Monday, October 14, 2019

बक्सादुआर के बाघ-6 कर्नल भूपाल लाहिड़ी अनुवादःपलाश विश्वास

बक्सादुआर के बाघ-6
कर्नल भूपाल लाहिड़ी
अनुवादःपलाश विश्वास


बाइस


उस रात सुशीला के जाने के बाद सुमन को लगा था कि जगरु के साथ बहुत जल्दी मुलाकात करनी चाहिए।किंतु उस वक्त रुपये पैसे का जुगाड़ करना और भी जरुरी हो गया।उसे पैतृक घर बेचने के लिए कोलकाता दौड़ना पड़ा था।वहां का काम खत्म  करके लौटने में सुमन को हफ्ताभर लग गया।
फिर उसी हफ्तेभर में बक्सा के जंगल में एक बड़ी दुर्घटना घट गयी।
बाघ के हमले में एक वनकर्मी मारा गया।
बक्सादुआर के जंगल में बाघ के हमले में इंसान की मौत अभूतपूर्व कोई घटना नहीं है।आठ दस साल पहले तक अक्सर ऐसा घटता था।तब जंगल में बाघों की संख्या बहुत ज्यादा थी।सांप्रतिक काल में एक तरफ मनुष्यों की संख्या में बहुगुण वृद्धि हो गयी है तो दूसरी तरफ तेजी से बाघों  की संख्या घटी है।इसलिए इस घटना पर लोगों को अचरज है।
अदिति ने कहा,मृत वनकर्मी का नाम अक्षय तमांग है।
-यह नाम तो सुना सुना लगता है।हां,याद आया।जिन तीन लोगों ने सुशीला के मरद को पीट पीटकर मार डाला था,सुशीला के साथ सामूहिक बलात्कार किया था, अक्षय तमांग उन्हीं में एक था।सुनील सान्याल की हजार कोशिशों के बावजूद पुलिस ने उन्हें आजतक गिरफ्तार नहीं किया है।यह बात कहकर सुमन कुछ देर तक गंभीर चिंता में डूब गया।अक्षय तमांग नाम सुनने के बाद से उसके दिमाग में तरह तरह के प्रश्न उठ रहे हैं।अदिति से उसने सवाल किया,उस आदमी का पोस्टमार्टम हुआ है?
-नहीं जानती।लेकिन यह सवाल क्यों कर रहे हैं?
-कारण है।किंतु वह इस वक्त तुम्हें बता नहीं सकता।बाघ के खाये आदमी का पोस्टमार्टम जरुर अलीपुरदुआर सरकारी अस्पताल में हुआ होगा।कल सुबह मुझे एकबार अलीपुरदुआर जाना पड़ रहा है।
-क्यों?
-पोस्टमार्टम रपट में डाक्टर ने क्या लिखा है,मुझे वह जानना होगा।

अगले दिन भोर तड़के उठकर अलीपुरदुआर भागा सुमन।
सुनील सान्याल की मदद से पोस्टमार्टम रपट की कापी जुगाड़ करने में खूब असुविधा भी नहीं हुई।रपट में डाक्टर ने साफ साफ लिखा है कि बाघ की तरह किसी वन्य पशु के हमले में ही इस व्यक्ति की मृत्यु हुई है।कंधे के पास गहरे जख्म में बाघ की तरह जानवर के कैनाइन दांत के साफ दाग हैं तो सारे शरीर पर बाघ के तेज नाखून से खरोंचे जाने के चिन्ह हैं।डेड बोडी के साथ लिपटे हुए बाघ के रोम भी मिले हैं। इसलिए पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर का अनुमान है कि बाघ के हमले से ही उस आदमी की मौत हुई है।
रपट पढ़कर सुमन ने राहत की सांस ली।पहेली की तरह बातचीत से सुनील सान्याल के विस्मय की मात्रा थोड़ा और बढ़ाकर वह झटपट विदा लेकर चला आया। किंतु अपनी वकालत की बुद्धि से सुनील सान्याल ने समझ लिया कि सुमन चौधुरी कुछ छुपा रहे हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।

लौटने पर अदिति ने पूछा,क्या हुआ?
सुमन ने कहा,वह कुछ नहीं है- सब ठीकठाक है।
-एक आदमी को बाघ खा गया और आप कह रहे हैं कि सब ठीकठाक है।क्या ठीकठाक है?
-माने उस आदमी को बाघ ने ही खाया है।
-वह तो पहले से मालूम था।इसका सब ठीकठाक होने या न होने से क्या संबंध है? गले के स्वर से लगा कि अदिति सुमन के जबाव से खूब संतुष्ट भी नहीं है।
-बक्सा के जंगल में क्या सिर्फ बाघ हैं? और भी कितने हिंस्र जंतु रात में जंगल में भटकते रहते हैं।इनमें से किसी एक के हमले का शिकार होकर उसकी मृत्यु हो सकती थी।पोस्टमार्टम रपट पढ़ने के बाद मैं निश्चित हूं कि बाघ ने ही उस आदमी को खाया है, किसी और ने नहीं।
उस आदमी को बाघ ने खाया है,इस बारे में अब सुमन के निश्चिंत होने के बावजूद कौन सी  दुश्चिंता कल इस तरह उसे सुदूर अलीपुरदुआर तक उर्द्धश्वास दौड़ा  कर ले गयी,इस सवाल का कोई सदुत्तर अदिति को नहीं मिला।दो दिनों के भागमभाग से वह भीषण थका हुआ था,इसलिए उसने चर्चा लंबी खींचना नहीं चाहा।किंतु उसके मन में एक बड़ा प्रश्नचिन्ह बना रहा।


अगले दिन सुबह बरामदे बैठकर एक छोटे खाते में सुमन हुसाब लिख रहा था। इसबर कोलकाता जाकर पैतृक घर बेचने का बंदोबस्त कर आया है।खरीददार तय हो गया है।उसे मकान के दस्तावेज, इत्यादि जरुरी कागजात दे आया है।अगले महीने रजिस्ट्रेशन है।तभी रुपये मिल जायेंगे।उन रुपयों में से किसे कितने रुपये देने होंगे, इसका मोटा हिसाब जोड़ने की सुमन कोशिश कर रहा था।
इस रकम का ज्यादातर हिस्सा सुनील सान्याल का प्राप्य है।किंतु उनको देय सही रकम क्या है,यह न उसे और न अदिति को मालूम है।सुमन को मालूम है कि सुनील सान्याल से पूछने का कोई फायदा नहीं है।रुपये लौटाने की बात करते ही वे भड़क जायेंगे।कल अलीपुरदुआर गया था, सुनील सान्याल से हाल के सभी मुद्दों पर चर्चा हुई है,किंतु उनसे कोलकाता का घर बेच देने के बारे में कुछ घुमा फिराकर भी कहने की हिम्मत उसे नहीं हुई।
किंतु यह बात उन्हें किसी दिन बतानी ही होगी।उस दिन उनकी मित्रता अटूट रहेगी या नहीं,निश्चित तौर पर सुमन बता नहीं सकता।हिसाब जोड़ते जोड़ते सुमन ऐसी ही तरह तरह की बातें सोच रहा था,खाते से मुंह उठाकर उसने दूर से देखा,सिंथिया आ रही है।
बरामदे पर चढ़कर सिंथिया ने कहा,ट्यूकलेर लोकगुला आइच्चे- उयारा बस्तीत एकटा ट्युकल बसाइते चाहे।किंतु बस्तीर मानुषगुलार मइध्ये लड़ाई लागि गिछे कहां लगे ट्युकल,इसे लेकर।उत्तर बस्तीर लोकगुला कहे,चर्च के बगले बसाओ।दक्षिण बस्तीत  लोकगुला कइतेछे खेल मैदान के कोने में बसाइत होइबे।एई निया दुई दले झगड़ा लागि गिछे।नोकमा गिछे उत्तर बस्तीत,काजिया थमाइते।मोके कहि गिछे, बाबूक डाकि आन।बस्तीके मानुष उयार कथा सुने।
हिसाब का बही एक तरफ रखकर सुमन ने कहा,एक मिनट रुको।कमीज पहनकर आता हूं।

