप्त उद्देश्य का इन शब्दों में  खुलासा किया गया हैः
हिंदी उद्धरण(6)
बहरहाल हैरतअंगेज ढंग से डाक्टर साहेब खुद गांधी के डांडी नमक सत्याग्रह में निजी तौर पर शामिल हो गये थे।जाहिर है कि उनके इस निर्णय के पीछे कोई गुप्त उद्देश्य भी रहा होगा। हम जिसके बारे में आरएसएस की ओर से प्रकाशित उनकी जीवनी से जान सकते हैंः     
हिंदी उद्धरण (7)
इस संदर्भ में आगे इस जीवनी बताया गया हैः  
हिंदी उद्धरण (8)
जाहिर है कि डा.हेगड़ेवार ने दूसरी बार जेल यात्रा आंदोलन के मकसद से सहमत होने की वजह से नहीं या स्वतंत्रता आंदोलन में भागेदारी के उद्देश्य लेकर भी नहीं, बल्कि हिंदुत्व के एजंडे में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भी शामिल करने का एजंडा पूरा करने के लिए गये। उन कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जो असहयोग आंदोलन में शामिल थे और सभी धर्ममत में आस्था रखनेवाली  भारत की जनता के अखंड स्वतंत्रता संग्राम का बैनर उठाकर जेल जा रहे थे। दरअसल कांग्रेस नेतृत्व को भी जल्द समझ में आ गया कि तमाम सांप्रदायिक और विभाजनकारी संगठन अपनी शातिर साजिशों  को अंजाम देने के लिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं के गलत इस्तेमाल करने की कोशिश में लगे हए हैं। इसलिए 1934 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी ने बाकायदा एक प्रस्ताव पारित करके कांग्रेस सदस्यों के आरएसएस, हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग के सदस्य बनने पर रोक लगा दी।         
इसे खास तौर पर ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जिन दो मौकों पर डा. हेगड़ेवार ने जेलयात्रा की, दोनों बार वे कांग्रेस की अपील पर जेल गये। जाहिर है कि अगर सच यही है कि कांग्रेस के नेतृत्व में हुए आंदोलनों में भागेदारी के लिए वाजपेयी सरकार उनका सम्मान कर रही थी, तो इसे साफ तौर पर बता दिया जाना चाहिए था। दूसरी तरफ इस तथ्य पर भी गौर करें कि अगर उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक के हिसाब से सम्मानित किया गया है तो उनका `अवदान’ ,जिसपर उनका दावा बनता है,यह रहा है कि वे हिंदू राष्ट्र की सांप्रदायिक और विध्वंसक उस विचारधारा का प्रचार प्रसार कर रहे थे, जिस विचारधारा ने  देश की स्वतंत्रता के आंदोलन को विभाजित करके उसे भीतर से  नुकसान पहुंचाया।
देश की जनता यह जानना चाहेगी कि 1947 से पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शिकंजे से भारत को आजाद करने के लिए आरएसएस ने कौन से आंदोलन खड़े किये? उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं में से किन लोगों ने औपनिवेशिक शासन में दमन और उत्पीड़न का सामना किया?  देश की स्वतंत्रता के लिए उनमें से कौन जेल गये और कौन कौन शहीद हो गये?                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

अखंड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को खंडित करने के लिए धार्मिक राष्ट्रीयता का जन्म
सच तो यह है कि 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान साम्राज्यवादविरोधी जनता की एकता और विशेष तौर पर हिंदू मस्लिम आवाम की एकता की नींव बन गयी थी। इसी एकता के आधार पर असहयोग आंदोलन (1920-22) चला,जिससे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गुणात्मक परिवर्तन आया। पहले विश्वयुद्ध के तुरंत बाद की अवधि की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इस दौरान एमके गांधी की पहल पर चलने वाले जन आंदोलनों की निरंतरता रही है। असहयोग आंदोलन के बाद मेहनतकश वर्ग और किसानों के आंदोलन भी शुरु हो गये, जिससे एकताबद्ध साम्राज्यवादविरोधी आंदोलन और ताकतवर हो गया।
उसी वक्त राष्ट्रीय आंदोलन के लिए दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति यह भी बन गयी कि 1920 के दशक के मध्य कुछ  मुख्य हिंदू और मुस्लिम नेताओं के सांप्रदायिक लाइन पर चलने की प्रवृत्ति तेज होती गयी। यह नई हलचल ब्रिटिश हुक्मरान के हक में थी, जाहिर है कि साम्राज्यवादी शासकों ने इसे प्रोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
कांग्रेस के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन से बनी एकता को तोड़ने के लिए  हिंदू और मुस्लिम अलगाववादियों ने भीतरघात किया। हिंदू महासभा की साम्प्रदायिकता  को कांग्रेस की दक्षिणपंथी धारा का समर्थन मिला हुआ था,जिससे  हिंदू महासभा के इसी सांप्रदायिक रवैय्ये की वजह से सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखने में भारी मुश्किलें खडी हो गयीं। जबकि  मुस्लिम कौमपरस्त, खासतौर पर अंधेरे के हक में खड़े प्रतिक्रियावादी तबके ने खलीफा के उस  मुद्दे को प्रोजेक्ट करने का प्रयास शुरु कर दिया, जिसका ताल्लुक सिर्फ मुसलमानों से था और उनकी महात्वाकांक्षा ग्लोबल इस्लामी साम्राज्य की स्थापना करने की थी। इस मुद्दे के धार्मिक पक्ष पर खास जोर देकर उन्होंने इस आंदोलन की  राजनीतिक और साम्राज्यवादविरोधी विषयवस्तु का महत्व खत्म कर दिया। असहयोग आंदोलन के बाद इनमें से कुछ सांप्रदायिक राजनीति में शामिल हो गये जबकि दूसरे काफी लोग जैसे मौलाना आजाद, अल्ला बख्श, डा.एमए अंसारी, अब्दुल्ला बरेलवी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी और सैफुद्दीन किचलू हिंदू मुसलमान एकता के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता की  वजह से कांग्रेस और कांग्रेस के बाहर अखंड स्वतंत्रता संग्राम के नेता बन गये।
यही वह वक्त था जबकि हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्व एक दूसरे की राजनीति के पूरक बन गये और ब्रिटिश शासकों ने बखूब उन्हें पाला पोसा।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानतम क्रांतिकारियों में से एक आशफकुल्ला खान ने नौजवानों को अपने आखिरी संदेश में इस सच का खुलासा किया कि कैसे ब्रिटिश खुफिया एजंसियां इन तत्वों की वित्तीय मदद कर रही थीं। अपने इस संदेश में उन्होंने कहा हैः
सरकार के खुफिया सेवा ( सीक्रेट सर्विस) के एजंट धार्मिक प्रचार अभियान के लिए वित्तीय मदद कर रहे हैं। उनका उद्देश्य धर्म की रक्षा करना नहीं है और न ही धर्म के प्रचार प्रसार के लिए वे ऐसा कर रहे हैं। बल्कि वे स्वतंत्रता संग्राम की  चलती ट्रेन के रास्ते में अवरोध खड़ा करने के मकसद से यह कर रहे हैं।(9)
इसी परिदृश्य में डा.हेगड़ेवार ने 1925 में भारतीय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। डा.हेगड़ेवार का जन्म 1889 में नागपुर में हुआ था। स्कूल शिक्षा पूरी करने के बाद वे डाक्टरी  की पढ़ाई के लिए कोलकाता (1910-1915) चले गये। हालांकि इस सिलसिले में आरएसएस प्रकाशन का दावा है कि इस दौरान वे कोलकाता में क्रांतिकारी समूहों के संपर्क में थे, लेकिन इसके बारे में किसी स्वतंत्र सूत्र से इस दावे की पुष्टि नहीं हो सकी है। वे नागपुर 1915 में लौटे और उसके बाद पांच साल तक उनकी राजनीतिक गतिविधियों के बारे में कुछ भी मालूम नहीं पड़ता। ऐसा लगता है कि उन्होंने डाक्टरी की  प्रैक्टिस नहीं की। बहरहाल राजनीतिक  जीवन के बारे में उनकी तैयारियों के बारे में अस्पष्टता बनी हुई है। वे एक छोटी अवधि तक कांग्रेस में जरुर थे और हमने देख लिया है कि कांग्रेस कार्यकर्ता की हैसियत से उन्होंने दो बार जेलयात्राएं भी कीं।
कांग्रेस में डा.हेगड़ेवार धुर दक्षिणपंथी हिंदू महासभा के नेता डा.बीएस मूंजे के अंतरंग थे। उस वक्त मूंजे कांग्रेस में बने हुए थे और वे हिंदू मुस्लिम एकता के गांधी के कार्यक्रमों के विरुद्ध थे। यही नहीं ,वे ब्रिटिश हुकूमत के साथ सहयोग करना चाहते थे।
जेल से बाहर निकलकर डा.हेगड़ेवार ने हिंदू मुस्लिम एकता के गांधी के विचारों के लिए उनकी आलोचना कर दी और राष्ट्रवाद को हिंदू राष्ट्र या देश बताने लगे।
अपनी स्थापना के समय से आरएसएस के प्रचार की थीम देश से मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों की `गद्दारी’ रही है। डा.हेगड़ेवार के मुताबिक
हिंदी उद्धरण (10)