उत्तर गारो बस्ती दस मिनट के रास्ते पर है।दोनों एक साथ पैदल चल रहे हैं। सुमन ने ख्याल किया कि आज सिंथिया का साज पोशाक थोड़ा ज्यादा भड़कीला है, प्रसाधन थोड़ा भारी है।कमर से नीचे घुटनों तक तांत का नक्शा किया हुआ दकमंदा। देह पर गाढ़े लाल रंग का ब्लाउज,उसके साथ मैच की हुई लाल रंग की ओढ़नी।होंठों पर लाल रंग के लिपस्टिक का हल्का स्पर्श।सुमन को परफ्युम की मीठी सुगंध भी मिल रही है।
सिंथिया रोज अदिति के पास पढ़ने आती है।सुमन ने तब उसे सीधा सादा पोशाक में ही देखा है।आज हठात् उसके इस साज पोशाक की धूम क्यों?
-आसपास कहीं मेला लगा है क्या? सुमन ने पूछा।
- ना तो,एई कथा केनो पूछेन?
-इतना सज धज कर आयी हो-
-सजना धजना कोनखाने? एई दकमंदा तो घरेर तांते बुनेइछि।आपनार पसंद होइछे? सोची अदिति दीदीमणि के एकखान बुनि दिम।
नोकमा के घर में बरामदे पर एक कोने में काठ का यह यंत्र सुमन की नजर में जरुर आया था,किंतु किसी को उसे चलाते हुए नहीं देखा।सिर्फ नोकमा नहीं,गारो बस्ती में अनेक घरों में ही काठ का वह तांत है।कुछ साल पहले भी बस्ती की महिलाएं अपने पहनने के कपड़े खुद बुन लिया करती थीं।तब बाजार में मामूली खरीददारी से ही काम चल जाता था।
-तुम तांत से इतना सुंदर बुन लेती हो,नहीं मालूम था।
-इयार थिकाओ सुंदर बुइनते सकी।अदिति दीदीमणि को एकखान दकमंदा बुनि दिले पिन्दबेन तो?
-यह मुझे कैसे मालूम होगा? तुम ही पूछ लेना।
-कैन,निजेर स्त्री,उयार पसंद अपसंद जानेन ना? नाकि,दीदीमणि आपनार बिया करा बउ ना?
यह सवाल सुनकर कुछ पल चुपचाप रहा सुमन।इससे पहले भी सिंथिया ने यही सवाल उससे कई दफा घुमा फिराकर पूछा है।इसबार भी उसका अपवाद नहीं है। कहा, औरतों का पसंद अपसंद मर्दों को कितना मालूम होता है!
-जाने,दुई जनेर मध्ये प्रेम भालोबासा थाइकले जाने।स्टीफेन हमार पसंद अपसंद सभी जाइनतो।कोनटा पिंदते हमार पसंद,कोनटा खाइते हमार पसंद!
-स्टीफेन? स्टीफेन के?
-स्टीफेन माराक।एई गारो बस्तीरई मानुष आछिलो।भालोबाइसतो आमाक,खूब भालोबाइसतो।आमि भी भालोबाइसताम।बिया कइरबो तय करछिलाम।किंतुक हमी देखछि,जाक जतो भालोबासा जाये,सेई ततो दूरे भागि जाये।ग्लोबियाक धोखा दिया रोबार्ट भागिछे।आमाक धोखा दिया स्टीफेन भागिछे,अनेक दूरे,ओई आकाशे।आमि जानी,आपनिओ भागिबेन।दूरे,अनेक दूरे!
उसके मन की इस आशंका के बारे में सिंथिया ने इससे पहले भी कई दफा कहा है। उसके और अदिति के वैवाहिक संबंध को लेकर इस तरह बार बार सवाल, यहां से उसके चले जाने के बारे में आशंका के मार्फत क्या सिंथिया उसे कुछ बताने की कोशिश कर रही है?
इसका उत्तर इस पल सुमन के लिए स्पष्ट नहीं है।सिंथिया के कहे पर बिना कोई मंतव्य किये सुमन ने प्रश्न किया,स्टीफेन को क्या हुआ था?
-सांपे काटेछिलो।विषेर कालनागिनी सांप।जंगल बस्तीर तमाम ओझा चेष्टा करियाओ उयाक बांचाइते सके नाई।आपनाक निया हमार डर लागे।नोकमार काछे सुनछि,एका एका सेदिन नदी किनारे गेइछिलेन?
-ना,ना,अकेला क्यों जाता? मेरे साथ अदिति थी।
-अदिति दीदीमणि?ओई लोकगुला आपनाक बंदूक हाथे घिरि धइरले,जोर करि बांधि निया जाइले कि कइरबे अदिति दीदीमणि? जंगले आसि शरीलटा एमनि खराब होइछे,लड़ाई कइरबार क्षमता आछे उयार?
थोड़ा रुककर सिंथिया ने कहा,एई बक्सा जंगल आपनार कोइलकाता शहर ना होय।एई जंगले हरेक रकम गाछेर पीछे छुपे बाघ भाल्लुकेर डर,बंदूक हाथे खूंखार माइनसेर डर।कखोन कोनखाने आपनार ऊपर हामला कइरबे, ठीक नाई।जंगले ऐका  कुथाओ जाइबेन ना।जखोन जेखाने जाइबेन,आमाक कहिबेन।
इस गारो बस्ती मं आने के बाद से ,रोबिन या रोबार्ट की अनुपस्थिति में रसोई के लिए जलावन लकड़ी से लेकर चावल, दाल, चीनी, नमक, पेयजल समेत,यह सबकुछ वक्त पर देने का दायित्व निभा रही है सिंथिया।एक दिन भी इसकी अन्यथा नहीं हुई है। बीच बीच में खाना भी बनाती रही है।इसके बाद अब जो सिंथिया उसके बाडीगार्ड का अतिरिक्त दायित्व भी निबाहने की बात कह रही है,वह स्वेच्छा से यह जिम्मेदारी लेने को कह रही है या फिर अपने बाप नोकमा जास्टिन की आज्ञा से,मन के कोने में इस सवाल  के बार बार ताक झांक करते रहने के बावजूद सुमन को सीधा सवाल करने में दुविधा को बोध होने लगा।
उत्तर गारो बस्ती पहुंचकर वहां के लोगों से बातचीत के बाद फैसला हुआ कि दोपहर बाद नोकफांते के बगल में खेल के मैदान में उत्तर और दक्षिण गारो बस्ती के लोगों की बैठक होगी,जिसमें सबकी राय लेकर फैसला किया जायेगा कि वह ट्यूबवेल कहां लगाया जाये।
दोपहर बाद हुई बैठक में तय हुआ कि उत्तर और दक्षिण गारो बस्ती के बीचोंबीच नोकफांते के बगल में लगेगा  वह ट्यूबवेल।
इससे पहले भी छोटे मोटे मुद्दों को लेकर उत्तर और दक्षिण बस्तीवालों के बीच मत विरोध हुआ है,नोकमा की मध्यस्थता से वह निबटता भी रहा है।किंतु हर बार भीषण तर्क वितर्क,कभी कभार हाथापाई, मारपीट तक की नौबत आती रही है।किंतु इस बार कुछ अलग ही हो गया।उत्तर और दक्षिण गारो बस्तियों से एक एक प्रतिनिधि ने सबके बीच उठकर खड़े होकर कहा,सुमन बाबू जे जगह ठीक कइरबेन,हमरा वही मानि लिबो।
बस्ती में से एक भी व्यक्ति ने सुमन के फैसले का विरोध नहीं किया।बस्ती के वृद्धों वृद्धाओं ने मान लिया कि उन्होंने तजिंदगी ऐसी घटना न  देखी है और न सुनी है।

सुमन जब घर लौटा तो संध्या हो गयी।अदिति की छात्राओं में तब तक कोई नहीं पहुंची थी।किसी वजह से उनके आने में देरी हो रही थी।ऐसा बीच बीच में होता रहता है।विशेषकर जब हाथी वगैरह निकले।
घर में घुसने के बाद सुमन ने देखा,चारों तरफ अंधेरा।लालटेन नहीं जला है। अदिति बिस्तर पर चादर ओढ़कर लेटी है।पास जाने पर सुमन से उसने कहा,बहुत बुखार है।सर उठा नहीं पा रही,चक्कर आ रहा है।चूल्हे का पास माचिस है,लालटेन जला लीजिये।
तब तक सांध्य कक्षा की छात्राएं पहुंच चुकी थीं।उनके साथ ग्लोबिया और सिंथिया भी।सिंथिया बोली,छोड़ दीजिये।मैं जलाती हूं।बाहर आकर लड़कियों से बोली, तोमरागुला जाओ,दीदीमणिक बुखार होय।ग्लोबिया,बापूके जाया कहो,दीदीमणिर शरील खराब होइच्चे।
सिंथिया की मां की जब मौत हुई,तब उसकी उम्र सिर्फ दस साल और ग्लोबिया की तीन साल थी।उसी कम उम्र में नन्हे नरम एक हाथ से उसने गृहस्थी संभाल ली और दूसरे हाथ से चंचल ग्लोबिया को।आज भी घर का सारा काम उसी को करना होता है। कभी यौवन के प्रारंभ में पूर्ण संभावना के साथ उसके चित्त कानन में वसंत आया था।किंतु वह वसंत दीर्घस्थायी हुआ नहीं।अकाल में माटी में झर गया लाल कामना का पलाश।उसके यौवन के सपनों को दीर्घश्वास की तरह उदासी हवाएं उड़ा ले गयीं।उसके इस हठात सूखे हुए मरुभूमि की तरह ऊसर वैचित्रहीन एकरस जीवन में,दीर्घ रौद्रतप्त ग्रीष्म के अवसान के बाद आषाढ़ के प्रथम वर्षण की तरह सहसा आ गया सुमन।
किंतु जिस तरह आषाढ़ की मेघमाला को खबर नहीं होती,उनके परस्पर घर्षण से किसकी आंखें चौंधियाने लगीं,मूसलाधार बरसात से नदी का कौन सा किनारा टूटा,कौन बह गया और कौन डूब गया-सुमन को भी नहीं मालूम है कि उसके अनजाने,उसे घेरकर सिंथिया ने नये सपनों का जाल बुनना शुरु कर दिया है।
आज से बारह साल पहले उदासीन सुमन के अनजाने अदिति ने भी एक सपना बुन लिया था-हालांकि सिंथिया के उस दिन के सपने के रंग और आज की सिंथिया के सपने के रंग में कोई मेल नहीं है।

अदिति की खोज खबर लेने रात को नोकमा चले आये।विलियम को उन्होंने निर्देश दिया कि वह रातभर पहरे में रहेगा,जरुरत हुई तो उन्हें खबर करेगा।
पक्की गृहिणी की तरह सिंथिया ने खाना बनाया।सुमन को परोस दिया।अदिति ने कुछ नहीं खाया।बोली,खाने की इच्छा नहीं है।रात बढ़ने के साथ अदिति का बुखार भी चढ़ने लगा।सारी रात जागकर,अदिति के सिरहाने बैठकर जलपट्टी देती रही सिंथिया।