करीब करीब उसी वक्त व्ही डी सावरकर की विवादास्पद पुस्तक हिंदुत्व 1923 में प्रकाशित हो गयी। जिसमें यह दावा किया गया कि भारत सिर्फ हिंदुओं का है।यह पुस्तक हेगड़ेवार के हाथ लग गयी। आरएसएस के प्रकाशन से हमें यह जानकारी मिलती हैः
सावरकर की प्रेरणास्पद मेधासंपन्न हिंदुत्व की अवधारणा के प्रकाशन जो तर्कसंगत और स्पष्ट, अखंडनीय रहा है,उसने डाक्टरजी के ह्रदय के तारों को छू लिया। क्योंकि अपनी स्पष्ट ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि और व्यवहारिक अनुभवों के साथ वे भी हिंदू राष्ट्रवाद के उसी सत्य तक पहुंच चुके थे। अगर मुस्लिम आक्रमणों के सदमों से हिंदू अपने व्यामोह से बाहर निकल आये तो सावरकर के हिंदुत्व ने उनकी निष्क्रिय हिंदू आत्मा में राष्ट्रवाद की अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी।(11)
नौजवानों में और खासतौर पर टीनएजर किशोरों में अपने इन विचारों के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। फिर आरएसएस ने डा. हेगड़ेवार के हिंदू राष्ट्र के विचारों को युवाओं में संक्रमित करने के लिए उसके  प्रचार प्रसार  सारा जोर लगा दिया। बहरहाल इस संगठन ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ न कोई आंदोलन चलाया और न ही किसी तरह का कोई संघर्ष किया। इसके विपरीत  एक तरफ चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और उनके तमाम साथी अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिलाने लगे थे तो दूसरी ओर, 1920 के दशक के उत्तरार्द्ध में ऐसा कोई आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जिससे आरएसएस की ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ किसी भी तरह की हलचल का पता चले। तभी से आरएसएस का मुख्य काम अल्पसंख्यकों और खास तौर पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत की मुहिम चलाना रहा है। संघ ने पहले पहल शहरी  मध्यवर्गीय महाराष्ट्रीय ब्राह्मण किशोरों को अपने प्रचार का लक्ष्य बनाया और शुरुआती वर्षों में यही इस संगठन का मुख्य सामाजिक आधार रहा है। इस सिलसिले में यहां यह बता देना सही होगा कि नागपुर में 1927 में हुए हिंदू मुस्लिम दंगे के बाद इस संगठन की सदस्यता अभियान में उफान आ गया था।
जिस वक्त आरएसएस ने यह घृणा अभियान शुरु कर दिया, उसी दौरान 1927-28 में स्वतंत्रता संग्राम एक नये दौर में पहुंचने को तैयार था।1920 के दशक में भारत में सोशलिस्ट समूहों और कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के साथ वामपंथी आंदोलन तेज हो गया। एक मजबूत ट्रेड यूनियन आंदोलन भी शुरु हो गया। 1920 के दशक के अंत में देशभर में श्रमिक वर्ग के आंदोलनों की लहर चल गयीं।1927 में एक और बड़ी घटना हो गयी। ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में संवैधानिक सुधारों के सवाल पर विवेचना के लिए एक और आयोग साइमन कमीशन की घोषणा कर दी। राष्ट्रवादियों ने साइमन कमीशन का विरोध कर दिया तो कांग्रेस ने इसके बायकाट की अपील जारी कर दी। साइमन कमीशन के बायकाट को लेकर एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा हो गया । ब्रिटिश हुकूमत को तब  1920 के उत्तरार्द्ध में साम्राज्यवादविरोधी जनविद्रोह के दमन के लिए लगातार आक्रामक हो रहे हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों का सहारा था, जिसके तहत उसे  ब्रिटिश हितों को साधने के लिए किसी संवैधानिक बंदोबस्त  थोंपने में कामयाबी मिलने की उम्मीद थी।


स्वतंत्रता आंदोलन से जानबूझकर विश्वासघात
साम्राज्यवादविरोधी संघर्ष में शामिल कांग्रेस, क्रांतिकारी समूहों और दूसरे तमाम समूहों की गतिविधियों के बारे में व्यापक जानकारी हासिल करने के लिए प्राइमरी स्रोतों से हासिल होने वाली सामग्री और विभिन्न संग्रहों में उपलब्ध दस्तावेज प्रचुर मात्रा में हैं। कम्युनिस्टों ने भयंकर औपनिवेशिक दमन के मुकाबले इस पूरी अवधि के  दौरान गोपनीय तौर तरीके के साथ भूमिगत होकर अपनी गतिविधियां चलायीं और उन्होंने इस अवधि की कम्युनिस्ट कार्रवाइयों के बारे में भारी मात्रा में प्राइमरी स्रोतों के दस्तावेजों के एक हिस्से को पहले ही प्रकाशित कर दिया है। उनके  वक्तव्यों, तथ्यों की पुष्टि उस अवधि के आधिकारिक और अर्द्ध आधिकारिक रिकार्ड से की जा सकती है या क्रास चेक किया जा सकता है। क्रांतिकारी समूहों,खासतौर पर चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाकुल्ला खान और भगवती चरण व्होरा भी हालांकि अत्यधिक गोपनीय तरीके से अपना काम कर रहे थे, लेकिन वे भी अपने पीछे अपनी गतिविधियों के बारे में पर्याप्त प्रमाण छोड़ गये हैं। दो राष्ट्र सिद्धांत के प्रचारक बनने से पहले साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के नायक बने रहने के दौरान  व्ही डी सावरकर के बारे में भी यही सच है।
इसके विपरीत आरएसएस की तरफ से ऐसा कोई दस्तावेजी काम नहीं हुआ है। न समकालीऩ आधिकारिक रिकार्ड, न प्रेस रपट या किसी वृत्तांत में ऐसा कोई संदर्भ है, जिससे आरएसएस की औपनिवेशिक शासन विरोधी भूमिका पर रोशनी पड़े। दिलचस्प बात यह है कि आजादी के बाद के संघ की प्रकाशित सामग्रियों में ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में आरएसएस ने अपनी भूमिका होने का दावा किया है। राष्ट्रवादी आरएसएस का अभी स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका से संबंधित दस्तावेजों का पहला संग्रह प्रकाशित किया जाना बाकी है। वास्तव में, आजादी से पहले के दस्तावेजों, लेखन और भाषणों में आरएसएस नेताओं ने भारत की स्वतंत्रता संग्राम से अपने लगातार विश्वासघात के रिकार्ड पेश किये हैं।


केबी हेगड़ेवार की स्वीकारोक्ति


केबी हेगड़ेवार (आरएसएस सुप्रीमो 1925 -1940) ने सचेत तरीके से आरएसएस को औपनिवेशिक शासन के खिलाफ आजादी की लड़ाई से अलग रखा। आरएसएस ने बड़ी राजनीतिक ईमानदारी के साथ ऐसी किसी भी राजनीतिक गतिविधि से खुद को अलग रखा ,जिसके तहत उसे ब्रिटिश हुक्मरान के विरोधियों के साथ नत्थी किया जा सके। हेगड़ेवार की आधिकारिक जीवनी में स्वीकार किया गया हैः
हिंदी उद्धरण (12)
गांधी के नेतृत्व में सभी समुदायों की एकताबद्ध लड़ाई की कांग्रेस की अपील को ठुकराते हुए हेगड़ेवार का कहना थाः
हिंदू संस्कृति हिंदुस्तान की जिंदगी सांस है।इसलिए यह स्पष्ट है कि उगर हिंदुस्तान की रक्षा करनी है तो हमें सबसे पहले हिंदू संस्कृति का पोषण करना होगा। अगर हिंदुस्तान में ही हिंदू संस्कृति का अवसान हो जाये और हिंदू समाज का अस्तित्व ही न रहे तो सिर्फ भौगोलिक सत्ता जो हिंदुस्तान बतौर बचा रहेगा, उसका उल्लेख करना उचित नहीं होगा। सिर्फ एक भौगोलिक गांठ से कोई राष्ट्र नहीं बनता। दुर्भाग्य से कांग्रेस संगठन ने हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति  की रक्षा के बारे में कुछ विचार नहीं किया है।यह संगठन इसके उलट हिंदू समाज पर बाहरी तत्वों के दिन प्रतिदिन के आक्रमण की तरफ आंखें बंद किये हुए है।(13)
हेगड़ेवार ने गांधी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह में आरएसएस कार्यकर्ताओं को स्वाभाविक तौर पर शामिल होने से रोकने के लिए एहतियाती इंतजाम कर दिये लेकिन गुप्त कारण से स्वयं इसमें शामिल हो गये ,जिसके बारे में हमने चर्चा की है। सत्याग्रह के लिए रवाना होने से पहले हेगड़ेवार ने आरएसएस कार्यकर्ताओं को इस  सत्याग्रह में शामिल होने से रोकने के लिए यह बयान जारी कियाः
आज जेल जाने को देशभक्ति का लक्षण माना जा रहा है।..जब तक इस तरह के क्षणभंगुर भावनाओं के बदले समर्पण के सकारात्मक और स्थाई भाव के साथ अविराम प्रयत्न नहीं होते, तब तक राष्ट्र की मुक्ति असंभव है। (14)
मार्च,1936 को आरएसएस के एक प्रचारक (होल टाइमर) कृष्णाराव वाडेकर को आरएसएस की शाखा की स्थापना के लिए महाराष्ट्र के धुले- जलगांव क्षेत्र में भेजा गया। 24 मार्च को हेगड़ेवार ने उन्हें लिखित संघ स्थापना विधि दी,उस क्षेत्र में शाखा स्थापना के लिए निर्देशिका जैसी यह थी।इसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्देश भी शामिल थाः
संघ को सामयिक उत्साह और चंचल भावनाओं के तहत शुरु किये गये हर कार्यक्रम से अपने को हर हालत में अलग रखना होगा।क्योंकि ऐसे किसी कार्यक्रम से जुड़ने पर संघ के स्थायित्व को नुकसान पहुंचेगा।(13)