सुबह होते ही सुमन ने सिंथिया से कहा,मुझे एक बार जगरु की बस्ती में जाना होगा।
-आइज ना गैलेन,दीदी मणिर देहे बुखार!
- यह काम बेहद जरुरी है।दीदीमणि की देखभाल के लिए तुम तो हो।
-से तो आछि.एई निया आपनि चिंता ना करेन।किंतु जल्दी फिरबेन।आउर ऐकटा कथा।एका जाइबेन ना,संगे विलियमके निया जान।
जंगलके मध्य लंबा रास्ता तय करके जगरु की बस्ती में पहुंचते पहुंचते दोपहर ढलने लगी थी।जगरु अपने घर में ही मिल गया।
-सुशीला कहां है? घुसते ही तुरंत पूछा सुमन ने।
-कहार पारि ना।दिनराइत वने वादाड़े भटके,घूमे।अभी हमी कि करिया कमो, कोनखाने गिछे?
-अच्छा याद करके बताओ,पांच दिन पहले,माने पिछले  बुधवार रात को सुशीला क्या घर से बाहर निकली थी? एक मोड़ा खींचकर बैठने के बाद सुमन ने पूछा।
-उयार काछे बुधवार कि,आउर विष्युत्वार कि ? उयार कि वारेर कोनो हिसाब आछे? रोज राइतेई बाहिर होय! किंतु आप हमाक कहेन मामलाटा कि?
-कहता हूं।पहले मेरे एक और सवाल का जबाव दो।सुशीला करीब दस दिन पहले गारो बस्ती गयी थी।उस दिन उसने हमें बताया था कि  उसने चोर शिकारियों से बाघ के नख,दांत जुगाड़ लिये थे।यह बात क्या तुम्हें मालूम है?
-मालूम आछे।सिरफ बाघेर नख आउर दांत नहीं,बाघेर पूरा एकटा छाल भी वो जुगाड़ करिछे।सेगुला आमाक देखाइछे।
-कहां है वह सब?सुमन के स्वर में उत्कंठा।
-उयार काछे।आमाक हाथ तक लागाते देय नाई।बाघेर छाल देहे पिंदिया, नखगुला सूता दिया उंगली से मजबूत बांधिया,लंबा लंबा दांत गुला हाथे निया आमाक कहै- दैख,आमि बाघ होइछि,एईबार जलछिटा दिया आमाक सत्यि सत्यि बाघ बानाये दे,हमी ओई सालार मानुषगुलाक खामो।
जगरु के उस भयंकर चेहरे पर भी आतंक की छाप।आंखें बड़ी बड़ी करके उसने कहा, जलेश्वर बाबार कसम,उयार आंख दुनो जिंदा बाघेर मतो चमकते छिलो।आमाक डर लाइगते छिलो,हमार ऊपर हमला ना करि दे।
कुछ पल भयभीत जगरु केचेहरे पर निष्पलक दृष्टि से देखता रहा सुमन। अविश्सनीय लग रहा है,फिरभी यह साफ है कि इस भयंकर दीख रहे आदमी के मन में सुशीला को लेकर आतंक पैदा हो गया है।फिर इस पल उस कुत्सित आदमी की आंखों और चेहरे की अभिव्यक्ति में परिवर्तन कोई जादू का खेल भी नहीं है- इस बारे में सुमन को तनिक संदेह नहीं है।
इस बदसूरत आदमी के चरित्र के बारे में आज तक सुमन को संदेह होता रहा है, सुशीला को रोके रखने के पीछे उसके असल मकसद को लेकर शक करता रहा है। उस रात को यह शक और गाढ़ा  हो गया था,जब सुशीला ने उसका सिर चबाकर खाने की बात कही थी ।
जगरु के पसीना पसीना शरीर और उसके भयभीत चेहरे की ओर देखकर अब सुमन को लग रहा है कि इस आदमी पर शायद यकीन किया जा सकता है।यकीन करके, उसके साथ अपना भय बांटा जा सकता है।इस तरह की हिस्सेदारी से हो सकता है कि उसके मन में जमा पहाड़ की तरह आंतक और दुश्चिंता का बोझ कुछ कम हो जाये।
सुमन ने गंभीर होकर कहा, जगरु,तुमसे एक बात करनी है।किसी और से यह बात मत कहना।सुशीला भीषण विपद में है।
-विपद? कि विपद? किसेर विपद?
-तुमने शायद सुना है कि तमांग नाम का फारेस्ट गार्ड पिछले बुधवार को बाघ के हमले में मारा गया है।
-सुनछि।किंतु उयार साथे सुशीलार विपदेर कि संबंध?
-हो सकता है कि कोई संबंध न हो,लेकिन संबंध हो भी सकता है।हांलाकि पोस्टमार्टम रपट बता रही है कि उस आदमी की मौत बाघ के हमले से ही हुई है,किसी ने बाघ को अपनी आंखों से देखा नहीं है!
-आपनि कि कहा चाहे,खुलिया कहेन।आपनि कि संदो करेन सुशीला बाघ साजिया-
-ना, ना,ऐसा कोई सबूत मुझे अभी तक मिला नहीं है।इसलिए किसी संदेह के आधार पर मैं ऐसी कोई बात नहीं करना चाहता।मैं तो तुम्हें सिर्फ सावधान करने यहां आया हूं। मुझे मालूम है कि सुशीला के किसी संकट में फंस जाने पर तुम्हें दुःख होगा। क्योंकि तुम सुशीला से प्यार करते हो।
- वो तो आप भी प्यार करेन।ना होइले,आमाक सावधान  कइरबार जन्य जंगलेर भीतर दिया इत्ता रास्ता ऐइसा एका एक ना आइसतेन।
जगरु की बात पर उसके चेहरे की तरफ देखकर सुमन सूखी हंसी हंसा।यह मूर्ख आदमी कैसे उसके मन की खबर जान सकता है? वह कैसे समझ सकता है कि सुशीला नाम के वाइल्ड फ्लावर ने कभी उसकी कल्पना के राज्य में कितनी जगह दखल कर लिया था! उसे लेकर मन ही मन कितनी कविताएं उसने रच दी थीं।
-जो बात मैंने कही है,याद रखना।अब सुशीला को कड़ी निगरानी में रखने की कोशिश करना।गंभीर स्वर से जगरु को इतना कहकर सुमन ने विदाई ली।
आज वह अकेला है।संगी साथी कोई नहीं है।विलियम को साथ लेकर आने की बात थी।सुबह रवानगी से पहले बहुत खोजने के बाद भी वह नहीं मिला।नोकमा ने उसके लिए अगले दिन तक इंतजार करने को कहा था।सुमन राजी न हुआ।
सुखरा बस्ती जाने के लिए हठात् वह इतनी जल्दी क्यों मचा रहा है,बहुत कोशिश करने के बावजूद सुमन से नोकमा को इसका सीधा जबाव नहीं मिला।उसके दिमाग में यह बात कतई नहीं आ रही थी  कि बरदोलोई और उसके शागिर्दों की धमकी की उपेक्षा करके उसे इस तरह अकेले इतना जोखिम उठाकर सुखरा बस्ती क्यों भागना पड़ रहा है। नोकमा को कैसे मालूम होगा कि झाड़ी के पीछे घात लगाये बैठे खूंखार बरदोलोई या बाघ के आतंक से बढ़कर सुशीला को लेकर आखिर कौन सा आतंक उसे भगाकर ले आया सुखरा बस्ती में।
इस ढलती हुई दोपहर को भयंकर जंगल के बीच इतना लंबा रास्ता उसे आज अकेले ही तय करना होगा।इस पल उसके मन में एक ही चिंता है कि चाहे जैसे हो,अंधेरा होने से पहले उसे गारो बस्ती लौटना होगा।
मन में फिर एक और दुश्चिंता है।अस्वस्थ अदिति को छोड़कर आया है।उसका बुखार और बढ़ा है कि नहीं,किसे पता है!