हेगड़ेवार ने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध जनांदोलन की व्याख्या इस तरह कीः
हिंदी उद्धरण (16)
कांग्रेस के नमक सत्याग्रह और ब्रिटिश सरकार के बढ़ते हुए दमन के संदर्भ में नेतृत्वकारी आरएसएस कार्यकर्ताओं को उन्होंने निर्देश दिया, `इस वर्तमान आंदोलन के कारण किसी भी सूरत में आरएसएस को खतरे में नहीं डालना है’। एकदम प्रारंभिक अवस्था में 1923 में एक बहस में शामिल होकर असहयोग आंदोलन की निरर्थकता के बारे में कहा, `इस आंदोलन से  जो यश मिलता हुआ आज दीख रहा है, वह अस्थाई है और इसके संभावित परिणाम के दृष्टिकोण से भी अस्थाई है’।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को संगठित करते हुए, उसका नेतृत्व करते हुए हेगड़ेवार ने इसका खास ख्याल रखा कि इसकी गतिविधियों में ब्रिटिश मालिकान की किसी तरह की कोई खिलाफत न हो जाये। इस मकसद को हासिल करने के लिए उन्होंने अपने निकट सहयोगियों की इच्छाओं के विरुद्ध जाने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखायी। हेगड़ेवार के गुरु बीएस मूंजे ने एक आम सभा में हेगड़ेवार की उपस्थिति में राम सेना के गठन की घोषणा कर दी और हेगड़ेवार को ही उसका कमांडर इन चीफ बनाये जाने का ऐलान कर दिया। बहरहाल हेगडेवार ने बहुत जल्द समझ लिया कि इस कदम से ब्रिटिश सरकार बुरा मान सकती है क्योंकि मिलिटैंट मुसलमानों के एक संगठन खाकसार को पहले ही उन्होंने गैरकानूनी घोषित कर दिया था। फिर जल्दी ही उन्होंने बिहार के  राजगीर से बाकायदा बयान जारी करके खुद को राम सेना से अलग कर लिया ( हेगड़ेवार जनवरी,1940 में अपनी बीमारी से स्वस्थ होने के लिए राजगीर गये थे )।
हालांकि ऐसा संभव है कि उस अवधि के दौरान जन आंदोलन इतना व्यापक होने के मद्देनजर आरएसएस के कुछ कार्यकर्ता निजी हैसियत से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इस आंदोलन में शिरकत की हो, लेकिन ऐसी घटनाएं अपवाद ही हैं। दमन की शिकार जनता के हक हकूक के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बतौर एक संगठन आरएसएस ने कभी कोई आंदोलन या अभियान नहीं चलाया।आरएसएस का शीर्षस्थ नेतृत्व भी स्वतंत्रता संग्राम को हिस्सा नहीं रहा है।1940 में डा.हेगड़ेवार के निधन के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख बने गुरु गोलवलकर की कार्यकलापों और उनके विचारों के अध्ययन से  पता चलता है कि वे भी राष्ट्रीय आंदोलन के साथ कभी नहीं जुड़े।
गोलवलकर का इकबालिया बयान
गुरु गोलवलकर का जन्म 1906 में नागपुर के नजदीक  हुआ।अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय चले गये, जहां उन्होंने जीव विज्ञान का अध्ययन किया और इसी सिलसिले में दावा किया जाता है कि वे उस विश्वविद्यालय में 1933 तक अध्यापन करते रहे। उन्होंने पहले संक्षिप्त समय तक आरएसएस का काम किया और फिर आध्यात्म की ओर मुड़ गये।1937 में वे फिर आरएसएस में सक्रिय हो गये और अंततः डा. हेगड़ेवार के बाद उनके उत्तराधिकारी घोषित कर दिये गये (इसके बावजूद कि संगठन में वे सापेक्षिक तौर पर जूनियर थे)। उन्होंने 1940 में ऐसे समय पर आरएसएस का नेतृत्व संभाल लिया, जब मुस्लिम लीग के पाकिस्तान संकल्प पारित हो जाने के बाद सांप्रदायिक प्रचार प्रसार तेज करने के लिए उन्हें बनी बनायी  उपजाऊ जमीन मिल गयी।
गोलवलकर ने सीधे तौर पर स्वतंत्रता संग्राम से अलग रहने के डा.हेगड़ेवार के रास्ते का अनुसरण किया। गुरु गोलवलकर ने इस सच का महिमामंडन एक खास घटना की चर्चा करते हुए इस तरह किया हैः
हिंदी उद्धरण (20)
इस घटना से साफ जाहिर है कि आरएसएस स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहने  के लिए उसमें शामिल होने के इच्छुक ईमानदार देशभक्तों को हतोत्साहित कर रहा था। गुरु गोलवलकर ने बेशर्मी के साथ सिर्फ भारत छोड़ो आंदोलन नहीं, बल्कि ब्रिटिश विरोधी हर आंदोलन की निंदा कीः
हिंदी उद्धरण (21)
इस तरह हम देखते हैं कि गुरु गोलवलकर को ब्रिटिश हुकूमत के दमनात्मक कानून को वैध साबित करने की कितनी फिक्र थी। स्वाभाविक तौर पर स्वतंत्रता संग्राम के प्रति आरएसएस नेतृत्व की इस बेपरवाह रवैय्ये से आरएसएस के कार्यकर्ताओं भारी असंतोष पैदा होने लगा। गोलवलकर ने बिना किसी तरह कोई पश्चाताप किये इस परिदृश्य के बारे में इन शब्दों में कहाः
हिंदी उद्धरण (22)
बहरहाल संघ का ऐसा कोई प्रकाशन या दस्तावेज सामने नहीं आया, जिससे भारत छोड़ो आंदोलन या ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ किसी और अभियान में आरएसएस के किये महान अप्रत्यक्ष कार्यों पर रोशनी पड़े। गुरु गोलवलकर के बारे में निष्पक्षता से यह कहा जा सकता है कि उन्होंने कभी दावा नहीं किया कि आरएसएस ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ था। इंदौर (मध्यप्रदेश) में 1960 के दौरान अपने भाषण के दौरान उन्होंने कहाः
हिंदी उद्धरण (23)
आरएसएस की आस्था यह है कि भारत हिंदुओं की पितृभूमि है और सभी को शामिल कर लेने वाले किसी भारत की स्वतंत्रता को वैधता देने वाले किसी संग्राम को विफल करना उसके दृष्टिकोण से अनिवार्य रहा है, इसी का परिणाम आरएसएस का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से यह अलगाव है। गुरु गोलवलकर ने दरअसल इसी को स्पष्ट किया है कि आरएसएस जिस राष्ट्रवाद का प्रवक्ता है, उसमें ब्रिटिश विरोधी या साम्राज्यवाद विरोधी किसी तरह की कोई सामग्री नहीं हैः
हिंदी उद्धरण(24)
पूरे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदू मुस्लिम एकता और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनता के एकताबद्ध संग्राम के विरुद्ध विषैला विरोध आरएसएस का कार्यक्रम रहा है। गांधी को आरएसएस ने एक ऐसे खलनायक की तरह प्रचारित किया, जो हिंदू राष्ट्र की स्थापना में बाधक थे। इसी क्रम में यह महत्वपूर्ण है कि ब्रिटिश हुकूमत ने जिन्ना की जिस सांप्रदायिक राजनीति को प्रोत्साहित किया और जिस तरह इस उपमहाद्वीप का विभाजन थोंपने के लिए मुस्लिम लीग का सुविधाजनक औजार बतौर इस्तेमाल किया, आरएसएस ने उसकी निंदा कभी नहीं की, जबकि स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे गांधी का आरएसएस ने दानवीकरण कर दिया। गांधी के इसी दानवीकरण के कारण ही 1948 में उनकी हत्या कर दी गयी। महात्मा की हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप से आरएसएस भी मुक्त नहीं हो सका है।
मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपने घृणा अभियान निरंतर जारी रखने के अलावा गुरु गोलवलकर के अधीन आरएसएस ने एक और भूमिका का निर्वाह किया,जिसके तहत 1940 के दशक में वामपंथी और समाजवादी भी आरएसएस के घृणा अभियान के निशाना बना दिये गये। यह कार्रवाई ठीक उसी वक्त की गयी जबकि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में वामपंथियों और समाजवादियों का प्रभाव बढ़ रहा था। आरएसएस की इस विभाजनकारी भूमिका को आगे होने वाले शीतयुद्ध में प्रमुख भूमिका निभानेवाली खिलाड़ी सीआईए ने समुचित मान्यता दे दी। इसका स्मरण करें कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद विश्वभर में कम्युनिस्टविरोधी अभियान चलाने में मास्टर माइंड सीआईए का था। भारतीय परिदृश्य पर सीआईए प्रायोजित एक अध्ययन में कहा गया हैः
अगर भारत में वामपंथी शक्तियों को बढ़ता हुआ महत्व मिलता है या भारत की संप्रभुता के लिए कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद से बड़ा खतरा पैदा होता है तो इसका नतीजा कांग्रेस सरकार को भुगतना होगा और आरएसएस को इसका फायदा मिलेगा। ऐसी परिस्थिति में आरएसएस का उग्र हिंदू राष्ट्रवाद के जरिये मार्क्सवाद का प्रतिरोध किया जा सकेगा।(25)
इस तरह पूरे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आरएसएस की संदिग्ध भूमिका देखी जा सकती है। सारे सबूत इसके विध्वसंक चरित्र की ओर इंगित करते हैं और साबित करते हैं कि आरएसएस स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा कभी नहीं रहा है। आरएसएस का इकलौता महत्वपूर्ण `अवदान’ हिंदू राष्ट्र के उग्र अनन्य नारे के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय जनता के संग्राम को लगातार विघ्नित करते रहने का है।