तेइस

सुमन ने पहुंचकर देखा,अदिति का बुखार थोड़ा उतरा है।
सिंथिया ने खाना पकाकर दोपहर को अदिति को खिला दिया है।विलियम था नहीं, सो खुद ही दूर के ट्यूबवेल से पानी ढो लायी है।घर का सारा सामान सहेजकर रखा है।
सिंथिया ने कहा,राइतेर खाना बनाये ढाकि राइखाछि,खाया निबेन।दीदीमणि ऐखोन भालो आछेन,हमी अब घरत जायी।काइल बिहाने फिर आसिम।ना जानि एका एका ग्लोबिया कि कइरतेछे।घर संसारेर कामे एक्केबारे मन नाई।केवल बाहिर बाहिर घूमेक मन।सिंथिया यें बातें कहकर सीढ़ी से उतरकर जा ही रही थी कि सुमन ने उससे कहा,रुको,तु्म्हें कुछ दूर तक छोड़ आता हूं।
-आमाक छोड़ा नागे ना,एका चलि जाम।
उसके कहे पर कान न देकर सुमन ने मजाक में कह  दिया,मैं जानता हूं,तुम बहुत हिम्मतवाली लड़की हो! चलो-
-जंगले हमार जन्म,एई जंगलेई बड़ो होइछि।जंगले हमार भय डर लागे ना। शालवन होकर रास्ते पर पैदल चलते चलते सिंथिया बोली।
-किंतु जंगल के जंतुओं और जानवरों को तो यह मालूम नहीं होगा कि तुम शहर की हो या फिर जंगल की।
-उयारा जानेना,किंतुक हमरा जंगलेर मानुषगुलाक मालूम पड़े कि कोनखाने कोन जानवर घात लगाये बसि आछि-नाके गंध पाई,पांवेर आवाज सुनि।
-बाघेर गंध? हवा में गंध सूंघकर क्या कह सकती हो कि आसपास बाघ है या नहीं?
- केवल गंध ना,अइन्य जानवरेर चीख पुकार सुनि कहि सकी कि आस पास बाघ आछे कि नाई।
किंतु मानुष बाघ? उसकी भी क्या कोई गंध होती है?वह बाघ अगर शाल के उस पेड़ के पीछे घात लगाये बैठा हो,तो तुम्हें कैसे मालूम होगा? मन ही मन उसने सिंथिया से सवाल कर दिया।
-एखोन बाघेर कथा छाड़ेन,आमाक कहेन,सुखरा बस्तीत कैन गिछिलेन? कि एमोन जरुरी काम आछिलो सेईखाने?
-सुशीला की खबर लेने।
-कैमोन आछे सुशीला?
-भालो नाई।
-कैन,कि होइछे उयार?
- उसका दिमाग और खराब हो गया है।रात बिरात वन वादाड़ भटकती है।जिस किसी दिन कोई बड़ी दुर्घटना घट सकती है।
-ओई जगरुर चक्करे पड़ि उयार आइज एई दशा!
-जगरु नहीं,उसकी इस दुर्गति के लिए वे तीन फारेस्ट गार्ड जिम्मेदार हैं।उनमें से एक को बाघ ने खाया है।बाकी दो और इस बक्सा के जंगल में इधर उधर आजाद घूम रहे हैं। बाघ का नहीं,मुझे भय उन्हीं को लेकर है।
-उयादेर निया आपनार किसेर भय?
फारेस्ट गार्ड तमांग की मृत्यु के बाद,बाकी दो को लेकर जो भय का सृजन उसके मन में हो गया है,उस भय के बारे में सुमन सिंथिया को बता नहीं सकता।किंतु सिंथिया के प्रश्न का कोई उत्तर उसे देना होगा,उसके मन में भय क्या है,यह उसे बताना होगा।
थोड़ा सोचकर सुमन ने कहा,भय यह है कि कब किस निरीह लड़की पर वे अचानक बाघ की तरह हमला कर दें!
--ऐं,हमला कइरबे! हमार ऊपर हमला कइरले,दिखाइबो मजा! जानि राखेन,हमी आपनार ओई सुशीला ना,हमी जास्टिन मोमिनेर माइये सिंथिया। हमार बाप खाली हाथे बाघेर साथे ऐकला लड़ाई कइच्चे।ऐमोन दुई चाइरटा फारेस्ट गार्ड हमी हमार खाली दो हाथ दिया खतम कइरते पाइरबो!
सुमन ने उसकी तरफ बढ़ाये सिंथिया के दोनों मजबूत हाथों की ओर देखा। इसके बाद उसके चेहरे को देखा।यह लड़की आत्म विश्वास से उबलने लगी है।इतने दिनों से वह सिंथिया को देख रहा है।एकाधिकार बार उसकी साहसिकता और शारीरिक शक्ति का परिचय उसे मिला है।शुरुआत से ही उसके कभी न खत्म होने वाले उद्यम और स्फूर्ति पर उसकी नजर रही है।सुमन को लगा कि सिंथिया जो कह रही है,उसकी वे बातें बड़बोलापन कतई नहीं हैं। आमना सामना हो जाये तो तमांग जैसे आदमी को वह खूब सजा देने की शारीरिक और मानसिक शक्ति इस लड़की में है।उसकी ओर देखकर सुमन ने मन ही मन कहा कि उसे अगर बक्सादुआर की बाघिन कहा जाये तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी।
चलते चलते एक जगह पर रुक गयी सिंथिया।बोली,आपको और आगाइते होइबे ना,आप घरत फिरि जान।यह कहकर तेज कदमों से रास्ते के मोड़ की उस तरफ रात के अंधेरे में अदृश्य हो गयी सिंथिया।

अदिति को संपूर्ण स्वस्थ होने में पूरा हफ्ताभर लग गया।इस दरम्यान रोज तड़के चली आयी सिंथिया,दिनभर सारा कामकाज करती रही - रोज अपने घर लौटी संध्या के बाद। खाना पकाया,सुमन और अदिति को परोसा।वक्त पर अदिति को दवा खिलाती रही।विलियम या रोबिन के न होने पर काफी दूर के ट्यूबवेल सा पानी ढोकर लायी।
इस पूरे हफ्ते के दरम्यान करीब करीब रोज संध्या के बाद सुमन कुछ दूरी तक उसको पहुंचाता रहा।सिंथिया के निषेध के बावजुद उसने अनसुना कर दिया।
-अदिति अब तो स्वस्थ है,कल से तुम्हें और कष्ट सहकर आने की जरुरत नहीं है।पिछले सात दिनों से रोज आ रही हो,घर में जरुर सारा कामकाज सब जमा हो गया होगा।
-ओई निया आपनि चिंता ना करेन।आउर कष्टेर कथा कि कहितेछेन?आपनि आउर दीदीमणि हमरागुलार जइन्य कम कष्ट करेन ? थोड़ा थमकर सिंथिया कहती रही,अदिति दीदीमणिर शरील दुर्बल होइछे।आपनि घरे रहे ना,रोज ही एठे उठे चलि जान।आउर कुछ दिन उयार देखभाल करा नागे।समये समये औषध खायान नागे। आपनि आमाक आइसते निषेध ना करेन।सुमन के जबाव का इंतजार किये बिना तेज कदमों से वह अपने घर की ओर निकल गयी।

सुमन समझने लगा है कि उसके और अदिति की प्रात्याहिक जीवनयात्रा में सिंथिया कितनी अपरिहार्य हो उठी है, वे भी उस लड़की पर कितने निर्भरशील हो गये हैं। किंतु सुमन को यह बात समझ में नही आ रही है,यह जो किसी लता की तरह उनके जीवन के साथ सिंथिया का घुलमिल जाना है,वह क्या प्रकृति के स्वाभाविक नियम से है, या परिस्थितियों के कारण या इसके पीछे उसे घेरकर सिंथिया की पुष्पित पल्लवित होने की कोई सुप्त आकांक्षा है?
इस पल ,इस सवाल का कोई जबाव सुमन को मालूम नहीं है।