शहादत की परंपरा को धार्मिक नजरिये से बदनाम करना
आरएसएस ने न सिर्फ क्रांतिकारियों की गतिविधियों से खुद को अलग रखा बल्कि भगतसिंह, चंद्र शेखर आजाद और उनके साथियों के जैसे क्रांतिकारियों के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन की भी उसने एक मानक बतौर निंदा की है। सिर्फ यही नहीं, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गांधी जैसे नेताओं के सुधारवादी उदार आंदोलनों से भी आरएसएस को घृणा थी।
तथ्यों को `गढ़ने’ में आरएसएस की क्षमता की कोई सीमा नहीं  है। आजादी के बाद भारत में आरएसएस ऐसा साहित्य तैयार करता रहा, जिसमें दावा किया गया है कि हेगड़ेवार ने भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव से 1925 में मुलाकात की थी और यही नहीं, हेगड़ेवार लगातार इन क्रांतिकारियों की सभाओं में भाग लेते रहे, फिर यहां तक कि उन्होंने 1927 में सैंडर्स की हत्या के बाद जब राजगुरु भूमिगत थे, तब उन्हें शेल्टर भी दिया।(26)
हमें मधुकर दत्तात्रेय देवरस, जिन्हें बालासाहेब देवरस के नाम से जाना जाता है और जो आरएसएस के तीसरे प्रमुख थे,उनके संस्मरणों के साथ इन दावों की तुलना करनी होगी, जिसमें देवरस ने उस घटना का ब्यौरा पेश किया है जिसमें हेगड़ेवार ने उन्हें और उनके मित्रों को भगतसिंह और उनके साथियों के रास्ते पर चलने से बचा लिया। दिलचस्प बात यह है कि ये संस्मरण आरएसएस के अपने ही प्रकाशन में ही प्रकाशित किये गयेः
जब हम कालेज में पढ़ रहे थे तब आम तौर पर हम (नौजवान) भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के विचारों से आकर्षित हो रहे थे। हमारे दिलोदिमाग में अक्सर यह ख्याल आता था कि क्यों न भगत सिंह के नक्शेकदम पर हम भी कोई बहादुरी का का कर दिखायें। उस वक्त हम संघ (आरएसएस) की तरफ कम ही आकर्षित हो रहे थे क्योंकि तत्कालीन राजनीति, क्रांति जैसे मुद्दों की तरफ नौजवान दिल से खींचे चले जा रहे थे और इन मुद्दों को लेकर संघ में चर्चा कम ही होती थी। जब भगत सिंह और उनके साथियों को मौत की सजा हो गयी, तब हमारे दिलों में इतना ज्यादा जोश पैदा हो गया कि हम मित्रों ने मिलकर संकल्प किया कि कुछ सीधी कार्रवाई कर दी जाये और हमने इसके लिए भयंकर योजना भी बना ली, फिर इस योजना को कामयाब बनाने के लिए हमने अपने अपने घर से भाग निकलने का निर्णय भी कर लिया। लेकिन इस तरह घर से भागने से पहले डाक्टरजी को जानकारी न देना उचित नहीं था। ऐसा विचार करने के बाद हमने अपने फैसले की जानकारी डाक्टरजी को देना तय किया। मित्रों के समूह ने डाक्टरजी को जानकारी देने की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी।
हिंदी उद्धरण (27)
यहां हम आरएसएस की ओर से प्रकाशित गुरु गोलवलकर के रचना संकलन के `बंच आफ थाट्स’ से एक उद्धरण पेश कर रहे हैंः
हिंदी उद्धरण (28)
शहीदों के लिए,हमारी स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति देने वाले पुरुषों और स्त्रियों के विरुद्ध इससे ज्यादा अपमानजनक और ऩिंदात्मक कोई और वक्तव्य हो सकता है क्या?
ब्रिटिश शासकों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में अपना सबकुछ जिन लोगों ने न्योच्छावर कर दिया,उनके प्रति आरएसएस के इस रवैये के लिए लज्जाजनक शब्द भी उचित प्रतीत नहीं होता। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर 1857 के महान स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एकता का माध्यम और प्रतीक बन गये थे। उनके बारे में मजाक उड़ाते हुए गोलवलकर ने लिखा हैः
हिंदी उद्धरण(29)
देश के लिए खुद को कुर्बान कर देने वाले लोगों के बारे में गोलवलकर के विचार उनके निम्नलिखित शब्दों से भी स्पष्ट होते हैं। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना प्राण उत्सर्ग करने को इच्छुक महान क्रांतिकारियों से वे उतावला होकर यह सवाल इस तरह पूछते हैं,जैसे कि वे ब्रिटिश हुकूमत का प्रतिनिधित्व कर रहे होंः
हिंदी उद्धरण(30)
गोलवलकर को भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान देने वाले लोगों की बेशर्मी की हद तक  निंदा करने की यह प्रवृत्ति अपने गुरु डा. हेगड़ेवार से विरासत में मिली है। आरएसएस की ओर से प्रकाशित हेगड़ेवार की जीवनी के मुताबिक
हिंदी उद्धरण (31)
इस तरह आरएसएस के संस्थापक के मुताबिक भारत की स्वतंत्रता  के लिए अपना बलिदान देने वाले `सतही देशभक्ति’से प्रेरित थे। यही वह कारण रहा होगा जिस वजह से आरएसएस के किसी नेता या कार्यकर्ता ने भारत में ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती नहीं दी।
चूंकि हेगड़ेवार ने निजी हैसियत से सविनय अवज्ञा  आंदोलन भाग लिया था, दूसरे कार्यकर्ताओं ने भी वैसा ही करने की अनुमति मांगी। निम्नलिखित सलाह के साथ हेगड़ेवार ने तत्काल उन्हें हतोत्साहित कर दियाः
हिंदी उद्धरण (32)


हिंदुत्व भारतीय राष्ट्रीयता के खिलाफ


आरएसएस ने अपनी बेईमान राजनीति के तहत अपनी गतिविधियां भारतीय जनता के आम (कामन) दुश्मन ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम के ध्रूवीकरण करने के लिए जारी रखीं। निम्नलिखित उदाहरणों से यह देखा जा सकता है कि किस तरह आरएसएस ने अपने ब्रिटिश आकाओं के साथ लगातार टकराव टाला और टकराव के बजाय उसने उन्हीं ब्रिटिश आकाओं की खुशी के लिए भारतीय जनता का धर्म के आधार पर बंटवारा करने के लिए हर संभव छल प्रपंच किये। ब्रिटिश शासन के दौरान आरएसएस की शाखाओं ( कवायद और दीक्षा स्थलों) पर की जाने वाली प्रार्थना और प्रतिज्ञा का अध्ययन एक उदाहरण है कि किस तरह राष्ट्रवाद को हिंदुत्व का पर्याय बनाया जा रहा था, ठीक उसी तरह जैसे मुस्लिम लीग ने इस्लाम को राष्ट्रवाद से मिला दिया था। यह महत्वपूर्ण है कि प्रार्थना और प्रतिज्ञा दोनों मातृभूमि की ब्रिटिश शासकों के अधीन पराधीनता के मुद्दे पर मौन हैं। दोनों के प्रासंगिक अंशों को देखने से यह एकदम साफ हो जाता है कि आरएसएस कार्यकर्ताओं की प्रतिज्ञा और प्रार्थना का उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन की जंजीरों से मुक्त कराने का नहीं था बल्कि इसके विपरीत वे स्वतंत्रता आंदोलन के सभी समुदायों और जातियों के एकताबद्ध संघर्ष के जरिये  एक सर्व समावेशी भारत बनाने के  लिए ब्रिटिश  हुकूमत से देश को आजाद करने के लक्ष्यों के विरुद्ध हिंदू राष्ट्र के निर्माण की तैयारी कर रहे थे। हिंदू राष्ट्रवाद के बीज इन दोनों अभ्यासों अर्थात प्रार्थना और प्रतिज्ञा में अंतर्निहित थे, जिससे ब्रिटिश शासकों का अपना दमनात्मक राजकाज जारी रखने में भारी मदद मिली।
प्रार्थना
हिंदी उद्धरण (33)
प्रतिज्ञा
हिंदी उद्धरण (34)
भारतीय राष्ट्रवाद को हिंदू धर्म का पर्याय बना देने की इस कवायद की अक्सर अनेक हिंदुओं ने आलोचना की है, आरएसएस के प्रकाशन में एक घटना के ब्यौरे से ऐसा पता चलता है। यह घटना बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में 1929-30 में हुई,इस मौके पर डा.हेगड़ेवार और गोलवलकर दोनों मौजूद थेः
हिंदी उद्धरण (33)
इस बैठक के बाद गोलवलकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय शाखा के संघ चालक नियुक्त कर दिये गये।
गुरुजी बाद में सरसंघचालक भी बने। वे  विदेशी हुकूमत के विरुद्ध किसी आंदोलन पर अपना विरोध छुपा नहीं पाते थे।यहां तक कि मार्च,1947 में जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का फैसला कर लिया था, तब भी गुरुजी ने दिल्ली में आरएसएस के वर्षपूर्ति समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि संकुचित दृष्टि वाले नेता ब्रिटिश राजसत्ता का विरोध करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने अपने इस मंतव्य की व्याख्या करते हुए आगे कहा कि विदेशी शासकों को हमारी सभी बुराइयों के लिए जिम्मेदार ठहराना गलत है। उन्होंने `विजेताओं के प्रति हमारी घृणा को आधार बनाकर राजनीति आंदोलन शुरु करने की प्रवृत्ति’ की आलोचना की।(36)
अपने भाषण के दौरान एक घटना के बारे में चर्चा करे हुए इस मुद्दे पर उन्होंने और मौलिक विचार पेश कियेः