किंतु जीवन के लिए जो आवश्यकता है,वह ऐसे प्रश्नें को उत्तर की अपेक्षा में नहीं होतीं।कोलकाता का घर बेचने के सिलसिले में  रजिस्ट्रेशन की तारीख पहले से तय है। सुमन को दो चार दिनों के लिए कोलकाता जाना ही होगा।
अदिति ने कहा,बिक्री करेंगे,ऐसा तय करके सारा बंदोबस्त जब पक्का कर ही लिया है तो देरी करने से क्या फायदा है? आप रवानगी का दिन तय कर लीजिये।बुखार जब फिर वापस नहीं लौटा है,तो आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है।शरीर थोड़ा दुर्बल है,वह भी दो चार दिन में ठीक हो जायेगा।आपके न रहने पर कोई असुविधा नहीं होगी, सिंथिया तो है ही।
सिंथिया बोली,दीदीमणिर देखभाल निया आपनि कोनो चिंता ना करेन।किंतु कोइलकातार बाड़ी बिक्रीर आगे आपनाक एकबार फिर चिंता करा नागे।
-क्या चिंता करें बोलो,माथे पर ऋण का बोझ है,जेब एकदम खाली है।
-पाकेट खाली बलि,बाडी़ बेचई दिबेन? दीदीमणि आपनि बाबूक समझाया कहेन। सिंथिया ने अदिति के दोनों हाथ पकड़कर कहा।
-बहुत समझाया है।मेरी कोई बात नहीं सुनते तम्हारे बाबू!अदिति के गले में अभिमान।
अदिति की बात सुनकर कुछ पल चुप रही सिंथिया।फिर दुविधा में बोली,बाबू हमी एकटा कथा कहूं,सुइनबेन?
-बोलो,क्या कहना चाहती हो।सुमन ने सिंथिया के चेहरे को देखा।
-हमार किछु रुपया आछे,किछु गहना आछे,निबेन? सर नीचा करके ओढ़नी का एक कोना उंगली में फंसाते हुए सिंथिया बोली।
-तुम्हें रुपये और गहने कहां से मिले? सुमन ने सवाल किया।
-हमार मां आमाक दिया छिलो,हमार बियार जइन्यो।रुपया गहना हमार कोन काजे लगबे?
-क्यों, तुम्हारी ब्याह में लगेंगे?
सुमन के प्रश्न पर सिंथिया के चेहरे पर विषण्णता की छाया पसर गयी।गंभीर गले से बोली,आपनाक हमी कहिछि,जाक बिया कइरबो ,ठीक करछिलाम,लोकटा  पलाइछे। स्टीफेन कोनो दिन फिरिया आइसबे ना।
ये बातें कहते हुए सिंथिया का गला रुंध गया।आंखों से आंसुओं की धार उसके दोनों गुलाबी गाल पर बहने लगीं।ओढ़नी के आंचल से वह वे आंसू पोंछती रही।
सुमन और अदिति दोनों सिंथिया की बात सुनकर स्तंभित हो गये।उससे क्या कहें,यह बात उनकी समझ में नहीं आयी।
उस पल सिंथिया को धन्यवाद कहने के सिवाय सुमन के लिए कुछ कहना बाकी न था।
किंतु अदिति? स्तंभित भाव से उबरने के बाद हो सकता है कि उसे बहुत कुछ सिंथिया से कहना था। अनेक सवाल  अपने सुमनदा से करने थे। किंतु न जाने क्यों एक भी बात कह नहीं सकी,वह चुप रही।


चौबीस

कोलकाता रवाना होने से पहले सुमन ने मन ही मन तय कर लिया था कि घर बिक्री का रजिस्ट्रेशन पर्व चुक जाने के बाद वह जस्टिस अमरेश मुजमदार से मिलेगा। उनके साथ अनेक जरुरी मुद्दों पर उसे बातचीत करनी है।