हिंदी उद्धरण (37)


ब्रिटिश शासकों और नाजियों के लिए प्रेम
आरएसएस औपनिवेशिक वर्चस्व को अन्याय मान नहीं रहा था। 8 जून,1942 को अपने भाषण में गोलवलकर ने घोषणा कीः
संघ किसी और को समाज के इस अधःपतन के लिए दोष देना नहीं चाहता।जब लोग दूसरों को दोषी ठहराते हैं, तब उनमें कोई दुर्बलता होती है। किसी दुर्बल के प्रति हो रहे अन्याय के लिए किसी शक्तिशाली को दोष देना व्यर्थ है।...संघ दूसरों की आलोचना में अपना अमूल्य समय नष्ट नहीं करना चाहता। अगर हम जानते हैं कि बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाती हैं, तो यह सरासर पागलपन है कि इसके लिए बड़ी मछलियों को दोष दिया जाये। प्रकृति के नियम अच्छे हों या बुरे शाश्वत हैं। ये नियम उन्हें गलत कहकर बदले नहीं जा सकते।(38)
यह अपने आप में सच को उजागर करता है कि 1925 से लेकर 1947 तक आरएसएस के पूरे साहित्य में ब्रिटिश हुक्मरान के खिलाफ चुनौती, पर्दाफाश, आलोचना या टकराव वाली एक भी पंक्ति उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि इसका एक मात्र काम अल्पसंख्यकों को कोसने और खासतौर पर मुसलमानों को कोसने का रहा है।
गुरुजी की पुस्तक `वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ 1939 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक से आरएसएस नेतृत्व के चिंतन मनन की अंतर्दृष्टि मिलती है। इस पुस्तक में उन्होंने हिटलर के नाजी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आदर्श बतौर प्रस्तुत किया। वही हिटलर जिसने करोड़ों यहूदियों की निर्ममताा से हत्या कर दी थी, उन्हें आदर्श बनाते हुए उन्होंने निम्नलिखित शब्दों में लिखाः
हिंदी उद्धरण (39)
गोलवलकर ने बेहिचक अपने हिंदू राष्ट्र के लिए हिटलर के अधिनायकवाद और उनके फासीवादी कामकाज को बतौर माडल पेश किया और यह इसी पुस्तक में इन शब्दों में लिखा गया हैः
हिंदी उद्धरण (40)
इस पुस्तक में एक भी पंक्ति उन ब्रटिश शासकों के खिलाफ नहीं है जो भारतीय जनता का दमन कर रहे थे और देश को लूट रहे थे। इस पुस्तक में एक ही कार्यक्रम की रुपरेखा है और वह कार्यक्रम उन अल्पसंख्यकों को अधीनस्थ बनाने का है, जो न तो राष्ट्र का नियंत्रण कर रहे थे और न उनकी कोई राजनैतिक या आर्थिक ताकत थी। जिनमें से पचानब्वे फीसद लोग तरह तरह के काम धंधे में शिल्पकार दस्तकार, गरीब किसान, भूमिहीन खेतिहर मजदूर और दिहाड़ी मजदूर थे। गोलवलकर की सुपर हिंदू नस्ल को ब्रिटिश शासकों में कोई प्रतिपक्ष नजर नहीं आता था, जो वास्तव में विदेशी की परिभाषा के सही अर्थ में विदेशी थे और जिन्होंने भारतीय जनता के हुजूम, जिनमें बहुसंख्यक हिंदू थे, उन्हें तकलीफें ,भूख, गरीबी और मौत के अलावा कुछ नहीं दिया।
अल्पसंख्यकों, खास तौर पर मुसलमानों के प्रति  आरएसएस की घृणा और ब्रिटिश शासकों से प्रश्नातीत प्रेम 1882-85 के दौरान बंकिम चंद्र चटर्जी के लिखे ऐतिहासिक उपन्यास `आनंदमठ’ से सघन हुई हिंदुत्व की विरासत की निरंतरता है। (41) इस उपन्यास में मुसलमानों के कत्लेआम का जश्न मनाते हुए ब्रिटिश शासन को हिंदू राजकाज के बराबर महिमामंडित किया गया है। इसके बावजूद हिंदुत्ववादी तत्व इस उपन्यास को भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक मानते हैं। इस उपन्यास में हिंदू संतानों (साधुओं) द्वारा मुस्लिम शासन के तख्ता पलटने और ब्रिटिश शासन की स्थापना की कथा है। जब कुछ संतानों (साधुओं ने) इस परिणाम से असंतुष्ट होकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ाई की मांग की तो चूंकि हिंदुओं के शासन की अभी तक स्थापना नहीं हुई थी,इसलिए स्वर्ग से अवतरित किसी रहस्यवादी नेता ने उनसे कहाः
हिंदी उद्धरण (42)
इस तरह हिंदू विद्रोह के नेता अंततः संतानों को हिंदू देश के पुनरूत्थान न होने तक ब्रिटिश राज की उपयोगिता समझाने में  सफल हो गये और संतानों में से अनेक यह संसार छोड़कर हिमालय चले गये। जिस आनंदमठ से बंगाल में राष्ट्रवादी आंदोलन की प्रेरणा मिली ,उसमें ब्रिटिश राज का महिमामंडन भरा पूरा है।


आरएसएस ने हिंदू रजवाड़ों का पक्ष लिया जो औपनिवेशिक शासकों के पिट्ठू थे
आरएसएस के विचारों का एक और धार्मिक कुलीन कार्डिनल पहलू है,जिस वजह से उसने खुद को स्वतंत्रता संग्राम से अलग रखा। भारत की देशी रियासतों के रजवाड़ों से संघ की गहरी आत्मीयता रही है। आरएसएसके मुताबिक हिंदू रजवाडे़ सिर्फ हिंदू धर्म के अवलंबी ही नहीं, बल्कि वे अतीत के उन बहादुर हिंदू राजाओं के उत्तराधिकारी हैं और वे `आपातकालीन परिस्थितियों में (हिंदुत्व की ) शक्ति’ हैं। वास्तव में, आरएसएस और हिंदू महासभा दोनों देशी रियासतों के रजवाड़े के ब्रिटिश शासकों के साथ गठबंधन को गर्व के साथ हिंदुत्व का शक्ति स्थान बताते रहे हैं। इसका निश्चित मायने यह है कि भारत की मेहनतकश हिंदू जनता की आकांक्षाओं के बारे में उनकी कोई धारणा नहीं रही है और न वे इस पर यकीन करने को तैयार थे कि हिंदू (और मुस्लिम और सिख) रजवाड़े दरअसल इस देश में ब्रिटेन के लिए पंचम वाहिनी की तरह काम कर रहे थे।
इस महत्वपूर्ण  तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि 1857  की क्रांति के दौरान जो हिंदू (और दूसरे) रजवाड़े विदेशी शासकों के प्रति पूरी तरह वफादार रहे और जिन्होंने उन्हें अपनी सेना के साथ कुमुक  भी मुहैय्या कराया, उन्हें अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के दमन के बाद राजकाज में बहाल रहने दिया। गोरे आकाओं के वफादार और विश्वसनीय गुर्गे ये रजवाड़े अपनी रियासतों में लोकतांत्रिक कार्यकलापों की इजाजत कभी नहीं देते थे। इन देशी रियासतों में बलात्कार, हत्या, अपंग बना देने की अंतहीन घटनाएं होती रहती थीं और इसके साथ ही मौलिक मानवाधिकारों की मांग लेकर होने वाले राजनीतिक कार्यकलापों के लिए भयंकर उत्पीड़न किया जाता रहा है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में असंख्य ऐसे मामले हैं, जिनमें इन रियासतों की प्रजा को कांग्रेस का तिरंगा तक फहराने नहीं दिया गया। ऐसी एक रक्तरंजित घटना मैसूर रियासत में हुई, जहां सार्वजनिक तौर पर तिरंगा को सलामी देने के जुर्म में हिंदू शासक की सशस्त्र सेना ने छब्बीस लोगों को मौत के घाट उतार दिया और असंख्य लोगों को जख्मी कर दिया।(43)
इन रजवाड़ों के उत्पीड़न और अमानवीय राजकाज के बारे में सरदार पटेल को लंबे अरसे से जानकारी रही है। स्वतंत्रता संग्राम के एक नेता की हैसियत से वे स्वयं निजी तौर पर उनके हाथों ऐसे उत्पीड़न के शिकार हुए। 24 जुलाई,1946 को बीकानेर के राजा को लिखे अपने पत्र में उन्होंने दो टुक शब्दों में इन रियासतों के निरंकुश चरित्र को रेखांकित किया हैः
रियासतों और उनकी प्रजा के बीच अच्छे संबंध स्थापित होने के रास्ते में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो जाता है कि ज्यादातर रियासतों में मौलिक अधिकारों और नागरिको की स्वतंत्रता को मान्यता नहीं दी जाती और जिम्मेदार शासन की प्रजा की नैसर्गिक  मांग को भी स्वीकार नहीं किया जाता।(44)
आरएसएस के प्रकाशित अपने साहित्य में कुछ घटनाओं का जो ब्यौरा पेश किया गया है, उनसे आरएसएस के इन रजवाड़ों के साथ नजदीकी रिश्तों का अंदाजा लगाया जा सकता है। 1931 में बाकायदा हेगड़ेवार के विशेष निर्देशों के तहत कोल्हापुर के शासक राजाराम महाराजा को खुश करने के मकसद से स्थानीय आरएसएस संगठन का नामकरण उनके नाम पर `राजाराम स्वयंसेवक सेवक संघ’ कर दिया गया।(45) इसी तरह जब भी हेगड़ेवार पुणे की यात्रा पर होते थे, वे राजकीय अतिथि होते थे। हालांकि 1938 में अपनी एक ऐसी ही यात्रा के दौरान जब स्वयंसेवकों के एक समूह ने रियासत प्रायोजित कार्यक्रमों से भी अपने जुड़ने की इजाजत मांगी तो हेगड़ेवार ने आरएसएस कार्यकर्ताओं की नाराजगी की परवाह किये बिना इस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया।(46)
इसी तरह जब भी हेगड़ेवार औंध रियासत (जो अब महाराष्ट्र में है) जाते थे, वे हमेशा राजा के साथ राजमहल में ही ठहरते थे और हेगड़ेवार जिन आम सभाओं को संबोधित करते, उनकी अध्यक्षता भी औंध के राजा किया करते थे। नागपुर शहर में आरएसएस का प्रतिष्ठान बनते ही नागपुर के शाही घराने ने आरएसएस की सभाओं के लिए जगह देने का सिलसिला जारी रखा। राजा लक्ष्मणराव भोंसले और रघुजी राव भोंसले दोनों ने आरएसएस और हिंदू महासभा को अपनी रियासत में जड़ें जमाने में मदद की।(48) पुणे (अब भी पुणे) के प्रधानमंत्री जमनादास मेहता भी आरएसएस और हिंदू महासभा दोनों संगठनों के बड़े संरक्षक थे। उन्होंने अनेक प्रकार से दोनों संगठनों की सहायता की।(49)
अखंड भारत के प्रति इन हिंदू राजाओं की प्रतिबद्धता की विवेचना इस तथ्य के आलोक में  की जा सकती है कि नवानगर के महाराजा ( चांसलर आफ दि चैंबर आफ प्रिसेंज) 1947 में देशी रजवाड़ों की सत्ता बहाल रखने के बारे में मुस्लिम लीग से बातचीत करते बताये जाते हैं।रजवाड़ों के इस नेता की दलील थीः `हम क्यों न मुस्लिम लीग का समर्थन करें क्योंकि मिस्टर जिन्ना हमारा वजूद बनाये रखने को तैयार हैं, जबकि नेहरु रजवाड़ों को खत्म कर देना चाहते हैं..’(50)
1948 में गांधी की हत्या के बाद फिर एक बार आरएसएस और हिंदू रजवाडो़ं के आपराधिक संबंध उजागर हो गये। ग्वालियर, भरतपुर और अलवर रियासतों में गांधी की हत्या पर मिठाइयां बांटी गयीं (और ये तीनों रियासतें आरएसएस और हिंदू महासभा का संरक्षण कर रही थीं)। जवाहर लाल नेहरु ने गांधी की हत्या के छह दिन बाद अपने मंत्री सरदार पटेल को लिखे पत्र में इस ताल्लुकात के बारे इन शब्दों में लिखाः
ऐसा लग रहा है कि कुछ रियासतों में खासकर भरतपुर और अलवर में बड़ी तादाद में आरएसएस के खास लोग पहुंच गये हैं। जो अपने साथ विभिन्न तरह की सामग्री बड़ी मात्रा में लेकर वहां पहुंचे है। इसका अंदेशा है कि ये लोग अन्यत्र खुफिया गतिविधियां शुरु करने के मकसद से इन रियासतों में आधार बना रहे होंगे।(51)
भारतीयों, जिनमें बहुसंख्य हिंदू हैं, के विकास और देश की आजादी दोनों बातें औपनिवेशिक शासन और उनके पिट्ठुओं के अंत होने पर ही निर्भर थे।किंतु आरएसएस का गठबंधन इन निरंकुश सामंती तत्वों के साथ था और वह उनकी संप्रभुता बहाल करने की मांग कर रहा था।इस तरह आरएसएस दरअसल इस रजवाड़ों के वास्तविक संरक्षक ब्रिटिश शासकों के पक्ष में खड़ा था। आरएसएस और देशी रजवाड़ों के इस रिश्ते से फिर साबित होता है कि आजादी की लड़ाई के कितने खिलाफ रहा है आरसएस।


आरएसएसः द्विअर्थी वक्तव्य का विशेषज्ञ
भारत की स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र,अल्पसंख्यकों के प्रति बेशर्म तानाशाह रवैय्ये और पतनशील हिंदू रजवाड़ों और ब्रिटिश आकाओं को खुल्ला समर्थन को जायज बता पाना आरएसएस समर्थक तत्वों के लिए संभव नहीं था। (दिलचस्प बात यह है कि मोहमम्द अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने भी मुस्लिम रजवाड़ों का आरएसएस के हिंदू रजवाड़ों को समर्थन की तर्ज पर समर्थन किया था।) `वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ (52)जैसी किताब जिसका  ब्रिटिश राज के दौरान आरएसएस ने  खुलकर प्रचार प्रसार किया था और जिसके चार संस्करण प्रकाशित हो गये थे, अचानक उस पुस्तक को किसने लिखा, इस पर विवाद खड़ा कर दिया गया।अपनी ताजा जरुरतों के मुताबिक आरएसएस मशीनरी इस पुस्तक के लेखक के बारे में तरह तरह की थ्योरी पेश करने लगी है। दिलचस्प बात यह है कि इस पुस्तक में जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर का महिमामंडन ब्रिटिश राज के उस दौर में किया गया, जब अंग्रेज हिटलर के खिलाफ दूसरे विश्वयुद्ध में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे थे, इसके बावजूद ब्रिटिश प्रशासन ने इस पुस्तक पर पाबंदी नहीं लगायी। ऐसी पुस्तक के अबाध प्रचार प्रसार की इस तरह इजाजत देने का सीधा मतलब यह है कि ऐसी पुस्तक `बांटो और राज करो’ की साम्राज्यवादी नीति के लिए जरुरी थी।
`वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ के लेखक असल में कौन है, इस पर खड़े किये गये विवादों से परे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आरएसएस ने अल्पसंख्यकों, खास तौर पर मुसलमानों के सफाये का अपना नजरिया कतई नहीं बदला है। ब्रिटिश शासकों ने आरएसएस को खुली छूट दे रखी थी और इस मौके का फायदा उठाकर आरएसएस ने अपनी सांगठनिक क्षमता ऐसी विकसित कर ली ,जिसके तहत मौका पड़ने पर देश के अनेक हिस्सों में उसने मुसलमानों और ईसाइयों के खून की होली खेलने की भरसक कोशिशें कीं। भारतीय स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर देश की एकता को खंडित करने की आरएसएस की भयावह योजना के बारे में उत्तर प्रदेश के पहले गृहसचिव राजेश्वर दयाल, आईसीएस ने अपनी जीवनी में साफ साफ लिखा हैः
हिंदी उद्धरण (53)
तिरंगे की बदनामी
आरएसएस ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हर उस चीज से नफरत की,जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध संघर्ष का प्रतीक थी। इसे समझने के लिए तिरंगा एक सही मामला है। दिसंबर,1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन  में पूर्ण स्वराज का राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित कर दिया और जनता से अपील कर दी कि 26 जनवरी,1930 को तिरंगा फहराकर उसका सम्मान करते हुए स्वतंत्रता दिवस मनायें। तब तक तिरंगे को  राष्ट्रीय आंदोलन का ध्वज मानने पर आम सहमति हो गयी थी। इसकी प्रतिक्रिया में सरसंघचालक डा.हेगड़ेवार ने आरएसएस की सभी शाखाओं को एक निर्देश जारी करके की वे भगवे ध्वज की पूजा करें। इसमें सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि आरएसएस किसी कार्यक्रम में आज भी तिरंगा या राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया जाता। देशभक्ति के पाखंड के प्रदर्शन के लिए हालांकि आरएसएस के डा.मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता कश्मीर के श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा फहराने जा सकते हैं या आरएसएस मदरसों में तिरंगा फहराने की मांग उठा सकता है या उमा भारती तिरंगा यात्रा पर निकल सकती हैं,लेकिन सच यह है कि आरएसएस खुलकर तिरंगा का असम्मान करता है और उसकी बदनामी भी करता है। गोलवलकर ने नागपुर में 14 जुलाई,1946 को  गुरु पूर्णिमा के अवसर पर वहां इकट्ठे लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि भगवा ध्वज संपूर्णता के साथ हमारी महान संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यह ईश्वर का प्रतिरुप हैः `हमें पक्का विश्वास है कि अंत में पूरा देश भगवे ध्वज को नमन करेगा।’(54)
आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र  आर्गेनाइजर ने संविधान सभा की समिति में सभी दलों और सभी समुदायों को मंजूर तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रुप में मान लेने के फैसले की खबर पर प्रतिक्रिया जताते हुए` दि नेशनल फ्लैग’ शीर्षक से 17 जुलाई,1947 के अपने संपादकीय में लिखाः
हिंदी उद्धरण
`अगर हिंदुस्तान के हिंदुओं की एक साझा सभ्यता, संस्कृति, रीति रिवाज और तौर तरीके हैं, साझा भाषा और साझा परंपराएं हैं तो उनका एक ध्वज भी है,जो विश्वभर में सबसे प्राचीन और सबसे महान है, जैसे कि उनकी सभ्यता विश्वभर में प्राचीनतम है।  राष्ट्रीय ध्वज से सवाल का हल इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में निकाला जाना चाहिए, न कि लापरवाह तरीके से जैसा इस वक्त किया जा रहा है। यह सत्य है कि विदेशी आक्रमणों के कारण अस्थाई दुर्भाग्य और उसके नतीजतन तमाम तरह के खौफनाक मंजर की वजह से हिंदुओं का राष्ट्रीय ध्वज पीछे धकेल दिया गया है।लेकिन सभी को मालूम है कि निश्चित तौर पर यह फिर अपने प्राचीन गौरव और महानता के साथ किसी दिन लहरायेगा। इस ध्वज  के अद्वितीय रंग में ऐसा कुछ है जो देश के प्राण औऱ आत्मा के लिए अत्यंत प्रिय है और यह रंग भोर का अद्भुत रंग है,जो पूर्व की दिशा में  धीरे किंतु राजकीय सूर्योदय के वक्त प्रकट होता है। इसी तरह हमारे पूर्वजों ने हमें विश्व को जीवनी शक्ति देने वाला यह ध्वज सौंपा है। वे सिर्फ अज्ञानी और दुष्ट हैं जो इस ध्वज के अद्भुत आकर्षण, उसकी महानता और भव्यता को देख नहीं सकते। यह आकर्षण, महानता और भव्यता उतना ही गौरवशाली है जैसा कि स्वयं सूर्य है। यह ध्वज हिंदुस्तान का एकमात्र सच्चा ध्वज बन सकता है। राष्ट्र को यही और एकमात्र यही स्वीकार होगा।जनता की लगातार बढ़ती मांग देखी जा सकती है और संविधान सभा को इसके मद्देनजर जनआकांक्षा की पूर्ति के लिए सुझाव दिये जाने चाहिए।’