इधर अलीपुरदुआर कोर्ट में सुलेमान राभा ,सुशीला, इत्यादि कई मामलों में फैसला पुलिस या फारेस्ट डिपार्टमेंट के खिलाफ हो गया।अवश्य ही इसका संपूर्ण श्रेय सुनील सान्याल को जाता है।दिन रात परिश्रम करके असंभव को उन्होंने संभव कर दिखाया है।
किंतु उनकी क्षमता वहीं तक सीमाबद्ध है।जिनके खिलाफ न्यायाधीश का फैसला है, वह पुलिस और फारेस्ट डिपार्टमेंट सरकार के मातहत हैं।अलीपुरदुआर के कोर्ट में हुए हर फैसले के खिलाफ सरकारी पक्ष ने उच्च न्यायलय में अपील कर दी है।परवर्ती सुनवाई कोलकाता हाईकोर्ट में चलेगी।इस तरह चरणबद्ध तरीके से,अंतिम पर्व में जिस आदालत में अपराधियों का फैसला होना है,वह अलीपुरदुआर शहर या बक्सा के जंगल से अनेकों योजन दूर है- सुनील सान्याल और जंगल की बस्तियों,उभय की दैहिक क्षमता और आर्थिक सामर्थ्य की सीमा से बाहर।
एकतरफ संख्यागरिष्ठ होने की वजह से बलशाली महाशक्तिशाली सरकार, दूसरी तरफ अधनंगे, अधपेट खाये, अशिक्षित और धनशून्य संख्याकनिष्ठ अल्पसंख्यक-  इस असम युद्ध में गारो बस्ती या राभा बस्ती के मनुष्यों को आखिरकार न्याय मिलेगा,अपराधियों को सजी होगी,ऐसी असंभव कल्पना सुनील सान्याल या सुमन नहीं करते।यहां तक कि डाक्टर अमरेश मजुमदार भी नहीं।
अपने चैंबर में बैठकर अमरेश मजुमदार ने कहा,हमारे संविधान में नागरिकों को जो अधिकार दिये गये हैं,समाज के कमजोर तबकों को मिले वे सारे अधिकार सुरक्षित रहें,संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गयी है- बहुत कुछ सरकार की दया दक्षिणा पर छोड़ दिया गया है।जो राजनीतिक दल सरकार चलाता है यानी शासक दल, वह अपने स्वार्थ को छोड़कर कुछ भी नहीं समझता,कुछ नहीं करता।सत्ता दखल और सत्ता में बने रहना जिनका एकमात्र उद्देश्य है,वे कमजोर श्रेणी के हक हकूक बहाल रखने के लिए कोई उत्साह नहीं दिखायेंगे,यह वास्तव तथ्य संविधान रचयिताओं के मन में क्यों नहीं आया,मुझे नहीं मालूम है।
उन्होंने क्या सोचा होगा,कोर्ट में कानूनी लड़ाई बिना पैसे के क्या की जा सकती है? सरकार या कोई धनी प्रभावशाली व्यक्ति, बहुत रुपये फीस में देकर एकाधिक नामी दामी एडवोकेट को नियुक्त करने में सक्षम हैं।किसी गरीब आदमी की क्या वह क्षमता है? वर्तमान व्यवस्था में चूंकि कानूनी लड़ाई करने की क्षमता सबकी समान नहीं है, सबके लिए समान कानून जैसी बातें निरर्थक हैं।
कानूनी अधिकार की तरह अन्यान्य अधिकारों  के मामले में यही असमानता होने से क्षमतावान की दया दक्षिणा देने और उसी के साथ दुर्बलों से अवसर छीनने या उनके एक्सप्लायटेशन का मामला बन गया है। नागरिकों के दो क्लास बन गये हैं- प्रीविलेज्ड एंड डिप्राइव्ड! प्रीविलेज्ड श्रेणी ने सभी तरह की क्षमता और अधिकारों पर एकाधिकार कायम कर लिया है और वह दुर्बल श्रेणी को समस्त अधिकारों से वंचित करके ,दोनों हाथों से देश की धनसंपदा लूट रही है- सभी तरह के सुयोग सुविधा भोग रही है।डिप्राइव्ड क्लास के पास जो भी कुछ बचा है,वह सबकुछ छीनकर क्रमशः प्रीविलेज्ड क्लास और वित्तशाली,और शक्तिशाली बनता जा रहा है।इसके साथ ही डिप्राइव्ड क्लास लगातार और गरीब,और दुर्बल होता जा रहा है।
कोई मूर्ख भी नहीं कहेगा कि यह प्रीविलेज्ड क्लास वंचितों पर दया करके,कृपा करके इन सभी अवसरों और सुविधाओं का त्याग कर देगा,लुटी हुई संपदा वंचितों के साथ समान समान बांट लेगा।याद रखना होगा, दुर्बलों को वंचित करके ही उन्होंने अपनी संपदा और शक्ति में यह वृद्धि कर ली है।फिर उसी शक्ति से वह दुर्बलों को पांवों के नीचे दबाये रखता है,उनका खून चूसता है।वंचितों की तुलना में उनकी संख्या बेहद कम है।किंतु वे संगठित हैं और संघबद्ध हैं।इसलिए गणतंत्र के नियम से वे मेजरिटी हैं। मेजरिटी का मतलब शक्ति है।इसी शक्ति से राष्ट्र की समस्त क्षमताओं पर उसका एकाधिकार है।और वंचित? संघबद्ध न होने की वजह से ही वे जनसंख्या में बहुसंख्य होकर भी माइनारिटी हैं।अल्पसंख्यक बनकर वे दुर्बल हैं।अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए वे संघबद्ध क्षमतावान के कृपाप्रार्थी बने हुए हैं।
-क्या इसी तरह हमेशा चलता रहेगा? सुमन ने प्रश्न किया।
-हमेशा की बात नहीं कह सकता,किंतु निकट भविष्य में किसी परिवर्तन की कोई संभावना मैं देख नहीं रहा।गणतंत्र के सार्थक और कार्यकर होने की कुछ मौलिक शर्तें हैं। पहली शर्त यहै है कि शासक और आम जनता के बीच सत्ता का संतुलन बना रहे।दूसरी,समस्त नागरिकों को समान अधिकार और समान अवसर।तीसरी,सत्ता वर्ग और देश के जन गण का चरित्र। ये तीनों बातों में एक भी हम पर लागू नहीं है और रजानीतिक दल या दलों के नेताओं में से कोई नहीं चाहेगा कि इस व्यवस्था में कोई परिवर्तन हो।यह जो उनकी राजसिक जीवन शैली है- टैक्स पेयर्स के रुपयों से विदेशों में जाकर मौज मस्ती करना,देश की संपदा लूटकर विदेशी बैंकों में जमा करना-यह सब कुछ शौक से कौन छोड़ना चाहेगा,कहिये।आफ्टर आल,आजकल इलेक्शन कांटेस्ट करना हो तो प्रत्येक उम्मीदवार को लाख लाख रुपये खर्च करने होते हैं।आप क्या समझते हैं कि ये रुपये किसी दानछत्र में मिलते हैं? या फिर समाज के गरीब लोगों के दुःख दर्द से रात में इन्हें नींद नहीं आती!
-इलेक्ट्राल सिस्टम के रिफार्म को लेकर आजकल खूब चर्चा हो रही है और कुछ कुछ परिवर्तन भी हो रहे हैं.सुमन ने मंतव्य किया।
-वह सब कास्मेटिक है।हर बार चुनाव के वक्त हजारों हजार करोड़ काला रुपये उड़ते रहते हैं,भ्रष्ट दागी नेता आईन कानून को अंगूठा दिखाते हुए चुनाव में उम्मीदवार बनकर जीत रहे हैं।देश के सारे राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर इलेक्शन कमीशन को नखदंतहीन बनाकर गणतंत्र के पहले सोपान इलेक्शन को एक फार्स में परिणत कर दिया है। इन बातों को छोड़ ही दें,अलीपुर दुआर के कोर्ट में चल रहे मुकदमों का क्या हुआ,बताइये।
-सुलेमान राभा और सुशीला केस में हारकर सरकारी पक्ष ने हाईकोर्ट में अपील कर दी है।रोबार्ट माराक केस और तालचिनि थाने पर पुलिस की गोली चलाने का केस अभी गहरे पानी में हैं।पुलिस ने अभी इंवेस्टीगेशन ही कंप्लीट नहीं किया है।
-खूब स्वाभाविक है यह।ये केस पुलिस के खुद अपने खिलाफ हैं! इसलिए इंवेस्टीगेशन तो वे लटकाकर ही रखेंगे।इसी वजह से साल दर साल गुजरते जाते हैं , मुकदमों का फैसला नहीं होता,गरीबों के साथ न्याय नहीं होता।कवि के शब्दों में,न्याय की वाणी नीरवे निभृते रोयें!
सुमन ने कहा,कवि के वे उद्गार भी अब बासी हो गये हैं।न्याय की वाणी अब एकांत में नहीं रोती है,पब्लिकली रोती है।अखबारों के पन्नों पर,टीवी के परदे पर,सर्वत्र उसी रुदन की छवियां हैं!न्यायाधीशों को क्या वे छवियां दीखती नहीं हैं या रोने की आवाज उनके कानों तक पहुंचती नहीं है?
-देख रहे हैं।सुन भी रहे हैं।अवश्य ही!
-तब वे कुछ कर क्यों नहीं रहे हैं? क्या वे इतने ही दुर्बल हैं कि न्यायालय में बैठकर सिर्फ रोने की आवाज ही सुनते रहेंगे,करेंगे कुछ भी नहीं?
-न्यायाधीश कतई दुर्बल नहीं हैं,किंतु दूसरी संस्थाओं की तरह ही न्याय प्रणाली को जान बूझकर कमजोर बनाकर रखा गया है।सैकडो़ं न्यायाधीशों के पद वर्षों से रिक्त हैं,जानबूझकर ही उन रिक्तियों को भरा नहीं जाता।इंफ्रास्ट्राक्चर और न्यायाधीशों के अभाव में अदालतों में हजारों हजार केस जमा होते जा रहे हैं,मुकदमों के फैसले में पंद्रह से बीस साल तक लग रहे हैं।
-इस सिलसिले में भी प्रीविलेज्ड क्लास के लिए मामला कुछ और है,सुमन ने कहा।वे चाहे तो रातोंरात किसी मुकदमे का फैसला हो जाये।फिर उनकी इच्छा न हो तो मुकदमा साल दर साल झूलता जाता है।इन हालात में उन गरीबों की एक बार सोचें! पंद्रह बीस साल तक कोई केस अगर झूल जाता है तो उतने अरसे तक केस चलाने का आर्थिक सामर्थ्य क्या उनके पास है?नहीं है।तब,उनपर अन्याय हो,अत्याचार हो ,तो कहां जायें गरीब लोग?
-उनके लिए जाने की कोई जगह नहीं है।फिर यहीं संविधान में सबसे बड़ी खामी है,हमारे गणतंत्र की यही सबसे बड़ी दुर्बलता है।उस दुर्बलता को दूर करने के लिए संविधान में संशोधन करने की कोई प्रचेष्टा नहीं है। हमारा देश एक वेलफेयर राष्ट्र है, सिर्फ मुंह जुबानी कहने से नहीं होगा,संविधान में इसके लिए ठोस मजबूत व्यवस्था भी होनी चाहिए।किंतु दुर्भाग्य से वह है ही नहीं।
सुमन ने कहा,मुझे क्या लगता है,जानते हैं? समस्या यह नहीं है कि संविधान में क्या लिखा है या क्या लिखा नहीं है।पिछले साठ सालों के दौरान हमारे राजनीतिक नेताओं ने संविधान में वर्णित गणतंत्र के स्तंभों को धीरे धीरे ध्वस्त कर दिया है।फिर एक ही साथ चरणबद्ध तरीके से उन समस्त ध्वस्त स्तंभों पर टिकी राष्ट्र क्षमता अपने हाथों में केंद्रित कर ली है।पुलिस और प्रशासन को रीढ़विहीन बनाकर अपनी उंगलियों पर नाचने वाली  कठपुतलियों में तब्दील कर दिया है।मेरे हिसाब से समस्या संविधान की कोई खामी नहीं है,समस्या यह है कि कि हमारे देश के राजनीतिक दल किसी भी कीमत पर सत्ता दखल और फिर सत्ता में बने रहने की कोशिश में लगे हैं- समस्या उन दलों के अनैतिक नेताओं की मानसिकता में है।
जस्टिस मजुमदार ने कहा,आप सही कह रहे हैं।हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को सड़क से धमकी दी गयी है- अमुक गो बैक! जजों की नियुक्तियों के मामले में अक्सर हस्तक्षेप होता रहा है! भ्रष्ट जज की नियुक्ति के लिए पीएमओ आपिस से ला मिनिस्टर को नोट भेजा गया है।भारत की सर्वोच्च जांच संस्था को तोता पाखी बना कर रख दिया गया है और इलेक्शन कमीशन को नखदंतविहीन बाघ।
सुमन ने मंतव्य किया,केवल मात्र अपने हित साधने के लिए,निरंतर साझा कोशिशों के तहत इन लोगों ने विश्व के वृहत्तम गणतंत्र को एक फिउडल स्टेट में बदल दिया है।गणतंत्र का मूल वक्तव्य बाई द पीपुल,फार द पीपुल न होकर बाई द पार्टी,फार द पार्टी हो गया है।जो कोई इन फिउडल लार्डों के खिलाफ एक भी बात कहेगा,उसे राजद्रोही घोषित करके जेल में डाल दिया जायेगा।
-हां,इन्हीं लोगों ने तो  दो दो बार आपको जेल में डाला है।उन मुकदमों का क्या हुआ? जस्टिस मजुमदार ने पूछा।
अलीपुरदुआर का केस डिसमिस हो गया है,कोलकाता के केस में जमानत पर हूं। नेक्स्ट हियरिंग कब होगी,नहीं जानता।
-हियरिंग की तारीख तय हो जाये तो मुझे बताइयेगा।अब उठता हूं,इतना कहकर जस्टिस अमरेश मजुमदार चैंबर से चले गये।


इससे पहले हर बार सुमन कोलकाता से खाली हाथ लौटा है।इसकी वजह गाड़ी भाड़ा के अलावा उसकी जेब में खास कुछ होता नहीं था।इस बार घर बेचने के एडवांस की अच्छी खासी रकम उसकी जेब में है।उससे उसने छात्रों और छात्राओं के लिए कुछ किताबें,कापियां और बस्ती के लोगों के लिए कुछ दवाइयां खरीद लीं।उसको खूब इच्छा हुई सुनाल सान्याल और उनकी पत्नी प्रतिमा के लिए कुछ खरीदकर ले जाये।किंतु इसे किस तरह लेंगे सुनील सान्याल,यह सोचकर आखिरकार कुछ भी खरीदना न हुआ!
उसके हाथों में इतनी चीजें देखकर सुनील सान्याल ने कहा,क्या बात है? यह तो देख रहा हूं कि पूरा कोलकाता ही सर पर ढोकर लाये हैं! काफी हद तक हनुमान के गंधमादन पर्वत उठाने का जैसा कोई मामला है।
सुमन ने कहा,ना ना,विशेष कुछ नहीं है- अदिति की छात्राओं के लिए कुछ किताबें और बस्तीवालों के लिए कुछ जरुरी दवाएं! मन में बहुत साध हो रहा था  कि आपके और प्रतिमा भाभी के लिए कुछ खरीद लूं,किंतु हिम्मत नहीं हुई।आप अगर अन्यथा ले लें!
-मामला क्या है, कहिये तो! लाटरी वगैरह लग गयी है क्या?
- नहीं,लाटरी नहीं,कोलकाता में मैंने अपना घर बेच दिया है।रोजगार कुछ है नहीं बहुत रुपये का कर्ज भी चढ़ गया है, मेरी जमानत के लिए आपने जो रुपये दिये,उनमें से एक पैसा भी आज तक लौटा नहीं सका!
-मैंने क्या  एकबार भी वे रुपये मांगे हैं? और उन्हीं रुपयों को लौटाने के लिए आपको घर बेचना पड़ा!
-सिर्फ आपके रुपये नहीं हैं।और भी काफी कर्ज उधार हो गया है।जंगल में गरीब लोगं के कंधे पर बैठकर हम दोनों इतने महीनों से खा रहे हैं,पाकेट एकदम गढ़ का मैदान है! यहां तक कि अपने लिए दवाएं,साबुन,टूथपेस्ट खरीदने तक के पैसे नहीं हैं।इसके लिए किसके आगे हाथ फैलायें?
-किंतु घर बेचने से पहले ,यह बात एक बार मुंह खोलकर मुझसे तो आप कह सकते थे! सुनील सान्याल के गले में अभिमान का स्वर।इसके बाद कहा,अन्यथा ने लें, सुमनबाबू,हाल में देख रहा हूं कि आप मुझसे काफी कुछ छुपाने लगे हैं।
सुमन जानता था,सुनील सान्याल से ये बातें उसे एकदिन सुननी ही हैं।यह भी जानता था कि सुनकर उसे चुप ही रहना है।सुनील सान्याल के पास वह चिरकृतज्ञ है, चिर ऋणी है।फिरभी सारी बातें उनसे कही नहीं जा सकतीं।सिर्फ सुनील सान्याल ही क्यों,अत्यंत अंतरंग,इतने अरसे से उसकी संगिनी अदिति से भी नहीं।
इसलिए सुनील सान्याल का अभियोग सुनकर चुप रहा सुमन।
फिर बैग से एक पैकेट निकालकर सुनील सान्याल के हाथों में देकर कहा,आपके यहां मेरा कितने रुपये उधार हैं,मेरे पास इसका कोई हिसाब नहीं है।लेकिन मुझे एक बात मालूम है- सिर्फ इस जनम में नहीं,सात जनम में भी मैं आपका कर्ज उतार नहीं सकता। मेरे बाकी बचे आत्म सम्मान की दुहाई है,यह मामूली रकम स्वीकार करके मुझे उस विशाल ऋण के बोझ से थोड़ा सा मुक्त कर दें।
सुनील सान्याल पैकेट हाथ में लेकर कुछ देर तक चुपचाप खड़े रहे।इसके बाद गंभीर होकर बोले,आपने जानबूझ कर मुझे धर्म संकट में डाला है।यह काम आपने सही नहीं किया।
आज परिस्थिति ने उसे ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया है कि वहां क्या सही है, क्या गलत- सुमन ने शायद यह बोध ही खो दिया है।
अलीपुरदुआर से बक्सादुआर की यात्रियों से ठसाठस भरी बस में एक कोने में खड़े खड़े सुमन यही सोच रहा था।इस पल ढेर सारे गलत ने एक साथ उसे घेर लिया है। अदिति की आंखों में उसका घर बेचने का फैसला गलत है।सुनील सान्याल के लिए उसकी कर्ज उतारने की कोशिश गलत है।जगरु के नजरिये से सुशीला को लेकर उसका आतंक गलत है।सरकार के लिए उसके प्रतिवाद की भाषा गलत है तो सिंथिया के लिए उसका जंगल में अकेले ही घूमते रहना गलत है।बरदोलोई की नजर में जंगल के लोगों को लिखना पढ़ाना सिखाना गलत है।सशस्त्र सीमा बल की दृष्टि में उसका जंगल में रहना ही गलत है।
अभिमन्यु की तरह इतने सारे गलत ने उसे चारों तरफ से घेर लिया है।इस गलत के ब्यूह को कैसे तोड़कर वह निकल पायेगा,उसे मालूम नहीं है।





 




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