भारत की स्वतंत्रता से मात्र एक दिन पहले आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र आर्गेनाइजर (14 अगस्त,1947) में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज चुनने के निर्णय को नीचा दिखाते हुए लिखा गयाः
हिंदी उद्धरण
स्वतंत्रता के बाद भी जब तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज बन गया, आरएसएस ने इसे राष्ट्रीय ध्वज मानने से इंकार कर दिया। `बंच आफ थाट्स’ में `ड्रिफ्टिंग एंड ड्रिफ्टिंग’ शीर्षक निबंध में गुरु गोलवलकर ने राष्ट्रीय ध्वज के मुद्दे पर चर्चा करते हुए राष्ट्रीय ध्वज की निंदा करते हुए  निम्नलिखित शब्दों में लिखाः
हिंदी उद्धरण (55)
बतौर सांस्कृतिक संगठन आरएसएस
आरएसएस के नेतृत्व ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपनी निष्क्रियता के बचाव में हमेशा यही दलील पेश की है कि उनका तो एक सांस्कृतिक संगठन है और राजनीतिक मुद्दे उठाना उसके लिए संभव नहीं था।मीडिया में आरएसएस समर्थक लोग इस धारणा को मजबूत करने के लिए ओवरटाइम काम करते रहते हैं। अपनी राजनीतिक सुविधा के मुताबिक आरएसएस अपना चेहरा बदलता रहता है। हकीकत यह है कि अल्पसंख्यकों, धर्मनिरपेक्षता और हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में वे उग्र राजनीतिक हैं। बहरहाल जब भी अमानवीय ब्रिटिश हुकूमत का मुद्दा उठता है, वे तुरंत चेहरा बदलकर सांस्कृतिक संगठन का मुखौटा ओढ़ लेते हैं।आरएसएस नेताओं के सार्वजनिक दिखावे के विपरीत राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने के विषय पर गुरुजी के विचार जानना उपयोगी होगा। वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के एक प्रशिक्षण शिविर को संबोधित करते हुए उन्होंने कहाः
हिंदी उद्धरण (56)
गोलवलकर के ये विचार बेतरतीब नहीं हैं।स्वतंत्रता के बाद आरएसएस की राजनीतिक महात्वाकांक्षा के के बारे में वे उनकी  निरंतर मुखरता इन शब्दों में अभिव्यक्त होती रही हैः
हिंदी उद्धरण (57)
इसलिए स्वतंत्रता संग्राम के साथ आरएसएस के विश्वासघात का यह कोई कारण नहीं है कि एक अराजनीतिक संगठन बतौर आरएसएस की कोई सीमाबद्धता रही है।अपने ब्रिटिश आकाओं के मातहत काम को छुपाने का यह एक बहाना है।
आरएसएस और वीर सावरकर ने एक साथ मिलकर ब्रिटिश शासकों और मुस्लिम लीग की मिलीभगत से स्वतंत्रता आंदोलन के साथ विश्वासघात किया
व्ही डी सावरकर ने एक सच्चे क्रांतिकारी की तरह भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना राजनीतिक जीवन 1904 में शुरु किया, तब वे ऐसा स्वतंत्र भारत चाहते थे, जिसमें किसी तरह का धार्मिक और राजनीतिक भेदभाव न हो। जो 1857 पर उनकी `महान कृति’ `दि इंडियन वार दि इंडिपेंडेस 1857’ की भावधारा रही है और उन्होंने यह पुस्तक इंग्लैंड में रहते हुए 1907 में लिखी थी।
किंतु  1911 में अंडमान सेलुलर जेल में कारावास के दौरान भारत की स्वतंत्रता के बारे में उनकी समझ में मौलिक परिवर्तन आ गया। उन्होंने पांच दया याचिकाएं लिखकर ब्रिटिश हुकूमत से अतीत में अपने ब्रिटिश विरोधी कार्यकलापों के लिए मापी मांगी और आवेदन किया कि वे उन्हें जेल से रिहा  कर दिया जाय और यह वादा भी कर दिया कि वे उनके प्रति वफादारी निभायेंगे।अब वे हिंदू राष्ट्र के पक्षधर में तब्दील  हो चुके थे और उन्हें ब्रिटिश जेल में रहते  हुए 1923 में हिंदू अलगाववाद पर अपना निबंध हिंदुत्व लिखने की इजाजत मिल गयी।(58)
सावरकर जल्दी ही उन सभी लोगों को लामबंद करने का माध्यम बन गये, जो अलग हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे। जेल से औपचारिक रिहाई के बाद उन्होंने हिंदू महासभा के नेतृत्व की कमान संभाल ली। महत्वपूर्ण बात यह है कि आरएसएस के संस्थापक हेगड़ेवार हिंदू महासभा के इन्हीं व्ही डी सावरकर को अपना गुरु, दार्शनिक और गाइड मानते थे। सावरकर की आधिकारिक जीवनी के लेखक धनंजय खेर ने इन दोनों की आत्मीयता का ब्यौरा इस तरह दिया हैः
हिंदी उद्धरण (59)
आरएसएस के एक और आलोकस्तंभ, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी स्वीकार किया है कि उनकी जड़ें सावरकर के हिंदुत्व में हैं। 4 मई,2002 को पोर्टब्लेयर एअरपोर्ट का नामकरण वीर सावरकर एअरपोर्ट करने के लिए पोर्ट ब्लेयर  की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने उपस्थित लोगों से कहा कि `हिंदुत्व को लेकर लज्जित होने की जरुरत नहीं है और उन्होंने सावरकर के विचारों के विस्तार से प्रतिपादित किया।उनके मुताबिक देश की विरासत की यह सर्वसमावेशी विचारधारा है।’(60)
दुर्भाग्यजनक तौर पर आडवाणी उन सावरकर का महिमामंडन कर रहे थे, जो हिंदुत्व की आदर्शमूर्ति होने के बावजूद दो राष्ट्र सिद्धांत के घनघोर समर्थक थे। अहमदाबाद में 1937 को हिंदू महासभा के 19वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने घोषणा कर दीः
हिंदी उद्धरण (61)
इसी प्रसंग में इस तथ्य को नजर्ंदाज नहीं किया जा सकता कि मुस्लिम लीग ने अपना पाकिस्तान प्रस्ताव 1940 में ही पारित किया था। आरएसएस के महान दार्शनिक और गाइड सावरकर ने न सिर्फ मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव से काफी पहले दो राष्ट्र का सिद्धांत पेश कर दिया, बल्कि भारत छोड़ो आंदोलन को तोड़ने के लिए उन्होंने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन भी कर लिया।कानपुर (उत्तरप्रदेश) में 1942 में हिंदू महासभा के 24 वें अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने मुस्लिम लीग के साथ गिरोहबंदी का बचाव इन शब्दों में कियाः
हिंदी उद्धरण (62)
हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने नार्थ वेस्ट फ्रांटियर प्रोविंस में भी साझा सरकार बनायी।


भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ ब्रिटिश शासकों का समर्थन
आरएसएस के भ्रातृ संगठन हिंदू महासभा ने भी सावरकर के नेतृत्व में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अत्यंत संदिग्ध और विभाजनकारी भूमिका निभाई। तमाम कांग्रेस कार्यकर्ता और भारतीय जनता का एक बड़ा हिस्सा जब औपनिवेशिक शासन के भयंकर दमन का मुकाबला कर रहे थे और उन्होंने राजकीय संस्थाओं के बायकाट का फैसला कर लिया, हिंदू महासभा ने ब्रिटिश शासकों के साथ सहयोग करने का निर्णय किया। कानपुर (उत्तरप्रदेश) में 1942 में हिंदू महासभा के 24 वें अधिवेशन को  संबोधित करते हुए सावरकर ने ब्रिटिश शासकों के साथ सहयोग करने की रणनीति की रुपरेखा इन शब्दों में प्रस्तुत कीः
हिंदी उद्धरण (63)
उन्होंने इस सहयोग के तहत यहां तक  घोषणा कर दी कि `वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध तथाकथित संयुक्त मोर्चा टूट जाने की भी परवाह नहीं करेंगे’। उनके यह कहने का तात्पर्य यह था कि वे भारत छोड़ो आंदोलन को तोड़ने में भी हिचकिचायेंगे नहीं और वास्तव में उन्होंने ऐसा ही कर दिखाया।
डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953) राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख आदर्श मूर्ति हैं,जिन्हें महानतम  हिंदू राष्ट्रवादियों में शामिल  माना जाता है। लेकिन सदमे की बात यह है कि यह `महान हिंदू राष्ट्रवादी भी ब्रिटिश शासकों के महान पिट्ठू रहे हैं। जब वे बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार के उप मुख्यमंत्री थे,तब  उन्होंने अपने ब्रिटिश आकाओं से भारत छोड़ो आंदोलन को रौंद डालने का वादा किया। बंगाल के ब्रिटिश गवर्नर को संबोधित अपने 26 जुलाई,1942 तारीख के सरकारी पत्र में उन्होंने लिखाः
कृपया मुझे बंगाल में कांग्रेस के व्यापक आंदोलन छेड़ देने से पैदा होनेवाली  स्थिति की चर्चा करने की इजाजत दें। युद्ध के दौरान जो कोई जन भावनाएं भड़काने की योजना में लिप्त होकर आंतरिक उपद्रव या असुरक्षा की स्थिति पैदा करेगा, उस दौरान राजकाज में शामिल किसी भी सरकार को सख्ती से निबटना होगा।(64)
उन्होंने ब्रिटिश राज का महिमामंडन करते हुए इस आंदोलन के दमन के लिए दमन की पद्धतियों के सुझाव भी दिये।उनके मुताबिकः
सवाल यह है कि बंगाल में इस आंदोलन (भारत छोड़ो) का मुकाबला कैसे किया जाये? राज्य प्रशासन को इस तरह तैयार करना होगा कि कांग्रेस के सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद बंगाल में इस आंदोलन की जड़ें फैलनी नहीं चाहिए।यह हम जैसे ,खासतौर पर जिम्मेदार मंत्रियों के लिए संभव होगा कि हम जनता को समझा सकते हैं कि कांग्रेस ने जिस स्वतंत्रता के लिए आंदोलन शुरु किया है, जन प्रतिनिधियों को वह पहले से मिल गयी है। बहरहाल कुछ क्षेत्रों में आपातकालीन स्थितियों में वह सीमित जरुर हो सकती है। भारतीयों को ब्रिटिश हुकूमत में आस्था रखनी होगी। ऐसा ब्रिटेन के हित में नहीं, न ही इसके लिए कि इससे ब्रिटिश की शक्ति बढ़ेगी,बल्कि प्रांत की सुरक्षा और उसकी स्वतंत्रता के लिए यह जरुरी है।आप गवर्नर  की हैसियत से प्रांत के संवैधानिक प्रमुख हैं और आप अपने मंत्रियों के परामर्श के मुताबिक ही राजकाज चलायेंगे।(65)
सुभाष चंद्र बोस से विश्वासघात
1939 में नेताजी नाम से मशहूर सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस छोड़ दी और औपनिवेशिक शासन से भारत को स्वतंत्र करने के लिए सशस्त्र संग्राम शुरु करने का लक्ष्य लेकर अगले ही साल भारत छोड़कर चले गये। इसकी प्रतिक्रिया में आश्चर्यजनक तौर पर सावरकर की अध्यक्षता में हिंदू महासभा ने किसी भी सैन्य प्रतिरोध को कुचलने के लिए ब्रिटिश हुकूमत की मदद करने का फैसला कर लिया। सावरकर ने बेशर्मी से ऐलान कर दियाः
हिंदी उद्धरण (66)
सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महासभा ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी बिना किसी अपवाद के संपूर्णता के साथ कर रही थी। उन्होंने हिंदुओं का आह्वान किया कि `वे करोड़ों हिंदू योद्धाओं और हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं के दिलों के साथ बाढ़ की तरह (ब्रिटिश) सेना,नेवी और वायु सेना में घुस जायें’ और आश्वस्त किया कि अगर वे ऐसा करते हैं तो
हिंदी उद्धरण (67)
आरएसएस ने सावरकर  के चरण चिन्हों पर चलते हुए इस विचार को सिरे से रद्द कर दिया कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ मिलकर राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए। आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र आर्गेनाइजर ने स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर (14 अगस्त, 1947 को) अपने संपादकीय में राष्ट्र की अवधारणा इस रुप में प्रस्तुत कीः
हिंदी उद्धरण
भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की इसी प्रतिबद्धता के तहत  2013 में आरएसएस के वरिष्ठ स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी ने, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे (मई, 2014 को भारत का प्रधानमंत्री बनने से पहले), अपने को हिंदू राष्ट्रवादी घोषित कर दिया। स्वाभाविक तौर पर मोदी ने भारतीय राष्ट्रवाद की गौरवशाली विरासत का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया और मुस्लिम अलगाववाद के झंडेवरदार मुस्लिम राष्ट्रवादी जिन्ना को अनुसरण करते हुए हिंदू राष्ट्रवादी बन गये। यह उल्लेखनीय है कि 30 जनवरी,1948 को जिन हिंदुत्ववादी अपराधियों ने एमके गांधी की हत्या कर दी थी, उन्होेंने भी खुद को हिंदू राष्ट्रवादी घोषित कर दिया था।
निष्कर्ष
एक औसत भारतीय के लिए ब्रिटिश हुकूमत का मायने क्या है? दमन, लूट और भारतीय जनता की गरीबी का प्रतीक है ब्रिटिश हुकूमत। इसका मतलब बांटो और राज करो की विदेशी शासकों की नीति है जिसके तहत उन्होंने भारतीय समाज के धार्मिक और सांप्रदायिक विभाजन को प्रोत्साहन दिया। ऐसे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ किसी संग्राम की प्रेरक भावना क्या हो सकती थी? ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन की मूल भावना क्या रही है?
भाजपा का नेतृत्व आरएसएस को स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा साबित करने के लिए बहुत इच्छुक है। यह ज्यादा सम्मान  और व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त करने का एक प्रयास है। एक ऐसी पार्टी जो खुद देशभक्ति का पारस पत्थर होने का दावा करती है, उसके लिए यह महत्वपूर्ण चुनौती है। भाजपा को यह शर्मनाक लगता है कि आरएसएस स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा नहीं रहा है जबकि उसका शीर्ष नेतृत्व और बहुत भारी बहुसंख्य भाजपा कार्यकर्ता आरएसएस से जुड़े हैं। यह राजनीतिक तौर पर असुविधाजनक है कि कि एक ऐसा संगठन जो लगातार अतीत गौरव के संदर्भ प्रस्तुत करे, औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संग्राम में, जो भारतीय जनता का इस देश में सबसे शक्तिशाली महासंग्राम है, उसमें उसकी कोई विरासत नहीं है। आरएसएस में इतना सत्साहस नहीं है कि वह खुलकर कहे कि उसकी अपनी विचारधारा ने ही उसे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने से रोका। बहरहाल  हिंदू दक्षिणपंथ की इस राजनीतिक धारा को हालांकि इस बीच इतिहास को झूठा साबित करने और अपने हिसाब से इतिहास गढ़ने का भारी अनुभव हो गया है। इसलिए इसमें कोई अचरज किसी भी सूरत में होना मुश्किल है कि  स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को विकृत करने के लिए हर तरह के झूठ को आजमाया जा रहा है। क्या साम्राज्यवादविरोधी  संग्राम की गौरवशाली परंपरा वाला यह महान देश इस तरह की कोशिशों का शिकार बन जायेगा? सिर्फ इतिहास हमें बतायेगा कि आरएसएस और इसके सहयोगियों जैसे गद्दारों का मुखौटा उतारने का काम भारत कैसे कर पाता है।
आजादी से पहले के आरएसएस के साहित्य की इस विषय से संबंधित संदर्भ सूची
स्वतंत्रता संग्राम में आरएसएस की भूमिका की जांच पड़ताल करने के लिए आम तौर पर 1925 से 1947 तक के इसके उपलब्ध साहित्य को विषयसंगत तरीके से सूचीबद्ध करने की पद्धति अपनायी गयी है। इस विषयसंगत इंडेक्स के लिए इस अध्ययन के निश्चित विषय से संदर्भित  आरएसएस के साहित्य की जांच पड़ताल की गयी है। उदाहरण के लिए हम उन संदर्भों की खोज कर रहे थे, जिनमें आरएसएस ने ब्रिटिश शासकों के भारत छोड़ने के लिए कोई अपील जारी की होगी या ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ क्रांतिकारियों की लड़ाई की कोई मदद की होगी या जालियांवाला बाग नरसंहार, भगतसिंह,राजगुरु सुखदेव और दूसरे क्रांतिकारियों की शहादत जैसी घटनाओं के बारे में कुछ लिखा होगा।इस सारी कवायद के बाद जो निर्णायक तस्वीर सामने आयी,उसे हम नीचे  पेश कर रहे हैं जो खुद हकीकत बयान करती हैः
संदर्भ                                                                                 गिनती
ब्रिटिश हुकूमत की आलोचना                                                  शून्य
ब्रिटिश राज का महिमामंडन                                                    16
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ वंदेमातरम् गाना                              शून्य
अल्पसंख्यकों की बदनामी,उन्हें धमकी और उनपर हमले            74
स्वतंत्रता संग्राम की प्रशंसा                                                    शून्य
अग्रेजों के भारत छोड़ने के लिए कोई आव्हान                            शून्य
स्वतंत्रता संग्राम में भागेदारी की कोई बड़ी उपलब्धि जैसे काकोरी
बम केस,जालियांवाला बाग नरसंहार,आईएनए, गदर आंदोलन    शून्य
बिट्रिश राज के खिलाफ किसी शहीद के जान कुर्बान कर देने
के बारे में कोई तारीफ                                                         शून्य
शहीदों,शहादत की निंदा के संदर्भ                                           10
भारती संविधान और राष्ट्रीय ध्वज की प्रशंसा                         शून्य
भारतीय संविधान और राष्ट्रीय ध्वज की निंदा                           10
स्वदेशी की सराहना                                                             शून्य

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